गैराज का जंग लगा शटर जब ऊपर उठता, तो एक अजीब सी चरमराहट होती थी, मानो कोई पुराना जोड़ दर्द से कराह रहा हो। लेकिन दीनानाथ जी के लिए यह आवाज़ किसी संगीत से कम नहीं थी। शटर खुलते ही सामने खड़ी थी—‘नीलम’। उनकी 1984 मॉडल की प्रीमियर पद्मिनी फिएट। कभी उसका रंग गहरा आसमानी नीला हुआ करता था, जो अब वक्त की मार और धूल की परतों के नीचे दबकर मटमैला हो चुका था। बोनट पर जंग के निशान थे, बंपर एक तरफ से झुका हुआ था और पिछले पहिये की हवा बरसों पहले निकल चुकी थी।
दीनानाथ जी ने अपनी धोती का एक कोना कमर में खोंसा और हाथ में बाल्टी-मग लेकर ‘नीलम’ को नहलाने की तैयारी करने लगे। पिछले दस सालों से यह गाड़ी एक इंच भी नहीं हिली थी, लेकिन दीनानाथ जी का नियम अटूट था। हर रविवार उसे धोना, पोंछना और स्टेयरिंग पर हाथ फेरना।
"पापा! आप फिर शुरू हो गए?" पीछे से एक भारी और झुंझलाहट भरी आवाज़ आई।
दीनानाथ जी ने मुड़कर नहीं देखा। उन्हें पता था यह उनका बेटा समीर है। समीर, जो शहर की एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था और जिसके पास वक्त की हमेशा कमी रहती थी।
"समीर, आज रविवार है। नीलम को साफ़ करने का दिन," दीनानाथ जी ने इत्मीनान से कहा और गीला कपड़ा बोनट पर मारने लगे।
समीर गैराज के अंदर आया, नाक पर रुमाल रखते हुए। "पापा, प्लीज़। अब बहुत हो गया। मैंने आपसे पिछले महीने भी कहा था। मेरी नई एसयूवी (SUV) की डिलीवरी अगले हफ्ते आ रही है। मुझे यह गैराज खाली चाहिए। यह खटारा अब कबाड़ के भाव भी मुश्किल से जाएगी, लेकिन मैंने एक डीलर से बात कर ली है। वो कल इसे टो (tow) करके ले जाएगा।"
दीनानाथ जी का हाथ रुक गया। पानी की बूंदें बोनट से टपक कर ज़मीन पर गिर रही थीं। उन्होंने धीरे से मुड़कर समीर की आँखों में देखा। उन बूढ़ी आँखों में गुस्सा नहीं, एक अजीब सी बेबसी थी।
"यह खटारा नहीं है समीर। यह नीलम है। मेरी पहली कमाई, मेरी पहली जीत," दीनानाथ जी की आवाज़ में कंपन था।
"पापा, इमोशन से गाड़ियाँ नहीं चलतीं," समीर ने अपनी कलाई घड़ी देखते हुए कहा। "यह जगह घेर रही है। नई गाड़ी बीस लाख की है, उसे मैं सड़क पर पार्क नहीं कर सकता। और यह? इसका इंजन सीज़ हो चुका है, पार्ट्स मिलते नहीं हैं। यह सिर्फ़ लोहे का ढेर है। प्रैक्टिकल बनिए। माँ को गए हुए पांच साल हो गए, अब उन पुरानी यादों को ढोने का क्या मतलब?"
'माँ' का ज़िक्र आते ही दीनानाथ जी का चेहरा सख़्त हो गया। "तुझे क्या पता तेरी माँ और इस गाड़ी का क्या रिश्ता था? जब तुझे निमोनिया हुआ था और तू सांस नहीं ले पा रहा था, आधी रात को यही गाड़ी थी जो आंधी-तूफ़ान में हमें अस्पताल ले गई थी। जब तेरी पहली नौकरी लगी थी, तो इसी गाड़ी से हम तुझे स्टेशन छोड़ने गए थे। यह लोहे का ढेर नहीं, इस घर का सदस्य है।"
समीर ने सिर हिलाया। उसे लगा पिता जी की उम्र हो गई है, सठिया गए हैं। "पापा, बहस करने का वक्त नहीं है। कल सुबह 10 बजे टो-ट्रक आएगा। आप बस चाबी तैयार रखियेगा, अगर कहीं बची हो तो।" समीर यह कहकर तेज़ी से घर के अंदर चला गया।
दीनानाथ जी वहीं गैराज में खड़े रह गए। उनकी नज़र नीलम की धुंधली विंडशील्ड पर पड़ी। उन्हें उसमें अपना अक्स नहीं, बल्कि अपनी पत्नी सुधा का मुस्कुराता हुआ चेहरा नज़र आया।
उस रात दीनानाथ जी ने खाना नहीं खाया। समीर और उसकी पत्नी, राधिका, डाइनिंग टेबल पर फुसफुसा रहे थे।
"पापा ज़िद्दी हो गए हैं राधिका। उन्हें समझ नहीं आता कि मॉडर्न लाइफस्टाइल में इस कबाड़ की कोई जगह नहीं है। सोसायटी वाले भी मज़ाक उड़ाते हैं," समीर कह रहा था।
राधिका ने समझाया, "समीर, उन्हें थोड़ा वक्त दो। वो गाड़ी उनके लिए सिर्फ़ मशीन नहीं है।"
"वक्त ही तो नहीं है। नई गाड़ी आ रही है, उसे रखूँ कहाँ?"
अगली सुबह का सूरज दीनानाथ जी के लिए किसी ग्रहण जैसा था। सुबह के 9 बज चुके थे। गैराज का शटर आज खुला नहीं था। समीर तैयार होकर नीचे आया। उसे लगा पापा मान गए होंगे।
ठीक 10 बजे एक बड़ा टो-ट्रक घर के बाहर आकर रुका। कबाड़ी वाला और दो मज़दूर अंदर आए।
"साहब, वो फिएट उठानी है?" कबाड़ी वाले ने पूछा।
"हाँ, गैराज में है," समीर ने इशारा किया।
समीर आगे बढ़ा और गैराज का शटर ऊपर उठाया। जैसे ही शटर उठा, अंदर का नज़ारा देखकर समीर और कबाड़ी वाला, दोनों ठिठक गए।
दीनानाथ जी ड्राइवर सीट पर बैठे थे। उन्होंने अपना पुराना वाला कोट पहन रखा था, जो वे अक्सर ड्राइव करते वक्त पहनते थे। बगल वाली सीट पर सुधा की एक बड़ी तस्वीर रखी थी। दीनानाथ जी ने दोनों हाथों से स्टेयरिंग व्हील को जकड़ रखा था, मानो कोई तूफ़ान उन्हें उखाड़ने की कोशिश कर रहा हो।
"पापा, यह क्या बचपना है? बाहर निकलिए," समीर चिल्लाया।
दीनानाथ जी ने कांच चढ़ा लिए और दरवाज़े अंदर से लॉक कर लिए। उन्होंने इशारे से मना कर दिया। उनकी आँखों में एक दृढ़ निश्चय था—अगर यह गाड़ी जाएगी, तो मैं भी इसके साथ जाऊंगा।
"साहब, यह तो लफड़ा है। बूढ़े बाबा अंदर हैं, हम कैसे उठाएं?" कबाड़ी वाले ने हाथ खड़े कर दिए।
समीर को गुस्सा आ गया। वह खिड़की पीटने लगा। "पापा, ज़िद मत कीजिये। तमाशा बन रहा है। लोग देख रहे हैं।"
दीनानाथ जी टस से मस नहीं हुए। वे बस सामने दीवार को घूर रहे थे, और उनके होंठ हिल रहे थे, जैसे वे किसी से बातें कर रहे हों। शायद सुधा से।
राधिका भी दौड़कर आ गई। "पापा जी, प्लीज़ बाहर आ जाइये। आपकी तबीयत ख़राब हो जाएगी, अंदर गर्मी है।"
लेकिन दीनानाथ जी ने नहीं सुना।
समीर ने गुस्से में पैर पटका और गैराज के कोने में पड़े पुराने टूलबॉक्स को लात मारी। टूलबॉक्स गिर गया और उसमें से जंग लगे पेंच और औज़ारों के साथ एक पुरानी, डायरी जैसी चीज़ बाहर निकल कर फ़र्श पर गिर गई।
समीर की नज़र उस पर पड़ी। वह एक 'लॉग-बुक' (Logbook) थी। पुराने ज़माने में लोग गाड़ी की सर्विस और पेट्रोल का हिसाब रखने के लिए डायरी रखते थे। समीर ने न चाहते हुए भी उसे उठा लिया। पन्ने पीले पड़ चुके थे।
उसने डायरी खोली।
पहली एंट्री: 12 जनवरी 1984. आज नीलम घर आई। सुधा बहुत खुश है। उसने कहा इसका रंग आसमान जैसा है। हमने तय किया है कि इसमें पहली सवारी समीर को स्कूल छोड़ने की होगी।
समीर का हाथ रुका। उसने पन्ना पलटा।
15 जून 1990. आज बहुत बारिश थी। समीर का दसवीं का रिजल्ट आया। वो फर्स्ट डिवीज़न पास हुआ। हम सब नीलम में बैठकर आइसक्रीम खाने इंडिया गेट गए। सुधा ने कहा कि यह गाड़ी हमारे बेटे की किस्मत की सवारी है।
समीर की आँखों के सामने धुंधलापन आने लगा। वह तेज़ी से पन्ने पलटने लगा।
20 अगस्त 1998. समीर को इंजीनियरिंग कॉलेज छोड़ने जा रहे हैं। नीलम का रेडिएटर बार-बार गर्म हो रहा है, लेकिन इसने हार नहीं मानी। शायद इसे भी पता है कि इसका मालिक एक बड़ा अफ़सर बनने जा रहा है। सुधा पीछे की सीट पर बैठकर छुपकर रो रही है, बेटा पहली बार घर से दूर जा रहा है।
और फिर एक पन्ना, जिस पर लिखावट थोड़ी कांपी हुई थी।
5 मार्च 2018. सुधा आज चली गई। अस्पताल ले जाते वक्त उसने इसी सीट पर मेरा हाथ पकड़कर कहा था—'दीनानाथ, मुझे डर लग रहा है, गाड़ी तेज़ मत चलाना।' मैं उसे बचा नहीं सका। लेकिन जब तक यह गाड़ी है, मुझे लगता है सुधा मेरे बगल में बैठी है। मैं इसे कभी नहीं बेचूंगा। यह गाड़ी नहीं, मेरी सुधा की आखिरी सांसें इसमें बसी हैं।
समीर के हाथ से डायरी छूटकर गिर गई। उसे लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर भारी पत्थर रख दिया हो। वह जिस चीज़ को 'लोहे का ढेर' और 'कबाड़' समझ रहा था, वह दरअसल उसके पिता का 'ताजमहल' थी। यह गाड़ी उनके प्रेम, उनके संघर्ष और उनके जीवन के सफ़र की गवाह थी। उसने महसूस किया कि वह सिर्फ़ एक गाड़ी को गैराज से बाहर नहीं निकाल रहा था, बल्कि अपने पिता के जीवन के आखिरी सहारे को उनसे छीन रहा था।
समीर ने गैराज की खिड़की के अंदर देखा। दीनानाथ जी का सिर स्टेयरिंग पर झुका हुआ था। उनके कंधे हिल रहे थे। वे रो रहे थे। एक पिता, जो अपने बेटे के सामने कभी कमज़ोर नहीं पड़ा, आज एक निर्जीव वस्तु के लिए बच्चों की तरह रो रहा था।
समीर की आँखों से आंसू बह निकले। उसने कबाड़ी वाले की तरफ देखा जो टो-चेन (tow chain) लेकर खड़ा था।
"जाओ यहाँ से," समीर ने भर्राई हुई आवाज़ में कहा।
"क्या साहब?"
"मैंने कहा जाओ! यह गाड़ी नहीं बिकेगी। कभी नहीं बिकेगी," समीर चिल्लाया और अपनी जेब से कुछ नोट निकालकर कबाड़ी वाले के हाथ में थमा दिए। "यह तुम्हारा हर्जाना। अब दफ़ा हो जाओ।"
कबाड़ी वाला हैरान होकर चला गया।
समीर ने कार की खिड़की पर दस्तक दी। "पापा... पापा दरवाज़ा खोलिये।"
दीनानाथ जी ने धीरे से सिर उठाया। उन्होंने देखा कि टो-ट्रक जा रहा है। उन्होंने कांपते हाथों से लॉक खोला।
समीर ने दरवाज़ा खोला और घुटनों के बल बैठकर अपने पिता के पैरों में गिर पड़ा। "मुझे माफ़ कर दीजिये पापा। मैं अंधा हो गया था। मुझे लगा मैं तरक्की कर रहा हूँ, लेकिन मैं अपनी जड़ें काट रहा था।"
दीनानाथ जी ने बेटे के सिर पर हाथ रखा। वे कुछ बोल नहीं पाए, बस उनकी आँखों से बहते आंसुओं ने सब कह दिया।
"यह गाड़ी कहीं नहीं जाएगी पापा," समीर ने उठकर कहा। "यहीं रहेगी। इसी गैराज में।"
"लेकिन तेरी नई गाड़ी?" दीनानाथ जी ने मासूमियत से पूछा। "बीस लाख की गाड़ी सड़क पर खड़ी होगी तो ख़राब हो जाएगी।"
समीर मुस्कुराया, आंसुओं के बीच। "पापा, घर के बगल वाली खाली ज़मीन मिस्टर गुप्ता की है न? मैंने उनसे बात की थी, वो किराए पर देने को तैयार हैं। मैं वहां शेड डलवा लूंगा। मेरी एसयूवी वहां खड़ी होगी। यह गैराज 'नीलम' का घर है, और यह उसी का रहेगा।"
उस शाम, घर का माहौल बदला हुआ था। गैराज से आती खट-पट की आवाज़ फिर सुनाई दे रही थी। लेकिन इस बार दीनानाथ जी अकेले नहीं थे। समीर भी अपनी आस्तीनें चढ़ाकर, हाथ में ग्रीस लगाए, अपने पिता के साथ 'नीलम' का एक पुराना टायर बदलने की कोशिश कर रहा था।
राधिका चाय लेकर आई और दोनों बाप-बेटे को देखकर मुस्कुरा दी।
"पापा," समीर ने रिंच (wrench) घुमाते हुए कहा, "मैंने एक विंटेज कार रिस्टोर करने वाले मैकेनिक का पता लगाया है। अगले महीने तक हम नीलम का इंजन ठीक करवा देंगे। फिर हम सब इसमें बैठकर इंडिया गेट आइसक्रीम खाने जाएंगे। ठीक है?"
दीनानाथ जी ने बेटे की तरफ देखा। उनके चेहरे पर सालों बाद एक निश्चिंत मुस्कान थी। उन्होंने बोनट पर हाथ फेरा और धीरे से बोले, "सुधा सुन रही हो? हमारा बेटा बड़ा हो गया है। आज उसने समझदारी की बात की है।"
उस दिन समीर ने सिर्फ़ एक पुरानी गाड़ी को नहीं बचाया था, उसने अपने पिता के अकेलेपन को बांट लिया था। उसने समझ लिया था कि नई चीज़ें बाज़ार से खरीदी जा सकती हैं, लेकिन जो चीज़ें यादों और भावनाओं से जुड़ी होती हैं, उनकी कोई कीमत नहीं होती। वे अनमोल होती हैं।
'नीलम' आज भी उसी गैराज में शान से खड़ी है। अब वह धूल से ढकी नहीं रहती, बल्कि चमकती है। क्योंकि अब उसे साफ़ करने वाले दो हाथ नहीं, चार हाथ हैं। और जब भी गैराज का शटर उठता है, तो पड़ोसियों को जंग लगी चरमराहट नहीं, बल्कि एक परिवार के खिलखिलाने की आवाज़ सुनाई देती है।
समाप्ति
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