हर किसी की ज़िंदगी एक संगीत की तरह होती है… किसी की बांसुरी की मीठी धुन सी बहती हुई, किसी की सितार के तारों जैसी कसी हुई और सुरीली। मैं अपनी ज़िंदगी के सुरों को सुनती हूँ तो लगता है जैसे कोई पुराना, बेसुरा तानपूरा बज रहा हो—टूटा हुआ, बेताल, कानों में चुभता हुआ। एक ऐसा शोर जिसे मैं बंद करना चाहती हूँ, पर वो मेरे भीतर ही गूंजता रहता है। आज शाम यह शोर कुछ ज़्यादा ही तेज़ था। ऑफिस की फाइलों में सिर खपाने के बाद जब घर लौटी, तो सन्नाटा काटने को दौड़ रहा था।
“मीरा मैम… आपके लिए कुरियर आया है,” मेरी बिल्डिंग के गार्ड ने इंटरकॉम पर सूचना दी।
“भेज दीजिये,” मैंने बेमन से कहा।
पाँच मिनट बाद मेरे हाथ में एक खाकी रंग का लिफाफा था। उस पर भेजने वाले का नाम नहीं था, बस शहर का नाम लिखा था—‘बनारस’। बनारस… मेरे अतीत का वो शहर जहाँ की गलियों में मेरा बचपन खो गया था और जवानी कुम्हला गई थी। मेरे हाथ कांपने लगे। लिफाफा खोलते ही अंदर से एक चिट्ठी और एक पुरानी, फीकी पड़ चुकी तस्वीर गिरी। तस्वीर में एक दस साल की सांवली सी लड़की, एक बेहद खूबसूरत महिला के पैरों के पास बैठी थी। वो लड़की मैं थी, और वो महिला… मेरी माँ, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका, गायत्री देवी।
चिट्ठी बुआ जी की थी।
“मीरा, अगर तू यह पढ़ रही है, तो समझ ले कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है। भाभी की तबीयत बहुत खराब है। डॉक्टर ने जवाब दे दिया है। वो तुझे याद कर रही हैं। बार-बार तेरा नाम लेती हैं। अपनी ज़िद छोड़ और एक बार आ जा। हो सकता है यह आखिरी मौका हो। 10 तारीख को बनारस आ जा, मैं इंतज़ार करूँगी।”
चिट्ठी पढ़ते ही मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा। क्या मुझे जाना चाहिए? उस माँ के पास जिसने मुझे कभी बेटी नहीं, हमेशा अपनी ‘गलती’ समझा?
“मैम, आप ठीक तो हैं?” मेरी मेड, सुधा, ने पानी का गिलास बढ़ाते हुए पूछा।
“हाँ… सुधा, मेरा सूटकेस निकाल दो। मुझे कल बनारस जाना है।”
वह रात कयामत की रात थी। मैं बिस्तर पर करवटें बदल रही थी, लेकिन नींद कोसों दूर थी। यादों का एक सैलाब उमड़ पड़ा था।
मेरा और मेरी माँ का रिश्ता किसी सामान्य माँ-बेटी जैसा नहीं था। माँ अपनी सुंदरता और अपनी आवाज़ के अहंकार में जीती थीं। और मैं? मैं उनके लिए एक बदनुमा दाग थी। मैं न तो उनकी तरह गोरी थी, न ही मेरी आवाज़ में वो जादू था।
“तुमने मेरी कोख लजा दी, मीरा,” माँ अक्सर रियाज़ करते वक्त तानपूरा कसते हुए कहती थीं। “न रूप मिला, न गुण। किसके घर जाएगी तू? कौन ब्याहेगा तुझे?”
मैं सहम कर कोने में दुबक जाती। मुझे याद है वो दिन, जब स्कूल के वार्षिक उत्सव में मुझे कोरस में गाने के लिए चुना गया था। मैं दौड़ती हुई घर आई थी।
“माँ, मुझे स्कूल के फंक्शन में गाना है!”
माँ ने पलटकर मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया हो।
“तुम? गाओगी?” उन्होंने हिकारत से हँसते हुए कहा था। “रहने दे मीरा। क्यों जग हंसाई करवाती है? तेरी आवाज़ में वो खनक नहीं, वो कंकड़ जैसी चुभन है। चुप रहा कर।”
उस दिन मेरे अंदर का संगीत हमेशा के लिए मर गया था। मैंने गाना छोड़ दिया, बोलना कम कर दिया। मैं बस एक छाया बनकर रह गई थी उस विशाल हवेली में।
वक्त बीतता गया। मैं पढ़ाई में डूब गई क्योंकि वही एक रास्ता था उस नर्क से निकलने का। जिस दिन मेरी नौकरी मुंबई में लगी, माँ ने मुझे रोकने की कोशिश नहीं की।
“जा रही हो? जाओ। लेकिन याद रखना, इस दुनिया में सरवाइव करना आसान नहीं है। लौटकर मेरे पास ही आना पड़ेगा रोते हुए।”
मैंने अपना बैग उठाया और बिना पीछे मुड़े निकल आई। उस दिन के बाद पंद्रह साल बीत गए। मैंने अपनी अलग दुनिया बसाई। एक सफल आर्किटेक्ट बनी। लोग मेरी इज़्ज़त करते थे। लेकिन मेरे अंदर वो डरी हुई सांवली लड़की आज भी ज़िंदा थी, जो माँ की एक शाबाशी के लिए तरसती थी।
और आज… आज वो बुलावा आया था। पैकिंग करते हुए हाथ कांप रहे थे। क्या माँ सच में बदल गई होंगी? क्या बीमारी ने उनके अहंकार को तोड़ दिया होगा? या फिर यह कोई नई चाल थी?
अगली सुबह मैं फ्लाइट में थी और दोपहर तक टैक्सी मुझे बनारस की उन तंग गलियों की ओर ले जा रही थी। गंगा के घाट, वो पुराने मंदिर, और हवा में घुली अगरबत्ती की महक… सब कुछ वैसा ही था, बस मैं बदल गई थी।
“यही है हवेली, मैडम?” ड्राइवर ने एक जर्जर, काई लगी पुरानी इमारत के सामने गाड़ी रोकी।
‘गायत्री विला’… नेमप्लेट पर धूल जमी थी। कभी यहाँ शाम को महफिलें सजती थीं, आज यहाँ वीरानी का डेरा था।
मैंने भारी कदमों से गेट खोला। आंगन में तुलसी का पौधा सूखा पड़ा था।
“कौन?” एक क्षीण आवाज़ आई।
बुआ जी बाहर आईं। उनके बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे।
“मीरा? तू आ गई?” उन्होंने मुझे गले लगा लिया। उनकी आँखों में आँसू थे। “जा… अंदर जा। वो तेरे कमरे में है।”
मेरे कमरे में? माँ मेरे कमरे में क्या कर रही थीं?
मैं धड़कते दिल के साथ सीढ़ियाँ चढ़ी। वो कमरा, जहाँ मैंने अपने बचपन के आंसू बहाए थे। दरवाज़ा थोड़ा खुला था।
अंदर का नज़ारा देखकर मैं चौंक गई।
माँ बिस्तर पर लेटी थीं। वो बेहद कमज़ोर लग रही थीं। वो कड़क मिज़ाज औरत, जिसकी आवाज़ से नौकर कांपते थे, आज हड्डियों का ढांचा मात्र रह गई थी। लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि उनके हाथों में मेरी बचपन की वही फ्रॉक थी जिसे पहनकर मैं स्कूल फंक्शन में जाने वाली थी।
“माँ?” मेरे मुँह से बहुत धीमे से निकला।
माँ ने धीरे से आँखें खोलीं। उनकी आँखों में मोतियाबिंद उतर आया था, लेकिन मुझे पहचानते ही एक चमक आ गई।
“मीरा… मेरी बच्ची,” उनकी आवाज़ में वो खनक नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा दर्द था।
वो उठने की कोशिश करने लगीं। मैं दौड़कर उनके पास गई और उन्हें सहारा दिया।
“तू आ गई… मुझे लगा तू कभी नहीं आएगी,” माँ ने मेरे हाथ को अपने कांपते हाथों में थाम लिया। उनका स्पर्श… आज पहली बार वो स्पर्श ठंडा नहीं, गर्म लगा।
“बुआ जी ने बताया आपकी तबीयत…”
“छोड़ तबीयत को,” माँ ने मेरी बात काटी। “मेरी तरफ देख। मुझे माफ कर दे मीरा।”
मैं सन्न रह गई। गायत्री देवी और माफी?
“मैंने तेरे साथ बहुत बुरा किया। मैं अपनी शोहरत और सुंदरता के नशे में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे अपनी ही बेटी की मासूमियत नहीं दिखी। मैं तुझे वो सांचा बनाने की कोशिश करती रही जो मैं चाहती थी, जबकि तू तो एक आजाद पंछी थी।”
माँ की आँखों से आँसू बहकर तकिए को भिगो रहे थे।
“मैंने तेरा बचपन छीन लिया, तेरा आत्मविश्वास तोड़ दिया। पिछले दस सालों से, जब से मेरा गला खराब हुआ है, मुझे समझ आया कि जब सुर साथ छोड़ देते हैं तो इंसान कितना अकेला हो जाता है। आज मेरे पास सब कुछ है—पैसे, ये हवेली… लेकिन कोई अपना नहीं है। तू मुझे माफ कर दे बेटी।”
मेरा दिल पसीज गया। पंद्रह सालों की नफरत, गुस्सा, और शिकायतें एक पल में पिघलने लगीं। जिस माँ के प्यार के लिए मैं पूरी ज़िंदगी तरसी, आज वो मेरे सामने गिड़गिड़ा रही थी।
मैं रो पड़ी। “माँ, प्लीज… आप शांत हो जाइए।”
मैंने अपना सिर उनकी गोद में रख दिया। उनके हाथ मेरे बालों को सहलाने लगे। वही सुकून, जिसकी कल्पना मैं बचपन में रातों को रोते हुए करती थी।
“तू बहुत सुंदर है मीरा… तू मेरी सबसे खूबसूरत रचना है,” माँ ने कहा।
बाहर बारिश शुरू हो गई थी। बादलों की गड़गड़ाहट और बारिश की बूंदे खिड़की के शीशे पर थपकियां दे रही थीं। हम दोनों बस एक-दूसरे को थामे रो रहे थे। बरसों की जमी हुई बर्फ पिघल रही थी।
“माँ, मैं अब आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। हम साथ रहेंगे,” मैंने सिसकते हुए कहा।
माँ ने मुस्कुराते हुए मेरे गाल पर हाथ रखा। “मेरा समय पूरा हो गया है मीरा। बस तेरी माफी चाहिए थी। अब मैं चैन से जा सकती हूँ।”
“ऐसी बातें मत करो माँ…”
“मीरा, एक बार… बस एक बार मेरे लिए वो गाना गा दे जो तू उस दिन स्कूल में गाना चाहती थी? मैंने तुझे कभी सुना ही नहीं।”
मेरा गला रुंधा हुआ था, लेकिन माँ की इच्छा मेरे लिए आदेश थी। मैंने आँखें बंद कीं और गुनगुनाना शुरू किया।
मेरी आवाज़ कांप रही थी, लेकिन फिर धीरे-धीरे सुर सधने लगे। कमरे में मेरा दर्द एक प्रार्थना बनकर गूंजने लगा। माँ आँखें बंद किए, चेहरे पर एक अलौकिक शांति लिए सुन रही थीं।
जैसे ही गाना खत्म हुआ, बिजली कड़की। तेज़ रोशनी से मेरी आँखें चौंधिया गईं।
“बहुत अच्छा गाती है तू… मेरी कोकिला,” माँ की आवाज़ गूंजी।
मैं मुस्कुराई और उन्हें गले लगाने के लिए आगे झुकी। लेकिन…
मेरे हाथ हवा में ही रह गए।
माँ का शरीर वहाँ नहीं था। बिस्तर खाली था।
“माँ?” मैं चिल्लाई।
कमरा बदल गया था। वो पुरानी हवेली का कमरा नहीं था। वो मुंबई का मेरा बेडरूम था।
“मैम? मैम, क्या हुआ? आप ठीक हैं?” सुधा मुझे झकझोर रही थी।
मैं हड़बड़ाकर उठी। पसीने से लथपथ। साँसें फूल रही थीं।
सामने दीवार घड़ी पर सुबह के चार बज रहे थे। कोने में रखा मेरा सूटकेस खुला पड़ा था।
क्या यह सपना था? इतना जीवंत सपना?
तभी मेरी नज़र साइड टेबल पर रखे उस खाकी लिफाफे पर पड़ी। बुआ की चिट्ठी।
मैंने कांपते हाथों से पानी का गिलास उठाया। मेरा दिल अभी भी ज़ोरों से धड़क रहा था। सपने में माँ का स्पर्श, वो माफी, वो प्यार… सब इतना सच लग रहा था कि अभी भी मेरी हथेलियों में उनकी गर्माहट महसूस हो रही थी।
लेकिन फिर, हकीकत की एक ठंडी लहर ने मुझे जकड़ लिया।
मैंने मोबाइल उठाया। स्क्रीन पर बुआ जी के दस मिस्ड कॉल थे। मैंने कॉल बैक किया।
“हेलो… बुआ जी?”
“मीरा? तू फोन क्यों नहीं उठा रही थी?” बुआ जी की आवाज़ सख्त थी, वैसी ही जैसी हमेशा होती थी। “सुन, अगर तू आ रही है तो बता दे, वरना हम वकील को बुलाकर वसीयत का काम शुरू करें। भाभी को होश आया था अभी, पूछ रही थीं कि क्या मीरा ने प्रॉपर्टी के पेपर्स पर साइन करने के लिए हामी भरी है?”
मेरे कानों में सन्नाटा छा गया।
“क्या?” मैंने अविश्वास से पूछा। “माँ… माँ ने मुझे याद नहीं किया? माफी नहीं मांगी?”
बुआ जी हँसीं, एक रूखी, व्यंग्यात्मक हँसी। “माफी? तू पागल है क्या मीरा? तू गायत्री भाभी को नहीं जानती? वो कह रही थीं कि उस लड़की को बोलो कि अगर हवेली में हिस्सा चाहिए तो आकर मेरी सेवा करे। वरना एक फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी। तू आ रही है न?”
मेरे हाथ से फोन लगभग छूटने ही वाला था।
सपने में मिली वो ममता… वो बस मेरे अवचेतन मन की एक पुकार थी। वो मेरी दबी हुई इच्छा थी जो सपने बनकर उभरी थी। हकीकत तो यह थी कि गायत्री देवी कभी नहीं बदल सकती थीं। वो आज भी वही व्यापारी थीं, जो रिश्तों का सौदा करती थीं। पहले उन्होंने मेरे बचपन का सौदा अपनी महत्वाकांक्षाओं से किया था, आज वो मेरी सेवा का सौदा दौलत से करना चाहती थीं।
मेरी आँखों से आँसू बहे, लेकिन ये आँसू दुख के नहीं थे। ये उस भ्रम के टूटने के आँसू थे जिसे मैंने सालों से पाल रखा था।
“मीरा? बोलती क्यों नहीं? टिकट बुक कराया तूने?” बुआ जी की आवाज़ चुभ रही थी।
मैं उठी। खिड़की के पास गई। बाहर मुंबई की बारिश शुरू हो चुकी थी।
“मीरा?”
“बुआ जी,” मेरी आवाज़ अब कांप नहीं रही थी। उसमें एक अजीब सी दृढ़ता थी। “वकील से कहिए कि जो भी करना है, मेरे बिना करें। मुझे हवेली का हिस्सा नहीं चाहिए।”
“क्या? तू होश में तो है? करोड़ों की जायदाद है!” बुआ चीखीं।
“मुझे नहीं चाहिए बुआ जी। और माँ से कहिएगा…” मैं एक पल के लिए रुकी, “कहिएगा कि मीरा मर चुकी है। वो जो लड़की उनकी नफरत सहती थी, वो अब नहीं है।”
मैंने फोन काट दिया।
सामने रखा सूटकेस मुझे घूर रहा था। मैं उसके पास गई। एक-एक करके कपड़े बाहर निकाले और अलमारी में वापस रखने लगी।
फिर मैंने वो लिफाफा उठाया। बुआ की चिट्ठी और वो बचपन की तस्वीर।
मैंने तस्वीर को देखा। उस डरी हुई बच्ची को देखा।
“तुझे अब डरने की ज़रूरत नहीं है,” मैंने खुद से कहा। “तुझे किसी की वैलिडेशन की ज़रूरत नहीं है।”
मैंने उस चिट्ठी और तस्वीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और डस्टबिन में डाल दिया।
बाहर बारिश तेज़ हो गई थी। मैंने बालकनी का दरवाज़ा खोला और ठंडी हवा को अपने चेहरे पर महसूस किया। मेरे गालों पर जमे आँसू बारिश के पानी के साथ धुल गए।
मेरे अंदर का वो शोर, वो बेसुरा तानपूरा… अचानक शांत हो गया था। अब वहाँ सन्नाटा नहीं था, बल्कि मेरी अपनी ज़िंदगी का एक नया, सुरीला संगीत बज रहा था।
मैंने एक गहरी साँस ली। आज ऑफिस जाने से पहले मैं अपने लिए एक नई, चटख लाल रंग की साड़ी निकालूँगी। वो रंग जो मुझे पसंद है, न कि वो जो माँ को पसंद था।
मैं आज़ाद थी।
समापन:
दोस्तों, यह कहानी उन सभी संतानों के लिए है जो पूरी ज़िंदगी अपने माता-पिता की अपेक्षाओं और आलोचनाओं के बोझ तले दबे रहते हैं। हमें बचपन से सिखाया जाता है कि माता-पिता भगवान का रूप होते हैं, लेकिन हम भूल जाते हैं कि वे भी इंसान हैं, और इंसानों से गलतियाँ भी होती हैं और उनमें अहंकार भी होता है। कभी-कभी अपने आत्म-सम्मान और मानसिक शांति के लिए उन दरवाज़ों को हमेशा के लिए बंद करना ज़रूरी होता है जहाँ से सिर्फ दर्द आता हो। माफ करना ज़रूरी है, लेकिन बार-बार ज़ख्म खाने के लिए वापस जाना समझदारी नहीं।
एक सवाल आपके लिए: क्या आपने भी कभी किसी ऐसे रिश्ते को ढोया है जो आपको अंदर ही अंदर खत्म कर रहा था? क्या खून के रिश्ते आत्म-सम्मान से बड़े होते हैं? अपने विचार कमेंट में ज़रूर लिखें।
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