"रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी।
रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे।
"सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली।
सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द निवारक गोली खाई और सोने की कोशिश करने लगी, क्योंकि उसे पता था कि कल का दिन उसके लिए किसी युद्ध से कम नहीं होने वाला था।
अगले दिन रवि और सुमन की शादी की पांचवीं सालगिरह थी। रवि ने सुबह उठते ही सुमन को 'हैप्पी एनिवर्सरी' विश किया, लेकिन उसके लहज़े में वो गर्माहट नहीं थी जो पहले हुआ करती थी।
नाश्ते की टेबल पर रवि की माँ, निर्मला देवी, ने बड़े उत्साह से कहा, "रवि बेटा, आज शाम की पार्टी की चिंता तुम मत करना। मैंने सब इंतजाम सोच लिया है। बस तुम समय पर आ जाना। आखिर मेरे बेटे और बहु की सालगिरह है, मैं कोई कमी नहीं छोड़ूँगी।"
रवि ने मुस्कुराते हुए कहा, "माँ, आप रहने दीजिये ना। मैंने कहा था कि हम बाहर होटल में डिनर कर लेंगे। घर पर फालतू में आप और सुमन परेशान होंगे।"
निर्मला देवी ने तुरंत बात काटी, "अरे, बाहर का खाना भी कोई खाना होता है? और फिर तेरी बुआ, मासी और वो फूफा जी सब आ रहे हैं। घर की बात ही अलग होती है। और तू चिंता मत कर, मैंने 'महाराज' (हलवाई) को बोल दिया है। वो अपनी पूरी टीम के साथ आएगा और सब संभाल लेगा। सुमन को तो बस तैयार होकर मेहमानों का स्वागत करना है। मैंने इसे सुबह ही कह दिया है कि आज कोई काम न करे।"
सुमन रसोई में खड़ी चाय छान रही थी। सास की यह सफ़ेद झूठ सुनकर उसका हाथ कांपा और चाय की कुछ बूंदें स्लैब पर गिर गईं। हलवाई? कौन सा हलवाई? सासू माँ ने तो सुबह ही उसे मेनू थमाया था—पचास लोगों के लिए दाल मखनी, शाही पनीर, पुलाव, रायता, और तीन तरह की मिठाइयां। और हिदायत दी थी कि "खबरदार जो रवि को बताया। वो फिजूलखर्ची करेगा। हम घर की औरतें हैं, घर का पैसा बचाना हमारा धर्म है। चुपचाप लग जा काम पर।"
रवि आश्वस्त होकर ऑफिस चला गया। उसने जाते-जाते सुमन से कहा, "देखो, माँ कितना ख्याल रखती हैं तुम्हारा। हलवाई बुक कर दिया ताकि तुम्हें आराम मिले। और तुम हो कि बस उनकी शिकायतें ढूंढती रहती हो। शाम को अच्छे से तैयार होना, मैंने वो जो नई साड़ी दी थी, वही पहनना।"
रवि के जाने के बाद घर का दृश्य पूरी तरह बदल गया। निर्मला देवी ने सोफे पर पैर पसार लिए और टीवी का रिमोट हाथ में ले लिया।
"सुमन! खड़ी क्या है? दस बज गए हैं। मटर छीलने शुरू कर। और सुन, पनीर के टुकड़े एक साइज़ के होने चाहिए, वरना मेरी नाक कट जाएगी रिश्तेदारों में। और हाँ, काम जल्दी निबटाना, शाम को तुझे तैयार भी होना है, नहीं तो लोग कहेंगे कैसी फूहड़ बहु है।"
सुमन ने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और काम पर लग गई। एक अकेली जान और पचास लोगों का खाना। मिक्सर की आवाज़, कुकर की सीटियां और बर्तनों की खन्-खन् के बीच सुमन की सिसकियां दब गईं। उसके पैरों की सूजन अब और बढ़ गई थी, खड़े-खड़े उसे चक्कर आ रहे थे, लेकिन रुकने की इजाज़त नहीं थी। निर्मला देवी बीच-बीच में रसोई के दरवाज़े पर आकर केवल हुक्म चला जातीं—"काजू का पेस्ट थोड़ा बारीक पीसना," या "गुलाब जामुन की चाशनी ज़्यादा गाढ़ी मत कर देना।" मदद के नाम पर उन्होंने एक गिलास पानी भी उठाकर नहीं दिया।
शाम के सात बजते-बजते सुमन की हालत ऐसी हो गई थी जैसे वह किसी भट्टी से निकली हो। पसीने से लथपथ, बाल बिखरे हुए, और आँखों के नीचे गहरे काले घेरे। उसने जैसे-तैसे सारा खाना तैयार किया, ड्राइंग रूम साफ़ किया और फिर भागकर कमरे में गई तैयार होने।
जब मेहमान आने शुरू हुए, तो सुमन सजी-धजी खड़ी थी, लेकिन उसके चेहरे की थकान मेकअप की परतों के नीचे भी साफ़ झलक रही थी। रवि भी ऑफिस से आ चुका था और मेहमानों के साथ हंसी-मज़ाक में व्यस्त था।
"अरे निर्मला जी, क्या खुशबू आ रही है! लगता है आज तो दावत है," रवि की बुआ ने कहा।
निर्मला देवी ने गर्व से सीना चौड़ा किया, "अरे दीदी, बस आप लोगों के लिए खास 'बनारस वाले महाराज' को बुलवाया है। मैंने कहा, पैसे कितने भी लगें, स्वाद में कमी नहीं आनी चाहिए।"
सुमन एक कोने में खड़ी ट्रे में पानी के गिलास सजा रही थी। यह सुनकर उसे लगा जैसे किसी ने उसके अस्तित्व पर तमाचा मारा हो। उसकी मेहनत, उसका पसीना, उसका दर्द—सब कुछ 'बनारस वाले महाराज' के नाम हो गया?
तभी रवि सुमन के पास आया और फुसफुसाया, "सुमन, तुम इतनी थकी हुई क्यों लग रही हो? और स्माइल क्यों नहीं कर रही? माँ ने इतना सब किया, हलवाई बुलवाया, कम से कम खुश तो दिखो।"
सुमन ने कुछ कहना चाहा, "रवि, वो..."
लेकिन तभी निर्मला देवी की आवाज़ आई, "अरे सुमन, ज़रा अंदर से स्टार्टर तो ले आ। महाराज शायद किचन के पीछे वाले हिस्से में काम कर रहे हैं, तू बस सर्व कर दे।"
सुमन चुपचाप रसोई की तरफ मुड़ गई।
पार्टी शबाब पर थी। सभी खाने की तारीफ कर रहे थे।
"वाह! यह शाही पनीर तो लाजवाब है।"
"दाल मखनी का टेक्सचर तो देखो, बिल्कुल फाइव स्टार होटल जैसा है।"
रवि गर्व से फूल रहा था। उसे अपनी माँ की मैनेजमेंट स्किल्स पर नाज़ हो रहा था।
खाना ख़त्म होने के बाद, रवि को प्यास लगी। पानी का जग खाली था। उसने सोचा, लाओ मैं खुद ही किचन से पानी ले आता हूँ, सुमन तो मेहमानों में व्यस्त होगी। वह रसोई की तरफ बढ़ा।
जैसे ही रवि रसोई के दरवाज़े पर पहुँचा, वह ठिठक गया।
वहाँ का नज़ारा देख उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। रसोई में कोई 'हलवाई' नहीं था। कोई हेल्पर नहीं था। बर्तनों का पहाड़ सिंक में पड़ा था। फर्श पर आटा बिखरा था। और वहां, एक छोटे से मोढ़े (स्टूल) पर सुमन बैठी थी। वह अपने नंगे पैरों को दबा रही थी जो सूजकर हाथी के पाँव जैसे हो गए थे। उसके सामने एक थाली रखी थी जिसमें मेहमानों का बचा हुआ, ठंडा हो चुका पुलाव और थोड़ी सी ग्रेवी थी। वह सूखी आँखों से, यांत्रिक रूप से खाना मुंह में डाल रही थी।
उसकी साड़ी, जिसे रवि ने बहुत चाव से दिलवाया था, जगह-जगह से पानी और हल्दी के दागों से ख़राब हो चुकी थी।
रवि ने नज़रें घुमाईं। वहां कोई बड़े बर्तन नहीं थे जो कैटरिंग वाले लाते हैं। वही घर के पुराने पतीले और कढ़ाइयां थीं, जो अब जले हुए और गंदे पड़े थे। यानी, यह सारा खाना... पचास लोगों का खाना... सुमन ने अकेले बनाया था?
तभी निर्मला देवी वहां आ धपकीं। उन्होंने रवि को नहीं देखा था। उनका ध्यान सुमन पर था।
"अरे महारानी! यहाँ बैठकर ठूंस रही है? बाहर बुआ जी को खीर चाहिए। और ये बर्तनों का ढेर कौन साफ़ करेगा? तेरा बाप? जल्दी हाथ चला, कल सुबह काम वाली नहीं आएगी, मुझे किचन साफ़ चाहिए।"
रवि, जो दरवाज़े की ओट में खड़ा था, सन्न रह गया। यह वही माँ थी जो बाहर कह रही थी—"मेरी बहु तो बेटी है"? यह वही माँ थी जिसने कहा था—"हलवाई है, सुमन को आराम मिलेगा"?
रवि ने एक गहरी सांस ली। उसका भ्रम, उसका विश्वास, सब कांच की तरह बिखर गया था। उसे याद आया बीती रात सुमन का कहना—"पैरों में सूजन है"। उसे याद आया सुमन का मुरझाया चेहरा। उसने महसूस किया कि वह कितना बड़ा अपराधी है।
वह चुपचाप ड्राइंग रूम में वापस गया। मेहमान अब विदा ले रहे थे।
"निर्मला जी, खाना बहुत शानदार था। उस हलवाई का नंबर ज़रूर दीजियेगा," एक रिश्तेदार ने जाते हुए कहा।
निर्मला देवी हंसते हुए बोलीं, "हाँ-हाँ, क्यों नहीं। मैं व्हॉट्सऐप कर दूंगी।"
जब आखिरी मेहमान चला गया, तो निर्मला देवी सोफे पर निढाल होकर बैठ गईं। "उफ़! मैं तो थक गई मेहमाननवाज़ी करते-करते। रवि, देखा? कैसा शानदार फंक्शन हुआ! तेरे पापा होते तो कितना खुश होते।"
रवि दरवाज़े पर खड़ा था। उसकी आवाज़ बेहद शांत, लेकिन बर्फीली थी। "हाँ माँ, फंक्शन बहुत शानदार था। और सबसे शानदार था वो 'बनारस वाला महाराज'।"
निर्मला देवी थोड़ा सकपका गईं। "हाँ... वो... वो तो पीछे के दरवाज़े से निकल गया। पैसे दे दिए मैंने उसे।"
"कितने पैसे दिए माँ?" रवि ने पूछा। "मैंने आपको बीस हज़ार रुपये नकद दिए थे कैटरिंग के लिए। और दस हज़ार अलग से डेकोरेशन के लिए।"
"अरे... वो... हिसाब बाद में कर लेंगे। तू थक गया होगा, जा सो जा," निर्मला देवी ने बात टालनी चाही।
"नहीं माँ। हिसाब आज ही होगा," रवि ने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला और टेबल पर रखा। "ये डॉक्टर की रिपोर्ट है। पिछले हफ्ते सुमन को चक्कर आया था, मैं उसे छुपकर डॉक्टर के पास ले गया था—तब नहीं जब आप सो रही थीं, बल्कि तब जब आप अपनी किटी पार्टी में थीं। डॉक्टर ने कहा है उसकी रीढ़ की हड्डी में गैप आ रहा है और उसे 'सवेरे अनिमिया' (खून की भारी कमी) है। उसे बेड रेस्ट की ज़रूरत थी।"
निर्मला देवी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
रवि रसोई की तरफ बढ़ा और सुमन का हाथ पकड़कर उसे बाहर खींच लाया। सुमन घबराई हुई थी, उसके हाथ अभी भी जूठे थे।
"इस 'महाराज' को देखिए माँ," रवि ने सुमन को सोफे पर बिठाया। "ये है वो हलवाई जिसने आज आपकी इज़्ज़त बचाई। और बदले में आपने इसे क्या दिया? गालियाँ? बचा हुआ खाना? और झूठ?"
"रवि, तू अपनी माँ से ऐसे बात कर रहा है?" निर्मला देवी ने आंसुओं का नाटक शुरू किया। "मैंने तो बस पैसे बचाने के लिए... आखिर पैसा घर में ही तो रहा। भविष्य के लिए ही तो जोड़ रही हूँ।"
"किसका भविष्य माँ?" रवि चिल्लाया। "एक मुर्दा बहु का भविष्य? या एक ऐसे बेटे का भविष्य जो अपनी पत्नी का हत्यारा बन जाए? आपने पैसे बचाए नहीं, आपने मेरी पत्नी का खून चूसा है। मैंने आपको एसी लगवाने के पैसे दिए, आपने लगवाया नहीं और सुमन से कहा कि रवि मना कर रहा है। मैंने आपको मेड (कामवाली) के पैसे दिए, आपने उसे निकाल दिया और सुमन से कहा कि मेड भाग गई। आज आपने कैटरिंग के पैसे भी हज़म कर लिए और इस बीमार हालत में इससे पचास लोगों का खाना बनवाया।"
सुमन रो रही थी, लेकिन आज उसे रवि का हाथ अपने कंधे पर महसूस हो रहा था। एक सुरक्षा कवच।
"रवि, ये औरत तुझे मेरे खिलाफ भड़का रही है!" निर्मला देवी ने आखिरी पैंतरा फेंका।
"इसे कुछ बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ी माँ," रवि ने अपनी नम आँखें पोंछीं। "इसकी खामोशी और किचन में पड़े वो जूठे बर्तन सब सच बोल रहे हैं। मैं अँधा था, जो मुझे आपके 'प्यार' के नाटक के पीछे का क्रूर चेहरा नहीं दिखा। मुझे लगा आप 'माँ' हैं, पर आप तो एक 'मालिक' की तरह बर्ताव कर रही थीं और इसे 'बंधुआ मज़दूर' समझ रखा था।"
रवि ने सुमन को खड़ा किया। "चलो सुमन।"
"कहाँ?" सुमन ने कांपती आवाज़ में पूछा।
"होटल," रवि ने दृढ़ता से कहा। "आज हमारी एनिवर्सरी है। और तुम वहां खाना खाओगी जहाँ तुम्हें परोसा जाएगा, तुम परोसोगी नहीं। और कल से..." रवि ने माँ की ओर देखा, "...कल से इस घर का हिसाब मैं देखूंगा। राशन से लेकर मेड तक, सब मैं खुद मैनेज करूँगा। आपके हाथ में अब एक रुपया नहीं आएगा। और रही बात सेवा की, तो अब आपकी 'सेवा' वही करेगा जिसे आप पैसे देंगी। मेरी पत्नी अब इस घर में सिर्फ पत्नी बनकर रहेगी, नौकरानी नहीं।"
निर्मला देवी सन्न रह गईं। उनका बरसों का बुना हुआ जाल एक पल में काट दिया गया था।
रवि सुमन को लेकर मुख्य दरवाज़े की ओर बढ़ा। सुमन ने एक बार पीछे मुड़कर देखा। उस आलीशान ड्राइंग रूम में निर्मला देवी अकेली बैठी थीं, बिल्कुल अकेली। उनकी झूठी शान और पैसों का घमंड धरा रह गया था।
गाड़ी में बैठते ही रवि ने सुमन के सूजे हुए पैरों को अपनी गोद में रख लिया और धीरे से दबाने लगा। "आई एम सॉरी सुमन। मुझे माफ़ कर दो। मैंने देर कर दी, लेकिन अब और नहीं।"
सुमन ने रवि के हाथ पर अपना हाथ रखा। उसने कुछ नहीं कहा, बस उसके आंसुओं ने बता दिया कि आज उसे उसका पति, उसका स्वाभिमान और उसका 'घर' वापस मिल गया था।
दोस्तों, अक्सर हम सयुंक्त परिवारों में 'बड़ों के लिहाज़' के नाम पर शोषण को अनदेखा कर देते हैं। एक बेटा अपनी माँ पर भरोसा करता है, यह अच्छी बात है, लेकिन उस भरोसे की कीमत अगर पत्नी के अस्तित्व को कुचल कर चुकानी पड़े, तो वह भरोसा नहीं, गुनाह है। घर की लक्ष्मी सिर्फ़ वो नहीं जो पैसे बचाए, बल्कि वो भी है जो अपनी सेहत और खुशियाँ होम कर दे। उस लक्ष्मी का सम्मान ही असली 'कुल की मर्यादा' है।
Nice ending ✌️
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