रजत ने अपनी चमचमाती एसयूवी का इंजन बंद किया और गहरी सांस ली। गाड़ी का एसी बंद होते ही बाहर की उमस भरी गर्मी ने उसे घेर लिया। सामने लोहे का वो पुराना गेट था, जिसका पेंट जगह-जगह से उखड़ चुका था। यह मेरठ की वो पुरानी गली थी जहाँ उसका बचपन बीता था, लेकिन आज मुंबई के एक बड़े बिजनेसमैन के तौर पर यहाँ वापस आना उसे किसी अजीब से द्वंद्व में डाल रहा था। उसने रियर व्यू मिरर में अपना चेहरा देखा—थकी हुई आँखें, माथे पर चिंता की लकीरें और एक झूठी मुस्कान जो उसे अगले दो दिनों तक अपने चेहरे पर सजानी थी।
रजत का गारमेंट एक्सपोर्ट का बिज़नेस पिछले छह महीनों से भारी घाटे में चल रहा था। बैंक की ईएमआई, वेंडर्स का उधार और स्टाफ की सैलरी—सब कुछ पहाड़ बनकर उसके सीने पर रखा था। उसे बीस लाख रुपयों की सख्त ज़रूरत थी, वरना अगले हफ्ते उसकी फैक्ट्री सील हो सकती थी। वह यहाँ अपने माता-पिता से मिलने नहीं, बल्कि पुश्तैनी ज़मीन के कागज़ात मांगने आया था। उसे पता था कि पिताजी, मास्टर दीनानाथ, उस ज़मीन को अपनी 'अंतिम पूंजी' मानते हैं, लेकिन रजत के पास कोई और रास्ता नहीं था।
गेट की चरमराहट के साथ ही बरामदे में बैठी माँ, सावित्री देवी ने उसे देखा। "अरे! मेरा राजा बेटा आ गया!" वह अपनी गठिया की दर्द भरी चाल को भूलकर जितनी तेज़ हो सकता था, उतनी तेज़ी से उसकी ओर लपकीं।
रजत ने झुककर पैर छुए। "कैसी हो माँ?"
"मैं तो चंगी हूँ, तू बता? इतना दुबला क्यों हो गया है? और बहू-बच्चों को क्यों नहीं लाया?" सावित्री देवी ने उसके गालों को चूमते हुए सवालों की झड़ी लगा दी।
"बच्चों के स्कूल थे माँ, और शिखा को ऑफिस में काम था," रजत ने वही रटा-रटाया झूठ बोला जो वह हर बार बोलता था। असलियत यह थी कि शिखा और उसके बीच इस आर्थिक तंगी को लेकर रोज़ झगड़े हो रहे थे।
तभी घर के अंदर से खट-खट की आवाज़ आई। दीनानाथ जी अपनी पुरानी लूना मोपेड को स्टैंड पर लगा रहे थे। वह पसीने से लथपथ थे और हाथ में सब्ज़ी का थैला था। सत्तर साल की उम्र में भी उनकी पीठ सीधी थी और आँखों में वही मास्साब वाली कड़क चमक।
"आ गए नवाब साहब?" दीनानाथ जी ने बिना उसकी तरफ देखे कहा, "गाड़ी गली के बाहर खड़ी करनी थी, यहाँ बच्चों के खेलने की जगह घेर ली होगी।"
"नमस्ते पापा," रजत ने कहा। उसे हमेशा लगता था कि पिता जी उसे कभी खुश होकर नहीं मिलते।
"जीते रहो। हाथ-मुँह धो ले, खाना तैयार है," दीनानाथ जी इतना कहकर अंदर चले गए।
रजत अपने पुराने कमरे में गया। वहां सब कुछ वैसा ही था। दीवारों पर उसका पुराना क्रिकेट बैट टंगा था, शेल्फ पर कॉलेज की किताबें जमी थीं। लेकिन छत का पंखा वही पुराना था, जो चलते वक्त ऐसी आवाज़ करता था जैसे कोई जनरेटर चल रहा हो। रजत को झुंझलाहट हुई। उसने मन ही मन सोचा, "मैं इन्हें कितने पैसे भेजता हूँ, फिर भी ये लोग उसी पुरानी चीज़ों के साथ चिपके रहते हैं। कंजूसी की भी हद होती है।"
रात के खाने पर मेज पर सादगी थी—अरहर की दाल, भिंडी की सब्ज़ी और रोटी। रजत को फाइव स्टार होटलों की आदत थी, लेकिन माँ के हाथ की दाल की खुशबू ने उसकी भूख जगा दी।
दीनानाथ जी ने चुपचाप खाना शुरू किया। रजत मौके की तलाश में था। कैसे कहे? कैसे मांगे ज़मीन के कागज़?
"काम-काज कैसा चल रहा है?" अचानक दीनानाथ जी ने पूछा।
रजत का निवाला हलक में अटक गया। उसने पानी पिया। "जी... जी बढ़िया चल रहा है। अभी एक नया एक्सपोर्ट ऑर्डर मिला है, बस उसी की तैयारी है।" उसने झूठ बोला, लेकिन उसकी नज़रें पिता से नहीं मिल पा रही थीं।
"हम्म्," दीनानाथ जी ने चश्मे के ऊपर से उसे देखा। वो नज़रें ऐसी थीं जैसे एक्स-रे मशीन हों। "सुना है मार्केट में मंदी है?"
"हाँ, थोड़ी बहुत है, पर हम मैनेज कर रहे हैं," रजत ने बात संभाली।
खाने के बाद रजत बरामदे में टहलने लगा। उसे नींद नहीं आ रही थी। उसे अपने बचपन की याद आई। कैसे दीनानाथ जी ने अपनी पुरानी साइकिल पर उसे बिठाकर पूरा शहर घुमाया था। उन्होंने अपनी ज़रूरतें मारकर उसे इंजीनियरिंग करवाई थी। और आज? आज वह उन्हीं की आखिरी जमा-पूंजी छीनने आया था। उसे खुद पर घिन आने लगी।
"सोया नहीं?" पीछे से आवाज़ आई। दीनानाथ जी हाथ में एक लिफाफा लिए खड़े थे।
"बस, गर्मी लग रही थी," रजत ने बहाना बनाया।
दीनानाथ जी ने पास वाली कुर्सी खींची और बैठ गए। "बैठ, कुछ बात करनी है।"
रजत का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। क्या उन्हें पता चल गया?
दीनानाथ जी ने वह लिफाफा मेज पर रख दिया। "रजत, मुझे पता है कि तू झूठ बोलने में कभी अच्छा नहीं रहा। बचपन में जब तू स्कूल से भागकर सिनेमा गया था, तब भी तूने ऐसे ही नज़रें चुराई थीं जैसे आज खाने की मेज पर चुरा रहा था।"
रजत सन्न रह गया।
"मार्केट की मंदी सिर्फ अखबारों में नहीं छपती, बेटा। शर्मा जी का बेटा उसी बैंक में मैनेजर है जहाँ तेरा लोन चल रहा है। उसने मुझे बताया कि तेरी फैक्ट्री डिफॉल्टर होने वाली है।" दीनानाथ जी की आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें एक गहरा दर्द था।
रजत की आँखों में आँसू आ गए। उसका पूरा अहंकार, सारी बनावटी सफलता एक पल में ढह गई। "पापा, मैं... मैं बस आपको परेशान नहीं करना चाहता था। मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन..." उसका गला रुंध गया।
दीनानाथ जी ने धीरे से लिफाफा उसकी ओर सरकाया। "इसमें वो पुश्तैनी ज़मीन के कागज़ नहीं हैं।"
रजत ने चौंककर उन्हें देखा। "क्या?"
"वो ज़मीन तो मैंने पिछले महीने ही बेच दी थी," दीनानाथ जी ने बड़ी सहजता से कहा। "गाँव में डिस्पेंसरी बन रही थी, अच्छे दाम मिल रहे थे।"
"तो फिर ये क्या है?" रजत ने कांपते हाथों से लिफाफा उठाया।
"ये मेरे प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्युटी और जो एफडी (FD) तेरी माँ ने तेरे नाम से जोड़ी थी, उन सबके पेपर्स हैं। और साथ में उस ज़मीन के पैसे का चेक है," दीनानाथ जी ने अपनी पुरानी चप्पल से पैर बाहर निकालते हुए कहा। "कुल मिलाकर पच्चीस लाख हैं। तेरा कर्ज़ उतर जाएगा और थोड़ा बहुत धंधे में लगाने के लिए बच भी जाएगा।"
रजत के हाथ से लिफाफा छूट गया। वह अपने पिता के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा। "पापा, ये आपकी पूरी ज़िंदगी की कमाई है। आपका बुढ़ापा... मैं ये नहीं ले सकता। मैं इतना स्वार्थी नहीं हो सकता।"
दीनानाथ जी ने झुककर उसे उठाया। उनकी आँखों में भी नमी थी, लेकिन चेहरा सख्त था। "पापा हूँ मैं तेरा। बाप की कमाई औलाद के लिए नहीं होती तो और किसके लिए होती है? और रही बात बुढ़ापे की, तो क्या तू हमें सड़क पर छोड़ देगा?"
"कभी नहीं पापा, कभी नहीं," रजत ने उनका हाथ थाम लिया। वो हाथ सख्त और खुरदरे थे, जिन पर चॉक की धूल और ज़िंदगी की मेहनत जमी थी।
"देख रजत," दीनानाथ जी ने उसका कंधा थपथपाया, "पैसा तो फिर आ जाएगा। लेकिन अगर तू टूट गया, तो मैं और तेरी माँ बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। हमें तेरी सफलता से ज़्यादा तेरी शांति प्यारी है। और हाँ, ये मत सोचना कि ये खैरात है। ये उधार है। जब तेरा धंधा फिर से चल पड़े, तो सूद समेत वापस लूँगा। अपनी लूना बदलनी है मुझे, इलेक्ट्रिक स्कूटर लेनी है।" उन्होंने माहौल को हल्का करने के लिए मुस्कुराते हुए कहा।
उस रात रजत अपने पिता के बगल वाली खाट पर सोया, जैसा वह बचपन में सोता था। छत का पंखा अभी भी शोर कर रहा था, लेकिन आज वह शोर उसे लोरी जैसा लग रहा था। उसे अहसास हुआ कि जिसे वह पिता की कंजूसी समझता था, वह असल में अनुशासन और भविष्य की सुरक्षा थी। पिता ने कभी नई कार नहीं खरीदी, कभी एसी नहीं लगवाया, ताकि आज संकट की इस घड़ी में वो अपने बेटे का आत्मसम्मान बचा सकें।
अगली सुबह जब रजत जाने के लिए तैयार हुआ, तो उसमें एक अलग ही आत्मविश्वास था। वह अब सिर्फ एक बिजनेसमैन नहीं था, बल्कि एक ऐसे पिता का बेटा था जिसने उसे हारना नहीं सिखाया था।
उसने गाड़ी स्टार्ट की और खिड़की से बाहर देखा। दीनानाथ जी और सावित्री देवी गेट पर खड़े थे।
"पापा," रजत ने गाड़ी से सिर निकालकर कहा, "अगली बार आऊँगा तो लोन चुकाने के लिए नहीं, बल्कि आपको वो इलेक्ट्रिक स्कूटर दिलाने आऊँगा। यह वादा है।"
दीनानाथ जी मुस्कुराए और हाथ हिलाया।
गाड़ी धूल उड़ाती हुई आगे बढ़ गई। सावित्री देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं। "तुमने उसे बताया नहीं कि तुमने अपनी मोतियाबिंद की सर्जरी के पैसे भी उसी में दे दिए?"
दीनानाथ जी ने गेट बंद करते हुए कहा, "आँखें ठीक होकर क्या करेंगी अगर बेटा ही नज़रों से गिर जाए या दूर हो जाए? उसे अब सब साफ़ दिख रहा है, और मुझे भी। बस यही काफी है।"
रजत वापस शहर की भीड़ में जा रहा था, लेकिन इस बार वह अकेला नहीं था। उसके सिर पर पिता का हाथ और दिल में माँ का आशीर्वाद था। उसे समझ आ गया था कि दुनिया में सबसे बड़ा बैंक बैलेंस पिता का साया होता है, जो कभी दिवालिया नहीं होता।
प्रिय पाठकों,
रजत और दीनानाथ जी की यह कहानी सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि हमारे समाज के हर उस घर की हकीकत है जहाँ पिता अपनी ज़रूरतों का गला घोंटकर अपने बच्चों के सपनों को सींचते हैं। पिता वो नींव का पत्थर है जो ज़मीन के नीचे दबता है ताकि बेटे की इमारत आसमान छू सके।
क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा पल आया है जब आपको लगा हो कि आपके माता-पिता आपको नहीं समझते, लेकिन बाद में पता चला हो कि वो आपकी भलाई के लिए ही कठोर बने थे? या क्या आपके पास अपने पापा के त्याग की कोई ऐसी याद है जिसने आपकी आँखों में आँसू ला दिए हों?
अपनी दिल छू लेने वाली बातें नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें। आपके अनुभव किसी और को अपने माता-पिता के करीब ला सकते हैं।
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