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दुख को दहलीज़

 “अरे बेटा, तू अभी निकल जा। यहाँ का काम मैं समेट लूँगी,” सरला ने अपने बेटे की पत्नी मीरा से कहा। “तेरे बाबूजी की बरसी है, सब तेरी ही राह देख रहे होंगे। देर हो गई तो लोग बातें बनाएँगे।”

मीरा ने जल्दी-जल्दी रसोई की गैस बंद की, सिंक में पड़ी प्लेटें एक तरफ सरकाईं और बोली, “माँ, बस ये दाल का तड़का लगा दूँ। और आपकी दवा की स्ट्रिप भी टेबल पर रख देती हूँ। लौटते-लौटते रात हो जाएगी तो आपको परेशानी न हो।”

सरला ने उसके माथे पर हाथ रखा। “जा बेटा, मैं ठीक हूँ। भगवान के लिए आज वहाँ जाकर किसी से उलझना मत।”

मीरा ने हल्की हँसी हँसी, पर आँखों में थकान थी। वह स्कूटर की चाबी उठाकर बाहर निकली। पति नितिन ऑफिस में था—उसे शाम तक सीधे वहीं पहुँचना था। मीरा अकेली ही अपने मायके जा रही थी।

रास्ते में हवा तेज थी, धूप ज़रा नरम। मन में एक अजीब-सी बेचैनी भी थी। पिछले साल वह पिता की बरसी में गई थी तो सबने उसे “बहुत समझदार बहू” कहकर तारीफ की थी। इस बार फोन पर उसकी मौसी ने कहा था—“अरे मीरा, तू आ ज़रूर जाना, सब रिश्तेदार आए हैं… और हाँ, तेरे लिए भी एक बड़ी बात सुनने को मिलेगी।”

मीरा का दिल बैठ गया था। बड़ी बात? किस तरह की? फिर उसे याद आया—कुछ महीनों पहले उसने गुस्से में अपनी ससुराल की एक छोटी-सी बात को मायके में बढ़ा-चढ़ाकर कह दिया था। बस यूँ ही—थकान, झुंझलाहट और “किसी अपने” से शिकायत करने की आदत। उसने सोचा था, घर की बात घर में ही रहेगी। मगर बातें तो पानी हैं—लुढ़ककर दूर तक पहुँच जाती हैं।

घर पहुँची तो बरसी का कार्यक्रम शुरू होने ही वाला था। आँगन में सफेद चादरें बिछी थीं, प्लेटें तैयार थीं, पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे। मीरा ने अंदर जाकर माँ—लीला—को प्रणाम किया, छोटे भाई सुमित के सिर पर हाथ फेरा, चचेरी बहन काव्या से गले मिली।

पर जैसे ही उसने नजर उठाई, उसे लगा कि कई जोड़ी आँखें उसे टटोल रही हैं। कुछ मुस्कानें अधूरी थीं, कुछ फुसफुसाहटें तैर रही थीं।

मीरा ने धीरे से काव्या के कान में पूछा, “सब मुझे ऐसे क्यों देख रहे हैं?”

काव्या ने झेंपकर कहा, “कुछ नहीं दीदी… बस… अ… आप तो समझदार हो। चलो, अंदर बैठो।”

अंदर कमरे में महिलाओं का झुंड था—मौसी, बुआ, चाची, पड़ोस की दो आंटियाँ—सबकी हँसी चाय से ज़्यादा गरम थी। मीरा दरवाज़े पर पहुँची ही थी कि मौसी की आवाज़ कान में पड़ी—

“अरे, हमारी मीरा तो बहुत दुखी है रे… उसकी ससुराल में तो बड़ी तंगहाली है। ऊपर से वो सास भी बहुत टोकती है। और पति… बस ऑफिस, ऑफिस! बहू को पूछता ही नहीं।”

मीरा की रीढ़ में ठंडक उतर गई।

बुआ बोलीं, “हाँ, हाँ… पिछली बार आई थी तो खुद कह रही थी—‘मुझसे सारे काम कराते हैं, एक मददगार भी नहीं रखते। और जब मैं बोलूँ तो कहते हैं ‘तुम्हारे मायके वाले क्या करेंगे?’…’”

माँ लीला ने धीमी आवाज़ में कहा, “अरे… मैंने तो उसे समझाया था, पर बहू के मन में दुख बहुत है…”

मीरा का चेहरा तप गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके निजी जख्म को बाजार में टांग दिया हो। वह अंदर चली गई। अपनी आवाज़ पर काबू रखते हुए बोली, “मौसी, बुआ, ये बातें किसने कहीं? और किसके सामने?”

मौसी ने आँखें फैलाकर कहा, “अरे, तूने ही तो कही थीं बेटा! हम तो तेरे भले के लिए चिंता करते हैं। आखिर तू हमारी बच्ची है।”

मीरा का गला सूख गया। उसे याद आया—हाँ, उसने कहा था… मगर ऐसे नहीं। उसने उस दिन सिर्फ थककर इतना कहा था कि “घर में काम बहुत है।” उसने मजाक में कहा था, “कभी-कभी लगता है मैं ही मशीन हूँ।” पर लोगों ने मशीन से आगे “अत्याचार” जोड़ दिया… “तंगहाली” जोड़ दी… “बेचारी” जोड़ दी।

मीरा कुछ बोलती, तभी कमरे में नई आवाज़ गूंजी। ये उसके भाई सुमित की होने वाली सास, शैलजा देवी थीं। वह पहली बार उनके घर आई थीं, क्योंकि बरसी के बाद सगाई की बातें भी पक्की होनी थीं।

शैलजा देवी ने मीरा को ऊपर से नीचे देखा, और हल्की मुस्कान में तीर लपेटकर बोलीं, “मीरा बेटा, कैसी हो? सुना है तुम बहुत सहनशील हो। आजकल बहुएँ इतना बर्दाश्त कहाँ करती हैं… तुम तो सच में बड़ी ‘समझदार’ निकलीं।”

मीरा को शब्द ‘समझदार’ अब अपमान लगने लगा था।

शैलजा आगे बोलीं, “हम तो अपनी बहू को बेटी की तरह रखेंगे, देखना। न काम का बोझ, न किसी बात की रोक-टोक। मगर… हाँ, अपने मायके वाले भी हमेशा खुश रहेगा ऐसा नहीं… कुछ लोग तो बस शिकायतें करते रहते हैं।”

मीरा ने महसूस किया कि सबके चेहरों पर एक अजीब-सी संतुष्टि है—जैसे किसी के दुख से अपनी अच्छाई चमकाई जा रही हो।

उसी वक्त बाहर से पंडित जी की आवाज़ आई, “भोग का समय हो गया है।”

सब उठकर बाहर जाने लगे। मीरा भी चुपचाप निकल आई। बरसी की थाली परोसते हुए उसके हाथ काँप रहे थे। वह लोगों को देख रही थी—कोई सचमुच उसके लिए दुखी नहीं था। सबको बस एक कहानी चाहिए थी—“बेचारी बहू” की कहानी। और उसने खुद उस कहानी के लिए कुछ वाक्य दे दिए थे।

कार्यक्रम खत्म हुआ। लोग विदा लेने लगे। मीरा ने मां से कहा, “मैं अभी निकलती हूँ, माँ। सरला माँ अकेली होंगी।”

माँ लीला ने रोकने की कोशिश की, “अरे, अभी चाय तो पी ले…”

मीरा ने मुस्कान ओढ़ ली, “फिर कभी।”

स्कूटर उठाते वक्त मौसी फिर पास आईं, “बुरा मत मानना बेटा, हम तो तेरे लिए ही…”

मीरा ने पहली बार बहुत विनम्र लेकिन साफ़ शब्दों में कहा, “मौसी, चिंता और तमाशे में फर्क होता है। आज मुझे समझ आ गया।” और उसने हेलमेट पहन लिया।

रास्ते भर उसका मन पीछे भागता रहा—उन्हीं पुरानी बातों की तरफ। शादी के शुरुआती साल। एक दिन सास ने बस इतना कहा था—“बेटा, आज मेहमान हैं, थोड़ा जल्दी खाना बना देना।” मीरा उस दिन ऑफिस से थकी थी, और उसने रात को अपनी सहेली को फोन पर कह दिया—“यार, यहाँ तो बस काम ही काम है।” फिर वही बात किसी रिश्तेदार तक पहुँची, और हर किसी ने अपने हिसाब से नमक मिर्च लगा दी।

उसे सास सरला का चेहरा याद आया—सादी, शांत, कम बोलने वाली। जिसने कभी मीरा के मायके जाने पर रोक नहीं लगाई, जिसने हर महीने मीरा की पसंद का अचार बनाकर रखा, और जो अक्सर कहती—“घर की इज्जत बाहर नहीं घसीटते बेटा, भीतर बैठकर सँवारते हैं।”

मीरा की आँखें सूज गईं।
वह समझ गई—किसी की अच्छाई पर कालिख लगाना बहुत आसान है। और बाद में वही कालिख धोने के लिए हमें अपने ही आँसू लगाने पड़ते हैं।

घर पहुँची तो रात का अंधेरा फैल चुका था। सरला दरवाज़े के पास ही बैठी थी।
“आ गई बेटा?” उन्होंने राहत की साँस ली, “भूख लगी होगी, खाना गरम कर दूँ?”

मीरा का गला भर आया। वह वहीं बैठ गई, सास के घुटनों के पास।
“माँ… आज मैं बहुत शर्मिंदा हूँ,” उसके शब्द टूट रहे थे, “मैंने… कभी-कभी थककर आपके घर की बातें बाहर कह दीं। और आज उसी का फल… सबने आपके बारे में, नितिन के बारे में, हमारे घर के बारे में…।”

सरला ने मीरा के बाल सहलाए।
“बेटा, दुनिया बातों से घर नहीं बनाती, घर रिश्तों से बनता है। लेकिन हाँ—इतना याद रखो, दुख कहना गलत नहीं है। मगर सही जगह, सही इंसान के सामने। वरना दुख भी तमाशा बन जाता है।”

मीरा ने सिर हिलाया। “आज पहली बार महसूस हुआ कि लोग मेरी हिम्मत नहीं देख रहे थे… मेरी कमजोरी का मज़ा ले रहे थे। और मैं खुद ही उन्हें मौका दे रही थी।”

सरला ने धीरे से कहा, “तो अब क्या करोगी?”

मीरा ने आंसू पोंछे, आवाज़ में दृढ़ता लाई, “अब मैं शिकायत नहीं पालूँगी… समाधान पालूँगी। कुछ परेशानी होगी तो सीधे आपसे और नितिन से बात करूँगी। और अगर कोई मेरे ससुराल के बारे में ताना मारे, तो मैं चुप नहीं रहूँगी… लेकिन झगड़ा भी नहीं करूँगी। मैं बस सच कहूँगी—कि मेरा घर मेरा है। उसे समझना हमारा काम है, दुनिया का नहीं।”

उसी समय नितिन भी ऑफिस से लौट आया। उसने मीरा की आँखें देखीं तो चौंक गया, “क्या हुआ?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा, फिर धीमे से बोली, “आज मुझे अपनी गलती समझ आ गई। मैं अब अपने रिश्तों को लोगों की जुबान पर नहीं चढ़ने दूँगी।”

नितिन ने राहत से साँस ली और कहा, “देखो मीरा… लोग वही सुनते हैं जो उन्हें मसाला लगे। और अगर मसाला तुम्हारे घर का हो, तो वे और भी चाव से खाते हैं। इसलिए अपने घर का स्वाद घर में ही रहने दो।”

मीरा ने हल्की-सी मुस्कान दी। सरला ने खाना परोस दिया।
पहली बार मीरा ने उस रोटी में सिर्फ आटा नहीं, एक नई शुरुआत का सुकून महसूस किया।

और उसी रात उसने मन ही मन तय किया—
दुख को दहलीज़ पर नहीं, दिल के अंदर जगह दूँगी।
क्योंकि दहलीज़ पर रखी हर बात… किसी न किसी को तमाशा बन जाती है।

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