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त्याग की दहलीज

 शहर की ऊँची इमारत के सातवें फ्लोर पर बने उस आलीशान फ्लैट में आज शांति नहीं, बल्कि शब्दों की एक ऐसी जंग छिड़ी थी जिसने रिश्तों की मर्यादा को तार-तार कर दिया था। सोफे के एक कोने पर बैठी 65 वर्षीय रमा देवी की सांसें तेज चल रही थीं। उनके हाथ में पकड़ा हुआ पंप उनकी घबराहट के साथ कांप रहा था। दमे की पुरानी बीमारी ने उन्हें वैसे ही शारीरिक रूप से कमजोर कर दिया था, लेकिन आज उनके कान जो सुन रहे थे, उसने उन्हें मानसिक रूप से भी तोड़ दिया।

सामने खड़े विवान और उनकी पत्नी नेहा के बीच बहस अपने चरम पर थी। नेहा का चेहरा गुस्से से लाल था। उसने तीखे स्वर में कहा, "विवान, मैं अब और नहीं कर सकती। सुबह बच्चों को स्कूल तैयार करके भेजो, फिर ऑफिस की मीटिंग्स अटेंड करो, और शाम को वापस आकर घर के कामों के साथ-साथ तुम्हारी माँ की इस बीमारी को संभालो। आखिर मैं इंसान हूँ या मशीन? मैं आपके बच्चों की देखभाल करूँ या आपकी दमे की मरीज... माँ की?"

ये शब्द किसी धारदार चाकू की तरह हवा को चीरते हुए रमा देवी के सीने में जा लगे। विवान बेबस खड़ा था। उसे अपनी पत्नी की मेहनत भी दिख रही थी और माँ की ममता भी। उसने दबी आवाज में कहा, "नेहा, माँ बीमार हैं। उन्हें इस वक्त हमारी जरूरत है। बच्चे बड़े हो रहे हैं, वो समझ जाएंगे, पर माँ..."

"नहीं विवान!" नेहा ने बात काटते हुए कहा, "बच्चे नहीं समझेंगे। उनकी परवरिश खराब हो रही है क्योंकि मेरा सारा ध्यान इस कमरे की खांसी और दवाइयों की गंध में अटका रहता है। तुम्हें फैसला करना होगा।"

रमा देवी ने अपनी धुंधली आँखों से अपने बेटे की ओर देखा। विवान वही लड़का था जिसे उन्होंने अपनी गोद में पालकर बड़ा किया था। जब विवान के पिता का देहांत हुआ था, तब रमा देवी ने सिलाई कर-करके उसे शहर के सबसे बड़े स्कूल में पढ़ाया था। आज वही विवान सिर झुकाए खड़ा था। रमा देवी को महसूस हुआ कि उनकी मौजूदगी इस घर की खुशियों के बीच एक बड़ी बाधा बन गई है।

उस रात घर में सन्नाटा पसरा रहा। रसोई में बर्तन गिरने की आवाज नहीं आई, न ही बच्चों के हंसने की। अगले दिन सुबह, जब नेहा चाय लेकर रमा देवी के कमरे में गई, तो कमरा खाली था। बिस्तर करीने से लगा हुआ था और खिड़की खुली थी। मेज पर एक छोटा सा कागज का टुकड़ा रखा था, जिस पर टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट में कुछ शब्द दर्ज थे।

नेहा ने उसे पढ़ना शुरू किया:

"बेटा विवान और बहू नेहा, कल रात तुम दोनों की बातें सुनकर मुझे एहसास हुआ कि मैं इस घर का हिस्सा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी बन गई हूँ। नेहा, तुम गलत नहीं हो। एक माँ और एक पत्नी के बीच तालमेल बिठाना मुश्किल होता है। मैं नहीं चाहती कि मेरे पोते-पोतियों का बचपन मेरी बीमारी के साये में गुजरे। मैं पुराने घर (गाँव) जा रही हूँ। वहाँ शुद्ध हवा है, शायद मेरा दमा वहाँ कुछ कम हो जाए। विवान, अपना ख्याल रखना और बच्चों को कहना कि दादी उन्हें बहुत प्यार करती है।"

जैसे ही नेहा ने यह पढ़ा, उसके अंदर की स्त्री जाग उठी। उसे अपनी कही गई कड़वी बातें याद आने लगीं। "दमे की मरीज माँ..." ये शब्द उसे अब खुद को ही चुभने लगे थे। विवान जब कमरे में आया और उसने वह खत देखा, तो उसकी आँखों से आंसू छलक पड़े।

"नेहा, माँ चली गई। हमने उन्हें निकाल दिया," विवान की आवाज टूट रही थी।

लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई। उस दोपहर जब विवान और नेहा बदहवास होकर बस स्टैंड की तरफ भाग रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि रमा देवी बस स्टैंड के बेंच पर नहीं, बल्कि पास के एक पार्क में बैठी थीं। उनके पास एक छोटा बच्चा रो रहा था जिसकी माँ शायद पास ही कहीं काम कर रही थी। रमा देवी अपनी दमे की तकलीफ भूलकर उस बच्चे को चुप कराने की कोशिश कर रही थीं।

नेहा दौड़कर उनके पैरों में गिर पड़ी। "माँ, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने जो कहा वो मेरा अहंकार था, मेरा प्यार नहीं। बच्चों को संस्कार आपकी कहानियों से मिलते हैं, मेरी डांट से नहीं। चलिए घर वापस।"

रमा देवी की आँखों में फिर से वही चमक लौट आई। उन्होंने नेहा को उठाकर गले लगा लिया। उस दिन विवान के घर में एक नया नियम बना। अब काम बाँटा नहीं गया, बल्कि जिम्मेदारियों को प्यार से ओढ़ा गया। नेहा ने समझा कि बुजुर्ग घर की नींव होते हैं, और नींव अगर कमजोर पड़ जाए तो पूरा घर ढह जाता है।

दमे की बीमारी तो शायद कभी पूरी तरह ठीक नहीं होती, लेकिन अपनों के प्यार की गर्माहट ने रमा देवी को जीने की एक नई ताकत दे दी थी। अब उस घर में दवाओं की गंध नहीं, बल्कि हंसी के ठहाकों की खुशबू महकती थी।


क्या आपको लगता है कि आज के आधुनिक युग में बुजुर्गों को केवल 'जिम्मेदारी' समझा जाने लगा है? क्या नेहा का गुस्सा जायज था या उसे धैर्य से काम लेना चाहिए था? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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