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कठपुतली की डोर

 "जब एक माँ का प्यार 'ममता' की जगह 'बेड़ियां' बन जाए, तो क्या एक पत्नी का फर्ज नहीं बनता कि वह अपने पति को उन जंजीरों से आज़ाद कराए? यह कहानी सिर्फ सास-बहू के झगड़े की नहीं, बल्कि एक पुरुष के अस्तित्व को खोजने की है।"


कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े जैसी लग रही थी। सुमेधा ने सूटकेस की चेन बंद की और खड़ी हो गई। उसके सामने उसकी सास, विमला देवी, सीना ताने खड़ी थीं, जिनकी आँखों में गुस्सा और अविश्वास दोनों तैर रहे थे। पास ही सोफे पर सिर झुकाए बैठा था—निखिल। पैंतीस साल का एक हट्टा-कट्टा इंसान, जो इस वक्त किसी डरे हुए बच्चे जैसा लग रहा था।

"जा रही है?" विमला देवी ने ताना मारा, "बड़ी जल्दी हार मान ली। मैंने तो पहले ही कहा था, तू इस घर के तौर-तरीकों में ढल नहीं पाएगी। दरवाजे खुले हैं, शौक से जा।"

सुमेधा ने गहरी सांस ली और अपनी सास की आंखों में आंखें डालकर देखा। "मैं हार मानकर नहीं जा रही माँ जी, मैं इसलिए जा रही हूं क्योंकि इस घर में तीन लोग रहते हैं, पर बालिग सिर्फ दो हैं—आप और मैं।"

विमला देवी का चेहरा तमतमा गया। "जुबान संभाल कर बात कर लड़की! मेरे बेटे के बारे में..."

"बेटे के बारे में क्या?" सुमेधा की आवाज़ अचानक तेज़ हो गई, जिसने विमला को चौंका दिया। "वही तो कह रही हूँ माँ जी। आपने निखिल को बेटा बनाकर रखा ही कहाँ? आपने तो इसे अपनी परछाई बना दिया है। एक ऐसी कठपुतली जिसकी डोर पिछले पैंतीस सालों से आपकी उंगलियों में है।"

सुमेधा ने निखिल की तरफ इशारा किया, जो अभी भी नज़रें नहीं उठा पा रहा था। "देखिए इसे। ये एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर है, पचास लोगों की टीम संभालता है। लेकिन घर में? घर में ये तय करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता कि शाम को सब्जी कौन सी बनेगी या हम दिवाली पर कहाँ जाएंगे। क्यों? क्योंकि 'माँ बुरा मान जाएंगी'।"

"खबरदार जो मेरे बेटे को कुछ कहा," विमला देवी चिल्लाईं, "उसने मेरी इज़्ज़त की है, श्रवण कुमार है वो मेरा।"

"श्रवण कुमार माता-पिता की सेवा करते थे, माँ जी, अपना आत्मसम्मान गिरवी नहीं रखते थे!" सुमेधा की आवाज़ कांप रही थी, पर आंसुओं से नहीं, क्रोध से। "आप कहती हैं मैंने घर तोड़ दिया? घर तो तब टूट गया था जब आपने इसकी शादी करवाई। आप एक बहू नहीं, एक सेविका लाना चाहती थीं जो आपकी 'हाँ' में 'हाँ' मिलाए। लेकिन गलती ये हुई कि मैं एक जीती-जागती इंसान निकली।"

विमला ने निखिल की तरफ देखा, "देख रहा है निखिल? ये कल की आई छोकरी तेरी माँ को क्या-क्या सुना रही है और तू चुप है? इसी दिन के लिए तुझे पाला था?"

यही वो पल था। सुमेधा को लगा निखिल बोलेगा। हमेशा की तरह माँ का पक्ष लेगा और उसे चुप कराएगा।

सुमेधा ने कड़वाहट से हँसते हुए कहा, "माँ जी, आप किसे पुकार रही हैं? आपने अपने बेटे को 'मर्द' कहने लायक छोड़ा कहाँ है? यह बस देखने में मर्द है। शरीर मर्द का है, पर रीढ़ की हड्डी नहीं है इसमें। अगर होती, तो आज यह अपनी पत्नी और माँ के बीच में सैंडविच बनने की बजाय, एक जज की तरह सही और गलत का फैसला करता।"

"बस!" विमला देवी ने हाथ उठाया, "बहुत बोल लिया तूने। अगर तुझे मेरा बेटा नापसंद है, तो अभी निकल जा यहाँ से। हमें तेरी ज़रूरत नहीं है।"

सुमेधा ने अपना बैग उठाया। "आप गलत सोच रही हैं माँ जी। मैं घर छोड़कर नहीं जा रही। मैं अपने मायके भी नहीं जा रही। मैं पास के होटल में जा रही हूँ। और निखिल..." उसने अपने पति की ओर देखा, "मैं तुम्हें 24 घंटे का वक्त देती हूँ। या तो तुम 'माँ के राजा बेटा' बनकर यहीं रहो, जहाँ तुम्हारी हर सांस का फैसला माँ जी करेंगी। या फिर मेरे पति बनकर, एक हमसफर बनकर उस होटल में आ जाओ, जहाँ हम अपनी एक अलग दुनिया, एक अलग घर बसाएंगे—भले ही किराए का हो, पर वो 'हमारा' होगा।"

सुमेधा मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ी। विमला देवी ने पीछे से कहा, "ये नहीं आएगा। यह अपनी माँ को कभी नहीं छोड़ेगा।"

सुमेधा रुकी, मुड़ी नहीं, बस इतना कहा, "यही तो देखना है माँ जी। कि आपने उसे 'इंसान' बनाया है या 'सामान'।"

दरवाजा बंद हुआ और फिर से वही सन्नाटा छा गया। विमला देवी की छाती गर्व से फूल गई। उन्हें यकीन था कि उन्होंने जंग जीत ली है। वो मुड़ीं और सोफे पर बैठ गईं, "जा, निखिल। चाय बना ला। सिर दुख गया इस क्लेश से।"

निखिल उठा। उसने किचन की तरफ कदम बढ़ाया। विमला देवी के चेहरे पर विजय की मुस्कान थी। लेकिन तभी निखिल किचन के दरवाजे से मुड़ गया। उसने बेडरूम में जाकर अपनी अलमारी खोली।

"अरे! क्या कर रहा है?" विमला देवी ने पूछा।

निखिल बाहर आया, हाथ में एक छोटा बैग लिए। उसकी आँखें लाल थीं, पर उनमें एक अजीब सी शांति थी जो विमला ने पहले कभी नहीं देखी थी।

"चाय अब आप खुद बना लीजिए माँ," निखिल ने धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ में कहा।

"तू... तू जा रहा है? उस औरत के पीछे? अपनी माँ को छोड़कर?" विमला देवी को जैसे लकवा मार गया हो।

"मैं आपको नहीं छोड़ रहा माँ," निखिल ने पहली बार माँ की आँखों में देखा, "मैं उस 'निखिल' को छोड़ रहा हूँ जो अब तक आपके पल्लू से बंधा था। सुमेधा सही कह रही थी। आपने मुझे कभी बड़ा होने ही नहीं दिया। मुझे लगा था कि आपकी हर बात मानना प्यार है, लेकिन आज समझ आया कि वो प्यार नहीं, आपकी ज़िद थी। और उस ज़िद ने मेरी शादीशुदा ज़िंदगी का गला घोंट दिया है।"

"तो अब तू मुझे सिखाएगा?"

"नहीं माँ, अब मैं बस जीऊंगा। अपने फैसलों पर, अपनी गलतियों पर। मैं सुमेधा के पास जा रहा हूँ। मैं एक बेटा बनकर नहीं, एक पति और एक खुदमुख्तार इंसान बनकर उसके साथ रहना चाहता हूँ। जिस दिन आप मुझे एक 'व्यक्ति' के तौर पर स्वीकार कर लेंगी, उस दिन हमारे घर के दरवाजे आपके लिए खुले मिलेंगे।"

निखिल ने झुककर माँ के पैर छुए। विमला देवी पत्थर की मूरत बनी बैठी रहीं। निखिल मुड़ा और उसी दरवाजे से बाहर निकल गया जिसे सुमेधा ने अभी बंद किया था।

विमला देवी अकेली रह गईं। सामने दीवार पर निखिल के बचपन की तस्वीर टंगी थी। उन्हें आज पहली बार एहसास हुआ कि तस्वीर में दिख रहा बच्चा कब का बड़ा हो चुका था, बस उन्होंने ही उसे अपनी गोद से उतारने से इनकार कर दिया था। और आज, उस बच्चे ने खुद उतरकर चलना सीख लिया था—भले ही इसके लिए उसे अपनी माँ का हाथ झटकना पड़ा।

बाहर, सड़क पर सुमेधा ऑटो का इंतज़ार कर रही थी। तभी उसे पीछे से कदमों की आहट सुनाई दी। उसने मुड़कर देखा। निखिल खड़ा था, हाथ में बैग लिए। उसने कुछ नहीं कहा, बस सुमेधा का सूटकेस अपने हाथ में ले लिया।

सुमेधा की आँखों से एक आंसू गिरा। उसे उसका पति मिल गया था। और निखिल को? निखिल को आज पहली बार अपना वजूद मिल गया था।


प्रिय पाठकों,

सुमेधा ने जो किया, क्या वह सही था? अक्सर हमारे समाज में "श्रवण कुमार" बनने के दबाव में बेटे पिस जाते हैं और "आदर्श बहू" बनने के चक्कर में लड़कियां अपनी आत्मसम्मान खो देती हैं। क्या एक माँ का फर्ज यह नहीं है कि वह अपने बेटे को इतना सक्षम बनाए कि वह अपने फैसले खुद ले सके? या फिर बुढ़ापे का सहारा होने का मतलब यह है कि संतान की अपनी कोई राय ही न हो?

आपकी राय हमारे लिए बहुत मायने रखती है। क्या आपके आसपास भी कोई ऐसा 'निखिल' है जो अपनी माँ और पत्नी के बीच फंसा हुआ है? या कोई ऐसी 'सुमेधा' है जो अपने हक़ के लिए लड़ रही है?

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