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सामाजिक प्रतिष्ठा

 रात के ग्यारह बज रहे थे। बेडरूम में एसी की हल्की गुनगुनाहट के अलावा एकदम सन्नाटा था। समीर अपने लैपटॉप में सिर गड़ाए कल की प्रेजेंटेशन और घर पर होने वाली पूजा की तैयारियों की लिस्ट को आखिरी बार देख रहा था। बिस्तर के दूसरे कोने पर बैठी वंदना अपने माथे को कसकर दबाए हुए थी। उसके चेहरे पर पसीने की बारीक बूंदें थीं और शरीर तप रहा था। उसने हिम्मत जुटाकर समीर के कंधे पर हाथ रखा।

"समीर..." वंदना की आवाज़ में एक अजीब सी लड़खड़ाहट थी।

समीर ने बिना नज़रें हटाए ही झुंझलाते हुए कहा, "वंदना, प्लीज! अब और कोई नई मुसीबत मत खड़ी करना। तुम्हें पता है ना कल पापा की बरसी है और घर में सत्यनारायण की कथा भी रखी है। मम्मी सुबह से तैयारियों में लगी हैं और मैं ऑफिस और घर दोनों मैनेज करने में पागल हो रहा हूँ। अब अगर तुम्हें किसी रिश्तेदार की शिकायत करनी है या काम की टेंशन बतानी है, तो प्लीज, कल पूजा के बाद। अभी मुझे फोकस करने दो।"

वंदना ने एक बार फिर कुछ कहने के लिए मुंह खोला, उसके होंठ कांप रहे थे। वह कहना चाहती थी कि उसे 103 डिग्री बुखार है, उसका बदन टूट रहा है और उसे चक्कर आ रहे हैं। लेकिन समीर की बातों में इतनी रूखापन था कि उसके शब्द गले में ही अटक गए। उसने सोचा, शायद समीर सही कह रहा है। कल इतना बड़ा दिन है, घर मेहमानों से भरा रहेगा। ऐसे में अगर उसने अपनी बीमारी का रोना रोया, तो सासू मां, सुमित्रा देवी, फिर ताना मारेंगी कि 'बड़े मौकों पर ही इसे बीमार पड़ना होता है'। वंदना ने चुपचाप एक पेरासिटामोल की गोली निकाली, उसे पानी के साथ निगला और चादर ओढ़कर लेट गई। समीर को भनक तक नहीं लगी कि उसके बगल में लेटी उसकी पत्नी दर्द से कराह रही थी, उसने अपनी सिसकियों को तकिए में दबा दिया था।

अगली सुबह घर में चहल-पहल जल्दी शुरू हो गई। सुमित्रा देवी की आवाज़ हॉल से गूंज रही थी। "अरे, फूल वाले ने अभी तक गेंदे की माला नहीं भेजी? पंडित जी दस बजे आ जाएंगे। वंदना... ओ वंदना! अभी तक सो रही है क्या? महारानी को कोई जगाओ भाई, आज के दिन तो जल्दी उठ जाना चाहिए था।"

वंदना की नींद इस शोर से खुली। उसका सिर भारी हो रहा था, जैसे किसी ने हथौड़े बरसाए हों। बुखार उतरा नहीं था, बल्कि शरीर और ज्यादा निढाल हो गया था। लेकिन सुमित्रा देवी की तीखी आवाज़ सुनकर वह बिस्तर से किसी तरह उठी। समीर पहले ही नहा-धोकर तैयार हो चुका था और नीचे मेहमानों को रिसीव करने जा रहा था। वंदना ने दीवार का सहारा लेकर खुद को संभाला और बाथरूम की तरफ बढ़ी।

तैयार होकर जब वंदना नीचे पहुंची, तो सुमित्रा देवी ने उसे ऊपर से नीचे तक घूरकर देखा। "आ गई? शुक्र है। देखो वंदना, आज मेरी नाक नहीं कटनी चाहिए। शर्मा जी, वर्मा जी और समीर के बॉस... सब आ रहे हैं। खाना घर का ही होना चाहिए, यह कैटरिंग वाला खाना मुझे पसंद नहीं और पापा को भी हाथ का बना खाना ही पसंद था। तुम रसोई संभालो, मैं बाहर मेहमानों को देखती हूँ। और हाँ, चेहरे पर यह बारह मत बजाकर रखना, थोड़ा मुस्कुराकर मिलना सबसे। लोग क्या कहेंगे कि बहू को ससुर की बरसी पर काम करने में जोर आ रहा है।"

वंदना ने बस सिर हिलाया। उसकी आवाज़ नहीं निकल रही थी। वह रसोई में गई। वहां काम का अंबार लगा था। पचास लोगों का खाना बनना था। पूड़ियाँ, कचौड़ियाँ, तीन तरह की सब्जियां, और खीर। रसोई में एग्जॉस्ट फैन खराब था और गर्मी से वहां का माहौल भट्ठी जैसा हो रहा था। वंदना ने आटा गूंथना शुरू किया। हर पल उसे लग रहा था कि वह अब गिरी कि तब गिरी। उसके हाथ कांप रहे थे, लेकिन वह मशीन की तरह काम करती रही।

बाहर हॉल में एसी चल रहा था। हंसी-ठिठोली हो रही थी। सुमित्रा देवी अपनी नई कांजीवरम साड़ी में इतरा रही थीं। एक रिश्तेदार ने पूछा, "अरे सुमित्रा जी, वंदना नहीं दिख रही? अकेले सब संभाल रही है क्या?"

सुमित्रा देवी ने बनावटी हंसी के साथ कहा, "अरे क्या बताऊँ बहन, आजकल की बहुओं को तो बस काम से जी चुराना आता है। लेकिन मैंने वंदना को अच्छे संस्कार दिए हैं। उसे पता है कि घर की इज्जत क्या होती है। मैंने कहा, 'बेटा, तुम रसोई देखो, बाकी मैं देख लूंगी'। वैसे भी उसे खाना बनाने का बहुत शौक है, कहती है मम्मी जी आप आराम करो, मैं सब कर लूंगी।"

सभी औरतों ने सुमित्रा देवी की तारीफ की। "वाह! बहू हो तो ऐसी, और सास हो तो आप जैसी, जो बहू को बेटी मानती हैं।"

इधर रसोई में वंदना की हालत बिगड़ती जा रही थी। कड़ाही से निकलती तेल की गंध उसे उल्टी जैसा महसूस करा रही थी। बीच-बीच में वह सिंक के पास जाकर ठंडे पानी के छींटे अपने मुंह पर मारती ताकि बेहोश न हो जाए। समीर दो-तीन बार रसोई में पानी की बोतल लेने आया। उसने देखा कि वंदना पसीने से तर-बतर है।

"वंदना, यार जल्दी करो, पंडित जी भोग मांग रहे हैं," समीर ने हड़बड़ी में कहा। उसने यह गौर ही नहीं किया कि वंदना की आंखें लाल थीं और वह कितनी मुश्किल से खड़ी थी। वंदना ने कांपते हाथों से थाली बढ़ाई। समीर थाली लेकर चला गया।

दोपहर के दो बज गए। पूजा खत्म हो चुकी थी और मेहमान खाना खा रहे थे। वंदना लगातार रोटियाँ सेक रही थी और मेहमानों को गरम-गरम परोसने के लिए नौकरानी के हाथ भिजवा रही थी। सुमित्रा देवी बीच-बीच में रसोई के दरवाजे पर आकर हिदायत दे जातीं, "खीर में काजू कम लग रहे हैं, और डालो। और हाँ, वर्मा जी को कड़क रोटी पसंद है, ध्यान रखना।" उन्होंने एक बार भी वंदना से यह नहीं पूछा कि उसने कुछ खाया है या नहीं, या उसकी तबियत कैसी है।

आखिरकार, सारे मेहमान चले गए। घर में सन्नाटा पसर गया। बस कुछ करीबी रिश्तेदार और घर के लोग बचे थे। समीर सोफे पर निढाल होकर बैठ गया। "उफ्फ! बहुत थकान हो गई। मम्मी, प्रोग्राम बहुत शानदार रहा। सबने खाने की बहुत तारीफ की।"

सुमित्रा देवी अपनी तारीफ सुनकर फूल गईं। "हाँ बेटा, मैंने तो पहले ही कहा था, इंतजाम में कोई कमी नहीं रखूंगी। आखिरकार खानदान की इज्जत का सवाल था।"

समीर ने इधर-उधर देखा। "वंदना कहां है? उसे भी बुला लो, साथ में खाना खा लेते हैं।"

सुमित्रा देवी ने नाक सिकोड़ी। "अरे, वो अभी रसोई समेट रही होगी। तुम खा लो, औरतों का तो काम ही होता है सबको खिलाकर खाना। वैसे भी उसने काम ही क्या किया है? बस खाना ही तो बनाया है, सारी दौड़-भाग तो मैंने की है।"

समीर को थोड़ा अजीब लगा। उसने देखा कि सुबह से वंदना एक बार भी बाहर आकर नहीं बैठी। वह रसोई की तरफ गया। "वंदना... वंदना आओ यार, अब काम छोड़ो।"

जैसे ही समीर रसोई में दाखिल हुआ, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वंदना रसोई के फर्श पर बेसुध पड़ी थी। उसके पास आटे की परात बिखरी हुई थी और एक गिलास पानी जो शायद वह पीने की कोशिश कर रही थी, लुढ़का हुआ था।

"वंदना!" समीर चीखा और दौड़कर उसके पास पहुंचा। उसने वंदना का सिर अपनी गोद में रखा। उसका शरीर आग की तरह तप रहा था। "मम्मी! जल्दी आओ! वंदना बेहोश हो गई है!"

समीर की आवाज़ सुनकर सुमित्रा देवी और कुछ रिश्तेदार दौड़े चले आए। सुमित्रा देवी ने आते ही कहा, "अरे, नाटक कर रही होगी। सुबह से मुंह फुलाए बैठी थी। काम खत्म हुआ तो सोने का बहाना ढूंढ लिया।"

समीर ने गुस्से से अपनी मां की तरफ देखा, लेकिन कुछ बोला नहीं। उसने वंदना के गाल थपथपाए। "वंदना, आंखें खोलो।" वंदना ने मुश्किल से पलकें झपकाईं, वह बहुत क्षीण आवाज़ में बुदबुदाई, "पानी..."

समीर ने उसे पानी पिलाया और उसे गोद में उठाकर बेडरूम की तरफ ले जाने लगा। तभी उसकी नज़र रसोई के काउंटर पर रखे डस्टबिन के पास एक मुड़ी हुई पर्ची पर पड़ी। वह शायद दवा की पर्ची थी। समीर ने उसे अनदेखा किया और वंदना को कमरे में ले गया। डॉक्टर को फोन लगाया गया।

डॉक्टर ने आकर जांच की और उनका चेहरा गंभीर हो गया। "मिस्टर समीर, इनकी हालत बहुत खराब है। इन्हें 104 डिग्री बुखार है और डिहाइड्रेशन भी बहुत ज्यादा है। इनका बीपी खतरनाक रूप से कम है। यह हालत एक-दो घंटे में नहीं होती। यह शायद कल रात से या उससे भी पहले से बीमार हैं। आपने इन्हें काम क्यों करने दिया? अगर थोड़ी देर और हो जाती तो इन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता, मल्टी-ऑर्गन फेलियर का खतरा हो सकता था।"

समीर सन्न रह गया। "कल रात से?" उसे याद आया कि वंदना कल रात कुछ कहना चाहती थी, लेकिन उसने उसे चुप करा दिया था। उसे खुद पर इतनी घिन आई कि वह ज़मीन में गड़ जाना चाहता था।

डॉक्टर ने इंजेक्शन दिया और आराम करने की सख्त हिदायत देकर चले गए। सुमित्रा देवी कमरे के दरवाजे पर खड़ी थीं। डॉक्टर के जाते ही वह बोलीं, "अरे, आजकल के डॉक्टर भी ना, छोटी सी बात का बतंगड़ बना देते हैं। थोड़ा बुखार ही तो है, अब घर में काम है तो बहुएं क्या बिस्तर पकड़ लेंगी?"

समीर, जो अब तक वंदना के सिर पर पट्टियां रख रहा था, अचानक उठा। उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। वह सीधा अपनी मां के पास गया और उनका हाथ पकड़कर रसोई में ले गया।

"समीर, क्या कर रहा है? छोड़ मेरा हाथ, दुख रहा है," सुमित्रा देवी चिल्लाईं।

समीर उन्हें उसी डस्टबिन के पास ले गया जहां उसने वह पर्ची देखी थी। उसने वह पर्ची उठाई। वह वंदना की कल दोपहर की डॉक्टर की रिपोर्ट थी, जो शायद वंदना ने रसोई में जल्दबाजी में कहीं रख दी थी और वह गिर गई थी। समीर ने उसे पढ़ा। वायरल फीवर और बेड रेस्ट की सलाह लिखी थी।

"मम्मी," समीर की आवाज़ बहुत धीमी लेकिन बेहद कड़क थी। "कल शाम को वंदना आपके पास आई थी ना? जब मैं ऑफिस से आ रहा था?"

सुमित्रा देवी थोड़ा सकपकाईं। "हाँ... आई थी। कह रही थी तबीयत ठीक नहीं है। तो मैंने कहा, गोली खा ले। अब पूजा के वक्त बहाने तो सभी बनाते हैं।"

"बहाने?" समीर ने चिल्लाकर कहा। घर के बाकी लोग भी वहां आ गए। "104 डिग्री बुखार बहाना होता है? डॉक्टर कह रहा है कि उसकी जान को खतरा हो सकता था और आपको यह बहाना लग रहा है? आपने उसे एक बार भी रुकने को नहीं कहा? उल्टे आप उसे ताने मारती रहीं कि वो कामचोर है?"

"अरे तो क्या हो गया? हम भी तो बीमार होते थे, लेकिन घर का काम नहीं रुकता था। यह आज की लड़कियां ही नाज़ुक हैं," सुमित्रा देवी ने अपनी बात को सही ठहराने की कोशिश की।

"बस! बहुत हो गया!" समीर ने हाथ दिखाकर उन्हें चुप कराया। "आपकी यह महानता और बलिदान की कहानियां अब मुझे नहीं सुननी। आप जानती हैं मम्मी, आज मुझे वंदना पर तरस नहीं आ रहा, मुझे आप पर गुस्सा नहीं आ रहा, बल्कि मुझे खुद पर शर्म आ रही है। कल रात जब वह मुझसे बात करने आई थी, मैंने उसे झिड़क दिया। क्यों? क्योंकि मुझे लगा कि घर की शांति और यह 'दिखावे' का फंक्शन ज्यादा जरूरी है। मैंने आपकी आंखों से दुनिया देखना शुरू कर दिया था। मुझे लगा कि आप मां हैं, तो आप जो कहेंगी सही होगा। आप हमेशा कहती थीं कि वंदना घर को अपना नहीं समझती। आज देख लिया मैंने, उसने अपनी जान दांव पर लगा दी इस घर की झूठी शान के लिए।"

सुमित्रा देवी की आंखों में आंसू आ गए। "तू अपनी मां से ऐसे बात कर रहा है? एक जोरू के पीछे?"

"मैं जोरू के पीछे नहीं, इंसानियत के नाते बात कर रहा हूँ," समीर ने कहा। "वह कोई मशीन नहीं है, मम्मी। वह भी किसी की बेटी है। अगर आज आपकी बेटी रिया यहां होती और उसे इतना बुखार होता, तो क्या आप उससे पचास लोगों का खाना बनवातीं? नहीं ना? आप उसे बिस्तर पर लिटातीं, उसके पैर दबातीं। तो वंदना के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों? और सुनिए, आप जो बाहर सबको कह रही थीं ना कि बहू बेटी जैसी है... यह ढोंग बंद कर दीजिए। बेटी होती तो आज वह बेहोश होकर जमीन पर नहीं पड़ी होती।"

समीर ने एक गहरी सांस ली। "आज के बाद इस घर के नियम बदलेंगे। जब तक वंदना पूरी तरह ठीक नहीं हो जाती, रसोई में ताला लगा रहेगा। खाना बाहर से आएगा या मैं बनाऊंगा। और अगली बार अगर घर में कोई फंक्शन होगा, तो वह तभी होगा जब घर के लोग स्वस्थ होंगे। इज्जत पकवानों से या भीड़ से नहीं बनती मम्मी, इज्जत इससे बनती है कि हम अपने घर के लोगों का कितना ख्याल रखते हैं। आज पापा की आत्मा भी खुश नहीं होगी यह देखकर कि उनकी बरसी मनाने के लिए हमने घर की लक्ष्मी को मौत के मुंह में धकेल दिया।"

सुमित्रा देवी के पास कहने को कोई शब्द नहीं थे। उनका बेटा, जो हमेशा उनकी 'हां' में 'हां' मिलाता था, आज एक पराये की तरह, या शायद एक समझदार मर्द की तरह खड़ा था। समीर वापस कमरे में चला गया।

उस रात समीर वंदना के सिरहाने बैठा रहा। पूरी रात पट्टियां बदलता रहा। सुबह जब वंदना की आंख खुली, तो उसने देखा समीर कुर्सी पर बैठा-बैठा ही सो गया है और उसका हाथ वंदना के हाथ पर है। वंदना की आंखों से आंसू बह निकले। यह आंसू दुख के नहीं, बल्कि सुकून के थे। उसे पता था कि रास्ता अभी भी कठिन है, सुमित्रा देवी का स्वभाव इतनी जल्दी नहीं बदलेगा, लेकिन आज उसे यकीन हो गया था कि इस लड़ाई में वह अकेली नहीं है। उसका पति, जो अब तक मां की परछाई में था, अब उसका साथी बन चुका था।

कहानी यही सिखाती है कि अक्सर हम सामाजिक प्रतिष्ठा और रिवाजों के शोर में अपनों की खामोश चीखें नहीं सुन पाते। घर की नींव ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की परवाह और सम्मान से टिकी होती है। अगर आप अपने घर की औरतों को, चाहे वो पत्नी हो या बहू, सम्मान और स्वास्थ्य नहीं दे सकते, तो समाज में आपकी इज्जत का कोई मोल नहीं है। यह एक कड़वा सच है जो हर घर की कहानी हो सकता है, लेकिन इसका अंत बदलना हमारे हाथ में है।


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