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टूटते घर की खामोश दीवारें

 शाम के करीब पांच बज रहे थे, लेकिन घर के अंदर का सन्नाटा ऐसा था मानो रात का गहरा पहर हो। बाहर के कमरे में दीवार घड़ी की टिक-टिक हथौड़े की तरह कानों में बज रही थी। आंगन में तुलसी का चौरा आज भी वैसा ही सजा था, जैसा हर रोज सजता था, लेकिन आज उसके पास दिया जलाने वाला कोई नहीं था। सुमित ने अपने कमरे के कोने में रखे आखिरी सूटकेस की चेन बंद की। उस 'ज़िप' की आवाज उस सन्नाटे को चीरती हुई निकली और सीधे जाकर बगल वाले कमरे में बैठे बाबूजी के दिल पर लगी। बाबूजी, यानी मास्टर दीनानाथ, अपनी आरामकुर्सी पर आंखें मूंदे लेटे थे। अखबार उनकी गोद में गिरा हुआ था, लेकिन खबरें पढ़ने की हिम्मत आज उनमें नहीं थी। रसोई में बर्तनों की खड़खड़ाहट नहीं थी, जो अक्सर इस वक्त चाय बनने के दौरान हुआ करती थी।


सुमित की पत्नी, मेघना, दरवाजे की चौखट पर खड़ी थी। उसकी आंखों में आंसू सूख चुके थे, बचा था तो बस एक अजीब सा खालीपन। उसने एक नज़र उस घर को देखा जिसे उसने पिछले सात सालों में अपने खून-पसीने से सींचा था। हर दीवार का रंग, हर पर्दे का डिज़ाइन, सब उसकी पसंद का था। लेकिन आज ये सब उसे पराया लग रहा था। यह घर, जो ईंट-गारे से बना था, आज भावनाओं के बोझ तले चरमरा रहा था। सुमित ने मेघना के कंधे पर हाथ रखा, एक मूक इशारा—'अब चलने का वक्त हो गया है।'


बाहर मोहल्ले में सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी। शर्मा आंटी अपनी बालकनी से झांक रही थीं, और सामने वाले गुप्ता जी ने अपनी दुकान के लड़के को इशारा करके पूछा था कि दीनानाथ जी के घर के बाहर टैक्सी क्यों खड़ी है। समाज अपनी अदालत सजा चुका था। फैसला पहले ही सुनाया जा चुका था—"कलयुगी बेटे और मॉडर्न बहू ने बेचारे बूढ़े मां-बाप को छोड़ दिया।" यह कहानी इतनी घिसी-पिटी और पुरानी थी कि किसी को भी इसके दूसरे पहलू को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। लोगों के लिए यह सिर्फ एक मसालेदार खबर थी, शाम की चाय की चर्चा। लेकिन क्या वाकई सच इतना ही सीधा था?


सुमित सूटकेस उठाकर बाहर आया। उसके कदम भारी थे। उसे याद आया वह दिन जब उसकी नौकरी लगी थी और उसने पहली तनख्वाह लाकर बाबूजी के हाथों में रखी थी। बाबूजी ने उसे गले लगाकर कहा था, "मेरा बेटा मेरा अभिमान है।" तो फिर आज वही बेटा 'गद्दार' कैसे हो गया? क्या सिर्फ इसलिए कि वह अपनी पत्नी और छह साल के बेटे आरव के लिए एक ऐसा माहौल चाहता था जहां हर बात पर तंज न कसे जाएं? जहां सांस लेने के लिए किसी की इजाजत न लेनी पड़े?


यह कहानी किसी बड़े झगड़े या मारपीट की नहीं थी। अक्सर घर बड़ी आवाजों से नहीं, बल्कि खामोश चुभन से टूटते हैं। मेघना जब इस घर में आई थी, तो वह ढेरों सपने लेकर आई थी। वह जानती थी कि संयुक्त परिवार में तालमेल बिठाना पड़ता है। उसने अपनी नौकरी छोड़ दी क्योंकि माँजी (सुमित्रा देवी) की तबीयत नासाज रहती थी। उसने सुबह की चाय से लेकर रात के दूध तक, सब कुछ अपनी जिम्मेदारी बना लिया था। लेकिन समस्या काम नहीं थी, समस्या थी—अधिकार और अस्तित्व की लड़ाई।


दीनानाथ जी एक सिद्धांतवादी व्यक्ति थे। उनके लिए उनका शब्द ही कानून था। घर में कौन सी सब्जी बनेगी से लेकर, सुमित अपनी बचत का पैसा कहां निवेश करेगा, सब कुछ वही तय करते थे। शुरू में सुमित इसे बड़ों का प्यार और मार्गदर्शन समझता रहा। लेकिन जब आरव का जन्म हुआ, तब चीज़ें बदलने लगीं। मेघना आरव को कैसे पालना चाहती है, उसे क्या खिलाना है, उसे किस स्कूल में डालना है—हर बात पर सुमित्रा देवी और दीनानाथ जी का वीटो होता था।


"बच्चों को ज्यादा लाड़ नहीं लड़ाना चाहिए, बिगड़ जाते हैं," दीनानाथ जी कहते, जब भी मेघना आरव को रोने पर गोद में उठाती। "हमारे ज़माने में तो..." से शुरू होने वाले वाक्य मेघना के आत्मविश्वास को दीमक की तरह चाट रहे थे।


सुमित ने कई बार कोशिश की थी। उसने बाबूजी को समझाने की कोशिश की थी कि "बाबूजी, ज़माना बदल गया है। मेघना का अपना तरीका है, उसे थोड़ी आज़ादी दीजिए।" लेकिन हर बार जवाब मिलता, "तो अब तुम मुझे सिखाओगे कि घर कैसे चलाते हैं? जोरू के गुलाम बन गए हो।" यह ताना सुमित के पौरुष और उसके आत्मसम्मान, दोनों को छलनी कर देता था।


बात तब बिगड़ी जब पिछले महीने सुमित को ऑफिस से एक प्रोजेक्ट के लिए बैंगलोर जाने का अवसर मिला। यह उसके करियर के लिए एक बड़ी छलांग थी। तनख्वाह भी दुगनी थी और भविष्य सुरक्षित था। मेघना खुश थी, उसे लगा था कि शायद अब वे अपने तरीके से जी पाएंगे। लेकिन जब सुमित ने यह बात घर में बताई, तो मानो भूचाल आ गया।


"तो अब तुम हमें इस बुढ़ापे में अकेला छोड़ कर जाओगे?" माँजी ने रोना शुरू कर दिया। बाबूजी ने खाना छोड़ दिया। "इतने साल पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया, ताकि आज ये दिन देखना पड़े? पैसे का लालच इतना बढ़ गया कि मां-बाप का प्यार भी फीका पड़ गया?"


भावनात्मक अत्याचार का यह सिलसिला हफ्तों चला। सुमित ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की। "बाबूजी, मैं आपको छोड़ नहीं रहा। आप भी चलिए हमारे साथ। वहां बड़ा घर लेंगे।" लेकिन वे अपनी जगह छोड़ने को तैयार नहीं थे, और न ही सुमित को जाने देने को। अंत में, सुमित ने वह प्रमोशन ठुकरा दिया। वह रुक गया, सिर्फ अपने माता-पिता की खुशी के लिए।


लेकिन बलिदान की कीमत क्या मिली? क्या घर में शांति आई? नहीं। अगले ही दिन से ताने और तीखे हो गए। "देखा, हमने तो पहले ही कहा था, बाहर जाकर क्या उखाड़ लेते। यहीं रहो, हमारी नजरों के सामने।" मेघना को यह महसूस होने लगा था कि सुमित अंदर ही अंदर घुट रहा है। वह चिड़चिड़ा हो गया था। रात-रात भर जागता रहता। पति-पत्नी के बीच दूरियां आने लगी थीं। उस घर की हवा में इतना तनाव था कि अब आरव भी वहां सहमा-सहमा रहता था।


मेघना ने एक रात सुमित का हाथ पकड़कर कहा था, "सुमित, अगर हम यहां रहे, तो हम अच्छे बेटे-बहू तो शायद कहलाएंगे, लेकिन हम एक खुशहाल पति-पत्नी और अच्छे माता-पिता कभी नहीं बन पाएंगे। हमारा रिश्ता मर रहा है, सुमित। इस घर की ईंटों को बचाने के लिए हम अपनी नींव खोद रहे हैं।"


वह एक निर्णायक पल था। सुमित को अहसास हुआ कि 'श्रवण कुमार' बनने की होड़ में वह एक इंसान होना भूल रहा है। उसने तय किया कि वह अलग घर लेगा। शहर वही रहेगा, वह रोज आएगा-जाएगा, हर जिम्मेदारी उठाएगा, लेकिन छत अलग होगी। ताकि जब वे मिलें, तो प्यार से मिलें, न कि मजबूरी और कड़वाहट के साथ।


जब उसने यह फैसला सुनाया, तो घर में कोहराम मच गया। "घर तोड़ना चाहती है ये लड़की!" सारा दोष मेघना के सिर मढ़ दिया गया। सुमित ने बहुत कहा कि यह उसका फैसला है, लेकिन समाज और परिवार की नजर में 'बेटा' कभी गलत नहीं होता, उसे तो बस 'बहू' भड़काती है।


आज, जब वे दहलीज पार कर रहे थे, बाबूजी ने अपनी आंखें नहीं खोलीं। माँजी कोने में बैठकर पल्लू से मुंह छिपाए रो रही थीं। सुमित उनके पास गया, उनके पैर छुए। "माँ, मैं कोई परदेस नहीं जा रहा। सिर्फ दो गली छोड़कर किराए का मकान लिया है। शाम को आऊंगा आपसे मिलने।"


माँजी ने अपना पैर पीछे खींच लिया। "जिस बेटे ने जीते जी मार दिया, उसका आना न आना क्या मायने रखता है।"


ये शब्द सुमित के दिल में किसी खंजर की तरह उतरे। क्या अपनी मानसिक शांति चाहना माता-पिता की हत्या करने जैसा है? उसने मेघना की तरफ देखा। मेघना की आँखों में एक दृढ़ता थी—वह जानती थी कि वे 'विलेन' बन रहे हैं। वह जानती थी कि कल से हर रिश्तेदार के फोन आएंगे, उन्हें स्वार्थी कहा जाएगा। लेकिन उसने यह भी देखा कि सुमित के कंधों से एक अदृश्य बोझ उतर रहा था।


वे मुख्य द्वार से बाहर निकले। टैक्सी वाला सामान चढ़ा रहा था। पड़ोस के शर्मा जी, जो हमेशा 'बेटा-बेटा' करते थे, आज मुंह फेर कर खड़े थे। सुमित ने एक गहरी सांस ली। हवा में थोड़ी ठंडक थी, लेकिन उसमें एक ताज़गी भी थी।


टैक्सी में बैठते ही आरव ने मासूमियत से पूछा, "पापा, हम नानी के घर जा रहे हैं?"

सुमित ने उसे गोद में बिठाया और मुस्कुराया, "नहीं बेटा, हम अपने घर जा रहे हैं। एक ऐसा घर जहां तुम दीवार पर ड्राइंग कर सकोगे और कोई तुम्हें डांटेगा नहीं।"


गाड़ी चल पड़ी। पीछे छूट गया वह घर, वह बचपन की यादें, और वह उम्मीद कि कभी तो माता-पिता समझेंगे।


गाड़ी के पीछे का कांच धूल से भरा था, लेकिन सुमित ने मुड़कर नहीं देखा। वह जानता था कि दोष मढ़ने की रवायत सदियों पुरानी है। जब भी घर बंटता है, तो कहानी यही सुनाई जाती है कि बच्चों ने छोड़ दिया। कोई यह नहीं बताता कि बच्चों को जाने पर 'मजबूर' क्यों होना पड़ा। कोई उन रातों की बात नहीं करता जब बहू तकिए में मुंह दबाकर रोई थी, या बेटे ने अपने सपनों की चिता जलाई थी।


समाज को सिर्फ परिणाम दिखता है—टूटा हुआ घर। प्रक्रिया किसी को नहीं दिखती।


सुमित और मेघना ने आज एक कड़वा घूंट पिया था—'बुरे बनने' का घूंट। कभी-कभी रिश्तों को बचाने के लिए, दूरियों का होना जरूरी होता है। वे जानते थे कि शायद कुछ महीनों बाद, जब गुस्सा ठंडा होगा, तो शायद बाबूजी बात करेंगे। शायद अलग रहकर वे एक-दूसरे की अहमियत ज्यादा बेहतर समझ पाएंगे। साथ रहकर जो रोज की किच-किच थी, वह प्यार को खत्म कर रही थी। अलग रहकर शायद आदर बचा रहे।


लेकिन दुनिया के लिए? दुनिया के लिए आज एक और कहानी तैयार थी।

"अरे सुना तुमने? दीनानाथ जी के बेटे ने उन्हें छोड़ दिया। सब उस बहू का किया-धरा है। बेचारी गाय जैसी थी पहले, न जाने क्या जादू कर दिया लड़के पर।"


सच्चाई टैक्सी के पहियों के साथ आगे बढ़ रही थी, और झूठ पीछे स्थिर खड़ा था, अपनी जड़ें जमाए हुए।

हर बार बेटा-बहू ही गलत नहीं होते। कभी-कभी, बस हालात ऐसे होते हैं कि साथ रहना जहर पीने जैसा हो जाता है। और जीवन जीने के लिए होता है, घुट-घुट कर मरने के लिए नहीं।


सुमित ने मेघना का हाथ अपने हाथ में लिया। एक शब्द बोलने की जरूरत नहीं थी। दोनों जानते थे कि सफर मुश्किल होगा, ताने सुनने मिलेंगे, लेकिन कम से कम आज रात वे सुकून की नींद सोएंगे। एक ऐसी नींद, जिसमें कल सुबह उठकर किसी को खुश करने का दबाव नहीं होगा, बस अपनी छोटी सी दुनिया को संवारने का सुकून होगा।


घर टूटता नहीं है, कभी-कभी वह सिर्फ अपनी शक्ल बदलता है ताकि उसमें रहने वाले लोग साबुत रह सकें।


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**लेखक का संदेश:**

यह कहानी उन हजारों जोड़ों की मूक व्यथा है जो अपने ही घर में परायों सा महसूस करते हैं। घर छोड़ना हमेशा बगावत नहीं होती, कभी-कभी यह आत्मरक्षा होती है। यह ज़रूरी है कि हम सिक्के का दूसरा पहलू भी देखें। हर बेटा श्रवण कुमार बनने के दबाव में अपनी रीढ़ नहीं तोड़ सकता, और हर बहू घर तोड़ने के लिए नहीं आती। कभी-कभी 'दूरी' ही वह धागा होती है जो टूटते रिश्तों को फिर से जोड़ सकती है।


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