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वक़्त का पहिया

 दीवार घड़ी ने रात के बारह बजाए, तो शहर के सबसे पॉश इलाके में बने 'सिंघानिया विला' में जश्न का शोर और तेज हो गया। यह विक्रम सिंघानिया के 'बिज़नेस टाइकून ऑफ द ईयर' बनने की खुशी थी। शैम्पेन की बोतलें खुल रही थीं और शहर के नामचीन लोग विक्रम की झूठी तारीफों के पुल बांध रहे थे। विक्रम, जिसकी उम्र पैंतालीस के करीब थी, अपने महंगे इटालियन सूट में किसी राजा की तरह खड़ा था। उसके चेहरे पर सफलता की चमक कम और अहंकार की कठोरता ज्यादा थी।

पार्टी के एक कोने में, एक बुजुर्ग वेटर से गलती से जूस का एक गिलास विक्रम के कीमती कालीन पर गिर गया। विक्रम की हंसी अचानक रुक गई। उसने आव देखा न ताव, भरी महफिल में उस बुजुर्ग वेटर के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया।

"दो कौड़ी की औकात नहीं और नुकसान हजारों का करते हो! इसे धक्के मारकर बाहर निकालो," विक्रम ने गुर्राते हुए अपने सुरक्षाकर्मियों को आदेश दिया। बुजुर्ग वेटर हाथ जोड़ता रहा, गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन विक्रम के दिल में दया की एक बूंद भी नहीं थी। उसकी पत्नी, मालती ने उसे शांत करने की कोशिश की, "विक्रम, जाने दीजिए, गरीब है।"

"गरीब है इसीलिए तो गलती की सजा मिलनी चाहिए, ताकि अपनी हद में रहे," विक्रम ने हिकारत से कहा और दोबारा अपनी ड्रिंक थाम ली। वह भूल गया था कि दुआएं और बद्दुआएं, दोनों में बहुत ताकत होती है और वक्त की अदालत में फाइल कभी बंद नहीं होती।

यह विक्रम का असली चेहरा था। दस साल पहले तक कहानी ऐसी नहीं थी। विक्रम और उसका छोटा भाई, राघव, दोनों अपने पिता की छोटी सी कपड़े की मिल में काम करते थे। पिता के गुजरने के बाद विक्रम ने व्यापार की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी। राघव सीधा-सादा और संतोषी स्वभाव का था, जबकि विक्रम की आंखों में बेशुमार दौलत की भूख थी।

वह मनहूस दिन आज भी राघव को याद था जब विक्रम ने घर का बंटवारा किया था।

"देख राघव, व्यापार में घाटा बहुत है और मुझे इसे बढ़ाने के लिए पूंजी चाहिए। पिता जी का यह पुराना पुश्तैनी मकान और शहर वाली मिल मैं रख रहा हूँ। बदले में तुझे गाँव वाली जमीन और वहां का पुराना बाड़ा दे रहा हूँ," विक्रम ने वकीलों के सामने चालाकी से कागज तैयार करवाए थे।

राघव जानता था कि गाँव वाली जमीन बंजर थी और बाड़ा खंडर हो चुका था, जबकि शहर की मिल करोड़ों की थी।

"भैया, यह बंटवारा नहीं, यह तो धोखा है। मैं अपने परिवार के साथ उस खंडर में कैसे रहूँगा?" राघव ने नम आँखों से पूछा था।

विक्रम ने तब हंसते हुए कहा था, "तू तो हमेशा से कम अक्ल था राघव। व्यापार और रिश्ते अलग होते हैं। अगर तुझे यह मंजूर नहीं, तो सड़क पर रहने का शौक पूरा कर ले। मेरे पास तेरे लिए वक्त नहीं है।"

उस दिन राघव अपनी पत्नी सुधा और पांच साल के बेटे को लेकर खाली हाथ उस आलीशान घर से निकला था। विक्रम ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। उसे लगा कि उसने एक बोझ सिर से उतार दिया है। उसे क्या पता था कि उसने बोझ नहीं, बल्कि अपने जीवन का 'सुरक्षा कवच' खो दिया है।

अगले पांच साल विक्रम के लिए सुनहरे रहे। उसने मिल को एक बड़े टेक्सटाइल एम्पायर में बदल दिया। पैसा पानी की तरह बरस रहा था। उसने पुराने दोस्तों को छोड़ दिया, रिश्तेदारों का फोन उठाना बंद कर दिया और गरीब लोगों को कीड़े-मकोड़े समझना शुरू कर दिया। उसका अहंकार इतना बढ़ गया था कि वह मानता था कि सूरज भी उसकी मर्जी से उगता है।

दूसरी तरफ, राघव का जीवन संघर्ष की आग में तप रहा था। गाँव का वह खंडर रहने लायक नहीं था। छत टपकती थी और दीवारों में दरारें थीं। लेकिन राघव ने हार नहीं मानी। उसने और सुधा ने मिलकर दिन-रात मेहनत की। उस बंजर जमीन पर उन्होंने पसीना बहाया। राघव ने कर्ज लेकर 'ऑर्गेनिक खेती' शुरू की। शुरू में फसलें बर्बाद हुईं, लोग हंसे, "शहर का बाबू अब किसान बनेगा।"

लेकिन राघव के पास सब्र था और नीयत साफ़ थी। धीरे-धीरे, उसकी मेहनत रंग लाने लगी। जिस जमीन को विक्रम ने बेकार समझकर फेंका था, वही जमीन सोना उगलने लगी। राघव ने गाँव के लोगों को साथ जोड़ा, एक सहकारी समिति बनाई और देखते ही देखते उनका छोटा सा बाड़ा एक सफल एग्रो-फार्म में बदल गया। राघव के पास बेशुमार दौलत तो नहीं थी, लेकिन रात को सुकून की नींद और समाज का सम्मान जरूर था।

वक्त का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। कहते हैं, जब पाप का घड़ा भर जाता है, तो उसे फूटने में देर नहीं लगती।

विक्रम की सफलता ने उसे लापरवाह बना दिया था। उसने ज्यादा मुनाफे के लालच में गैर-कानूनी तरीके से कच्चा माल आयात करना शुरू कर दिया और टैक्स की बड़ी चोरी की। उसके आसपास अब सिर्फ मतलबी लोगों का जमावड़ा था जो उसकी जी-हुजूरी करते थे।

एक दिन अचानक इनकम टैक्स और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापे पड़े। विक्रम का पूरा साम्राज्य हिल गया। खबर आग की तरह फैली। उसके शेयर रातों-रात गिर गए। बैंक वालों ने कर्ज वसूली के लिए उसकी संपत्ति जब्त करनी शुरू कर दी। जिन "दोस्तों" को वह महंगी पार्टियां देता था, उन्होंने उसके फोन उठाने बंद कर दिए।

मुसीबत यहीं खत्म नहीं हुई। तनाव के कारण विक्रम को ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उसका आधा शरीर लकवाग्रस्त हो गया। वह अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा छत को घूरता रहता। इलाज महंगा था और उसके खाते सील हो चुके थे। उसकी पत्नी मालती जेवर बेचकर इलाज करवा रही थी, लेकिन वह पैसा भी खत्म होने की कगार पर था।

एक दिन डॉक्टर ने मालती से कहा, "मिसेज सिंघानिया, इनका ऑपरेशन बहुत जरूरी है और इसमें कम से कम पंद्रह लाख का खर्चा आएगा। आपको कल तक पैसे जमा करवाने होंगे, वरना हम कुछ नहीं कर पाएंगे।"

मालती के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह उन सभी दोस्तों के पास गई जो कभी विक्रम के साथ शामें रंगीन करते थे। किसी ने बहाना बनाया, तो किसी ने साफ मुंह पर दरवाजा बंद कर दिया। "अहंकारी विक्रम की मदद कौन करेगा?"—यही जवाब हर जगह से मिला।

थक-हारकर मालती अस्पताल की बेंच पर बैठकर रो रही थी। तभी उसे राघव की याद आई। विक्रम ने उसे कसम दी थी कि वह कभी राघव से संपर्क नहीं करेगी, लेकिन आज सवाल जिंदगी और मौत का था। कांपते हाथों से उसने राघव का पुराना नंबर डायल किया, यह सोचते हुए कि शायद वह नंबर बदल चुका होगा या वह फोन नहीं उठाएगा।

"हेलो?" दूसरी तरफ से एक शांत और भारी आवाज आई।

"राघव... मैं... मैं मालती भाभी," वह फूट-फूट कर रो पड़ी।

राघव ने जब पूरी बात सुनी, तो एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। उसे विक्रम के वो कड़वे शब्द याद आए—'तेरी औकात नहीं है'। उसे वह रात याद आई जब उसे घर से निकाला गया था।

"भाभी, आप चिंता मत कीजिये। मैं आ रहा हूँ," राघव ने बस इतना कहा।

अगली सुबह जब डॉक्टर राउंड पर आए, तो उन्होंने बताया कि बिल का भुगतान हो चुका है और विक्रम का ऑपरेशन शुरू होने वाला है। मालती हैरान थी।

ऑपरेशन सफल रहा। तीन दिन बाद जब विक्रम को होश आया, तो उसने खुद को जनरल वार्ड में पाया। प्राइवेट सुइट के पैसे नहीं बचे थे। उसकी नजर सामने कुर्सी पर बैठे एक शख्स पर पड़ी। साधारण कुर्ता-पजामा, चेहरे पर सौम्यता और आँखों में वही पुराना अपनापन।

वह राघव था।

विक्रम की आँखों से आँसू बह निकले। उसका गला रंध गया। वह कुछ बोलना चाहता था, पर शब्द नहीं निकले। जिस भाई को उसने 'कचरा' समझकर फेंक दिया था, आज वही उसकी साँसों की डोर थामे खड़ा था।

"राघव..." विक्रम ने टूटी हुई आवाज में कहा, "तू? यहाँ? मैंने तेरे साथ क्या नहीं किया... और तू..."

राघव ने आगे बढ़कर विक्रम का हाथ थाम लिया। "भैया, आपने जो किया वो आपका कर्म था, और मैं जो कर रहा हूँ, वो मेरा धर्म है। बाबूजी कहते थे कि खून के रिश्ते कागजों के बंटवारे से खत्म नहीं होते।"

विक्रम का अहंकार आंसुओं के साथ बह गया। उसने देखा कि राघव के साथ गाँव के कई लोग आए थे जो उसके लिए फल और खाना लाए थे। वही लोग जिन्हें विक्रम तुच्छ समझता था।

राघव ने बताया, "भैया, मैंने शहर वाला घर तो नहीं बचाया जा सका, वह बैंक ने ले लिया। लेकिन गाँव वाला घर अब खंडर नहीं है। हम सब वहां खुश हैं। जैसे ही आप ठीक होंगे, हम आपको अपने साथ ले चलेंगे। वहां की हवा में सुकून है, आपकी तबीयत जल्दी ठीक हो जाएगी।"

विक्रम को याद आया अपना वह आलीशान विला, जहाँ संगमरमर के फर्श तो थे पर सुकून नहीं था। और आज, जब उसके पास कुछ नहीं बचा, तब उसे समझ आया कि असली दौलत बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि वे रिश्ते हैं जो बुरे वक्त में साये की तरह साथ खड़े रहते हैं।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद, विक्रम व्हीलचेयर पर था। राघव उसे अपनी गाड़ी में बैठाकर गाँव ले जा रहा था। शहर की गगनचुंबी इमारतें पीछे छूट रही थीं। विक्रम ने खिड़की से बाहर देखा। उसे सड़क किनारे एक पुराना पेड़ दिखाई दिया जो आंधी में झुक गया था, लेकिन टूटा नहीं था क्योंकि उसकी जड़ें गहरी थीं।

उसे अपनी गलती का अहसास हो चुका था। उसने पूरी जिंदगी अहंकार की इमारत बनाने में लगा दी, जिसकी नींव रेत की थी। जबकि राघव ने प्रेम और त्याग की नींव पर जो घर बनाया, वह हर तूफ़ान में अडिग खड़ा था।

गाँव पहुँचकर, विक्रम ने देखा कि जिस जमीन को उसने 'बंजर' कहा था, वह हरी-भरी फसलों से लहलहा रही थी। घर आंगन में तुलसी का पौधा था और गाय रंभा रही थी। राघव के बच्चों ने आकर विक्रम के पैर छुए। उस सम्मान और प्यार ने विक्रम के अंदर के उस 'बिजनेसमैन' को मार दिया और एक 'इंसान' को जन्म दिया।

शाम को बरामदे में बैठे हुए विक्रम ने राघव से कहा, "राघव, मैं पूरी जिंदगी दौड़ता रहा, लोगों को कुचलता रहा, यह सोचकर कि मैं सबसे ऊपर पहुँच जाऊँगा। पर आज जब नीचे गिरा हूँ, तो समझ आया कि जो लोग जमीन से जुड़े होते हैं, वही गिरते हुए को थाम सकते हैं। मैंने तुझे दर्द दिया, और तूने मुझे जीवन। मुझे माफ़ कर दे।"

राघव ने मुस्कुराते हुए कहा, "भैया, माफ़ी मांगकर मुझे छोटा मत कीजिये। वक्त सबका हिसाब रखता है। बस, अब जो वक्त बचा है, उसे हम साथ मिलकर जिएंगे। कोई गिला-शिकवा नहीं।"

विक्रम की आँखों में आज पश्चाताप के आंसू थे, लेकिन दिल में एक अजीब सा हल्कापन था। उसे समझ आ गया था कि जिंदगी में हालात बदलते देर नहीं लगती। जो कल राजा था, वो आज मोहताज हो सकता है, और जिसे कल फकीर समझा गया, वो आज दाता बन सकता है।

उस रात विक्रम को बरसों बाद गहरी नींद आई। उस कच्चे मकान की खाट पर उसे वह चैन मिला, जो करोड़ों के गद्दे पर कभी नसीब नहीं हुआ था। उसने सीख लिया था कि किसी का दिल दुखाकर कमाया गया सुख ज्यादा दिन नहीं टिकता, और अहंकार चाहे कितना भी बड़ा हो, वक्त की एक ठोकर उसे चकनाचूर कर देती है।

दोस्तो वक्त बहुत बलवान होता है। वह न दौलत देखता है, न रुतबा। वह देखता है तो बस आपके कर्म। इसलिए जब आपका वक्त अच्छा हो, तो सरल बने रहें, और जब वक्त बुरा हो, तो धैर्य रखें। क्योंकि अंत में हमारे पास वही लौटकर आता है, जो हमने दुनिया को दिया होता है।


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