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विरासत का ज़हर

 शहर के पॉश इलाके में बने उस आलीशान बंगले 'शांति निवास' में नाम के उलट बड़ी अशांति थी। रवि ने कड़ी मेहनत करके यह मुकाम हासिल किया था, लेकिन इस सफलता की चमक में वह उन बुनियादी संस्कारों को भूल गया था जो उसके पिता, दीनानाथ जी ने उसे दिए थे। दीनानाथ जी एक सेवानिवृत्त शिक्षक थे। उनकी पत्नी के देहांत के बाद, रवि उन्हें अपने साथ शहर ले आया था। पर यह साथ केवल शारीरिक था, मानसिक और भावनात्मक रूप से वे एक-दूसरे से मीलों दूर हो चुके थे।

रवि की पत्नी, शालिनी, आधुनिक खयालों वाली महिला थी, लेकिन उसके मन में बुजुर्गों के प्रति सम्मान का अभाव था। घर में दीनानाथ जी की उपस्थिति उसे बोझ लगने लगी थी। सुबह की चाय हो या रात का खाना, दीनानाथ जी को हमेशा अंत में और ठंडा भोजन परोसा जाता। शालिनी अक्सर रसोई में बड़बड़ाती, "इतनी उम्र हो गई है, पर फरमाइशें कम नहीं होतीं। कभी ये दर्द, कभी वो दर्द!"

दीनानाथ जी का सबसे बड़ा सहारा उनका सात साल का पोता, आरव था। आरव जब भी स्कूल से आता, दौड़कर दादा जी के पास जाता और उनके साथ कैरम या लूडो खेलने की जिद करता। लेकिन शालिनी को यह बर्दाश्त नहीं था। वह तुरंत चिल्लाती, "आरव! दादा जी के कमरे में क्या कर रहे हो? वहाँ पुरानी किताबों की बदबू और धूल है। चलो, अपना होमवर्क करो या टैबलेट पर गेम खेलो।"

दीनानाथ जी की आँखें सजल हो जातीं। वे अकेले कमरे में बैठकर पुरानी यादों की जुगाली करते। कभी-कभी रवि जब ऑफिस से थका-हारा आता और अपने पिता के पास बैठने की कोशिश करता, तो शालिनी तुरंत कोई न कोई बहाना बना लेती। "रवि, सुनिए, गीजर खराब हो गया है, जरा देखिए तो।" या "रवि, आरव की फीस जमा करनी है, अभी बैठकर हिसाब कीजिए।" वह रवि को अपने पिता से बात करने का एक भी मौका नहीं देना चाहती थी।

दीनानाथ जी खिड़की से बाहर देखते रहते। उन्होंने रवि को पाल-पोसकर बड़ा किया था, उसे कंधे पर बिठाकर दुनिया दिखाई थी। पर आज वही कंधा उन्हें सहारा देने के बजाय खुद को बचाकर निकल जाता था। आरव यह सब देख रहा था। वह देख रहा था कि कैसे उसकी माँ दादा जी की थाली दूर से सरका देती है। वह सुन रहा था कि कैसे उसके पिता दादा जी की खाँसी पर झुंझला जाते हैं।

एक दिन रविवार की दोपहर थी। रवि और शालिनी लिविंग रूम में बैठकर आने वाली छुट्टियों की योजना बना रहे थे। आरव अपने खिलौनों से खेल रहा था। अचानक आरव ने अपनी एक पुरानी टूटी हुई कार उठाई और उसे अलमारी के सबसे ऊपरी कोने में रखने की कोशिश करने लगा।

रवि ने हँसते हुए पूछा, "बेटा, इस टूटी हुई कार को सहेज कर क्यों रख रहे हो? यह तो अब कचरा हो गई है।"

आरव ने बड़ी मासूमियत से अपनी माँ की तरफ देखा और फिर पिता से बोला, "पापा, यह कचरा नहीं है। मैं इसे संभाल कर रख रहा हूँ। जब आप और मम्मी बूढ़े हो जाओगे और दादा जी की तरह खाँसने लगोगे, तब मैं आपको भी इसी तरह एक कोने में रख दूँगा जैसे मम्मी ने दादा जी को रखा है। मैं भी आपको वही ठंडा खाना और टूटे हुए खिलौने दूँगा।"

आरव की यह बात सुनकर कमरे में सन्नाटा पसर गया। रवि और शालिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई। जो 'ज़हर' वे अनजाने में अपने बच्चे के मन में बो रहे थे, वह आज एक कड़वे सच के रूप में उनके सामने खड़ा था। शालिनी की आँखों से आँसू बहने लगे और रवि का सिर शर्म से झुक गया। उसे अहसास हुआ कि उसने अपने पिता के साथ जो किया, वही उसकी नियति बनने वाली है।

रवि तुरंत दीनानाथ जी के कमरे की ओर भागा। वह उस दिन खूब रोया, अपने पिता के पैरों में गिरकर। शालिनी ने भी अपनी गलती मानी। उस दिन के बाद 'शांति निवास' का नजारा बदल गया। अब आरव अपने दादा जी के साथ पार्क में टहलता और रवि हर शाम अपने पिता के पास बैठकर उनके पुराने किस्से सुनता।


इस कहानी पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं? क्या आज की पीढ़ी बुजुर्गों को केवल एक 'बोझ' समझने लगी है? अपनी प्रतिक्रिया कमेंट बॉक्स में जरूर दें।

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