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मर्द होने का वहम

 रात के 9 बज रहे थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, लेकिन शर्मा निवास के अंदर का माहौल बाहर के तूफ़ान से भी ज्यादा खौफनाक था। डाइनिंग टेबल पर खाना लगा हुआ था। दाल की कटोरी फर्श पर ओंधे मुंह पड़ी थी और पीली दाल सफ़ेद टाइल्स पर किसी नक्शे की तरह फ़ैल गई थी।


कमरे के बीचों-बीच खड़ी 26 साल की अवनि का गाल लाल पड़ चुका था। उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन वो सिसक नहीं रही थी। वह बस शून्य में घूर रही थी, जैसे उसे यकीन ही न हो रहा हो कि अभी-अभी क्या हुआ है। उसके सामने उसका पति, रमन, गुस्से से हांफ रहा था। उसकी मुट्ठियाँ अभी भी भींची हुई थीं।


रमन ने चिल्लाकर कहा, "हज़ार बार कहा है कि जब मैं ऑफिस से आऊं तो तौलिया और पानी तैयार रखा करो! दिन भर घर में करती क्या हो तुम? एक काम ठीक से नहीं होता?"


अवनि ने होंठ भींचे। उसने कहना चाहा कि आज उसकी तबीयत ठीक नहीं थी, उसे 102 डिग्री बुखार था, फिर भी उसने खाना बनाया था। लेकिन वह कुछ बोल पाती, उससे पहले ही रमन की माँ, सुमित्रा देवी, अपने कमरे से बाहर निकलीं।


सुमित्रा देवी, 60 साल की एक सख्त मिज़ाज़ महिला थीं। घर में उनकी आवाज़ पत्थर की लकीर मानी जाती थी। उन्होंने फर्श पर पड़ी दाल देखी, फिर अवनि का सूजा हुआ गाल, और अंत में अपने बेटे का लाल चेहरा।


माहौल में सन्नाटा था। अवनि को लगा कि अब सासू माँ उसे ही डांटेंगी, जैसा कि अक्सर होता है। और वही हुआ।


सुमित्रा देवी अवनि के करीब आईं और तीखे स्वर में बोलीं, **"अरे बहु! ऐसे काम ही क्यों करना कि पति को हाथ उठाना पड़े?"**


यह सुनते ही रमन के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई। उसे लगा माँ उसके पक्ष में है। उसने अपनी शर्ट की कॉलर ठीक की और सोफे पर धप्प से बैठ गया। "देखो माँ, समझाओ इसे। मैं दिन भर खट के आता हूँ और ये महारानी..."


अवनि का दिल टूट गया। जिस घर को उसने तीन साल खून-पसीने से सींचा, आज वहां उसे पिटने के बाद यह सुनने को मिल रहा था कि गलती उसी की है। वह रोते हुए अपने कमरे की तरफ भागी।


"रुको!" सुमित्रा देवी की आवाज़ ने अवनि के कदम रोक दिए। "मैंने जाने को कहा तुम्हें?"


अवनि वहीँ जम गई। सुमित्रा देवी ने एक कुर्सी खींची और रमन के ठीक सामने बैठ गईं।


"बैठ जा बहु," सुमित्रा ने इशारे से अवनि को सामने वाली कुर्सी पर बैठने को कहा। अवनि डरते-डरते बैठ गई।


सुमित्रा देवी ने रमन की आँखों में देखा। उनकी आवाज़ अब ऊँची नहीं, बल्कि बेहद शांत और ठंडी थी। "रमन, तूने अभी मेरी बात सुनी न? मैंने बहु से कहा कि ऐसे काम ही क्यों करना कि पति को हाथ उठाना पड़े..."


रमन ने सिर हिलाया, "हाँ माँ, वही तो। इसे तमीज़ ही नहीं है।"


"चुप!" सुमित्रा ने उसे बीच में ही रोक दिया। "मेरी बात पूरी नहीं हुई रमन।"


सुमित्रा देवी ने अवनि की तरफ देखा, "बहु, मैंने इसलिए कहा कि ऐसे काम क्यों करना... जैसे कि—अपनी बीमारी छिपाकर रोटियां बनाना। जैसे कि—बिना किसी छुट्टी के 365 दिन इस घर को साफ़ रखना। जैसे कि—अपनी एम.ए. की डिग्री संदूक में बंद करके इस घर की इज़्ज़त संभालना। ये सब काम ऐसे ही तो हैं, जो एक 'कमज़ोर' पति को डरा देते हैं। और जब पति डरता है, अपनी कमियों से घबराता है, तो वो हाथ उठाता है।"


कमरे में बिजली गिरने जैसा सन्नाटा छा गया। रमन की मुस्कान गायब हो गई। अवनि ने चौंका कर अपनी सास की ओर देखा।


सुमित्रा देवी अब रमन की ओर मुड़ीं। उनकी आँखों में वो ममता नहीं थी जो रमन अक्सर देखता था, वहां एक औरत का स्वाभिमान जल रहा था।


"तुझे क्या लगा रमन? मैं कहूँगी कि दाल गिर गई तो थप्पड़ मारना जायज़ है? तू भूल गया कि तेरी माँ भी एक औरत है? जिस हाथ से तूने आज अवनि को मारा है, उसी हाथ को बचपन में जब चोट लगती थी, तो मैं रात-रात भर नहीं सोती थी। मुझे नहीं पता था कि मैं उस हाथ को पाल-पोस कर इतना मज़बूत कर रही हूँ कि वो एक दिन एक निहत्थी औरत पर उठेगा।"


रमन ने हकलाते हुए कहा, "माँ, आप समझ नहीं रही हैं। इसने जुबान लड़ाई..."


"जुबान?" सुमित्रा देवी खड़ी हो गईं। "जुबान तो अभी मैंने भी लड़ाई है, मुझ पर भी हाथ उठा दे? तेरी हिम्मत कैसे हुई रमन? ये घर मेरे पति ने बनाया था, जो फौज में थे। वो जंग में दुश्मनों को मारते थे, लेकिन घर आकर मेरी आवाज़ ऊँची होने पर भी वो मुस्कुरा कर बात टाल देते थे। क्योंकि वो 'मर्द' थे। और तू? तू सिर्फ एक 'नर' है, मर्द बनने में तुझे अभी बहुत वक़्त लगेगा।"


रमन शर्मिंदा होने के बजाय गुस्से में खड़ा हो गया। "माँ, आप बात का बतंगड़ बना रही हैं। आजकल की औरतों को सर चढ़ाओगी तो यही होगा। मैं इस घर का बेटा हूँ, मैं जो चाहूँ..."


"बेटा है, मालिक नहीं!" सुमित्रा देवी ने दीवार पर टंगी अपने दिवंगत पति की तस्वीर की ओर इशारा किया। "इस घर की मालकिन मैं हूँ। और मेरे घर का एक नियम है—यहाँ जानवरों के लिए कोई जगह नहीं है।"


"जानवर?" रमन चिल्लाया।


"हाँ, जानवर। जो सिर्फ गुर्राना और काटना जानते हैं। इंसान वो होता है जो अपनी साथी का दर्द समझे। अवनि को 102 डिग्री बुखार है। तूने आते ही उसका माथा छुआ? तूने पूछा कि उसने खाना खाया या नहीं? नहीं। तुझे सिर्फ अपना तौलिया और पानी दिखा। स्वार्थी हो गया है तू रमन।"


सुमित्रा देवी अवनि के पास गईं और उसका चेहरा ऊपर उठाया। गाल पर उंगलियों के निशान साफ़ दिख रहे थे। सुमित्रा की आँखें भर आईं। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से अवनि के आंसू पोंछे।


"अवनि, जा अंदर। अपना सामान पैक कर," सुमित्रा ने आदेश दिया।


रमन हंस पड़ा। "देखा? मुझे पता था माँ। निकालो इसे घर से। दो दिन मायके में रहेगी तो अकल ठिकाने आ जाएगी।"


सुमित्रा देवी रमन की तरफ पलटीं और एक अजीब सी मुस्कान के साथ बोलीं, "तुझे गलतफहमी हुई है रमन। अवनि कहीं नहीं जा रही। सामान तुझे पैक करना है।"


रमन को लगा उसने गलत सुना है। "क्या?"


"सुना नहीं तूने? निकल जा मेरे घर से," सुमित्रा देवी की आवाज़ में शेरनी जैसी दहाड़ थी। "ये घर, ये छत, ये दीवारें... ये सब एक सुरक्षित पनाहगार हैं। यहाँ कोई भी ऐसी औरत नहीं रहेगी जो डरे, और कोई भी ऐसा मर्द नहीं रहेगा जो डराए। जब तक तू माफ़ी नहीं मांगता और ये साबित नहीं करता कि तू सुधर गया है, तेरे लिए इस घर के दरवाज़े बंद हैं।"


"माँ, आप पागल हो गई हैं? एक थप्पड़ के लिए आप अपने इकलौते बेटे को निकाल रही हैं?" रमन अविश्वास में था।


"वो एक थप्पड़ नहीं था रमन। वो एक शुरुआत थी," सुमित्रा देवी ने गंभीरता से कहा। "पहली बार ग़लती होती है, दूसरी बार आदत बन जाती है, और तीसरी बार वो 'हक़' बन जाता है। मैं तुझे वो हक़ बनाने का मौका ही नहीं दूंगी। मेरे लिए मेरा बेटा प्यारा है, लेकिन किसी और की बेटी की इज़्ज़त उससे ज्यादा प्यारी है। अगर आज मैं चुप रही, तो कल जब मेरी पोती होगी और उसके साथ ऐसा होगा, तो मैं किस मुंह से उसका साथ दूंगी?"


रमन ने अपनी माँ के चेहरे पर वो दृढ़ता देखी जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी। उसे समझ आ गया कि यह कोई धमकी नहीं, फैसला है।


"अवनि, अगर ये माफ़ी न मांगे, तो पुलिस को फ़ोन कर। मैं गवाही दूंगी," सुमित्रा ने अवनि के हाथ में अपना फ़ोन थमा दिया।


रमन का अहंकार पल भर में चकनाचूर हो गया। उसे अपनी माँ, अपनी पत्नी, और अपनी ही नज़रों में अपनी औकात समझ आ गई थी। वह जानता था कि सुमित्रा देवी जो कहती हैं, वो करती हैं। वह धीरे से अवनि के पास गया। उसका सिर झुका हुआ था।


"अवनि... मुझे... मुझे माफ़ कर दो," रमन की आवाज़ कांप रही थी। "गुस्से में पता नहीं चला। मैं कसम खाता हूँ, आज के बाद..."


अवनि चुप रही। उसने सास की तरफ देखा।


सुमित्रा देवी ने कहा, "माफ़ी मुझसे नहीं, उस उसूल से मांग जो तूने तोड़ा है। और सुन ले रमन, आज रात तू सोफे पर सोएगा। अवनि मेरे कमरे में सोएगी। तुझे सोचना होगा कि तूने क्या खोया है। यह थप्पड़ सिर्फ उसके गाल पर नहीं, हमारे परवरिश और संस्कारों पर भी लगा है।"


उस रात, घर में खाना नहीं बना। लेकिन उस घर की नींव पहले से ज्यादा मज़बूत हो गई थी।


देर रात, जब अवनि सुमित्रा देवी के कमरे में लेटी थी, तो उसने धीरे से पूछा, "माँ जी, आपने अपने सगे बेटे के खिलाफ़ इतना बड़ा कदम क्यों उठाया? वो नाराज़ होकर हमेशा के लिए जा भी सकता था।"


सुमित्रा देवी ने अवनि के सिर पर हाथ फेरा और कहा, "बेटी, अगर मैं आज बेटे का पक्ष लेती, तो मैं एक 'माँ' तो रह जाती, लेकिन एक 'औरत' मर जाती। और याद रखना, जो समाज औरत के आंसुओं पर चुप रहता है, वो समाज श्मशान से भी बदतर है। मैंने उसे नहीं निकाला, मैंने उसके अंदर के 'हैवान' को निकाला है। ताकि कल जब वो आइने में देखे, तो उसे एक इंसान नज़र आए।"


अवनि ने अपनी सास को गले लगा लिया। उसे महसूस हुआ कि असली माँ वो नहीं होती जो सिर्फ जन्म देती है, बल्कि वो होती है जो इज़्ज़त से जीना सिखाती है। उस एक "थप्पड़" की गूंज ने उस घर के सारे समीकरण बदल दिए थे। रमन सुधर गया था, डर से नहीं, बल्कि उस सम्मान के लिए जो उसने अपनी माँ की आँखों में खो दिया था और जिसे पाने के लिए उसे अब ताउम्र तपस्या करनी थी।


---


**कहानी का सार:**

अक्सर हम सुनते हैं कि "ताली दोनों हाथों से बजती है" या "औरत को ही झुकना चाहिए"। लेकिन सुमित्रा देवी जैसी सास समाज को बताती हैं कि हिंसा का कोई बहाना नहीं होता। गलत, गलत ही होता है, चाहे वो करने वाला अपना सगा बेटा ही क्यों न हो।


**सवाल:**

अगर आप सुमित्रा देवी की जगह होते, तो क्या आप भी अपने बेटे को घर से निकालने की हिम्मत दिखाते? या आप मामले को घर की चारदीवारी में दबा देते? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।


**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ, तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और दिल को झकझोर देने वाली कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!**


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