विवेक ने तुरंत बात लपकी, "हाँ माँ, भैया सही कह रहे हैं। हमने सोचा है कि हम इस घर को बेच देते हैं। अच्छे दाम मिल रहे हैं। जो पैसा आएगा, उसे हम दोनों भाइयों के बिज़नेस और फ्लैट की ईएमआई में एडजस्ट कर लेंगे। और रही बात आपकी, तो आप बारी-बारी से हम दोनों के पास रहिएगा। छह महीने बैंगलोर, छह महीने मुंबई। नाती-पोतों के साथ मन भी लगा रहेगा।"
सुमित्रा देवी के दो बेटे थे—मनीष और विवेक। दोनों अपनी-अपनी गृहस्थी में सेटल थे। मनीष बैंगलोर में एक आईटी कंपनी में बड़े ओहदे पर था, और विवेक मुंबई में अपना कपड़ों का शोरूम चलाता था। रघुनाथ जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी रेलवे की नौकरी में खपा दी थी। रिटायरमेंट के बाद जो प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी का पैसा मिला, उससे उन्होंने शहर के पॉश इलाके में यह दो मंज़िला मकान बनवाया था। उनकी इच्छा थी कि उनका बुढ़ापा इसी घर में, अपने बच्चों और नाती-पोतों की किलकारियों के बीच गुज़रेगा।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। रघुनाथ जी चले गए, और पीछे छोड़ गए सुमित्रा देवी को—अकेली, लेकिन आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर। रघुनाथ जी ने समझदारी दिखाते हुए अपनी सारी जमा-पूंजी और पेंशन सुमित्रा देवी के नाम कर दी थी। बैंक में अच्छी-खासी रकम थी और पेंशन भी इतनी थी कि सुमित्रा जी का खर्चा ठाठ से चल सके।
समस्या यहीं से शुरू हुई।
मनीष और विवेक, जो पिता के जीते जी 'आदर्श बेटा' होने का दम भरते थे, अब उनका व्यवहार बदलने लगा था। तेरहवीं के बाद दोनों बेटों ने एक 'फैमिली मीटिंग' बुलाई।
ड्राइंग रूम में सब इकट्ठा थे। मनीष की पत्नी रितु और विवेक की पत्नी सोनिया भी मौजूद थीं।
"माँ," मनीष ने भूमिका बांधते हुए कहा, "पापा तो चले गए। अब आप इस इतने बड़े घर में अकेली कैसे रहेंगी? आपकी सुरक्षा की भी चिंता है और फिर आपकी उम्र भी हो गई है।"
विवेक ने तुरंत बात लपकी, "हाँ माँ, भैया सही कह रहे हैं। हमने सोचा है कि हम इस घर को बेच देते हैं। अच्छे दाम मिल रहे हैं। जो पैसा आएगा, उसे हम दोनों भाइयों के बिज़नेस और फ्लैट की ईएमआई में एडजस्ट कर लेंगे। और रही बात आपकी, तो आप बारी-बारी से हम दोनों के पास रहिएगा। छह महीने बैंगलोर, छह महीने मुंबई। नाती-पोतों के साथ मन भी लगा रहेगा।"
सुमित्रा देवी ने बेटों के चेहरों को गौर से देखा। वहाँ चिंता नहीं, एक गणित चल रहा था। घर की कीमत का गणित।
"लेकिन बेटा, यह तुम्हारे पापा की निशानी है," सुमित्रा जी ने धीमी आवाज़ में कहा। "उन्होंने कहा था कि यह घर कभी नहीं बिकेगा।"
"ओह माँ! आप भी न, इमोशनल होकर प्रैक्टिकल बातें भूल जाती हैं," रितु ने बीच में टोका। "इतनी बड़ी कोठी में मेंटेनेंस का खर्चा कितना है, पता है? और फिर, हम तो आपकी सेवा करना चाहते हैं। अब आप अपने बेटों के साथ नहीं रहना चाहतीं क्या?"
भावनात्मक दबाव काम कर गया। सुमित्रा देवी मान गईं। घर बिक गया। करोड़ों की रकम आई। बेटों ने बड़ी चतुराई से वह रकम आपस में बांट ली। सुमित्रा देवी के पास बची तो सिर्फ़ उनकी मासिक पेंशन और लगभग पंद्रह लाख रुपये की एक फिक्स्ड डिपॉज़िट (FD), जिसे उन्होंने अपनी 'आपातकालीन निधि' के रूप में रखने की ज़िद की थी।
शुरुआत के दिन अच्छे बीते। सुमित्रा देवी पहले छह महीने के लिए बैंगलोर, मनीष के घर गईं। रितु ने शुरू में खूब आवभगत की। सुबह की चाय बिस्तर पर, शाम को पार्क में घुमाना। लेकिन जैसे ही दूसरा महीना शुरू हुआ, असली रंग दिखने लगे।
"माँजी," एक दिन रितु ने कहा, "अगले महीने हम यूरोप टूर पर जा रहे हैं। बच्चों की छुट्टियाँ हैं। अब आपको तो घुटनों में दर्द रहता है, आप चलकर क्या करेंगी? तो हमने सोचा है कि आपको विवेक के पास मुंबई भेज देते हैं। वैसे भी दो महीने तो हो ही गए हैं।"
सुमित्रा जी को झटका लगा। "पर बेटा, बात तो छह महीने की हुई थी। और विवेक के घर अभी पेंटिंग का काम चल रहा है, उसने मना किया था।"
"अरे, तो हम क्या करें?" रितु झल्ला उठी। "हम अपना ट्रिप कैंसिल कर दें? आप समझती क्यों नहीं कि हमारी भी अपनी लाइफ है? प्लीज़ एडजस्ट कीजिये।"
सुमित्रा जी को समय से पहले ही मुंबई रवाना कर दिया गया। वहाँ हालात और भी बदतर थे। सोनिया, छोटी बहू, साफ़-साफ़ शब्दों में बात करने वाली थी।
"माँजी, देखिए, मुंबई में लाइफ बहुत फ़ास्ट है," सोनिया ने पहले ही दिन नियम बता दिए। "मेरे पास रितु दीदी की तरह टाइम नहीं है कि मैं परांठे बनाऊँ। यहाँ कॉर्नफ्लेक्स और ब्रेड ही मिलेगा नाश्ते में। और हाँ, दिन में मेड नहीं आती, तो अपनी चाय आप खुद बना लीजिएगा।"
सुमित्रा देवी, जो अपने घर की मालकिन थीं, अब एक सूटकेस बन गई थीं। इधर से उधर ढोई जाने वाली एक ज़िंदा लाश। उनकी पेंशन के पैसे भी धीरे-धीरे 'घर के खर्च' के नाम पर उनसे ले लिए जाते। कभी बच्चों की स्कूल फीस, कभी बिजली का बिल।
"माँ, आपके पास तो पैसे रखे ही हैं, कैश निकालकर क्या करेंगी? लाओ, मैं ऑनलाइन पेमेंट कर देता हूँ," विवेक अक्सर उनका एटीएम कार्ड मांग लेता और फिर कार्ड हफ़्तों तक उसी के पास रहता।
एक दिन सुमित्रा देवी बाथरूम में फिसल गईं। उनके कूल्हे की हड्डी में हल्का फ्रैक्चर आ गया। डॉक्टर ने बेड रेस्ट और एक छोटी सर्जरी की सलाह दी।
अस्पताल के कमरे में मनीष और विवेक फुसफुसा रहे थे, लेकिन सुमित्रा जी की कान दवा के असर के बावजूद जाग रहे थे।
"यार, सर्जरी का खर्चा तीन लाख बता रहे हैं," विवेक ने धीरे से कहा। "मेरा तो धंधा मंदा चल रहा है। भैया, आप ही देख लो।"
"मैं कैसे देख लूँ?" मनीष चिढ़कर बोला। "यूरोप ट्रिप में क्रेडिट कार्ड की लिमिट ख़त्म हो गई है। और वैसे भी, माँ की वो 15 लाख वाली एफडी तुड़वा देते हैं न। बुढ़ापे के लिए ही तो रखी थी। अब इससे ज़्यादा बुरा वक़्त क्या आएगा?"
"पर वो एफडी तो माँ ने अपनी मर्जी से रखी थी," विवेक ने कहा।
"अरे, मर्जी क्या होती है? अब वो बिस्तर पर हैं। साइन करवा लेंगे या अंगूठा लगवा लेंगे। आखिर पैसा तो हमारा ही है, आज नहीं तो कल मिलना ही है। अभी इलाज में लग जाएगा तो हमारा बोझ कम होगा," रितु ने पीछे से राय दी।
सुमित्रा देवी ने अपनी आँखें कसकर भींच लीं। उनके आंसुओं ने तकिए को भिगो दिया। जिन बेटों को उन्होंने अपनी कोख में पाला, जिन्होंने उनका आलीशान घर बेचकर अपनी तिजोरियाँ भरीं, आज वे उनकी बीमारी में अपनी जेब से एक रुपया खर्च करने को तैयार नहीं थे। वे उनकी आखिरी जमा-पूंजी, वो 15 लाख रुपये, जो उनकी सुरक्षा थी, उस पर गिद्ध की तरह नज़र गड़ाए बैठे थे।
उन्हें रघुनाथ जी की एक बात याद आई। "सुमित्रा, दुनिया में सबसे भारी चीज़ खाली जेब होती है, उसे कोई उठा नहीं पाता। और सबसे हल्की चीज़ भरा हुआ बटुआ होता है, उसके सहारे तुम कहीं भी उड़ सकती हो।"
अगले दिन सुबह जब डॉक्टर राउंड पर आए, तो सुमित्रा जी ने उनसे कुछ कहा। डॉक्टर ने बेटों को बाहर जाने का इशारा किया।
आधे घंटे बाद, सुमित्रा जी ने मनीष और विवेक को अंदर बुलाया। उनके चेहरे पर बीमारी की शिकन थी, लेकिन आँखों में एक अजीब सी दृढ़ता।
"बेटों," सुमित्रा जी ने कहा, "मैंने डॉक्टर से बात कर ली है। सर्जरी होगी।"
"हाँ माँ, हम वही बात कर रहे थे," मनीष ने जल्दी से कहा। "वो आपकी एफडी के पेपर्स कहाँ हैं? बैंक मैनेजर को बुलाना पड़ेगा साइन के लिए।"
"उसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी," सुमित्रा जी ने शांत स्वर में कहा। "मैंने अपने वकील मिस्टर देशपांडे को बुला लिया है। वे रस्ते में हैं।"
"वकील? वकील क्यों?" विवेक घबरा गया।
"क्योंकि मैंने एक फैसला लिया है," सुमित्रा जी ने तकिए के नीचे से एक पर्चा निकाला। "तुम दोनों को लगता है कि मैं एक बोझ हूँ जिसे छह-छह महीने के लिए बांटा गया है। तुम लोग मेरे घर के पैसे से ऐश कर रहे हो, और मेरे इलाज के लिए मेरी ही एफडी तोड़ना चाहते हो। मुझे लगा था कि तुम मेरे बेटे हो, मेरा सहारा बनोगे। पर तुम तो मेरे बुढ़ापे के व्यापारी निकले।"
"माँ, आप क्या कह रही हैं?" सोनिया ने बात संभालने की कोशिश की।
"चुप रहो!" सुमित्रा जी की आवाज़ में इतनी कड़क थी कि सब सहम गए। "मैंने मिस्टर देशपांडे से कहकर शहर के सबसे अच्छे 'सीनियर सिटीजन केयर होम' (वृद्धाश्रम नहीं, एक लग्ज़री केयर होम) में अपना कमरा बुक करवा लिया है। वहाँ मेडिकल सुविधा है, खाना है, और सबसे ज़रूरी बात—वहाँ इज़्ज़त है, क्योंकि मैं अपनी कीमत चुका कर रहूँगी।"
"लेकिन माँ, पैसा?" मनीष ने पूछा। "वो केयर होम तो बहुत महँगे होते हैं।"
"हाँ," सुमित्रा जी मुस्कुराईं। एक कड़वी मुस्कान। "तुम्हें याद है तुम्हारे पापा का एक पुराना पीपीएफ अकाउंट और कुछ शेयर्स थे, जिनके बारे में तुम्हें पता नहीं था? वो अभी भी मेरे नाम पर हैं। और मेरी वो 15 लाख की एफडी। और मेरी मासिक पेंशन। यह सब मिलाकर इतना पैसा है कि मैं अपनी बाकी ज़िंदगी महारानी की तरह काट सकती हूँ।"
दोनों बेटों के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। उन्हें लगा था कि माँ के पास सिर्फ़ वही एफडी बची है।
"और सुन लो," सुमित्रा जी ने अपनी बात जारी रखी। "मैंने अपनी नई वसीयत भी तैयार करवा ली है। मेरे मरने के बाद, मेरे बैंक में जो भी पैसा बचेगा, वो किसी अनाथालय को जाएगा। तुम दोनों को मेरे जाने के बाद एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिलेगी। तुमने जीते जी मुझे मार दिया, अब मेरे मरने का इंतज़ार मत करना।"
"माँ, आप ऐसा नहीं कर सकतीं! लोग क्या कहेंगे?" विवेक गिड़गिड़ाया। "हमारी नाक कट जाएगी समाज में।"
"नाक तो तब कटनी चाहिए थी जब तुम अपनी माँ को सूटकेस की तरह इधर-उधर फेंक रहे थे," सुमित्रा जी ने कहा। "तुमने मेरा घर बेचा, मैंने माफ़ कर दिया। तुमने मेरा अपमान किया, मैंने सहा। पर आज जब तुम मेरे इलाज के लिए मेरे ही पैसे गिनने लगे, तो मेरा ममत्व मर गया।"
तभी वकील देशपांडे कमरे में दाखिल हुए। सुमित्रा जी ने पेपर्स पर साइन किए।
सर्जरी हुई। बिल सुमित्रा जी ने अपने चेक से भरा। रिकवरी के बाद, वे किसी बेटे के घर नहीं गईं। एम्बुलेंस उन्हें सीधे 'आनंदम केयर होम' ले गई।
वहाँ सुमित्रा जी को एक नया जीवन मिला। वहाँ उनकी उम्र के कई लोग थे। वे शाम को ताश खेलतीं, किताबें पढ़तीं, और अपनी पसंद का खाना खातीं। उनके पास उनका अपना पैसा था, अपनी मर्ज़ी थी।
मनीष और विवेक कई बार आए, माफ़ी मांगने (या शायद वसीयत बदलवाने)। लेकिन सुमित्रा जी ने उन्हें रिसेप्शन से ही लौटा दिया। वे कहतीं, "मेरे बेटे तो उसी दिन मर गए थे जिस दिन उन्होंने मेरे घर का सौदा किया था। अब मैं सिर्फ़ अपने लिए जिऊँगी।"
सुमित्रा देवी ने साबित कर दिया कि नारी चाहे माँ हो या पत्नी, उसकी असली शक्ति उसकी आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान में है। उन्होंने अपने 'किराए के रिश्तों' को छोड़कर, अपनी 'कमाई हुई इज़्ज़त' के साथ जीना चुना।
वह अब सूटकेस वाली माँ नहीं थीं। वह अब अपनी ज़िंदगी की मालकिन थीं।
लेखिका : आशा पासवान
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