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पिता का वो आखिरी झूठ

  सुबह के दस बज रहे थे। सूर्यकांत सोसायटी के गेट नंबर दो पर सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन उस सन्नाटे में भी एक अजीब सा शोर था। वह शोर था पहियों की गड़गड़ाहट का। 65 वर्षीय दीनानाथ जी अपना पुराना भूरे रंग का सूटकेस घसीटते हुए मुख्य द्वार की ओर बढ़ रहे थे। उनके पीछे उनका बेटा, आकाश, सिर झुकाए खड़ा था। उसने पिता को रोकने की कोशिश नहीं की, न ही उसने आगे बढ़कर वह भारी सूटकेस उनके हाथ से लिया।

बालकनी में खड़े मिस्टर वर्मा ने अपनी पत्नी सरिता से कहा, "देख रही हो सरिता? यही है कलयुग। जिस बेटे को दीनानाथ जी ने अपनी पीएफ की पाई-पाई जोड़कर इंजीनियर बनाया, आज वही बेटा उन्हें घर से निकाल रहा है। सुना है कल रात इनके घर से बहुत जोर-जोर से चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं।"

सरिता ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, "और वो बहू? वो तो दिख भी नहीं रही। अरे, जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो बहू को क्या दोष देना। भगवान बचाए ऐसी औलाद से। बेचारे दीनानाथ जी, पत्नी के जाने के बाद सोचा था बेटे के सहारे ज़िंदगी कटेगी, पर यहाँ तो बुढ़ापा सड़कों पर आ गया।"

सोसायटी के गार्ड ने भी सहानुभूति भरी नज़रों से दीनानाथ जी को ऑटो में बैठते हुए देखा। आकाश गेट के अंदर ही खड़ा रहा, तब तक जब तक ऑटो आँखों से ओझल नहीं हो गया। जैसे ही ऑटो मुड़ा, आकाश ने तेज़ी से पलटकर अपने घर की ओर दौड़ लगा दी। देखने वालों को लगा कि उसे पिता के जाने की इतनी खुशी है कि वह रुक नहीं पा रहा, लेकिन किसी ने उसकी आँखों में छिपी नमी को नहीं देखा।

अगले कुछ हफ़्तों तक सोसायटी में आकाश का सामाजिक बहिष्कार सा हो गया। लिफ्ट में कोई उससे बात नहीं करता। पार्क में अगर वह अपनी तीन साल की बेटी को लेकर आता, तो लोग अपनी जगह बदल लेते। मिस्टर वर्मा ने तो एक दिन सबके सामने तंज भी कस दिया, "क्यों भाई आकाश, पिताजी के कमरे को अब गेस्ट रूम बनवा लिया या स्टोर रूम? नींद आ जाती है उस घर में जहाँ से पिता को धक्के देकर निकाला हो?"

आकाश कुछ नहीं बोला। उसने बस फीकी मुस्कान दी और वहां से चला गया। उसकी यह चुप्पी लोगों को उसकी 'बेशर्मी' का सबूत लगी।

करीब तीन महीने बीत गए। दीनानाथ जी का कोई अता-पता नहीं था।

एक दिन मिस्टर वर्मा को शहर के मशहूर 'आस्था केयर होम' में जाने का मौका मिला। उनकी एक दूर की रिश्तेदार वहां भर्ती थीं। वर्मा जी रिसेप्शन पर खड़े थे कि तभी उनकी नज़र लॉन में बैठी एक जानी-पहचानी आकृति पर पड़ी। वह दीनानाथ जी थे। लेकिन वह वैसे नहीं लग रहे थे जैसे तीन महीने पहले लगते थे। वह एक व्हीलचेयर पर थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था। वह एक नर्स के साथ हंस-हंस कर बातें कर रहे थे।

वर्मा जी के मन में दबा हुआ गुस्सा उबल पड़ा। वह तेज़ कदमों से उनके पास गए। "दीनानाथ जी?"

दीनानाथ जी ने चौंक कर देखा। "अरे, वर्मा जी! आप यहाँ?"

वर्मा जी ने उनकी बगल वाली कुर्सी खींचते हुए कहा, "हमें तो लगा था कि आप किसी रिश्तेदार के यहाँ होंगे, पर उस नालायक ने आपको वृद्धाश्रम में फेंक दिया? और आप यहाँ हंस रहे हैं? उसने आपकी जायदाद हड़प ली, आपको घर से निकाल दिया और आप..."

दीनानाथ जी ने हाथ उठाकर वर्मा जी को रोका। उनकी मुस्कान फीकी नहीं पड़ी, बल्कि और गहरी हो गई। उन्होंने नर्स को इशारा किया कि वह थोड़ी देर अकेले बात करना चाहते हैं।

"वर्मा जी," दीनानाथ जी ने शांत स्वर में कहा, "आकाश ने मुझे नहीं निकाला। मैं खुद आया हूँ।"

वर्मा जी हतप्रभ रह गए। "आप क्या कह रहे हैं? हमने खुद देखा, वो खड़ा तमाशा देख रहा था और आप सूटकेस घसीट रहे थे। उसने आपको रोका तक नहीं!"

दीनानाथ जी की आँखों में एक पुरानी पीड़ा तैर गई। उन्होंने अपनी जेब से एक मुड़ा-तुड़ा कागज़ निकाला और वर्मा जी की तरफ बढ़ाया। वह एक मेडिकल रिपोर्ट थी।

"अल्ज़ाइमर... शुरुआती स्टेज," वर्मा जी ने पढ़ा। उन्हें समझ नहीं आया।

"छह महीने पहले मुझे पता चला," दीनानाथ जी ने बताना शुरू किया। "शुरुआत में मैं चाबियाँ भूलता था, फिर रस्ते... लेकिन बात तब बिगड़ गई जब एक दिन मैंने गैस खुली छोड़ दी। घर में मेरी पोती, गुड़िया, सो रही थी। अगर उस दिन आकाश समय पर न आता, तो पूरा घर उड़ जाता।"

वर्मा जी सन्न रह गए।

दीनानाथ जी ने आगे कहा, "डॉक्टर ने कहा कि मेरी बीमारी बढ़ेगी। मैं आक्रामक हो सकता हूँ, चीज़ें भूल सकता हूँ। आकाश और मेरी बहू, नेहा, दोनों ने रो-रो कर मुझे समझाया कि वे मेरा ख्याल रखेंगे। उन्होंने घर में नर्स रखने की बात की, कैमरे लगवाने की बात की। आकाश ने तो अपनी नौकरी छोड़कर 'वर्क फ्रॉम होम' लेने की ठान ली थी ताकि वो 24 घंटे मेरे पास रह सके।"

"तो फिर...?" वर्मा जी की आवाज़ अब धीमी हो चुकी थी।

"तो फिर मैंने एक पिता होने का फर्ज निभाया," दीनानाथ जी का गला भर आया। "वर्मा जी, आकाश का करियर अभी शुरू हुआ है। नेहा घर और ऑफिस दोनों संभालती है। और गुड़िया... वो तो अभी बच्ची है। क्या मैं अपनी बीमारी का बोझ उनके खिलते हुए जीवन पर डाल देता? क्या मैं यह देख सकता था कि मेरा बेटा मेरे मलमूत्र साफ़ करे और अपनी जवानी मेरी सेवा में होम कर दे? नहीं।"

दीनानाथ जी ने एक गहरी सांस ली। "मैंने नाटक किया। जानबूझकर। मैं रोज़ उनसे लड़ने लगा। मैंने उन पर चोरी का इल्ज़ाम लगाया। मैंने पड़ोसियों के सामने चिल्लाना शुरू किया ताकि आकाश को लगे कि मैं सठिया गया हूँ। लेकिन वो फिर भी नहीं माना। अंत में, मैंने उसे अपनी कसम दी। मैंने कहा कि अगर तुम मुझे इस केयर होम में नहीं छोड़ोगे, तो मैं खाना-पीना छोड़ दूंगा। मैंने उसे मजबूर किया कि वो मुझे 'निकाले'।"

वर्मा जी को लगा जैसे किसी ने उनके गाल पर तमाचा मारा हो।

"जिस दिन मैं जा रहा था," दीनानाथ जी ने आंसू पोंछते हुए कहा, "आकाश ने मुझसे कहा था- 'पापा, लोग मुझे नफरत करेंगे'। मैंने उससे कहा, 'बेटा, दुनिया के ताने सह लेना, लेकिन मेरे बुढ़ापे को अपनी बेड़ियों मत बनने देना'। वो सूटकेस जो मैं घसीट रहा था? वो खाली था वर्मा जी। मेरे कपड़े तो आकाश ने एक दिन पहले ही यहाँ भिजवा दिए थे। वो गेट पर इसलिए खड़ा था क्योंकि अगर वो आगे बढ़ता तो मेरे गले लग कर रो पड़ता, और मेरा सारा नाटक ख़राब हो जाता।"

वर्मा जी की जुबान तालू से चिपक गई थी। उन्होंने हमेशा आकाश को एक क्रूर बेटा समझा था, जबकि असल में वह एक आज्ञाकारी श्रवण कुमार था जो अपने पिता की ज़िद और उनके आत्मसम्मान की खातिर समाज की नफरत का विष पी रहा था।

"और सुनिए," दीनानाथ जी ने कहा, "यह कोई साधारण वृद्धाश्रम नहीं है। यह शहर का सबसे महंगा मेमोरी केयर सेंटर है। इसका महीने का खर्च आकाश की आधी तनख्वाह के बराबर है। वो हर रविवार सुबह 6 बजे आता है, जब आप सब सो रहे होते हैं, मुझसे मिलता है, मेरे गंदे कपड़े खुद अपने हाथों से धोता है, और मेरे उठने से पहले चला जाता है... सिर्फ़ इसलिए ताकि मुझे यह न लगे कि मैं उस पर बोझ हूँ।"

वर्मा जी की आँखों से आंसू बह निकले। उन्होंने दीनानाथ जी के हाथ पकड़ लिए। "हमने बहुत बड़ी गलती कर दी दीनानाथ जी। हम बाहरी दिखावे को सच मान बैठे। आकाश... आकाश तो देवता है।"

शाम को जब वर्मा जी वापस सोसायटी पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि आकाश अपनी कार पार्क कर रहा था। रोज़ की तरह वह सिर झुकाकर लिफ्ट की तरफ बढ़ा।

"आकाश बेटा!" वर्मा जी ने पीछे से आवाज़ दी।

आकाश ठिठक गया। उसे लगा आज फिर कोई ताना सुनने को मिलेगा। वह धीरे से मुड़ा। "जी अंकल?"

वर्मा जी उसके पास गए और बिना कुछ कहे उसे कस कर गले लगा लिया। आकाश हैरान रह गया। वर्मा जी रो रहे थे।

"माफ़ कर देना बेटा। हम सब अंधे थे। हमें नहीं पता था कि तुम उस घर में अकेले नहीं रह रहे, बल्कि अपने पिता के प्यार और त्याग के साथ जी रहे हो," वर्मा जी ने रुंधे गले से कहा।

आकाश समझ गया कि वर्मा जी पिताजी से मिल आए हैं। उसकी आँखों से भी आंसू छलक पड़े। इतने महीनों का जमा हुआ दर्द, अपमान और अकेलापन आंसुओं के रूप में बह निकला।

"पापा ठीक हैं ना अंकल?" उसने मासूमियत से पूछा।

"वो ठीक हैं बेटा," वर्मा जी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "वो राजा हैं, और तुम राजकुमार हो। कल से कोई तुम्हें गलत नज़र से नहीं देखेगा। मैं सबको सच बताऊंगा।"

आकाश ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, "नहीं अंकल, प्लीज़ किसी को मत बताइएगा।"

"क्यों?"

"क्योंकि अगर लोगों को पता चला कि पापा ने बीमारी की वजह से मुझे छोड़ा, तो लोग पापा को 'बेचारा' कहेंगे। पापा को अपनी इज़्ज़त बहुत प्यारी है। वो हमेशा से शेर रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि लोग उन्हें एक जिद्दी और सख्त पिता समझें, लेकिन एक 'लाचार मरीज़' नहीं। मुझे 'बुरा बेटा' कहलाना मंज़ूर है, लेकिन मेरे पापा को 'दया का पात्र' बनना मंज़ूर नहीं। यह हमारा उनका सीक्रेट है।"

वर्मा जी अब आकाश को विस्मय से देख रहे थे। उन्होंने महसूस किया कि हर घर की चारदीवारी के पीछे एक महाभारत चल रही होती है, और ज़रूरी नहीं कि जो धृतराष्ट्र दिखे, वो गलत ही हो, या जो दुर्योधन दिखे, वो पापी ही हो।

उस रात वर्मा जी ने अपनी पत्नी को पूरी बात बताई। सरिता जी भी सन्न रह गईं। उस रात के बाद से, सोसायटी में आकाश के लिए नज़रिया बदल गया। वर्मा जी ने सच तो नहीं बताया (जैसा कि उन्होंने वादा किया था), लेकिन उन्होंने लोगों से इतना ज़रूर कहा, "हर चीज़ वैसी नहीं होती जैसी दिखती है। आकाश और दीनानाथ जी के बीच जो हुआ, वो उनकी आपसी सहमति थी, हमें दखल देने का हक़ नहीं।"

कहानी का अंत सुखद नहीं था, क्योंकि दीनानाथ जी की याददाश्त धीरे-धीरे जा रही थी। लेकिन वह अंत संतोषजनक था। आकाश हर रविवार पिता से मिलने जाता, उन्हें अपने हाथ से खाना खिलाता, और जब दीनानाथ जी पूछते, "तुम कौन हो भाईसाहब?", तो आकाश मुस्कुरा कर कहता, "मैं आपका वो दोस्त हूँ, जो आपको कभी नहीं भूलेगा।"

रिश्ते सिर्फ़ साथ रहने से नहीं, कभी-कभी एक-दूसरे की भलाई के लिए दूर रहने से भी निभाए जाते हैं। प्रेम का सबसे बड़ा सबूत कभी-कभी पकड़ कर रखना नहीं, बल्कि छोड़ देना होता है।


क्या आपने कभी सोचा है?

हम अक्सर पड़ोसियों के घरों में झांककर फैसले सुना देते हैं, बिना यह जाने कि उस छत के नीचे क्या मजबूरी पल रही है। दीनानाथ जी और आकाश की कहानी हमें सिखाती है कि जो दिखता है, वो हमेशा सच नहीं होता।

सवाल: क्या आप आकाश की जगह होते तो समाज की बदनामी सहकर पिता की ज़िद मानते, या समाज के डर से उन्हें घर पर ही रखते चाहे उसमें उनकी तकलीफ क्यों न हो? अपने विचार कमेंट में लिखें।

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