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घर का हिस्सा

 “दादी, ये वाली कहानी फिर से सुनाओ ना… जिसमें छोटी-सी लड़की खुद ही स्कूल खोल देती है!”

आयुषी अपनी दादी के घुटनों पर सिर रखकर ज़िद कर रही थी।

कैलानी देवी ने हँसते हुए उसके बालों में उँगलियाँ फेरा,
“अरे पगली, वो कहानी कितनी बार सुन चुकी है तू! चल, आज तेरे लिए नई कहानी सुनाती हूँ… लेकिन पहले तू ये कॉपी–पेंसिल समेट दे, कमरे में कितनी बिखरी रहती हैं तेरी चीज़ें।”

आयुषी भागती हुई सामान समेटने लगी।
ड्रॉइंग रूम में बैठी सीमा ने ये सब देखते हुए गहरी साँस ली।

“अम्मा, आप बस इसी बच्ची के साथ लगी रहती हैं, कभी खुद के लिए भी तो सोचिए। उम्र हो गई है, आराम करिए। ये रोज़-रोज़ मोहल्ले के बच्चों को बुलाकर पढ़ाना, कहानी सुनाना… अब नहीं होता आपसे ये सब। कमर भी दुखती रहती है आपकी,” सीमा ने थोड़ा खीझकर कहा।

कैलानी चुप रहीं।
उनकी नज़र गोद में बैठे आयुषी के कॉपी–पेंसिल पर टिक गई, जिसमें टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था—
“अ आ इ ई…”

इसी बीच राहुल ऑफिस से घर लौटा।
बैग सोफे पर रखते ही बोला,
“माँ, डॉक्टर ने क्या कहा? दवा टाइम पर ली आपने? मैंने तो साफ कहा था, ज़्यादा चलना-फिरना मत, आराम कीजिए।”

“हाँ बेटा, ली दवा,” कैलानी ने सहजता से जवाब दिया,
“बस थोड़ा-बहुत घर के बच्चों को पढ़ा देती हूँ, इतना क्या ज़ोर पड़ता है।”

“इतना क्या ज़ोर…” सीमा तुरंत बोल पड़ी,
“सुबह मंदिर, फिर दोपहर में मोहल्ले के तीन–तीन बच्चों को बुलाकर पढ़ाना, फिर शाम को आयुषी के साथ खेलना… और ऊपर से रसोई में हमारे पीछे-पीछे लगे रहना। अम्मा, अब आपकी उम्र घर के काम करने की नहीं, आराम करने की है।”

राहुल ने भी हाँ में हाँ मिलाई,
“बिलकुल, हम हैं ना आपके लिए। नौकरानी है, कामवाली है। आप बस पूजा-पाठ करिए, टीवी देखिए, आराम करिए। ये बच्चों को पढ़ाने का झंझट छोड़ दीजिए।”

कैलानी मुस्कुराईं अवश्य, पर दिल के किसी कोने में हल्की चुभन भी हुई।
उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा,
“ठीक है बेटा, जैसा तुम दोनों को ठीक लगे। अब से नहीं पढ़ाऊँगी किसी को।”

आयुषी ये सब सुन रही थी।
उसने दादी का हाथ पकड़ा,
“दादी, सच में? अब मेरी कविता भी नहीं सुनवाओगी? अक्षर भी नहीं लिखवाओगी?”

“तू तो मेरी पोती है, तुझे कौन रोक सकता है मुझसे कुछ सीखने से?”
कैलानी ने प्यार से उसके माथे को चूम लिया,
“लेकिन मोहल्ले वाले बच्चों को शायद अब न बुलाऊँ।”

अगले कुछ दिनों तक घर में अजीब-सी ख़ामोशी छाई रही।
कैलानी सुबह मंदिर जातीं, फिर लौटकर अपने कमरे में रामायण या अख़बार पढ़तीं, पर चेहरा पहले जैसा चमकता नहीं था।
मोहल्ले के जो बच्चे रोज़ शाम को उनके घर का दरवाज़ा खटखटाते थे, अब गली में दिखकर सिर्फ़ नमस्ते कहकर निकल जाते।

एक दिन दोपहर को आयुषी स्कूल से लौटी तो उसके साथ दो और बच्चे थे—
शिवम और राधिका।
दोनों के हाथ में रिपोर्ट कार्ड थे, चेहरे पर चिंता की लकीरें।

“दादी, ये दोनों मेरे क्लास के हैं। इनका मैथमेटिक्स में बहुत कम नंबर आया है। ये लोग आपके पास पढ़ने आना चाहते हैं, लेकिन मम्मी ने मना किया है ना? इसलिए ये डरते-डरते आए हैं,” आयुषी ने हिचकते हुए कहा।

कैलानी ने बच्चों के रिपोर्ट कार्ड लेकर देखा।
वाकई, नंबर कम थे, पर आँखों में सीखने की चमक साफ दिखाई दे रही थी।

“आप उनके मम्मी-पापा से बात कर लो ना?” आयुषी ने धीरे से सुझाव दिया,
“आप तो सबकी ‘कैलानी टीचर’ हो। सब आपकी इज़्ज़त करते हैं।”

कैलानी ने कुछ पल सोचा,
फिर बच्चों से कहा,
“तुम लोग नीचे बरामदे में बैठो, मैं अभी आती हूँ।”

वह सीधे किचन में पहुँची, जहाँ सीमा सब्ज़ी काट रही थी।
“बहू, मुझे तुमसे एक बात कहनी है,” उन्होंने शांत स्वर में कहा।

“जी अम्मा?” सीमा ने बिना ऊपर देखे जवाब दिया।

“मैं समझती हूँ तुम और राहुल मेरी भलाई ही चाहते हो।
पर क्या तुम अपने बच्चे को दिनभर बस बिस्तर पर पड़े हुए देखना चाहोगी?
जो आदमी पूरी ज़िंदगी काम करके घर चलाता रहा हो,
अगर उसे अचानक कह दो—‘अब तुम सिर्फ़ खाओ, सोओ, टीवी देखो’—तो क्या वो खुश रह पाएगा?”

सीमा ने काम रोककर पहली बार ध्यान से माँ की तरफ़ देखा।
उनकी आँखों में शिकायत नहीं, बस एक गहरी बेचैनी थी।

“बहू, मैंने चालीस साल तक गाँव के स्कूल में पढ़ाया है।
मेरे लिए बच्चों को पढ़ाना सिर्फ़ काम नहीं, साँस लेने जैसा है।
तुम मुझे दवा देती हो, समय पर खाना खिलाती हो,
पर जो काम मेरे दिल को सुकून देता है,
अगर वो ही मुझसे छिन जाए तो मैं किस बात की ‘स्वस्थ’ रहूँगी?”

सीमा को पिछली बात याद आई—
कैसे उसने तेज़ आवाज़ में कहा था, “अम्मा, अब आपकी उम्र काम करने की नहीं।”
उसे थोड़ा पछतावा हुआ, पर स्वभाव के अनुसार सीधे स्वीकार नहीं कर पाई।

“पर अम्मा, हम तो सोच रहे थे कि आप थक जाती हैं…”

कैलानी ने बीच में ही कहा,
“थकान शरीर की नहीं, मन की ज़्यादा होती है बहू।
जो काम मन से किया जाए, वो थकाता नहीं, जगा देता है।
मैं कहाँ दिनभर खेत में हल चला रही हूँ?
दो–चार बच्चों को, जिनके माता-पिता महँगी ट्यूशन के पैसे नहीं दे सकते,
अगर मैं खेल-खेल में थोड़ा लिखना-पढ़ना सिखा दूँ,
तो क्या बुरा कर दूँगी?”

राहुल भी कमरे में आ चुका था।
आँखों से दिख गया कि उसने माँ की बात सुन ली है।

“माँ…” उसने धीमे से कहा,
“हम शायद ज़्यादा ही प्रोटेक्टिव हो गए थे आपके लिए।
हमें लगा, आपने सारी उम्र मेहनत की है, अब बस आराम मिलना चाहिए।
पर आपने ठीक कहा, बिना काम के… आदमी खुद को बोझ समझने लगता है।”

कैलानी ने मुस्कुरा दिया,
“मैंने तुम्हें हमेशा यही सिखाया है, बेटा—
कि बुज़ुर्गों की देखभाल सिर्फ़ दवा–कपड़े–खाना तक सीमित नहीं होती।
उन्हें ये अहसास भी होना चाहिए कि वो अभी भी किसी काम के हैं,
उनका अनुभव किसी के काम आ रहा है।
जरूरत सिर्फ़ शरीर को नहीं, आत्मसम्मान को भी होती है।”

राहुल ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए,
“माँ, आप जैसे चाहें वैसे रहिए।
आपके पढ़ाने से किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी।
बस इतना वादा कीजिए कि थक जाएँ तो आराम कर लेंगी,
और गिरने-पड़ने वाली जिद्द नहीं करेंगी।”

सीमा ने भी आगे बढ़कर कहा,
“अम्मा, मुझसे उस दिन सच में गलती हो गई।
आप मोहल्ले के बच्चों को पढ़ाइए।
जब भी आपको लगे कि ज़्यादा काम हो गया,
मुझसे कहिएगा।
मैं चाय बना दूँगी, पकोड़े तल दूँगी…
आप बस मेरी टीचर बनकर मुझे भी सिखाइए,
कैसे इतना धैर्य रखकर बच्चों से निपटा जाता है।”

कैलानी की आँखें भर आईं।
पर उन्होंने तुरंत आँसू पोंछ डाले,
“चलो, अब इतने भावुक मत बनो।
पहले उन तीनों बच्चों को बैठा दो,
फिर देखते हैं कौन-कौन-सा टेबल याद नहीं है उन्हें।”

कुछ ही दिनों में फिर वही पुराना नज़ारा लौट आया।
शाम के समय कैलानी के घर के बरामदे में चार-पाँच बच्चे बैठते,
किसी के हाथ में स्लेट, किसी के हाथ में कॉपी।
आयुषी तो जैसे आधी मॉनिटर बन गई थी—
“सही से बोलो, आठ दोनी सोलह… शाबाश!”

गली से गुज़रते लोग मुस्कुरा कर कहते,
“देखो, कैलानी मैडम का स्कूल फिर से खुल गया।”

धीरे-धीरे आस-पास की दो-तीन महिलाएँ भी अपने बच्चों को लेकर आने लगीं,
“बहन जी, दो घंटे तो ये मोबाइल में सिर घुसाए रहता है,
अगर आपके पास बैठ जाए तो शायद दो लाइन लिखना सीख जाए।”

राहुल कभी शाम को जल्दी लौटता तो यह दृश्य देखते हुए
अंदर तक सुकून महसूस करता।
सीमा भी अब अक्सर कह देती,
“अम्मा, बच्चा आपका है—
डाँट भी आप दीजिए, प्यार भी आप दीजिए।
बस बीच-बीच में खुद की चाय लेना मत भूलिएगा।”

एक दिन रात को टीवी देखते हुए सीमा ने राहुल से कहा,
“जानते हो, पहले मुझे लगता था
कि मैंने अम्मा की बहुत सेवा की है—
खाना, दवा, कपड़े, मंदिर, सब सुविधा दी।
आज समझ आया, मैंने उन्हें ‘आराम’ तो दिया,
पर ‘मायने’ नहीं दिया था।
असल में बड़ा होना ये नहीं कि हम बड़ों को
कुर्सी पर बिठाकर कहें—
‘अब आप चुपचाप बैठिए।’
बड़ा होना ये है कि हम उन्हें
उनका पसंदीदा काम करने की आज़ादी दें,
उनके अनुभव का सम्मान करें।”

राहुल ने सिर हिलाया,
“हम्म… और ये भी मानना पड़ेगा कि
हमने अपने बच्चे को तो पहले ही बिगाड़ दिया था।
अब अगर वो नंबर लाएगा,
तो उसमें ‘कैलानी टीचर’ का ही हाथ होगा।”

बगल के कमरे में,
कैलानी अपने बिस्तर पर सोने से पहले
आयुषी की कॉपी देख रही थीं।
नीचे टेढ़े-मेढ़े अक्षरों से लिखा था—
“दादी सबसे अच्छी टीचर है”

उन्होंने धीमे से बत्ती बुझाई,
और मन ही मन सोचा—

“शुक्र है, अब मेरे अपने ही
मुझे मेहमान नहीं,
घर का हिस्सा समझने लगे हैं।”


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