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संतोष और प्रेम का नमक

 कमरे की खिड़की से छनकर आती सुबह की धूप सीधे राघव की आँखों पर पड़ रही थी, लेकिन उसकी नींद तो कब की उजड़ चुकी थी। वह बिस्तर के किनारे पर बैठा, सिर झुकाए, अपने दोनों हाथों में सिर थामे किसी गहरी सोच में डूबा था। आज फिर वही दिन था—कर्जदारों के फोन, ऑफिस में झूठ बोलने का सिलसिला और घर में पसरा हुआ तनावपूर्ण सन्नाटा। राघव ने घड़ी देखी, आठ बज रहे थे। उसे तैयार होना था, लेकिन शरीर में जैसे जान ही नहीं थी।

तभी कमरे का दरवाजा हल्की सी आवाज के साथ खुला। मीरा अंदर आई। उसके हाथ में एक इस्त्री की हुई शर्ट और पैंट थी, और दूसरे हाथ में चाय का प्याला। उसने खामोशी से कप मेज पर रखा और कपड़े बिस्तर पर। राघव ने नजरें उठाकर मीरा को देखा। उसकी आँखों में सूजन थी, साफ पता चल रहा था कि वह पूरी रात रोती रही है।

राघव ने दबी हुई आवाज में पूछा, "तुमने मेरे कपड़े क्यों निकाले? कल रात तो तुमने कहा था कि अब तुम्हें मेरी कोई परवाह नहीं। तुमने कहा था कि मैं अपनी जिंदगी के साथ जो चाहे करूँ, तुम अब बीच में नहीं आओगी। फिर ये चाय, ये कपड़े... ये सब क्यों?"

मीरा एक पल के लिए रुकी। उसकी नजरें राघव पर टिकीं, जिनमें गुस्सा कम और बेबसी ज्यादा थी। उसने एक गहरी साँस ली और धीमे स्वर में बोली, "हां, कहा था। और शायद दिल से यही चाहती भी हूँ कि तुम्हें तुम्हारे हाल पर छोड़ दूँ। पर क्या करूँ? यह दिल और ये संस्कार, दोनों ही मुझे निर्दयी बनने की इजाजत नहीं देते। मैं अपनी कसमों से बंध सकती हूँ, पर अपने कर्तव्यों से मुँह नहीं मोड़ सकती। मैं पत्नी हूँ राघव, कोई सौदागर नहीं जो घाटा देखकर रिश्ता तोड़ ले। जानती हूँ कि बिना धुले कपड़े पहनकर जाओगे तो ऑफिस में लोग बातें बनाएंगे, और बिना चाय पिए निकलोगे तो आधे रास्ते में ही तुम्हारे सिर में दर्द शुरू हो जाएगा। तुम्हारी लापरवाही की सजा मैं तुम्हें दे सकती हूँ, पर तुम्हारे शरीर को कष्ट देकर मुझे सुकून नहीं मिलेगा।"

राघव अवाक रह गया। मीरा के शब्दों में एक ऐसी धार थी जो सीधे उसके दिल को चीर गई। उसने फिर पूछा, "अगर इतनी ही चिंता है मेरी, तो फिर कल रात घर छोड़कर जाने की बात क्यों कर रही थीं? क्यों मुझसे इतना लड़ती हो?"

मीरा की आँखों में आँसू तैरने लगे। वह तड़पकर बोली, "क्योंकि मैं डरती हूँ राघव। मैं लड़ती हूँ क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती। तुम्हें लगता है कि मुझे चिल्लाने में मजा आता है? मुझे शौक है कि हमारे घर की शांति भंग हो? मैं लड़ती हूँ उस 'राघव' को बचाने के लिए जो कहीं जुए और सट्टे की इस लत में खो गया है। तुम अब वो राघव नहीं रहे जिससे मैंने शादी की थी। तुम अब सिर्फ 'अगले दांव' के बारे में सोचते हो। तुम्हें पता भी है कि तुम्हारी इस 'जल्दी अमीर बनने' की चाहत ने हमें कहां ला खड़ा किया है? हमारे घर का सुकून बिक चुका है, और तुम... तुम बस एक जीत के इंतजार में हो जो कभी नहीं आएगी।"

राघव ने नजरें झुका लीं। मीरा ने अपनी बात जारी रखी, "मैं तुमसे इसलिए लड़ती हूँ क्योंकि मैं तुम्हें उन लोगों की नजरों में गिरते हुए नहीं देख सकती जो कभी तुम्हारी मिसाल देते थे। जब लोग दबी जुबान में कहते हैं कि 'राघव तो अब सट्टेबाज हो गया है', तो मुझे लगता है जैसे किसी ने मेरे वजूद पर तमाचा मारा हो। मैं तुम्हारा अपमान सह सकती हूँ, गरीबी सह सकती हूँ, लेकिन तुम्हारे चरित्र का पतन नहीं देख सकती। मैं चाहती हूँ कि तुम सिर उठाकर जियो, न कि कर्जदारों के डर से छिपते फिरो। मेरा गुस्सा मेरी नफरत नहीं है राघव, यह मेरी हताशा है... मेरा प्रेम है जो चीख-चीखकर तुम्हें उस दलदल से बाहर निकालना चाहता है।"

यह कहकर मीरा फफक कर रो पड़ी और अपना चेहरा आंचल में छिपा लिया। राघव सुन्न बैठा रहा। पिछले दो सालों की तस्वीरें उसकी आँखों के सामने किसी फिल्म की तरह घूमने लगीं।

राघव और मीरा की शादी तीन साल पहले हुई थी। राघव एक अच्छी प्राइवेट फर्म में अकाउंटेंट था। जिंदगी खुशहाल थी। छोटी-सी दुनिया, छोटे सपने। लेकिन फिर राघव के एक दोस्त ने उसे 'ऑनलाइन ट्रेडिंग' और 'सट्टेबाजी' के एप्स के बारे में बताया। शुरुआत में उसे कुछ फायदा हुआ। उस छोटी सी जीत ने उसके अंदर लालच का बीज बो दिया। उसे लगा कि वह अपनी बरसों की मेहनत के बजाय कुछ ही महीनों में अमीर बन सकता है। उसने अपनी सेविंग्स लगानी शुरू कीं। शुरुआत में मीरा को कुछ पता नहीं चला, लेकिन जब घर के खर्चे के लिए रखे पैसे गायब होने लगे, तो बात खुलने लगी।

राघव ने पहले झूठ बोला, फिर बहाने बनाए, और अंत में जब नुकसान बड़ा हो गया, तो उसने घर के गहने गिरवी रखने की बात की। मीरा ने बहुत समझाया, बहुत रोका। लेकिन जुए का नशा शराब से भी बुरा होता है। शराब आदमी को बेहोश करती है, लेकिन जुआ आदमी को होश में रखकर पागल बना देता है। राघव को हर हार के बाद लगता था कि बस एक बाजी और, और सब ठीक हो जाएगा। लेकिन वह 'एक बाजी' उसे और गहरे दलदल में धकेलती गई।

कल रात बात हद से बढ़ गई थी। एक साहूकार ने घर आकर तकादा किया था। उसने ऊंची आवाज में बात की थी और धमकी दी थी। उस वक्त मीरा की आँखों में जो शर्मिंदगी और डर था, उसने राघव को अंदर तक हिला दिया था। लेकिन फिर भी, लत की वजह से उसने मीरा पर ही चिल्लाना शुरू कर दिया था। मीरा ने कल रात गुस्से में कहा था कि वह अब और नहीं सह सकती और शायद मायके चली जाएगी।

लेकिन आज सुबह... आज सुबह वही मीरा, जिसने कल रात सब कुछ खत्म करने की बात की थी, उसके लिए चाय बना रही थी। उसके कपड़ों का ख्याल रख रही थी।

राघव उठा और मीरा के पास गया। उसने धीरे से मीरा के कंधे पर हाथ रखा। मीरा सिहर उठी, पर उसने हाथ नहीं हटाया। राघव ने रुंधे गले से कहा, "मीरा, मैं... मैं बहुत बुरा इंसान हूँ। मैंने तुम्हारे विश्वास का खून किया है। मैं अंधा हो गया था। मुझे लग रहा था कि मैं ये सब हमारे भविष्य के लिए कर रहा हूँ, तुम्हें रानी बनाकर रखने के लिए कर रहा हूँ। लेकिन मैं यह भूल गया कि महलों में रहने वाली रानियां खुश नहीं होतीं, खुश वो होती हैं जिनके पति का चरित्र और साथ सच्चा हो। मैं पैसे कमाने की दौड़ में तुम्हें ही गंवा रहा था।"

राघव ने गहरी साँस ली और मीरा का चेहरा अपनी ओर घुमाया। "आज जब मैंने तुम्हें मेरे लिए चाय लाते देखा, तो मुझे समझ आया कि दुनिया की सारी दौलत एक तरफ और तुम्हारा यह निस्वार्थ प्रेम एक तरफ। जो औरत मेरे इतने अपमान और गलतियों के बाद भी मेरी भूख और मेरी सेहत की चिंता कर रही है, उससे बड़ा धन मेरे पास और क्या हो सकता है? मैं बाहर जीत भी जाऊं, पर घर में हार गया तो उस जीत का क्या मोल?"

राघव ने अपनी जेब से अपना स्मार्टफोन निकाला। वही फोन जिस पर वह दिन-रात सट्टे के भाव देखता रहता था। उसने मीरा के सामने ही उन सभी एप्स को डिलीट कर दिया। फिर उसने मीरा का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, "मैं कसम खाता हूँ, आज के बाद मैं कभी इस रास्ते पर नहीं चलूंगा। चाहे हमें रूखी-सूखी रोटी खानी पड़े, चाहे हमें कर्ज चुकाने के लिए डबल शिफ्ट में काम करना पड़े, लेकिन अब मैं हराम की कमाई या शॉर्टकट के बारे में सोचूंगा भी नहीं। मुझे माफ कर दो मीरा। मैं उस राघव को वापस लाऊंगा जिसे तुमने प्यार किया था।"

मीरा ने राघव की आँखों में देखा। वहां उसे वह पुराना राघव दिखाई दिया—ईमानदार और संवेदनशील। उसे विश्वास हो गया कि आज की सुबह वाकई एक नई शुरुआत है। वह राघव के गले लग गई और उसका सारा दुख आंसुओं के जरिए बह निकला।

तभी राघव को याद आया। "अरे, तुम तो कह रही थी कि राशन खत्म हो गया है और डब्बे खाली हैं। फिर तुमने ये नाश्ता और मेरे लिए टिफिन कैसे तैयार किया?"

मीरा ने पल्लू से आँखें पोंछते हुए नजरें झुका लीं। उसने धीरे से कहा, "वो... मेरी माँ ने शादी के वक्त जो सोने की बालियां दी थीं... वो मैंने कल शाम सुनार के पास गिरवी रख दीं। राशन ले आई और साहूकार की इस महीने की किश्त भी भिजवा दी। ताकि तुम सुकून से ऑफिस जा सको और वहां कोई तमाशा न हो।"

राघव सन्न रह गया। उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस मुसीबत को उसने पैदा किया था, उसे सुलझाने के लिए मीरा ने अपनी माँ की आखिरी निशानी भी दांव पर लगा दी। वह अपने घुटनों के बल बैठ गया और बच्चों की तरह रोने लगा। "मैंने क्या कर दिया... मैंने तुम्हें कितना दुख दिया है मीरा। मैं अपनी ही नजरों में गिर गया हूँ।"

मीरा ने झुककर उसे उठाया। "खुद को मत कोसो राघव। गिरना इंसान की फितरत है, लेकिन संभल जाना उसकी ताकत। तुमने अपनी गलती मान ली, यही मेरे लिए सब कुछ है। बालियां तो फिर बन जाएंगी, लेकिन अगर हमारा रिश्ता टूट जाता, तो वह कभी नहीं जुड़ता। पैसे हम फिर कमा लेंगे। बस तुम मेरा साथ मत छोड़ना, और कभी कोई बात मुझसे मत छिपाना।"

राघव ने अपने आँसू पोंछे। उसके चेहरे पर एक दृढ़ निश्चय था। उसने कहा, "आज मैं ऑफिस जाकर सबसे पहले अपने बॉस से बात करूँगा। मैं उनसे एक्स्ट्रा काम मांगूंगा, ओवरटाइम करूँगा। और वादा करता हूँ, छह महीने के अंदर तुम्हारी वो बालियां छुड़ाकर लाऊंगा। अब से मेरे जीवन का एक ही लक्ष्य है—तुम्हारी आँखों में फिर से वो गर्व देखना जो शादी के दिन था।"

राघव तैयार होकर जब घर से निकलने लगा, तो उसे लगा जैसे उसके कंधों से मनों बोझ उतर गया है। वह हल्का महसूस कर रहा था। सीढ़ियां उतरते वक्त उसने पलटकर देखा। मीरा दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थी। यह मुस्कान बनावटी नहीं थी, इसमें उम्मीद थी।

राघव जब सड़क पर आया, तो बारिश की हल्की बूंदें गिरने लगी थीं। लेकिन आज उसे यह बारिश परेशान नहीं कर रही थी। उसे याद आया कि कैसे उसने अपनी लालच की आग में अपने घर की खुशियों को झोंक दिया था। उसे एहसास हुआ कि स्त्रियाँ सचमुच अद्भुत होती हैं। वे बाहर से चाहे कितना भी कठोर होने का नाटक करें, भीतर से वे करुणा का सागर होती हैं। वे उस वक्त भी हमारा हाथ थामे रहती हैं जब पूरी दुनिया हमें छोड़ चुकी होती है, यहाँ तक कि जब हम खुद को भी छोड़ चुके होते हैं।

मीरा का वह त्याग—खुद भूखी रहकर या अपनी प्रिय वस्तु त्यागकर पति की इज्जत बचाना—राघव के लिए एक जीवनरक्षक सबक बन गया था। उसे समझ आ गया था कि जीवन जुए के पत्तों में नहीं, बल्कि अपनों के विश्वास में बसता है। बुराई को केवल प्रेम और त्याग से ही जीता जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे अंधेरे को केवल रोशनी ही मिटा सकती है, लाठी नहीं।

उस दिन ऑफिस में राघव ने पूरी ईमानदारी से काम किया। शाम को जब वह थका-हारा घर लौटा, तो उसके हाथ में शराब की बोतल या सट्टे की पर्ची नहीं, बल्कि मीरा के लिए गजरा था। छोटा ही सही, लेकिन वह उसकी मेहनत की कमाई से खरीदा गया था। मीरा ने जब वह गजरा देखा, तो उसकी आँखों में जो चमक थी, वह किसी भी जैकपॉट से कहीं ज्यादा कीमती थी।

उस रात घर में फिर से वही पुरानी हंसी गूंजी जो सालों पहले खो गई थी। खाने की मेज पर साधारण दाल-रोटी थी, लेकिन उसका स्वाद किसी शाही दावत से कम नहीं था, क्योंकि उसमें संतोष और प्रेम का नमक घुला था। राघव और मीरा की कहानी ने साबित कर दिया कि गलती करना मानवीय है, लेकिन प्रेम के खातिर उस गलती को सुधार लेना ही सच्चा देवत्व है। दुनिया में कोई भी लत, कोई भी नशा, सच्चे प्रेम की ताकत के आगे टिक नहीं सकता। बस जरूरत होती है एक ऐसे साथी की जो आपके बुरे वक्त में आपका हाथ छोड़कर जाने के बजाय, उसे और कसकर थाम ले। और राघव के लिए वह साथी, वह ढाल, मीरा थी।


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