रवि ने जैसे ही घर का दरवाजा खोला, अंदर से बर्तनों के गिरने की तेज आवाज आई। उसके कदम वहीं ठिठक गए। दिन भर ऑफिस की फाइलों और बॉस की फटकार से जूझने के बाद, उसे उम्मीद थी कि घर में दो पल सुकून के मिलेंगे, लेकिन पिछले छह महीनों से 'सुकून' शब्द उसकी डिक्शनरी से जैसे गायब ही हो गया था।
अंदर के कमरे से वंदना की तेज आवाज आ रही थी, "मैं पहले ही कह चुकी हूं, मुझसे ये चिक-चिक नहीं होगी। मेरे पापा ने मुझे रानियों की तरह पाला है, नौकरानी बनने के लिए नहीं भेजा यहाँ। अगर आपके माता-पिता को समय पर खाना चाहिए, तो एक कामवाली बाई का इंतजाम क्यों नहीं करते? या फिर खुद जल्दी आ जाया करो ऑफिस से!"
रवि ने गहरी सांस ली और अंदर दाखिल हुआ। सामने का नजारा वही पुराना था। डाइनिंग टेबल पर खाना बिखरा पड़ा था। रवि की माँ, सुमित्रा जी, एक कोने में कुर्सी पर बैठी अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछ रही थीं और पिताजी, हरिशंकर जी, सिर झुकाए चुपचाप बैठे थे। वंदना कमर पर हाथ रखे, आँखों में अंगारे लिए खड़ी थी।
"क्या हुआ वंदना? अभी तो घर में कदम रखा है, और फिर शुरू हो गई तुम?" रवि ने अपना बैग सोफे पर पटकते हुए कहा। उसकी आवाज में गुस्सा कम और थकान ज्यादा थी।
वंदना तमतमाई हुई रवि की ओर मुड़ी, "हां, तो और क्या करूं? तुम्हारी माँ ने फिर से कह दिया कि सब्जी में नमक कम है। अरे, मैं कोई रसोइया हूं क्या? जो बना दिया, चुपचाप खा लेना चाहिए। ऊपर से मुझे ज्ञान दे रही हैं कि 'बहू, थोड़ा घर का काम मन लगा कर किया करो'। मन कहां से लगेगा रवि? मेरे मायके में मैंने कभी गिलास उठाकर पानी नहीं पिया, और यहाँ पूरे घर का झाड़ू-पोछा, बर्तन... मेरी तो कमर टूट गई है। मेरी उंगलियां देखो, कैसी रूखी हो गई हैं।"
रवि ने बेबसी से माता-पिता की ओर देखा। वह जानता था कि वंदना झूठ बोल रही है। घर में झाड़ू-पोछा करने के लिए सुबह एक बाई आती है। वंदना को सिर्फ दोपहर और रात का खाना बनाना होता है, और वह भी वह अक्सर बाहर से ऑर्डर करने की जिद करती है। लेकिन रवि की सैलरी इतनी नहीं थी कि वह रोज होटल का खाना खिला सके या वंदना के कहे अनुसार 24 घंटे की फुल-टाइम मेड रख सके। घर का लोन, पिताजी की दवाइयां और घर का खर्च—सब कुछ उसे ही देखना होता था।
"वंदना, माँ ने बस इतना कहा होगा कि नमक देख लेना। इसमें इतना बखेड़ा खड़ा करने की क्या जरूरत है? और रही बात काम की, तो तुम जानती हो मेरी हालत। अभी मैं फुल टाइम मेड अफोर्ड नहीं कर सकता," रवि ने समझाने की कोशिश की।
"तो फिर अलग हो जाओ!" वंदना ने चिल्लाकर अपना अंतिम फैसला सुना दिया। "हम अलग घर लेंगे। वहां मैं जो चाहूंगी, जैसे चाहूंगी रहूंगी। इन बुड्ढे-बुढ़ियों की सेवा मुझसे नहीं होगी। वैसे भी ये दोनों दिन भर खट-खट करते रहते हैं, मेरी तो प्राइवेसी ही खत्म हो गई है।"
सुमित्रा जी का दिल धक से रह गया। उन्होंने कांपते हाथों से पानी का गिलास उठाया, लेकिन वंदना ने झपट्टा मारकर गिलास मेज पर पटक दिया। "ड्रामा मत करिये माँजी! ये सब सहानुभूति बटोरने के पुराने तरीके हैं। रवि, मैं साफ कह रही हूँ, या तो ये घर में रहेंगे या मैं। मुझे अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीनी है।"
उस रात घर में चूल्हा नहीं जला। रवि और उसके माता-पिता भूखे सोए, जबकि वंदना ने अपने लिए पिज्जा ऑर्डर किया और बेडरूम का दरवाजा जोर से बंद कर लिया। रवि बाहर ड्राइंग रूम में सोफे पर लेटा छत को घूरता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। वह वंदना से प्यार करता था, लेकिन अपने माता-पिता को इस उम्र में कैसे छोड़ दे? वह पिता जिन्होंने अपनी पीएफ की रकम से उसे इंजीनियरिंग करवाई, वह माँ जिसने अपनी गहने बेचकर उसकी पहली बाइक दिलाई थी। क्या आज वे बोझ बन गए?
अगले कुछ दिन घर का माहौल और भी जहरीला हो गया। वंदना ने अब मौन व्रत तोड़कर 'असहयोग आंदोलन' शुरू कर दिया था। उसने खाना बनाना बंद कर दिया। रवि सुबह उठकर जल्दी-जल्दी चाय और नाश्ता बनाता, माता-पिता को देता और फिर ऑफिस भागता। वंदना अपने कमरे से तभी निकलती जब रवि चला जाता। वह जानबूझकर जोर-जोर से टीवी चलाती जब हरिशंकर जी दोपहर में आराम कर रहे होते।
एक शाम, जब रवि घर लौटा, तो उसने देखा कि पिताजी को अस्थमा का अटैक आया है और वे जोर-जोर से खांस रहे हैं। इनहेलर खत्म हो गया था। सुमित्रा जी घबराई हुई वंदना के कमरे का दरवाजा खटखटा रही थीं, "बहू... ओ बहू... जरा रवि को फोन लगा दे या नीचे से दवा ला दे, इनके पापा की सांस उखड़ रही है।"
अंदर से वंदना की आवाज आई, "माँजी, मैं अभी फेसपैक लगाकर बैठी हूँ, बाहर नहीं जा सकती। आप खुद चली जाइए न, सीढ़ियां ही तो उतरनी हैं।"
यह सुनकर रवि का खून खौल उठा। उसने दौड़कर पिताजी को संभाला, तुरंत केमिस्ट से दवा लाई और उन्हें नेबुलाइजर दिया। जब पिताजी की सांसें स्थिर हुईं, तो रवि गुस्से में वंदना के कमरे में गया।
"तुम इंसान हो या पत्थर?" रवि चिल्लाया। "पिताजी की जान जा सकती थी और तुम्हें अपने फेसपैक की पड़ी थी?"
वंदना ने आईने में खुद को निहारते हुए लापरवाही से कहा, "अरे, तो क्या हुआ? बुढ़ापे में ये सब तो लगा ही रहता है। हर छोटी बात पर पैनिक होने की क्या जरूरत है? और मैंने कहा था न, मुझसे नर्स वाली उम्मीदें मत रखना।"
रवि ने हाथ उठाना चाहा, लेकिन रुक गया। उसने अपनी मुट्ठी भींच ली। "भगवान सब देख रहा है वंदना। इंसान को अपने कर्मों का फल इसी जन्म में मिलता है। याद रखना।"
वंदना जोर से हंसी। "ओहो! अब तुम मुझे प्रवचन दोगे? कर्म-वर्म कुछ नहीं होता। जिसके पास पैसा और पावर है, वही सुखी है। तुम जैसे इमोशनल बेवकूफ ही कर्म के भरोसे बैठते हैं।"
तभी वंदना का फोन बजा। उसके भाई, अमित का फोन था। वंदना ने चहकते हुए फोन उठाया, "हाँ भैया! कैसे हो? कब आ रहे हो मुझे लेने?"
लेकिन दूसरी तरफ से जो आवाज आई, उसने वंदना के चेहरे का रंग उड़ा दिया। अमित की आवाज में घबराहट थी। "वंदना, तू जल्दी घर आजा। माँ बाथरूम में गिर गई हैं। उन्हें काफी चोट आई है। और... और घर में बहुत क्लेश हो रहा है। तू बस आजा।"
वंदना के हाथ-पांव फूल गए। "मैं... मैं अभी आ रही हूँ भैया।" उसने रवि की तरफ देखा। रवि ने बिना कोई सवाल किए गाड़ी की चाबी उठाई। "चलो, मैं छोड़ देता हूँ।"
रास्ते भर वंदना भगवान से प्रार्थना करती रही। उसका दिल अपनी माँ के लिए बैठा जा रहा था। जैसे ही वे वंदना के मायके पहुँचे, वंदना दौड़कर अंदर गई।
दृश्य देखकर वंदना के पैरों तले जमीन खिसक गई।
हॉल में सोफे पर उसकी भाभी, शिखा, आराम से मैगजीन पढ़ रही थी और पास में म्यूजिक सिस्टम पर गाने चल रहे थे। वंदना की माँ, जानकी देवी, जिनके पैर पर प्लास्टर चढ़ा था, फर्श पर बैठी दर्द से कराह रही थीं और कोशिश कर रही थीं कि पास रखे जग से पानी ले सकें। जग उनकी पहुँच से थोड़ा दूर था।
वंदना दौड़कर माँ के पास गई, उन्हें पानी पिलाया और फिर शिखा की तरफ मुड़ी। "भाभी! आपको दिखाई नहीं देता? माँ दर्द से तड़प रही हैं और आप यहाँ गाने सुन रही हैं? एक गिलास पानी नहीं दे सकती थीं?"
शिखा ने मैगजीन नीचे रखी और वंदना को ऊपर से नीचे तक देखा। उसके चेहरे पर वही भाव थे, जो अक्सर वंदना के चेहरे पर होते थे—लापरवाही और अहंकार।
"ओह वंदना! तुम आ गई," शिखा ने च्युइंग गम चबाते हुए कहा। "देखो, ज्यादा चिल्लाने की जरूरत नहीं है। मेरा आज किटी पार्टी का दिन था, जो मैंने कैंसिल किया है तुम्हारी माँ की वजह से। यही बहुत बड़ा एहसान है। और रही बात पानी की, तो मैंने नौकरानी से कहा था रखकर जाने को, अब अगर बुढ़िया... आई मीन, मम्मी जी से खुद नहीं लिया जा रहा तो मैं क्या करूँ? मैं कोई आया (nurse) थोड़ी हूँ?"
वंदना को लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर तमाचा मारा हो। ये शब्द... ये तो वही शब्द थे जो उसने कल रात रवि से कहे थे।
"भाभी, ये मेरी माँ हैं! आपकी सास हैं! आप ऐसा कैसे कह सकती हैं?" वंदना की आँखों में आंसू आ गए।
शिखा खड़ी हो गई, उसकी आँखों में तल्खी थी। "वंदना, तुम मुझे मत सिखाओ। जब तुम यहाँ थी, तो तुमने कभी एक तिनका उठाया था? माँ जी ने ही तुम्हें सिर पर चढ़ा रखा था। 'मेरी बेटी, मेरी राजकुमारी' करती थीं। अब वही राजकुमारी अपने ससुराल में क्या कर रही है, मुझे सब पता है। अमित ने बताया था कि तुम अपने सास-ससुर के साथ कैसा बर्ताव करती हो।"
वंदना सन्न रह गई।
शिखा आगे बढ़ी, "तुमने ही तो ट्रेंड सेट किया है न वंदना? 'मॉडर्न बहू' काम नहीं करती, सिर्फ ऑर्डर देती है। तो मैं भी वही कर रही हूँ। मुझे भी अपनी लाइफ जीनी है। मुझे भी इन बुजुर्गों की चिक-चिक नहीं पसंद। अगर तुम्हें अपनी माँ की इतनी चिंता है, तो ले जाओ इन्हें अपने साथ। वैसे भी ये घर मेरे और अमित के नाम होने वाला है।"
तभी वंदना के पिता, जो हमेशा कड़क स्वभाव के थे, कमरे से बाहर आए। उनके कपड़े मैले थे और चेहरा उतरा हुआ। वे वंदना को देखकर रो पड़े। "बेटी, ले जा हमें यहाँ से। यहाँ हमें दो वक्त की रोटी के लिए भी ताने सुनने पड़ते हैं। तेरी भाभी कहती है कि हम बोझ हैं।"
वंदना ने अपने पिता की वह हालत देखी तो उसका कलेजा मुंह को आ गया। ये वही पिता थे जिन्होंने वंदना की हर जिद पूरी की थी, जिन्होंने कभी उसे धूप में नहीं निकलने दिया था। आज वे अपनी ही बहू के सामने गिड़गिड़ा रहे थे।
वंदना शिखा पर चिल्लाना चाहती थी, उसे नोच लेना चाहती थी, लेकिन उसकी आवाज गले में फंस गई। किस मुंह से वह शिखा को गलत ठहराए? शिखा तो बस वंदना का ही प्रतिबिंब (reflection) थी। जो बीज वंदना ने अपने ससुराल में बोया था, उसकी फसल उसके मायके में पक चुकी थी और अब उसे वह कड़वा फल चखना पड़ रहा था।
रवि दरवाजे पर खड़ा सब देख रहा था। उसने कुछ नहीं कहा, बस वंदना के कंधे पर हाथ रखा।
वंदना माँ के गले लगकर फूट-फूट कर रोई। उस आंसुओं में सिर्फ माँ के दर्द का दुख नहीं था, बल्कि अपने पापों का प्रायश्चित भी था। उसे सुमित्रा जी का चेहरा याद आया, जिन्हें उसने पानी के लिए तरसाया था। उसे हरिशंकर जी की खांसी याद आई, जिसे उसने ड्रामा कहा था। आज जब उसकी अपनी माँ फर्श पर पड़ी थी, तब उसे समझ आया कि 'बोझ' और 'जिम्मेदारी' में क्या फर्क होता है।
कुछ देर बाद, वंदना उठी। उसने अपने आंसू पोंछे। वह शिखा के पास गई, लेकिन लड़ने के लिए नहीं।
"भाभी," वंदना की आवाज में अब अकड़ नहीं थी, बल्कि एक टूटे हुए इंसान की नरमी थी। "आप सही कह रही हैं। गलती आपकी नहीं है। गलती उस सोच की है जिसे मैंने भी पाला था। आज मुझे समझ आ गया कि जब हम ऊपर थूकते हैं, तो वह हमारे ही चेहरे पर गिरता है।"
उसने रवि की तरफ देखा, "रवि, क्या हम माँ-पापा को कुछ दिन अपने घर ले जा सकते हैं? जब तक ये ठीक न हो जाएं?"
रवि ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, "हमारा घर बड़ों का ही है वंदना, चाहे वो मेरे माता-पिता हों या तुम्हारे।"
शिखा और अमित अवाक खड़े थे। उन्हें उम्मीद थी कि वंदना तमाशा करेगी, पुलिस बुलाएगी। लेकिन वंदना की इस खामोश स्वीकारोक्ति ने उन्हें शर्मिंदा कर दिया।
शाम को जब वंदना वापस अपने ससुराल लौटी (मायके वालों को समझाने के बाद कि वह कल से रोज आकर देखभाल करेगी), तो घर का माहौल बदला हुआ था। नहीं, घर वही था, लोग वही थे, बदला था तो बस वंदना का नजरिया।
वह सीधे रसोई में गई। सुमित्रा जी डर गई थीं कि बहू फिर किसी बात पर लड़ेगी। "बहू, मैं अभी चाय बना देती हूँ..."
वंदना ने सुमित्रा जी के हाथ से चायदानी ले ली। "नहीं माँजी, आप बैठिए। आज आपके घुटनों में दर्द है न? मैं तेल मालिश कर दूंगी। और... मुझे माफ कर दीजिए।"
सुमित्रा जी और हरिशंकर जी एक-दूसरे को देखने लगे। क्या यह वही वंदना है?
वंदना ने चाय का कप मेज पर रखा और रवि के पास जाकर धीमे स्वर में बोली, "मुझे माफ करना रवि। मुझे समझने में बहुत देर हो गई कि 'जैसी करनी वैसी भरनी' सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का सच है। मैं नहीं चाहती कि कल मेरा बेटा आरव बड़ा होकर मेरे साथ वही करे जो मैंने आपके माता-पिता के साथ किया, या जो भाभी ने मेरी माँ के साथ किया। मैं इस चक्र को यहीं तोड़ना चाहती हूँ।"
रवि ने वंदना का हाथ थाम लिया। उस रात, उस छोटे से घर में अमीरी तो नहीं आई, लेकिन एक सुकून आया जो करोड़ों खर्च करके भी नहीं मिलता।
वंदना ने सीख लिया था कि रिश्ते शीशे की तरह होते हैं—अगर आप उसमें मुस्कुराहट देखना चाहते हैं, तो आपको भी मुस्कुराना ही पड़ेगा। अगर आप पत्थर मारेंगे, तो सामने से कांच के टुकड़े ही आएंगे जो आपको ही घायल करेंगे।
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**लेखक का संदेश:**
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि वक्त का पहिया गोल है। आज हम जो व्यवहार अपने बुजुर्गों के साथ कर रहे हैं, कल हमारी संतान या हमारे अपने वही व्यवहार हमारे साथ दोहराएंगे। कर्म का पता कभी नहीं बदलता, वह लौटकर आता ही है। अपने घर के बड़ों का सम्मान करें, क्योंकि उनकी दुआएं वो कवच हैं जो बड़ी से बड़ी मुसीबत को रोक लेती हैं, और उनकी बद्दुआएं वो आग हैं जो हंसते-खेलते घर को राख कर देती हैं।
**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद**
**शीर्षक: पिता का वो आखिरी झूठ**
**हूक लाइन:**
"दुनिया को लगा कि बेटे ने पिता को बेघर कर दिया, लेकिन उस बंद लिफाफे में छिपी वसीयत कुछ और ही कहानी बयां कर रही थी। क्या एक पिता अपने बेटे की खुशियों के लिए खुद को 'बेचारा' बना सकता है?"
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सुबह के दस बज रहे थे। सूर्यकांत सोसायटी के गेट नंबर दो पर सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन उस सन्नाटे में भी एक अजीब सा शोर था। वह शोर था पहियों की गड़गड़ाहट का। 65 वर्षीय दीनानाथ जी अपना पुराना भूरे रंग का सूटकेस घसीटते हुए मुख्य द्वार की ओर बढ़ रहे थे। उनके पीछे उनका बेटा, आकाश, सिर झुकाए खड़ा था। उसने पिता को रोकने की कोशिश नहीं की, न ही उसने आगे बढ़कर वह भारी सूटकेस उनके हाथ से लिया।
बालकनी में खड़े मिस्टर वर्मा ने अपनी पत्नी सरिता से कहा, "देख रही हो सरिता? यही है कलयुग। जिस बेटे को दीनानाथ जी ने अपनी पीएफ की पाई-पाई जोड़कर इंजीनियर बनाया, आज वही बेटा उन्हें घर से निकाल रहा है। सुना है कल रात इनके घर से बहुत जोर-जोर से चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं।"
सरिता ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, "और वो बहू? वो तो दिख भी नहीं रही। अरे, जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो बहू को क्या दोष देना। भगवान बचाए ऐसी औलाद से। बेचारे दीनानाथ जी, पत्नी के जाने के बाद सोचा था बेटे के सहारे ज़िंदगी कटेगी, पर यहाँ तो बुढ़ापा सड़कों पर आ गया।"
सोसायटी के गार्ड ने भी सहानुभूति भरी नज़रों से दीनानाथ जी को ऑटो में बैठते हुए देखा। आकाश गेट के अंदर ही खड़ा रहा, तब तक जब तक ऑटो आँखों से ओझल नहीं हो गया। जैसे ही ऑटो मुड़ा, आकाश ने तेज़ी से पलटकर अपने घर की ओर दौड़ लगा दी। देखने वालों को लगा कि उसे पिता के जाने की इतनी खुशी है कि वह रुक नहीं पा रहा, लेकिन किसी ने उसकी आँखों में छिपी नमी को नहीं देखा।
अगले कुछ हफ़्तों तक सोसायटी में आकाश का सामाजिक बहिष्कार सा हो गया। लिफ्ट में कोई उससे बात नहीं करता। पार्क में अगर वह अपनी तीन साल की बेटी को लेकर आता, तो लोग अपनी जगह बदल लेते। मिस्टर वर्मा ने तो एक दिन सबके सामने तंज भी कस दिया, "क्यों भाई आकाश, पिताजी के कमरे को अब गेस्ट रूम बनवा लिया या स्टोर रूम? नींद आ जाती है उस घर में जहाँ से पिता को धक्के देकर निकाला हो?"
आकाश कुछ नहीं बोला। उसने बस फीकी मुस्कान दी और वहां से चला गया। उसकी यह चुप्पी लोगों को उसकी 'बेशर्मी' का सबूत लगी।
करीब तीन महीने बीत गए। दीनानाथ जी का कोई अता-पता नहीं था।
एक दिन मिस्टर वर्मा को शहर के मशहूर 'आस्था केयर होम' में जाने का मौका मिला। उनकी एक दूर की रिश्तेदार वहां भर्ती थीं। वर्मा जी रिसेप्शन पर खड़े थे कि तभी उनकी नज़र लॉन में बैठी एक जानी-पहचानी आकृति पर पड़ी। वह दीनानाथ जी थे। लेकिन वह वैसे नहीं लग रहे थे जैसे तीन महीने पहले लगते थे। वह एक व्हीलचेयर पर थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था। वह एक नर्स के साथ हंस-हंस कर बातें कर रहे थे।
वर्मा जी के मन में दबा हुआ गुस्सा उबल पड़ा। वह तेज़ कदमों से उनके पास गए। "दीनानाथ जी?"
दीनानाथ जी ने चौंक कर देखा। "अरे, वर्मा जी! आप यहाँ?"
वर्मा जी ने उनकी बगल वाली कुर्सी खींचते हुए कहा, "हमें तो लगा था कि आप किसी रिश्तेदार के यहाँ होंगे, पर उस नालायक ने आपको वृद्धाश्रम में फेंक दिया? और आप यहाँ हंस रहे हैं? उसने आपकी जायदाद हड़प ली, आपको घर से निकाल दिया और आप..."
दीनानाथ जी ने हाथ उठाकर वर्मा जी को रोका। उनकी मुस्कान फीकी नहीं पड़ी, बल्कि और गहरी हो गई। उन्होंने नर्स को इशारा किया कि वह थोड़ी देर अकेले बात करना चाहते हैं।
"वर्मा जी," दीनानाथ जी ने शांत स्वर में कहा, "आकाश ने मुझे नहीं निकाला। मैं खुद आया हूँ।"
वर्मा जी हतप्रभ रह गए। "आप क्या कह रहे हैं? हमने खुद देखा, वो खड़ा तमाशा देख रहा था और आप सूटकेस घसीट रहे थे। उसने आपको रोका तक नहीं!"
दीनानाथ जी की आँखों में एक पुरानी पीड़ा तैर गई। उन्होंने अपनी जेब से एक मुड़ा-तुड़ा कागज़ निकाला और वर्मा जी की तरफ बढ़ाया। वह एक मेडिकल रिपोर्ट थी।
"अल्ज़ाइमर... शुरुआती स्टेज," वर्मा जी ने पढ़ा। उन्हें समझ नहीं आया।
"छह महीने पहले मुझे पता चला," दीनानाथ जी ने बताना शुरू किया। "शुरुआत में मैं चाबियाँ भूलता था, फिर रस्ते... लेकिन बात तब बिगड़ गई जब एक दिन मैंने गैस खुली छोड़ दी। घर में मेरी पोती, गुड़िया, सो रही थी। अगर उस दिन आकाश समय पर न आता, तो पूरा घर उड़ जाता।"
वर्मा जी सन्न रह गए।
दीनानाथ जी ने आगे कहा, "डॉक्टर ने कहा कि मेरी बीमारी बढ़ेगी। मैं आक्रामक हो सकता हूँ, चीज़ें भूल सकता हूँ। आकाश और मेरी बहू, नेहा, दोनों ने रो-रो कर मुझे समझाया कि वे मेरा ख्याल रखेंगे। उन्होंने घर में नर्स रखने की बात की, कैमरे लगवाने की बात की। आकाश ने तो अपनी नौकरी छोड़कर 'वर्क फ्रॉम होम' लेने की ठान ली थी ताकि वो 24 घंटे मेरे पास रह सके।"
"तो फिर...?" वर्मा जी की आवाज़ अब धीमी हो चुकी थी।
"तो फिर मैंने एक पिता होने का फर्ज निभाया," दीनानाथ जी का गला भर आया। "वर्मा जी, आकाश का करियर अभी शुरू हुआ है। नेहा घर और ऑफिस दोनों संभालती है। और गुड़िया... वो तो अभी बच्ची है। क्या मैं अपनी बीमारी का बोझ उनके खिलते हुए जीवन पर डाल देता? क्या मैं यह देख सकता था कि मेरा बेटा मेरे मलमूत्र साफ़ करे और अपनी जवानी मेरी सेवा में होम कर दे? नहीं।"
दीनानाथ जी ने एक गहरी सांस ली। "मैंने नाटक किया। जानबूझकर। मैं रोज़ उनसे लड़ने लगा। मैंने उन पर चोरी का इल्ज़ाम लगाया। मैंने पड़ोसियों के सामने चिल्लाना शुरू किया ताकि आकाश को लगे कि मैं सठिया गया हूँ। लेकिन वो फिर भी नहीं माना। अंत में, मैंने उसे अपनी कसम दी। मैंने कहा कि अगर तुम मुझे इस केयर होम में नहीं छोड़ोगे, तो मैं खाना-पीना छोड़ दूंगा। मैंने उसे मजबूर किया कि वो मुझे 'निकाले'।"
वर्मा जी को लगा जैसे किसी ने उनके गाल पर तमाचा मारा हो।
"जिस दिन मैं जा रहा था," दीनानाथ जी ने आंसू पोंछते हुए कहा, "आकाश ने मुझसे कहा था- 'पापा, लोग मुझे नफरत करेंगे'। मैंने उससे कहा, 'बेटा, दुनिया के ताने सह लेना, लेकिन मेरे बुढ़ापे को अपनी बेड़ियों मत बनने देना'। वो सूटकेस जो मैं घसीट रहा था? वो खाली था वर्मा जी। मेरे कपड़े तो आकाश ने एक दिन पहले ही यहाँ भिजवा दिए थे। वो गेट पर इसलिए खड़ा था क्योंकि अगर वो आगे बढ़ता तो मेरे गले लग कर रो पड़ता, और मेरा सारा नाटक ख़राब हो जाता।"
वर्मा जी की जुबान तालू से चिपक गई थी। उन्होंने हमेशा आकाश को एक क्रूर बेटा समझा था, जबकि असल में वह एक आज्ञाकारी श्रवण कुमार था जो अपने पिता की ज़िद और उनके आत्मसम्मान की खातिर समाज की नफरत का विष पी रहा था।
"और सुनिए," दीनानाथ जी ने कहा, "यह कोई साधारण वृद्धाश्रम नहीं है। यह शहर का सबसे महंगा मेमोरी केयर सेंटर है। इसका महीने का खर्च आकाश की आधी तनख्वाह के बराबर है। वो हर रविवार सुबह 6 बजे आता है, जब आप सब सो रहे होते हैं, मुझसे मिलता है, मेरे गंदे कपड़े खुद अपने हाथों से धोता है, और मेरे उठने से पहले चला जाता है... सिर्फ़ इसलिए ताकि मुझे यह न लगे कि मैं उस पर बोझ हूँ।"
वर्मा जी की आँखों से आंसू बह निकले। उन्होंने दीनानाथ जी के हाथ पकड़ लिए। "हमने बहुत बड़ी गलती कर दी दीनानाथ जी। हम बाहरी दिखावे को सच मान बैठे। आकाश... आकाश तो देवता है।"
शाम को जब वर्मा जी वापस सोसायटी पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि आकाश अपनी कार पार्क कर रहा था। रोज़ की तरह वह सिर झुकाकर लिफ्ट की तरफ बढ़ा।
"आकाश बेटा!" वर्मा जी ने पीछे से आवाज़ दी।
आकाश ठिठक गया। उसे लगा आज फिर कोई ताना सुनने को मिलेगा। वह धीरे से मुड़ा। "जी अंकल?"
वर्मा जी उसके पास गए और बिना कुछ कहे उसे कस कर गले लगा लिया। आकाश हैरान रह गया। वर्मा जी रो रहे थे।
"माफ़ कर देना बेटा। हम सब अंधे थे। हमें नहीं पता था कि तुम उस घर में अकेले नहीं रह रहे, बल्कि अपने पिता के प्यार और त्याग के साथ जी रहे हो," वर्मा जी ने रुंधे गले से कहा।
आकाश समझ गया कि वर्मा जी पिताजी से मिल आए हैं। उसकी आँखों से भी आंसू छलक पड़े। इतने महीनों का जमा हुआ दर्द, अपमान और अकेलापन आंसुओं के रूप में बह निकला।
"पापा ठीक हैं ना अंकल?" उसने मासूमियत से पूछा।
"वो ठीक हैं बेटा," वर्मा जी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "वो राजा हैं, और तुम राजकुमार हो। कल से कोई तुम्हें गलत नज़र से नहीं देखेगा। मैं सबको सच बताऊंगा।"
आकाश ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, "नहीं अंकल, प्लीज़ किसी को मत बताइएगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर लोगों को पता चला कि पापा ने बीमारी की वजह से मुझे छोड़ा, तो लोग पापा को 'बेचारा' कहेंगे। पापा को अपनी इज़्ज़त बहुत प्यारी है। वो हमेशा से शेर रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि लोग उन्हें एक जिद्दी और सख्त पिता समझें, लेकिन एक 'लाचार मरीज़' नहीं। मुझे 'बुरा बेटा' कहलाना मंज़ूर है, लेकिन मेरे पापा को 'दया का पात्र' बनना मंज़ूर नहीं। यह हमारा उनका सीक्रेट है।"
वर्मा जी अब आकाश को विस्मय से देख रहे थे। उन्होंने महसूस किया कि हर घर की चारदीवारी के पीछे एक महाभारत चल रही होती है, और ज़रूरी नहीं कि जो धृतराष्ट्र दिखे, वो गलत ही हो, या जो दुर्योधन दिखे, वो पापी ही हो।
उस रात वर्मा जी ने अपनी पत्नी को पूरी बात बताई। सरिता जी भी सन्न रह गईं। उस रात के बाद से, सोसायटी में आकाश के लिए नज़रिया बदल गया। वर्मा जी ने सच तो नहीं बताया (जैसा कि उन्होंने वादा किया था), लेकिन उन्होंने लोगों से इतना ज़रूर कहा, "हर चीज़ वैसी नहीं होती जैसी दिखती है। आकाश और दीनानाथ जी के बीच जो हुआ, वो उनकी आपसी सहमति थी, हमें दखल देने का हक़ नहीं।"
कहानी का अंत सुखद नहीं था, क्योंकि दीनानाथ जी की याददाश्त धीरे-धीरे जा रही थी। लेकिन वह अंत संतोषजनक था। आकाश हर रविवार पिता से मिलने जाता, उन्हें अपने हाथ से खाना खिलाता, और जब दीनानाथ जी पूछते, "तुम कौन हो भाईसाहब?", तो आकाश मुस्कुरा कर कहता, "मैं आपका वो दोस्त हूँ, जो आपको कभी नहीं भूलेगा।"
रिश्ते सिर्फ़ साथ रहने से नहीं, कभी-कभी एक-दूसरे की भलाई के लिए दूर रहने से भी निभाए जाते हैं। प्रेम का सबसे बड़ा सबूत कभी-कभी पकड़ कर रखना नहीं, बल्कि छोड़ देना होता है।
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**क्या आपने कभी सोचा है?**
हम अक्सर पड़ोसियों के घरों में झांककर फैसले सुना देते हैं, बिना यह जाने कि उस छत के नीचे क्या मजबूरी पल रही है। दीनानाथ जी और आकाश की कहानी हमें सिखाती है कि जो दिखता है, वो हमेशा सच नहीं होता।
**सवाल:** क्या आप आकाश की जगह होते तो समाज की बदनामी सहकर पिता की ज़िद मानते, या समाज के डर से उन्हें घर पर ही रखते चाहे उसमें उनकी तकलीफ क्यों न हो? अपने विचार कमेंट में लिखें।
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