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स्वाभिमान

 "चाबियों का गुच्छा मैंने सेंटर टेबल पर रख दिया है। अलमारी में तुम्हारी दवाइयाँ किस क्रम में रखी हैं, उसकी लिस्ट फ्रिज पर चिपका दी है। और हाँ, कल सुबह दूध वाले का हिसाब कर देना, डायरी में सब लिखा है।"

सविता की आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी—न गुस्सा, न शिकायत, बस एक ठंडी, बेजान सपाटता। उसने अपना छोटा सा सूटकेस उठाया और मुख्य दरवाज़े की ओर बढ़ी।

सोफे पर पैर पसारे, हाथ में सिगार थामे राघव ने अपनी नज़रें लैपटॉप की स्क्रीन से नहीं हटाईं। उसने एक उपहासपूर्ण मुस्कान के साथ कहा, "यह ड्रामा कितने दिन चलेगा सविता? हर बार की तरह दो दिन बाद फ़ोन करके गिड़गिड़ाओगी कि 'साहब, वापस आ जाऊँ?' जाओ, शौक से जाओ। मुझे वैसे भी अब एक प्रोफेशनल केयरटेकर की ज़रूरत है। तुम जैसी अनपढ़ गँवार औरत मेरे स्टैंडर्ड और मेरी लाइफस्टाइल के साथ वैसे भी मैच नहीं करती। मैंने तो बस तरस खाकर तुम्हें इतने साल इस घर की मालकिन जैसा रुतबा दे रखा था।"

राघव, शहर का एक नामी आर्किटेक्ट, अपनी सफलता के नशे में इतना चूर था कि उसे लगता था कि दुनिया उसी के इशारों पर नाचती है। सविता, जो पिछले पंद्रह सालों से उसके घर, उसके खान-पान और उसकी अस्त-व्यस्त ज़िंदगी को संभाल रही थी, उसके लिए महज एक 'सुविधा' थी। सविता उसकी पत्नी नहीं थी, एक दूर की रिश्तेदार थी जिसे राघव की माँ ने अपने गुज़रने से पहले राघव की ज़िम्मेदारी सौंपी थी।

सविता दरवाज़े पर ठिठकी। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा, बस इतना कहा, "राघव, इंसान को वहम हो जाता है कि घर ईंटों से टिका है, जबकि वह असल में किसी की दुआओं और सेवा पर टिका होता है। तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारी ज़रुरत हूँ, पर सच यह है कि तुम मेरी आदत बन गए थे। और आदतें बदली जा सकती हैं।"

दरवाज़ा बंद हुआ। एक भारी सन्नाटा घर में पसर गया। राघव ने सिगार का कश खींचा और बुदबुदाया, "हूँह! आदत! चार दिन में आटे-दाल का भाव पता चलेगा तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी।"


अगले तीन दिन राघव के लिए किसी जश्न से कम नहीं थे। उसे लगा जैसे उसे आज़ादी मिल गई हो। न कोई टोकने वाला कि "सिगरेट मत पियो", न कोई समय पर खाने के लिए पीछे पड़ने वाला। उसने तुरंत एक एजेंसी को फ़ोन करके एक 'ट्रेंड हाउसकीपर' को हायर कर लिया।

नई हाउसकीपर, मिस डिसूजा, वर्दी में आई। सब कुछ मशीन की तरह व्यवस्थित था। राघव खुश था। उसने सोचा, "देखा? पैसा फेंको, तमाशा देखो। सविता को लगता था उसके बिना यह 'राघव विला' खंडहर बन जाएगा।"

लेकिन, चौथे दिन से उस भव्य विला की दीवारों में दरारें—दिखने वाली नहीं, महसूस होने वाली दरारें—पड़ने लगीं।

सुबह राघव को अपनी 'लकी' ब्लू शर्ट नहीं मिली। मिस डिसूजा ने उसे धोकर प्रेस तो किया था, लेकिन उसे किसी और अलमारी में रख दिया था। राघव चिल्लाया, "मेरी चीज़ें अपनी जगह पर क्यों नहीं हैं?"

डिसूजा ने मशीनी लहजे में जवाब दिया, "सर, मैंने कलर-कोडिंग के हिसाब से कपड़े जमाए हैं। यही स्टैंडर्ड तरीका है।"

राघव को स्टैंडर्ड तरीका नहीं, अपना तरीका चाहिए था।

शाम को उसे एक ज़रूरी प्रेजेंटेशन के लिए ब्लूप्रिंट चाहिए था। वह अपने स्टडी रूम में पागलों की तरह फाइलें फेंक रहा था। सविता को पता होता था कि राघव कौन सा कागज़ किस किताब के बीच में रखकर भूल जाता है। मिस डिसूजा ने रद्दी समझकर कई 'रफ़ पेपर्स' डस्टबिन में डाल दिए थे।

जब राघव ने कूड़ेदान में अपने करोड़ों के प्रोजेक्ट का रफ़ स्केच देखा, तो उसका माथा ठनक गया। उसने मिस डिसूजा को उसी वक़्त नौकरी से निकाल दिया।

अगला एक हफ्ता राघव के जीवन का सबसे भयावह हफ्ता था। वह बाहर से खाना मंगवाता, जो उसे पचता नहीं था। उसे एसिडिटी होने लगी। घर में धूल की परतें जमने लगीं क्योंकि उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि सविता एक साथ सफाई, कुकिंग और उसकी फाइलों का मैनेजमेंट कैसे करती थी। वह रात-रात भर जागता रहता, क्योंकि उसे नींद की गोली नहीं मिल रही थी, और उसे याद भी नहीं था कि वह कौन सी गोली खाता है—सविता ही उसे पानी के साथ गोली देती थी।

उसका अहंकार अब भी उसे सविता को फ़ोन करने से रोक रहा था। "मैं नहीं झुकूँगा," वह शीशे में अपनी लाल आँखों को देखकर कहता। "मैं राघव मेहरा हूँ।"

लेकिन जीवन को राघव मेहरा के अहंकार से कोई लेना-देना नहीं था।

दसवें दिन, राघव के एक बहुत बड़े क्लाइंट, मिस्टर खन्ना, डिनर पर आने वाले थे। यह डील राघव के करियर के लिए 'करो या मरो' वाली थी। राघव ने शहर के सबसे महंगे होटल से खाना ऑर्डर किया। घर को जैसे-तैसे साफ़ किया।

मिस्टर खन्ना आए। बातें शुरू हुईं। राघव ने वाइन का गिलास उठाया, लेकिन उसके हाथ कांप रहे थे। थकान, चिड़चिड़ापन और कुपोषण उसके चेहरे पर साफ़ दिख रहा था।

"राघव, तुम बीमार लग रहे हो," मिस्टर खन्ना ने चिंतित होकर कहा। "और माफ़ करना, इस घर में वो बात नहीं लग रही जो पहले हुआ करती थी। मुझे याद है पिछली बार जब मैं आया था, तो यहाँ एक अजीब सी सकारात्मक ऊर्जा थी। और वो... क्या नाम था उनका... सविता जी? उनके हाथ की अदरक वाली चाय और वो अपनापन... आज सब कुछ बहुत 'कोल्ड' लग रहा है।"

राघव ने हड़बड़ाते हुए कहा, "अरे नहीं सर, वो तो बस एक मेड थी। चली गई। मैं सब संभाल लूँगा।"

"मेड?" मिस्टर खन्ना ने राघव को एक अजीब नज़र से देखा। "राघव, मैंने दुनिया देखी है। वो औरत इस घर को मंदिर समझकर साफ़ करती थी। वो तुम्हारी 'मेड' नहीं, इस घर की रूह थी। जिस आर्किटेक्ट को अपने घर की नींव की पहचान नहीं, वो मेरी बिल्डिंग की नींव क्या रखेगा?"

मिस्टर खन्ना डिनर किए बिना ही चले गए। डील कैंसिल हो गई।

राघव सोफे पर धम्म से गिर पड़ा। सन्नाटा अब उसे काटने को दौड़ रहा था। उसकी नज़र सामने वाली दीवार पर गई, जहाँ एक पुरानी फोटो टंगी थी—उसकी माँ और सविता की। माँ की आँखों में जो चिंता राघव के लिए थी, वही चिंता सविता की आँखों में भी थी।

उस रात राघव को बहुत तेज़ बुखार चढ़ गया। वह पानी के लिए तड़प रहा था, लेकिन रसोई तक जाने की हिम्मत नहीं थी। अँधेरे कमरे में पड़े-पड़े उसे भ्रम होने लगा। उसे लगा सविता उसके माथे पर पट्टी रख रही है। उसने हाथ बढ़ाया, "सविता..." पर वहाँ सिर्फ़ खाली हवा थी।

अगली सुबह, जब बुखार थोड़ा कम हुआ, तो राघव का अहंकार बुखार के साथ ही जलकर राख हो चुका था। उसे समझ आ गया था कि वह पैसे से बिस्तर खरीद सकता है, नींद नहीं; खाना मंगवा सकता है, स्वाद नहीं; और नौकर रख सकता है, पर परवाह करने वाला नहीं।

उसने कांपते हाथों से अपनी डायरी निकाली, जिसमें सविता के गाँव का पता लिखा था। उसने अपनी मर्सिडीज निकाली और शहर से 200 किलोमीटर दूर, सविता के पुश्तैनी गाँव की ओर चल पड़ा।

रास्ते भर वह रिहर्सल करता रहा कि वह क्या कहेगा। "चलो वापस, मैं तुम्हारी तनख्वाह बढ़ा दूंगा?" नहीं। "माफ़ कर दो?" शायद। "मुझे तुम्हारी ज़रुरत है?" हाँ, यह सही रहेगा।

दोपहर होते-होते वह सविता के छोटे से घर के सामने पहुँचा। एक पुराना, लेकिन बेहद साफ़-सुथरा घर। आँगन में तुलसी का पौधा और गोबर से लिपा हुआ फर्श।

राघव ने देखा कि सविता आँगन में बैठी है। लेकिन वह अकेली नहीं थी। उसके आस-पास दस-बारह बच्चे बैठे थे और वह उन्हें पढ़ा रही थी। सविता के चेहरे पर एक ऐसी चमक और शांति थी जो राघव ने पिछले पंद्रह सालों में कभी नहीं देखी थी। वह राघव के घर में हमेशा थकी हुई और चिंतित रहती थी, लेकिन यहाँ... यहाँ वह 'जीवित' थी।

राघव को अपनी सूट-बूट और महंगी घड़ी उस सादे माहौल में बेमानी लगने लगी। वह दबे पाँव अंदर गया।

बच्चों ने उसे देखा तो शोर मचाया। सविता ने सिर उठाया। राघव को देखकर उसके चेहरे पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ, जैसे उसे पता था कि यह दिन आएगा।

"सविता..." राघव का गला रुंध गया। "चलो। घर चलो। मैं... मैं परेशान हो गया हूँ। मेरा घर बिखर गया है। मेरी डील कैंसिल हो गई है। मुझे माफ़ कर दो। मैं वादा करता हूँ, अब तुम्हें कभी शिकायत का मौका नहीं दूंगा।"

सविता ने बच्चों को जाने का इशारा किया। वह उठी और राघव के पास आई। उसने राघव की बिखरी हुई शर्ट के कॉलर को ठीक किया—वही पुरानी आदत। राघव को लगा कि अब वह मान जाएगी।

"तुम्हारी हालत ख़राब है राघव," सविता ने ममतामयी स्वर में कहा। "बैठो, गुड़ और पानी लाती हूँ।"

उसने राघव को पानी पिलाया। राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया। "सविता, ज़िद छोड़ो। पैकिंग करो। मैं तुम्हें लेने आया हूँ। मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।"

सविता ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया और थोड़ा पीछे हट गई।

"राघव, तुम मुझे लेने आए हो क्योंकि तुम्हारी 'सुविधा' छिन गई है। तुम इसलिए नहीं आए कि तुम्हें मेरी याद आई, तुम इसलिए आए हो क्योंकि तुम्हें अपने 'काम' याद आ रहे हैं।"

"नहीं सविता, ऐसा नहीं है..."

"ऐसा ही है राघव," सविता की आवाज़ में अब दृढ़ता थी। "पिछले पंद्रह सालों तक मैंने तुम्हारी परछाई बनकर अपनी पहचान खो दी। मुझे लगा कि सेवा ही मेरा धर्म है। लेकिन जब मैंने वह घर छोड़ा और यहाँ आई, तो मुझे पता चला कि मैं सिर्फ़ एक 'केयरटेकर' नहीं हूँ। मैं किसी की 'मैडम' हूँ, किसी की 'दीदी' हूँ। ये गाँव के बच्चे, जिन्हें मैं पढ़ा रही हूँ, ये मेरी इज़्ज़त करते हैं, राघव। ये मुझे सिर्फ़ इसलिए नहीं चाहते कि मैं इनका काम करती हूँ, बल्कि इसलिए चाहते हैं कि मैं 'मैं' हूँ।"

राघव स्तब्ध रह गया। "तो... तो क्या तुम नहीं जाओगी? क्या तुम मुझे उस नर्क में अकेला छोड़ दोगी?"

"वह नर्क मैंने नहीं, तुम्हारे अहंकार ने बनाया है राघव," सविता ने शांत भाव से कहा। "और रही बात वापस जाने की... तो अब मैं वापस नहीं जा सकती। क्योंकि जिस सविता को तुम ढूँढ़ने आए हो, वह तो उसी दिन मर गई थी जब तुमने उसे 'अनपढ़ गँवार' कहा था। जो औरत तुम्हारे सामने खड़ी है, वह अब अपनी शर्तों पर जीती है।"

"तो मैं क्या करूँ?" राघव बच्चों की तरह बिलख पड़ा। "मैं बर्बाद हो जाऊँगा।"

सविता ने एक पल सोचा। फिर वह अंदर गई और एक पुरानी डायरी लेकर आई।

"राघव, इस डायरी में मैंने तुम्हारे घर को चलाने के सारे नियम, तुम्हारी सारी आदतों का ब्यौरा और तुम्हारी फाइलों का सिस्टम लिखा है। इसे ले जाओ। किसी भी नई हाउसकीपर को यह दे देना, वह तुम्हारा घर संभाल लेगी।"

"मुझे डायरी नहीं, तुम चाहिए हो!" राघव चिल्लाया।

"तुम्हें मैं कभी चाहिए ही नहीं थी राघव," सविता ने तीखा प्रहार किया। "तुम्हें सिर्फ़ एक ऐसा इंसान चाहिए था जो तुम्हारे अहंकार को सहला सके और तुम्हारी गंदगी साफ़ कर सके। अब तुम्हें खुद अपनी गंदगी साफ़ करनी सीखनी होगी। जाओ राघव, बड़ा बनो। सिर्फ़ दौलत से नहीं, चरित्र से भी।"

सविता ने वह डायरी राघव के हाथ में रख दी और मुड़कर वापस अपने स्कूल (बच्चों) की तरफ चली गई।

राघव वहां खड़ा रहा, उस डायरी को थामे हुए। उसे महसूस हुआ कि यह डायरी महज़ कागज़ का पुलिंदा नहीं है, बल्कि उसके पंद्रह सालों के शोषण और सविता के मूक बलिदान का दस्तावेज़ है।

उसने देखा कि सविता बच्चों के बीच बैठकर मुस्कुरा रही है। वह हँस रही है। वह आज़ाद है।

राघव ने महसूस किया कि उसने आज अपनी ज़िंदगी की सबसे कीमती चीज़ खो दी है, और विडंबना यह थी कि वह चीज़ कभी उसकी थी ही नहीं, उसने बस उस पर कब्ज़ा कर रखा था।

वह भारी कदमों से अपनी कार की ओर बढ़ा। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा, क्योंकि वह जानता था कि अब पीछे मुड़ने का कोई फायदा नहीं है। कुछ दरवाज़े जब बंद होते हैं, तो वे सिर्फ़ कुंडी से नहीं, बल्कि आत्मा से बंद होते हैं।

गाड़ी स्टार्ट हुई। धूल का एक गुबार उड़ा और राघव की कार उस कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ गई। पीछे रह गई थी एक शांति—वह शांति जो किसी के जाने से नहीं, बल्कि किसी के "खुद को पा लेने" से पैदा हुई थी।

आँगन में बैठी सविता ने उड़ती हुई धूल को देखा, एक गहरी सांस ली, और बच्चों से बोली, "चलो, अब हम अगला पाठ शुरू करते हैं—स्वाभिमान का।"

हवा में बस पन्नों के पलटने की आवाज़ थी, और फिर... एक अर्थपूर्ण सन्नाटा।


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