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झूठी मर्यादा की देहलीज

 सफेद संगमरमर से बना 'शांति-कुंज' बाहर से देखने में जितना भव्य और शांत लगता था, उसके अंदर की दीवारों में उतनी ही घुटन कैद थी। यह घर था शहर के प्रतिष्ठित व्यापारी दीनानाथ जी का, जहाँ हर चीज़ करीने से सजी होती थी, सिवाय घर की छोटी बहू, सुमन की किस्मत के।

सुमन एक मध्यमवर्गीय परिवार की पढ़ी-लिखी लड़की थी, जिसकी शादी बड़े अरमानों से रमन के साथ हुई थी। रमन, दीनानाथ जी का छोटा बेटा, स्वभाव से बेहद मृदु और अपने माता-पिता का परम भक्त था। उसे लगता था कि उसके माता-पिता दुनिया के सबसे आदर्श इंसान हैं। लेकिन रमन यह नहीं देख पा रहा था कि उस आदर्शवाद के चोग़े के नीचे सुमन का अस्तित्व धीरे-धीरे कुचला जा रहा था।

घर में रमन के बड़े भाई, विकास और भाभी, निताशा भी रहते थे। निताशा अमीर घराने की बेटी थी और अपने साथ भारी-भरकम दहेज लेकर आई थी। शायद यही वजह थी कि सासू माँ, विमला देवी, की नज़र में निताशा का दर्जा घर की मालकिन जैसा था, और सुमन का दर्जा एक अवैतनिक सुपरवाइजर या कहें तो एक उच्च-स्तरीय नौकरानी जैसा।

निताशा को सुबह देर तक सोने की आदत थी। "मम्मी जी, मेरा सिर भारी रहता है सुबह," यह कहकर वह अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती। विमला देवी बड़े प्यार से कहतीं, "कोई बात नहीं बहू, तुम आराम करो। सुमन तो है ही, वह सब संभाल लेगी।"

और बस, यहीं से 'सुमन तो है ही' का सिलसिला शुरू हो जाता। सुबह की चाय से लेकर रात के बर्तन मांजने तक, सुमन की दिनचर्या एक मशीन की तरह चलती। रमन सुबह जल्दी ऑफिस निकल जाता और रात को थककर आता, तो उसे सुमन का मुस्कुराता चेहरा दिखता। वह कभी देख ही नहीं पाया कि उस मुस्कान के पीछे कितनी थकान और अपमान छिपा है।

बात सिर्फ काम की होती तो सुमन शायद सह भी लेती, लेकिन बात आत्मसम्मान की थी। खाने की मेज पर अक्सर भेदभाव होता। निताशा और बच्चों के लिए फलों का जूस निकलता, जबकि सुमन के हिस्से में बची-कुची चाय आती। अगर कभी पनीर की सब्जी बनती, तो पनीर के टुकड़े निताशा और घर के पुरुषों की थाली में होते, और सुमन की कटोरी में सिर्फ तरी (ग्रेवी) होती।

"अरे सुमन, तुम्हें तो तरी ही पसंद है ना? तुम तो कहती हो हल्का खाना चाहिए," विमला देवी बड़ी चालाकी से सबके सामने कह देतीं और सुमन शर्म के मारे "जी माँ जी" कह कर चुप रह जाती। वह रमन से शिकायत करके उसे दुखी नहीं करना चाहती थी।

एक रविवार की बात है। घर में रमन की बुआ सास और उनके बच्चे आए हुए थे। मेहमानों की खातिरदारी में कोई कमी न रह जाए, इसके लिए विमला देवी ने सुबह से ही फरमान जारी कर दिए थे।

"सुमन, आज शाही पुलाव, दाल मखनी, तीन तरह की सब्जियाँ और खीर बनेगी। और हां, निताशा की तबीयत ठीक नहीं है, तो उसे परेशान मत करना," विमला देवी ने आदेश दिया और ड्राइंग रूम में मेहमानों के साथ गप्पें मारने बैठ गईं।

सुमन को पिछले दो दिनों से तेज़ बुखार था। उसका शरीर तप रहा था और जोड़ों में दर्द हो रहा था। उसने सुबह रमन को बताने की कोशिश की थी, "रमन, मेरी तबीयत..." लेकिन रमन को ऑफिस से कोई ज़रूरी कॉल आ गया और वह "शाम को बात करते हैं सुमन" कहकर बाहर लॉन में चला गया था।

सुमन ने एक पेनकिलर खाई और रसोई में जुट गई। पसीने से लथपथ, बुखार से तपती देह लेकर वह घंटों गैस के सामने खड़ी रही। निताशा बीच-बीच में आती, फ्रिज से ठंडा पानी पीती और कहती, "अरे सुमन, दाल में तड़का थोड़ा तेज़ लगाना, बुआ जी को फीका पसंद नहीं है," और फिर एसी वाले कमरे में जाकर बैठ जाती।

दोपहर के तीन बज चुके थे। मेहमानों, बच्चों, सास-ससुर, जेठ-जेठानी और रमन ने खाना खा लिया था। डाइनिंग टेबल पर हंसी-ठिठोली चल रही थी। रमन भी अपनी बुआ के बेटों के साथ बातों में मशगूल था। किसी ने एक बार भी नहीं पूछा कि "सुमन, तुमने खाया?"

रसोई में बर्तनों का ढेर लगा था। सुमन की आँखों के आगे अंधेरा छा रहा था। भूख से ज्यादा कमजोरी उसे मार रही थी। उसने सोचा अब सब खा चुके हैं, तो वह भी दो निवाले खाकर दवा ले लेगी। उसने पुलाव का भगौना खोला, वह खाली था। दाल की कढ़ाई देखी, उसमें सिर्फ नीचे चिपका हुआ मसाला बचा था। सब्जियों के डोंगे भी साफ हो चुके थे।

मेहमानों को खिलाने और घर वालों की पसंद पूरी करने के चक्कर में सुमन ने अपने लिए कुछ अलग निकाल कर नहीं रखा था, यह सोचकर कि इतना खाना तो बच ही जाएगा। लेकिन आज सब चट हो गया था।

रोटी बनाने की हिम्मत उसमें अब नहीं थी। तभी उसकी नज़र एक कोने में रखी बासी रोटियों के डिब्बे पर पड़ी जो सुबह गाय के लिए अलग निकाली गई थीं। भूख और कमजोरी जब हद से गुजर जाए, तो इंसान का स्वाभिमान भी घुटने टेक देता है। सुमन ने कांपते हाथों से वह सूखी रोटी उठाई, उस पर कढ़ाई में बचा हुआ थोड़ा सा मसाला और आचार लगाया।

वह रसोई के फर्श पर ही एक कोने में बैठ गई, जहाँ से उसे कोई देख न सके। उसकी आँखों से आंसू टपक कर उस सूखी रोटी पर गिर रहे थे। वह जल्दी-जल्दी निवाले निगल रही थी, ताकि कोई आ न जाए। उसे अपने आप पर घिन आ रही थी, अपने हालातों पर रोना आ रहा था। वह इस घर की बहू थी, या कोई भिकारन?

इधर, रमन को अचानक प्यास लगी। मेज पर पानी का जग खाली था। "अरे, सुमन पानी ला दो..." उसने आवाज़ दी, लेकिन शोर में उसकी आवाज़ दब गई। वह खुद ही उठकर रसोई की तरफ गया।

जैसे ही रमन रसोई के दरवाजे पर पहुँचा, उसके कदम ठिठक गए।

उसने देखा कि सुमन ज़मीन पर बैठी है, बाल बिखरे हुए हैं, चेहरा बुखार से लाल है। वह सिसक रही है और एक हाथ से आंसू पोंछते हुए दूसरे हाथ से सूखी, बासी रोटी आचार के साथ खा रही है। जबकि सिंक में जूठे बर्तनों का पहाड़ खड़ा था जिसमें शाही दावतों के अवशेष थे।

रमन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर ज़ोरदार तमाचा मारा हो। यह वही सुमन थी जिसे ब्याह कर लाते समय उसने वादा किया था कि वह उसे रानी बनाकर रखेगा। आज उसकी रानी, उसके ही घर में, जूठन और बासी टुकड़ों की मोहताज थी?

उसने ड्राइंग रूम की तरफ देखा जहाँ उसकी माँ और भाभी जोर-जोर से हंस रही थीं। "अरे भाभी, पुलाव तो कमाल का था, सुमन के हाथ में जादू है," निताशा कह रही थी।

जादू? रमन को उस हंसी में क्रूरता सुनाई दी। उसे अपनी माँ की आवाज़ सुनाई दी—"सुमन तो है ही, वो खा लेगी बाद में।" उसे याद आया कि कैसे अक्सर खाने के वक्त सुमन को कोई न कोई काम याद दिला दिया जाता था।

रमन चुपचाप वापस मुड़ा, लेकिन ड्राइंग रूम में नहीं गया। वह सीधे अपने कमरे में गया और अपना सूटकेस निकाला।

सुमन ने जब रोटी का आखिरी टुकड़ा निगला और पानी पीकर खड़ी होने की कोशिश की, तो उसे चक्कर आ गया। उसने स्लैब का सहारा लिया। तभी रमन रसोई में आया। उसका चेहरा पत्थर की तरह सख्त था, लेकिन आँखों में एक अजीब सी नमी थी।

उसने सुमन का हाथ पकड़ा। सुमन घबरा गई। "रमन... वो... मैं बस अभी बर्तन मांजने ही वाली थी। थोड़ा सुस्ताने बैठ गई थी।"

रमन ने कुछ नहीं कहा। उसने सुमन का हाथ कसकर पकड़ा और उसे खींचते हुए ड्राइंग रूम में ले गया।

"रमन? क्या हुआ? मेहमान बैठे हैं, छोड़ो मुझे," सुमन ने धीरे से कहा, लेकिन रमन रुका नहीं।

ड्राइंग रूम में अचानक सन्नाटा छा गया। रमन, जिसके एक हाथ में सूटकेस था और दूसरे हाथ में सुमन, सबके सामने खड़ा था।

"क्या हुआ रमन? कहीं जा रहे हो क्या?" विमला देवी ने हैरानी से पूछा।

रमन ने एक गहरी सांस ली। उसने अपनी माँ की आँखों में सीधे देखा।

"हाँ माँ, जा रहा हूँ। एक ऐसी जगह जहाँ मेरी पत्नी को इंसान समझा जाए।"

"क्या मतलब?" पिता दीनानाथ जी ने कड़क कर पूछा। "मेहमानों के सामने यह क्या तमाशा है?"

"तमाशा तो इस घर में रोज़ होता है पापा," रमन की आवाज़ कांपी, पर उसमें दृढ़ता थी। "पर्दों के पीछे। आज मैंने वो तमाशा अपनी आँखों से देख लिया। जिस बहू के हाथ के खाने की तारीफ करते आप लोग नहीं थक रहे, वो अंदर रसोई के फर्श पर बैठकर गाय के लिए रखी बासी रोटी खा रही है। वो बुखार में तप रही है, लेकिन किसी ने उसे एक गिलास पानी तक नहीं पूछा। और निताशा भाभी? आप तो कह रही थीं आपकी तबीयत खराब है, फिर एसी में बैठकर तीन प्लेट पुलाव कैसे खा गईं?"

निताशा का चेहरा पीला पड़ गया। विमला देवी सकपका गईं। "अरे, तो उसने बताया क्यों नहीं? खाना खत्म हो गया था तो बना लेती। इसमें घर छोड़ने वाली क्या बात है?"

"यही तो बात है माँ," रमन चिल्लाया। "उसे बताना क्यों पड़े? क्या वो इस परिवार का हिस्सा नहीं है? क्या उसे भूख नहीं लगती? आप लोग उसे मशीन समझते हैं। और मैं... मैं सबसे बड़ा दोषी हूँ। मैं अंधा बना रहा। मुझे लगा मेरा परिवार उसे प्यार करता है। पर आज समझ आया कि आप लोग उसे सिर्फ 'इस्तेमाल' करते हैं।"

"रमन, बेटा, गुस्सा थूक दे। लोग क्या कहेंगे?" विमला देवी ने रमन का हाथ पकड़ने की कोशिश की।

रमन ने अपना हाथ पीछे खींच लिया। "लोग क्या कहेंगे, इसकी चिंता मैंने बहुत कर ली माँ। अब मुझे इस बात की चिंता है कि जब मैं आईने में देखूँ, तो अपनी नज़रों से गिर न जाऊँ। सुमन ने आज तक उफ़ नहीं की, क्योंकि उसे मेरे संस्कारों का लिहाज था। पर आज उसका सब्र नहीं, मेरा भ्रम टूटा है।"

रमन ने सुमन की ओर देखा, जो अब भी सन्न खड़ी थी, आंसू उसकी गालों पर सूख चुके थे।

"चलो सुमन," रमन ने कहा। "मेरे पास आलीशान बंगला नहीं है, शायद किराए का छोटा मकान होगा। पर वहां तुम्हें बासी रोटी नहीं खानी पड़ेगी। वहां हम साथ बैठकर खाएंगे, चाहे चटनी-रोटी ही क्यों न हो।"

सुमन ने रमन को देखा। आज पहली बार उसे रमन में वो पति नज़र आया जिसका उसने सपना देखा था—वो जो दुनिया के सामने उसका हाथ थाम सके।

वे दोनों घर से निकल गए। पीछे आलीशान 'शांति-कुंज' अपनी झूठी शान के साथ खड़ा रह गया, और रमन-सुमन ने एक नई दुनिया की ओर कदम बढ़ाया, जहाँ दीवारें शायद कच्ची होंगी, लेकिन रिश्ते सच्चे होंगे।

 लेखिका : प्रियंका मुकेश पटेल


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