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अहंकार की दीवार और रिश्तों की धूप

 घड़ी की सुइयां रात के ग्यारह बजा रही थीं, लेकिन अनीता के लैपटॉप की स्क्रीन अभी भी चमक रही थी। ड्राइंग रूम में सन्नाटा था, जिसे कभी-कभी उसकी उंगलियों की कीबोर्ड पर चलने वाली खट-खट तोड़ देती थी। रसोई से बर्तनों के खिसकने की हल्की सी आवाज़ आई। अनीता के माथे पर त्यौरियां चढ़ गईं। उसने झुंझलाकर चश्मा उतारा और जोर से आवाज लगाई।

"माँजी! कितनी बार कहा है कि रात को दस बजे के बाद रसोई में खट-पट मत किया कीजिए। मेरी क्लाइंट के साथ मीटिंग चल रही है, डिस्टर्ब होता है।"

रसोई से एक सहमी हुई, बूढ़ी आवाज़ आई, "बेटा, वो तेरे लिए दूध गर्म कर रही थी। तूने शाम से कुछ नहीं खाया..."

"मुझे नहीं चाहिए दूध-वूद!" अनीता ने लैपटॉप बंद करते हुए चिढ़कर कहा। "मुझे शांति चाहिए। आप लोग समझते क्यों नहीं? मैं यहाँ ऑफिस का काम करती हूँ, कोई मटर नहीं छील रही। मेरी एक गलती से कंपनी का लाखों का नुकसान हो सकता है।"

कौशल्या देवी, अनीता की सास, हाथ में दूध का गिलास लिए रसोई के दरवाजे पर ही ठिठक गईं। उनकी आँखों में नमी तैर गई, लेकिन उन्होंने पल्लू से उसे पोंछ लिया। उनका बेटा, आलोक, सोफे पर बैठा न्यूज़ देख रहा था। उसने माँ को इशारे से बुलाया और चुपचाप गिलास ले लिया।

अनीता एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट थी। लाखों का पैकेज, बड़ी गाड़ी और शहर के पॉश इलाके में यह फ्लैट—सब अनीता की मेहनत का नतीजा था। आलोक एक सरकारी स्कूल में टीचर था। उसकी तनख्वाह अनीता की कमाई के सामने 'ऊंट के मुंह में जीरे' जैसी थी। शायद इसीलिए घर के फैसलों में, घर के माहौल में और यहाँ तक कि घर की हवा में भी अनीता का ही दबदबा था।

अनीता बुरी नहीं थी, लेकिन सफलता के नशे ने उसकी आँखों पर एक ऐसा चश्मा चढ़ा दिया था, जिसमें उसे कौशल्या देवी का प्यार 'दकियानूसीपन' और आलोक की सादगी 'नाकामी' नज़र आती थी। उसे लगता था कि चूंकि वह घर का मुख्य खर्च उठाती है, इसलिए घर के हर सदस्य को उसके हिसाब से चलना चाहिए।

अगले दिन रविवार था। अनीता के लिए रविवार का मतलब था—सोशलाइजिंग और रिलैक्सेशन। लेकिन कौशल्या देवी के लिए रविवार का मतलब था—पूजा-पाठ और बेटे-बहू के लिए अच्छा खाना बनाना।

सुबह-सुबह घर में अगरबत्ती की खुशबू और घंटी की आवाज़ गूंजने लगी। अनीता नींद से जागी तो उसका सिर भारी था। वह गुस्से में बाहर आई।

"माँजी, प्लीज़! आज संडे है। कम से कम आज तो सुबह-सुबह ये टन-टन बंद रखिए। मेरी नींद खराब हो गई।"

कौशल्या देवी पूजा की थाली लिए खड़ी थीं। "बेटा, आज एकादशी है। बस भगवान को भोग लगा रही थी। सोचा घर में सुख-शांति बनी रहे।"

"सुख-शांति पूजा करने से नहीं, पैसे कमाने से आती है," अनीता ने तंज कसा। "अगर मैं मेहनत न करूँ न, तो ये जो घी के दीये जल रहे हैं, इनके लिए भी पैसे नहीं होंगे। भगवान पेट नहीं भरते, नौकरी भरती है।"

आलोक से रहा नहीं गया। "अनीता, माँ से बात करने का यह कौन सा तरीका है? वे सिर्फ तुम्हारे भले की प्रार्थना कर रही थीं।"

"रहने दो आलोक," अनीता ने हाथ झटकते हुए कहा। "तुम्हारी यह इमोशनल बातें मुझे मत सुनाओ। तुम तो अपनी 50 हजार की नौकरी में खुश हो, तुम्हें क्या पता कि कॉर्पोरेट वर्ल्ड का प्रेशर क्या होता है। इस घर की ईएमआई मैं भरती हूँ, इस घर का राशन मेरे कार्ड से आता है, तो नियम भी मेरे चलेंगे। और मुझे यह पुराना, देहाती माहौल नहीं चाहिए। मेरे कलीग्स घर आते हैं तो मुझे शर्म आती है कि मेरी सास हिंदी बोलती हैं और साड़ी का पल्लू सिर पर रखती हैं।"

वह सन्नाटा जो उस पल घर में छाया, वह किसी तूफान से पहले की खामोशी थी। कौशल्या देवी ने कांपते हाथों से दीया बुझा दिया। मानो उस दीये के साथ-साथ उनका स्वाभिमान भी बुझ गया हो।

"ठीक है बेटा," कौशल्या देवी की आवाज़ बहुत धीमी थी। "अगर मेरे पूजा करने से, मेरे यहाँ रहने से तुझे शर्म आती है... तो मैं गाँव चली जाऊंगी। तेरे और आलोक के बीच दीवार नहीं बनूंगी।"

आलोक ने माँ को रोकना चाहा, लेकिन अनीता ने उसे आँखों से इशारा किया—'चुप रहो'। अनीता को लगा, चलो अच्छा है, 'प्राइवेसी' मिलेगी। झंझट खत्म हुआ।

शाम तक कौशल्या देवी ने अपना छोटा सा ट्रंक पैक कर लिया। उन्होंने अनीता से कुछ नहीं कहा, बस आलोक के सिर पर हाथ फेरा और अगले दिन की सुबह की बस पकड़ने की बात कही।

उसी रात, अनीता को एक बड़ी पार्टी में जाना था। यह उसके प्रमोशन की पार्टी थी। उसने अपनी सबसे महंगी डिज़ाइनर साड़ी पहनी और आलोक को भी तैयार होने को कहा। आलोक ने मना कर दिया। "माँ जा रही हैं सुबह, मेरा मन नहीं है।"

"ओह गॉड आलोक! तुम और तुम्हारा ड्रामा। ठीक है, मैं अकेली जा रही हूँ," अनीता बड़बड़ाते हुए चली गई।

पार्टी शानदार थी। शैम्पेन, संगीत, और तारीफों के पुल। अनीता सातवें आसमान पर थी। हर कोई उसकी सफलता की बात कर रहा था। लेकिन रात के करीब 1 बजे, जब वह वापस आ रही थी, तो उसकी गाड़ी एक सुनसान सड़क पर खराब हो गई। उसने ड्राइवर को चेक करने को कहा। ड्राइवर ने बताया कि इंजन गर्म हो गया है, कुछ वक्त लगेगा।

अनीता ने फोन निकाला, लेकिन नेटवर्क नहीं था। रात गहरी थी और सड़क वीरान। अचानक, दो बाइक सवार वहां रुके। उनके चेहरे ढके हुए थे। अनीता का दिल जोर से धड़कने लगा। वे लफंगे लग रहे थे। ड्राइवर ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने उसे धक्का दे दिया और अनीता की कार की खिड़की पर डंडा मारा।

"बाहर निकल! जो भी गहने हैं, दे दे!" एक ने चिल्लाया।

अनीता डर के मारे कांपने लगी। वह चिल्लाई, "आलोक! आलोक!" लेकिन आलोक वहां नहीं था। उसने अपने पर्स से सारे पैसे, अंगूठी, गले का हार—सब निकाल कर दे दिया। लेकिन वे बदमाश इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने उसका हाथ पकड़कर उसे गाड़ी से खींचने की कोशिश की।

तभी पीछे से एक पुलिस जीप का सायरन सुनाई दिया। बदमाश घबरा गए और बाइक भगा ले गए। पुलिस ने अनीता को सुरक्षित घर पहुंचाया।

जब अनीता घर पहुँची, तो वह बदहवास थी। उसका मेकअप आंसुओं से धुल चुका था, बाल बिखरे थे और शरीर कांप रहा था। उसने जैसे ही डोरबेल बजाई, दरवाजा आलोक ने नहीं, कौशल्या देवी ने खोला। शायद माँ को बेटे की चिंता में नींद नहीं आ रही थी।

अनीता को देखते ही कौशल्या देवी समझ गईं कि कुछ बहुत बुरा हुआ है। अनीता उनके पैरों में गिर पड़ी और फूट-फूट कर रोने लगी। वह वाइस प्रेसिडेंट, वह "मैं घर चलाती हूँ" का अहंकार—सब उस पल धराशायी हो गया था। वहां सिर्फ एक डरी हुई लड़की थी जिसे माँ की जरूरत थी।

कौशल्या देवी ने एक पल भी नहीं गंवाया। उन्होंने अनीता को उठाया, उसे सीने से लगाया। उन्होंने यह नहीं पूछा कि "इतनी रात को क्यों गई थी?" या "मैंने तो पहले ही कहा था।" उन्होंने वही किया जो एक माँ करती है।

वे उसे अंदर ले गईं। अपने हाथों से उसे पानी पिलाया। उसका पसीना पोंछा। आलोक भी जाग गया। उसने डॉक्टर को फोन करना चाहा, लेकिन कौशल्या ने मना कर दिया। "दवा से ज्यादा इसे अभी हिम्मत की जरूरत है।"

कौशल्या ने अनीता का सिर अपनी गोद में रख लिया। वह धीरे-धीरे उसके बालों में हाथ फेरने लगीं। "डर मत पगली... मैं हूँ न। कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता तेरा। शेरनी है तू मेरी।"

अनीता पूरी रात अपनी सास की गोद में सिर रखकर सुबकती रही। उस स्पर्श में जो सुकून था, वह उसे अपनी मखमली गद्दे और एसी वाले कमरे में कभी नहीं मिला था। उसे याद आया कि जब वह छोटी थी और डरावने सपने देखती थी, तो अपनी माँ की गोद में ऐसे ही छिपती थी। आज वही सुरक्षा उसे उस औरत से मिल रही थी, जिसे उसने कल सुबह घर से निकालने का मन बना लिया था।

सुबह जब अनीता की आँख खुली, तो उसने देखा कि वह अपने बेडरूम में है, लेकिन कौशल्या देवी कुर्सी पर बैठीं ऊंघ रही थीं। उन्होंने पूरी रात अनीता का हाथ नहीं छोड़ा था।

अनीता उठी और धीरे से उनके पैरों के पास बैठ गई। उसकी आँखों से फिर आंसू बह निकले, लेकिन ये डर के नहीं, पश्चाताप के आंसू थे।

कौशल्या की आँख खुली। उन्होंने घबराकर पूछा, "क्या हुआ बेटा? तबीयत ठीक नहीं है क्या?"

अनीता ने अपना सिर उनके घुटनों पर रख दिया। "माँजी, मुझे माफ कर दीजिये। मैं बहुत बुरी हूँ। मैंने अपने पैसों के घमंड में यह भूल गई थी कि मुसीबत के वक्त पैसा नहीं, अपने काम आते हैं। कल रात मेरे पास क्रेडिट कार्ड्स थे, कैश था, महंगी गाड़ी थी... लेकिन उनमें से किसी ने मुझे सुरक्षा नहीं दी। मुझे सुकून आपकी गोद में मिला।"

कौशल्या ने मुस्कुराते हुए उसके आंसू पोंछे। "पगली, घर में बर्तन तो खड़कते ही हैं। इसका मतलब यह थोड़ी है कि हम बर्तनों को फेंक दें। तू कमाती है, यह गर्व की बात है। लेकिन बेटा, पेड़ कितना भी ऊँचा हो जाए, अगर उसकी जड़ें मिट्टी से नहीं जुड़ी रहेंगी, तो पहली आंधी में गिर जाएगा। हम बुजुर्ग वही मिट्टी हैं।"

अनीता ने ट्रंक की तरफ देखा जो अभी भी कोने में रखा था। वह उठी और उसने ट्रंक खोला, उसमें से कपड़े निकालकर वापस अलमारी में रखने लगी।

"यह क्या कर रही है?" कौशल्या ने पूछा।

"अपनी जड़ें वापस जमा रही हूँ माँ," अनीता ने भर्राई आवाज़ में कहा। "अब आप कहीं नहीं जा रही हैं। और हाँ, आज सुबह की पूजा की घंटी नहीं बजी? मुझे वो सुननी है।"

आलोक दरवाजे पर खड़ा यह सब देख रहा था। उसने देखा कि घर की दीवारें वही थीं, लेकिन आज वह घर, 'मकान' से 'आशियाना' बन गया था।

उस दिन के बाद अनीता बदली नहीं, बल्कि निखर गई। वह आज भी वाइस प्रेसिडेंट थी, आज भी घर की ईएमआई भरती थी, लेकिन अब उसे इस बात का अहंकार नहीं था। उसे समझ आ गया था कि 'घर चलाना' सिर्फ पैसे फेंकने को नहीं कहते, बल्कि सबको साथ लेकर चलने को कहते हैं। अब जब उसके कलीग्स घर आते, तो वह गर्व से अपनी सास का परिचय कराती—"ये मेरी माँ हैं, हमारे घर की असली बॉस।"

क्योंकि उसने जान लिया था कि दुनिया जीतने के लिए घर का मजबूत होना सबसे जरूरी है। और घर ईंटों से नहीं, बुजुर्गों के आशीर्वाद से मजबूत होता है।

रिश्ते नाजुक धागे होते हैं, जिन्हें अकड़ तोड़ देती है और नरमी जोड़ देती है। अनीता ने सही समय पर उस धागे में गांठ लगा ली थी।


लेखक का संदेश:

यह कहानी हमें सिखाती है कि आधुनिकता और सफलता का मतलब अपनी जड़ों को काटना नहीं है। पैसा आपको बिस्तर दे सकता है, लेकिन नींद नहीं; मकान दे सकता है, लेकिन घर नहीं। हमारे माता-पिता और बुजुर्ग हमारे जीवन की नींव हैं। उनके पुराने विचारों में भले ही आज की चमक न हो, लेकिन उनके अनुभवों में वह मजबूती है जो हमें जीवन के सबसे कठिन तूफानों में भी थामे रखती है। अपने अभिमान को अपने रिश्तों के बीच न आने दें।

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