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कागज़ के पंख

 "दुनिया जिसे कामयाबी की मिसाल समझती थी, उसे क्या पता था कि उस 'मिसाल' ने खुद को जलाकर ही वो रोशनी पैदा की है। कभी-कभी भरा-पूरा घर भी एक इंसान के लिए सबसे अकेला स्थान बन जाता है।"

पार्टी में ठहाके गूंज रहे थे। घर की छत को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया गया था। मौका ही कुछ ऐसा था। रजत का प्रमोशन हुआ था और वह शहर की एक नामी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट बन गया था।

"अरे भाई अशोक जी, आपका बेटा तो हीरा है, हीरा!" पड़ोस के शर्मा अंकल ने रजत के पिता की पीठ थपथपाते हुए कहा, "इतनी कम उम्र में इतनी बड़ी कामयाबी। गाड़ी, बंगला, इतना बड़ा ओहदा... और क्या चाहिए ज़िंदगी में? आपने तो पुण्य किए होंगे जो ऐसा बेटा मिला।"

अशोक जी का सीना गर्व से फूल गया। उनकी पत्नी, निर्मला जी, मेहमानों को मिठाई खिलाते नहीं थक रही थीं। रजत बीच में खड़ा मुस्कुरा रहा था। एक सधी हुई, नपी-तुली मुस्कान, जो उसने कॉर्पोरेट जगत में पिछले दस सालों में सीखी थी। वह हर बधाई स्वीकार कर रहा था, हाथ मिला रहा था, 'थैंक यू' कह रहा था।

लेकिन भीड़ के एक कोने में खड़ी उसकी पत्नी, सुमेधा, उसे देख रही थी। वह रजत को दस साल से जानती थी, और पिछले पाँच साल से उसकी पत्नी थी। वह देख पा रही थी जो इस कमरे में मौजूद कोई और नहीं देख पा रहा था - रजत की आँखों का वीरानपन। वह मुस्कान उसके होठों तक ही सीमित थी, आँखों तक नहीं पहुँच रही थी।

पार्टी खत्म होने के बाद, जब आखिरी मेहमान चला गया और घर में सन्नाटा पसर गया, रजत अपनी बालकनी में जाकर खड़ा हो गया। वह रेलिंग पकड़कर नीचे सड़क पर आती-जाती गाड़ियों को देख रहा था।

सुमेधा दो कप कॉफी लेकर वहाँ आई।

"थक गए होंगे?" उसने धीमे स्वर में पूछा।

रजत ने पीछे मुड़कर देखा, और वह 'बाहरी' मुस्कान उतार फेंकी। उसने एक गहरी सांस ली, "थोड़ा सा। शोर अब बर्दाश्त नहीं होता, सुमेधा।"

"सब बहुत खुश हैं, रजत," सुमेधा ने कॉफी का कप उसे थमाया, "माँ-पापा तो फूले नहीं समा रहे।"

"हम्म," रजत ने कॉफी का घूँट भरा, "उनकी खुशी ही तो मेरा ईंधन है। पिछले पंद्रह सालों से इसी ईंधन पर तो चल रहा हूँ।"

सुमेधा ने उसकी आँखों में झाँका। "और तुम्हारी खुशी, रजत? आज तुम्हें वीपी की पोस्ट मिली है। ये वही पोस्ट है जिसके लिए तुमने पिछले पाँच साल से दिन-रात एक कर दिया था। फिर ये उदासी क्यों?"

रजत कुछ पल चुप रहा। फिर उसने जेब से अपना वॉलेट निकाला। उसमें एक पुरानी, मुड़ी-तुड़ी तस्वीर थी। एक पहाड़ की तस्वीर, जो किसी प्रोफेशनल कैमरे से नहीं, बल्कि एक साधारण रील वाले कैमरे से खींची गई थी।

"तुम्हें याद है सुमेधा, जब हम कॉलेज में मिले थे? मैं क्या बनना चाहता था?"

सुमेधा जानती थी। "वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर।"

"हाँ," रजत की आवाज़ में एक अजीब सा दर्द उभरा, "मुझे जंगलों में होना था, सुमेधा। मुझे पहाड़ों की हवा में सांस लेनी थी। मुझे ऑफिस के एसी केबिन में नहीं, बल्कि कीचड़ और बारिश में होना था। लेकिन फिर... दीदी की शादी आ गई। पापा का रिटायरमेंट पास आ गया। घर की ईएमआई थी। सबने कहा, 'रजत, बेटा समझदार बनो। शौक से पेट नहीं भरता।' और मैं समझदार बन गया।"

उसने वह तस्वीर वापस वॉलेट में रख ली। "आज जब सब मुझे बधाई दे रहे थे, तो मुझे लग रहा था कि वे मेरी तरक्की का जश्न नहीं मना रहे, बल्कि मेरे सपनों की अंतिम संस्कार की दावत खा रहे हैं। मेरे पास सब कुछ है - पैसा, इज़्ज़त, परिवार। पर वो 'रजत' नहीं है जो मैं था। मैं एक मशीन बन गया हूँ, सुमेधा। एक एटीएम मशीन, जो परिवार की ज़रूरतें पूरी करती है, जो समाज के लिए एक ट्रॉफी है। लेकिन अंदर से... अंदर से मैं खाली हूँ।"

सुमेधा ने देखा कि रजत की आँखों के कोने नम हो गए थे। यह वो रजत था जिसे दुनिया 'सख्त' और 'सफल' मानती थी।

"तुमने कभी किसी से कहा क्यों नहीं?" सुमेधा ने पूछा।

"किससे कहता? माँ से? जिन्हें लगता है कि एसी कार ही सफलता है? या पापा से? जो अपनी छाती चौड़ी करके चलते हैं कि उनका बेटा वीपी है? अगर मैं आज कह दूँ कि मैं यह सब छोड़कर पहाड़ों में जाना चाहता हूँ, तो उन्हें लगेगा मैं पागल हो गया हूँ। उन्हें लगेगा मैं स्वार्थी हूँ। और शायद मैं हूँ भी। एक 'जिम्मेदार' बेटा अपने सपनों के बारे में नहीं सोचता।"

सुमेधा ने अपना कप नीचे रखा और रजत का हाथ थाम लिया।

"जिम्मेदारी और खुदकुशी में फर्क होता है, रजत। तुमने सबके लिए सब कुछ किया। घर बन गया, दीदी सेटल हो गईं, पापा-माँ खुश हैं। अब और कितना कर्ज चुकाना बाकी है तुम्हारा?"

"ये कर्ज नहीं, फर्ज है सुमेधा," रजत ने सिर झुका लिया।

सुमेधा अंदर गई और अलमारी से एक लिफाफा लेकर आई। उसने उसे रजत के हाथ में थमा दिया।

"यह क्या है?" रजत ने पूछा।

"खोलो।"

रजत ने लिफाफा खोला। अंदर एक रेजिग्नेशन लेटर (इस्तीफा पत्र) था - टाइप किया हुआ, बस नीचे रजत के हस्ताक्षर बाकी थे। और साथ में मनाली के एक फोटोग्राफी वर्कशॉप का टिकट था जो अगले हफ्ते शुरू हो रहा था।

रजत हैरान रह गया। "सुमेधा, ये..."

"मैंने टाइप किया है," सुमेधा ने दृढ़ता से कहा, "रजत, हम सेविंग्स पर आराम से एक साल जी सकते हैं। मैं भी नौकरी करती हूँ, हम संभाल लेंगे। हमें यह बड़ा बंगला नहीं चाहिए, हम छोटे फ्लैट में खुश रह लेंगे। लेकिन मैं तुम्हें रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरते हुए नहीं देख सकती। मुझे वो रजत चाहिए जिसकी आँखों में चमक थी, ये थका हुआ वाइस प्रेसिडेंट नहीं।"

"पर माँ-पापा...?"

"उन्हें समझाने की जिम्मेदारी मेरी है। और अगर वो सच में तुमसे प्यार करते हैं, तुम्हारी एटीएम मशीन वाली छवि से नहीं, तो वो समझेंगे। जो तुम्हें सिर्फ तुम्हारी हैसियत के लिए प्यार करे, वो परिवार कैसा?"

रजत के हाथ काँप रहे थे। उसने उस कागज़ को देखा, फिर सुमेधा को। आठ साल बाद पहली बार उसे लगा कि पिंजरे का दरवाज़ा खुला है।

"क्या हम सच में ऐसा कर सकते हैं?" उसने एक बच्चे जैसी मासूमियत से पूछा।

"हम नहीं, तुम कर सकते हो। उड़ो रजत। तुम्हारे पंख अभी टूटे नहीं हैं, बस थोड़े धूल खा गए हैं।"

रजत ने सुमेधा को गले लगा लिया। उस रात, आलीशान घर की बालकनी में, बिना किसी जश्न के, बिना किसी शोर के, रजत ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी जीत हासिल की थी। उसने खुद को पा लिया था।

अगली सुबह जब सूरज निकला, तो रजत के हाथ में लैपटॉप का बैग नहीं, बल्कि एक पुराना कैमरा था। रास्ता कठिन था, लोग बातें बनाने वाले थे, लेकिन रजत खुश था। क्योंकि आज वो अपनी कहानी खुद लिखने जा रहा था।


दोस्तों, अक्सर हम "लोग क्या कहेंगे" या "परिवार क्या सोचेगा" के डर से अपनी पूरी ज़िंदगी दूसरों के हिसाब से जीने में गुज़ार देते हैं। हम जिम्मेदारियों के बोझ तले अपने सपनों का गला घोंट देते हैं। पर याद रखिए, एक खुश इंसान ही अपने परिवार को सच्ची खुशी दे सकता है। त्याग करना अच्छी बात है, पर खुद को खो देना नहीं। कभी-कभी खुद के लिए जीना स्वार्थ नहीं, बल्कि ज़रूरत होती है।

क्या आपके पास भी ऐसा कोई सपना है जिसे आपने जिम्मेदारियों के चलते कहीं पीछे छोड़ दिया? हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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लेखिका :रचना बंसल 


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