बैंगलोर की उस हाई-टेक सोसाइटी के 18वीं मंजिल पर बने फ्लैट की घंटी बजाते हुए सुधा के हाथ कांप रहे थे। तीन साल... पूरे तीन साल हो गए थे उसे अपने मायके आए हुए। पति की नौकरी दुबई में थी, इसलिए आना-जाना मुश्किल ही होता था। लेकिन इस बार वीडियो कॉल पर पापा का चेहरा देखकर उससे रहा नहीं गया। वो चेहरा, जो कभी घर की सबसे रौशन चीज़ हुआ करता था, अब बुझा-बुझा सा लगने लगा था।
दरवाज़ा खुला। सामने उसकी भाभी, रितिका खड़ी थीं।
"अरे सुधा दीदी! आ गईं आप? फ्लाइट लेट थी क्या?" रितिका ने मुस्कुराते हुए स्वागत किया।
पीछे भाई, समीर भी आ गया। "आ जा गुड़िया, तूने तो बहुत इंतज़ार करवाया।"
घर अंदर से किसी फाइव स्टार होटल जैसा चमक रहा था। हर चीज़ अपनी जगह पर, हर कोना सलीके से सजा हुआ। लेकिन सुधा की नज़रें उस शख्स को ढूंढ रही थीं जिसने उसे उंगली पकड़कर चलना सिखाया था।
"पापा कहाँ हैं?" सुधा ने जूते उतारते हुए पूछा।
"अपने कमरे में हैं, शायद टीवी देख रहे होंगे," समीर ने लापरवाही से कहा और सुधा का बैग उठाने लगा।
सुधा तेज़ कदमों से पापा के कमरे की ओर बढ़ी। दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर एसी की ठंडी हवा और दवाइयों की एक हल्की गंध थी। उसके पापा, दीनानाथ जी, खिड़की के पास वाली आरामकुर्सी पर बैठे बाहर आसमान को घूर रहे थे।
"पापा!" सुधा ने धीरे से पुकारा।
दीनानाथ जी चौंके। चश्मा ठीक करते हुए उन्होंने मुड़कर देखा। "सुधा... मेरी बिटिया?"
वे उठने की कोशिश करने लगे, लेकिन सुधा ने दौड़कर उन्हें गले लगा लिया। वह शरीर, जो कभी पहलवान जैसा गठीला था, अब सिर्फ़ हड्डियों का ढांचा लग रहा था।
"आप इतने कमज़ोर कैसे हो गए पापा?" सुधा की आँखों में आंसू आ गए।
"अरे कुछ नहीं बेटा, बुढ़ापा है। शरीर तो ढलता ही है," पापा ने हंसने की कोशिश की, लेकिन वो हंसी उनकी आंखों तक नहीं पहुंची।
रात के खाने का वक़्त हुआ। डाइनिंग टेबल पर महंगी क्रॉकरी सजी थी। रितिका ने सबके लिए पास्ता और गार्लिक ब्रेड बनाई थी। लेकिन पापा की थाली अलग थी। उसमें उबली हुई लौकी, बिना नमक की दाल और दो सूखी रोटियां थीं।
सुधा ने देखा, पापा ने चुपचाप रोटी का टुकड़ा तोड़ा और पानी के सहारे निगल लिया। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, बस एक मशीनी क्रिया चल रही थी।
"पापा, आप पास्ता नहीं खाएंगे? आपको तो नई चीज़ें चखने का बहुत शौक था ना?" सुधा ने पूछा।
इससे पहले कि पापा कुछ बोलते, रितिका बोल पड़ी, "अरे नहीं दीदी! डॉक्टर ने मना किया है। इनका बीपी फ्लक्चुएट होता है और कोलेस्ट्रॉल भी बॉर्डर लाइन पर है। हम कोई रिस्क नहीं ले सकते। सादा खाना ही इनके लिए बेस्ट है।"
समीर ने भी सिर हिलाया। "हाँ सुधा, हमें बहुत ध्यान रखना पड़ता है। पापा को समझ नहीं आता, पर उनकी सेहत के लिए यही सही है। हम उन्हें एकदम स्ट्रिक्ट डाइट पर रखते हैं।"
सुधा चुप रही, लेकिन उसका मन बेचैन हो गया। वो पापा, जो लखनऊ के नवाबों की तरह खाने के शौकीन थे, जिन्हें रविवार को कचौड़ी और जलेबी के बिना चैन नहीं आता था, वो आज उबली लौकी खाकर ज़िंदा थे? क्या सिर्फ़ सांसें चलते रहना ही ज़िंदगी है?
रात को जब सब सो गए, तो सुधा पानी पीने उठी। उसने देखा पापा के कमरे की बत्ती जल रही थी। वह दबे पाँव अंदर गई।
पापा बिस्तर पर बैठे अपनी पुरानी डायरी पलट रहे थे।
"नींद नहीं आ रही पापा?" सुधा ने पास बैठकर पूछा।
दीनानाथ जी ने डायरी बंद की। "नींद तो अब दवा खाने के बाद ही आती है बेटा। बस पुरानी यादें ताज़ा कर रहा था।"
सुधा ने डायरी देखी। उसमें माँ के हाथ की लिखी रेसिपीज़ थीं।
"पापा, सच बताइए," सुधा ने उनका हाथ अपने हाथ में लिया। "आप खुश तो हैं ना यहाँ?"
दीनानाथ जी की आँखों में एक नमी तैर गई। उन्होंने इधर-उधर देखा, जैसे डर रहे हों कि कोई सुन न ले। फिर फुसफुसाते हुए बोले, "बेटा, समीर और रितिका मेरा बहुत ख्याल रखते हैं। समय पर दवा, समय पर डॉक्टर, साफ़-सुथरा कमरा... किसी चीज़ की कमी नहीं है। लेकिन..."
"लेकिन क्या पापा?"
"लेकिन यहाँ 'ज़ायका' नहीं है बेटा। न खाने में, न बातों में। ऐसा लगता है मैं किसी अस्पताल के वीआईपी वार्ड में भर्ती हूँ। बस मौत का इंतज़ार कर रहा हूँ। मेरा मन करता है कि एक बार... बस एक बार बाज़ार वाली वो तीखी चाट खाऊँ, या वो अदरक वाली कड़क मीठी चाय पी लूँ। पर यहाँ तो चाय में भी चीनी नहीं मिलती और बातों में भी मिठास की जगह सिर्फ़ 'हिदायतें' मिलती हैं। 'ये मत करो', 'वो मत खाओ', 'वहाँ मत जाओ'..."
सुधा का कलेजा मुंह को आ गया। उसके पापा, जो पूरे मोहल्ले में अपनी ठहाकों और दावतों के लिए मशहूर थे, आज अपनी ही घर में एक कैदी की तरह जी रहे थे। यह 'देखभाल' नहीं थी, यह तो तिल-तिल कर मारना हुआ।
अगली सुबह रविवार था। समीर और रितिका को किसी ब्रंच पार्टी में जाना था।
"सुधा, हम दोपहर तक आ जाएंगे। मेड खाना बना देगी, तुम बस पापा को समय पर दवाई दे देना," रितिका ने जाते हुए कहा।
जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, सुधा की आँखों में एक चमक आ गई। उसने मेड को मना कर दिया।
"आज खाना मैं बनाऊँगी। और सुनो, कोठी के पीछे वाले बगीचे से पुदीना और हरी मिर्च तोड़ लाओ।"
सुधा ने रसोई का मोर्चा संभाल लिया। आज उस मॉड्यूलर किचन में बरसों बाद हींग और जीरे का तड़का लगा। उसने आलू-पूरी, कद्दू की खट्टी-मीठी सब्ज़ी और बूंदी का रायता बनाया। और सबसे ख़ास—गाजर का हलवा, जिसमें उसने जी भरकर घी और ड्राई फ्रूट्स डाले।
खुशबू पूरे घर में फैल गई। दीनानाथ जी अपने कमरे से बाहर निकल आए, उनकी नाक फड़क रही थी।
"अरे... यह खुशबू? आज घर में क्या बन रहा है?" उनकी आवाज़ में एक अजीब सा उत्साह था।
सुधा ने डाइनिंग टेबल सजाई। "पापा, आज डाइट चार्ट की छुट्टी। आज आपकी पसंद का खाना बना है।"
दीनानाथ जी ने थाली देखी तो उनकी आँखों में बच्चों जैसी चमक आ गई। "पूरी? और हलवा? पर बेटा... समीर आएगा तो..."
"समीर को मैं देख लूँगी, आप पहले खाना खाइए," सुधा ने उन्हें कुर्सी पर बिठाया।
पापा ने पहला निवाला लिया। उनकी आँखें बंद हो गईं। एक गहरे सुकून की सांस उनके सीने से निकली। वे इतनी शिद्दत से खा रहे थे, जैसे बरसों के भूखे हों। एक पूरी, फिर दूसरी, फिर तीसरी। उनके माथे पर पसीना आ गया था, लेकिन चेहरे पर जो लालिमा और मुस्कान थी, वो किसी भी मल्टीविटामिन गोली से नहीं आ सकती थी।
वे अभी हलवा खा ही रहे थे कि दरवाज़ा खुला। समीर और रितिका वापस आ गए थे।
घर में घुसते ही घी और मसालों की महक ने उनका स्वागत किया।
"ये क्या हो रहा है?" रितिका की नज़र डाइनिंग टेबल पर पड़ी। "पूरी? हलवा? सुधा दीदी, ये आपने क्या किया? आपको पता है न पापा का कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है?"
समीर भी नाराज़गी से बोला, "सुधा, तू क्या पागल हो गई है? हम इतनी मुश्किल से उनका डाइट मेन्टेन करते हैं और तूने एक दिन में सब बिगाड़ दिया। पापा, आप भी न... बच्चों की तरह शुरू हो गए। लाइए प्लेट इधर।"
समीर ने पापा के हाथ से हलवे की कटोरी लेने के लिए हाथ बढ़ाया।
"हाथ हटाओ समीर!" सुधा की आवाज़ इतनी तेज़ और सख्त थी कि समीर का हाथ हवा में ही रुक गया।
"दीदी, आप समझ नहीं रही हैं..." रितिका बोलने लगी।
"मैं सब समझ रही हूँ रितिका," सुधा अपनी कुर्सी से खड़ी हो गई। "मैं पिछले चौबीस घंटे से देख रही हूँ। तुम लोग पापा की 'सेहत' बचा रहे हो या उन्हें 'ज़िंदा लाश' बना रहे हो?"
"ये कैसी बातें कर रही हो?" समीर ने कहा। "हम उनकी भलाई के लिए ही तो करते हैं।"
"कैसी भलाई समीर?" सुधा की आँखों में आंसू और गुस्सा दोनों थे। "तुमने पापा की उम्र देखी है? 75 साल के हैं वो। इस उम्र में इंसान के पास जीने के लिए बचा ही क्या होता है? थोड़े से स्वाद और थोड़ी सी खुशी। तुम लोगों ने उनकी वो खुशी भी छीन ली। तुम चाहते हो कि वो सौ साल जिएं, लेकिन ऐसे घुट-घुट कर? उबली हुई लौकी खाकर और चारदीवारी में बंद रहकर?"
सुधा ने पापा की तरफ इशारा किया, जो अब सहम गए थे।
"देखो उनके चेहरे को। अभी जब वो खा रहे थे, तो मैंने उनकी आँखों में वो चमक देखी जो पिछले तीन साल में वीडियो कॉल पर कभी नहीं दिखी। तुम लोग उन्हें 'मेडिकल रिपोर्ट' के हिसाब से चला रहे हो, 'इंसान' के हिसाब से नहीं। अगर दो पूरी खाने से उनका बीपी थोड़ा बढ़ भी गया, तो क्या पहाड़ टूट जाएगा? लेकिन जो 'मन' रोज़ मर रहा है उसका क्या?"
कमरे में सन्नाटा छा गया। समीर और रितिका अवाक रह गए।
सुधा ने अपनी बात जारी रखी, "परहेज़ ज़रूरी है, मैं मानती हूँ। लेकिन परहेज़ का मतलब सज़ा नहीं होता। तुम लोगों ने घर को अस्पताल बना दिया है। पापा को जीने का मन ही नहीं करता, वो बस दिन काट रहे हैं। क्या फायदा ऐसी लंबी उम्र का जिसमें शाम को चाय के साथ बिस्कुट डुबोने की आज़ादी न हो?"
समीर ने पापा की तरफ देखा। दीनानाथ जी ने नज़रे झुका लीं, उनकी उंगलियां अभी भी हलवे की कटोरी पर थीं, जैसे कोई बच्चा अपने खिलौने को कस कर पकड़े हो। उस दृश्य ने समीर के दिल को चीर दिया। उसे याद आया कि कैसे बचपन में पापा उसे कंधे पर बैठाकर मेले ले जाते थे और खुद पैसे न होने पर भी उसे कुल्फी खिलाते थे। और आज? आज समीर के पास सब कुछ था, लेकिन उसने पापा को एक कटोरी हलवे के लिए तरसा दिया था।
समीर की आँखों से आंसू बह निकले। वह धीरे से आगे बढ़ा और पापा के पास घुटनों के बल बैठ गया।
"पापा... आपको... आपको सच में इतना मन था ये सब खाने का? आपने कभी बताया क्यों नहीं?"
दीनानाथ जी ने कांपते हाथ से समीर के सिर पर हाथ फेरा। "तुम लोग मेरी फिक्र करते हो बेटा, इसलिए कभी कुछ कहा नहीं। मुझे लगा मैं तुम लोगों पर बोझ न बन जाऊँ।"
रितिका भी रो पड़ी। "माफ़ कर दीजिये पापाजी। हमें लगा हम आपकी केयर कर रहे हैं, हमें अंदाज़ा ही नहीं था कि हम अनजाने में आप पर जुल्म कर रहे हैं।"
समीर ने हलवे की कटोरी उठाई और एक चम्मच भरकर पापा के मुंह के पास ले गया।
"खाइए पापा। आज कोई डाइट नहीं। और कल से... कल से हम डॉक्टर से पूछेंगे कि क्या चीज़ कितनी मात्रा में खा सकते हैं, लेकिन आपका खाना अब बेस्वाद नहीं होगा।"
दीनानाथ जी ने वो चम्मच मुंह में लिया। मीठा स्वाद उनकी जुबान पर घुला, और साथ ही सालों की कड़वाहट भी धुल गई।
उस शाम घर का माहौल बदल गया। सुधा ने शाम की चाय बनाई—अदरक और इलायची वाली, थोड़ी मीठी। सबने साथ बैठकर पी। समीर ने वादा किया कि अब हर रविवार 'चीट डे' (Cheat Day) होगा, जिसमें पापा अपनी पसंद का कुछ भी खा सकेंगे, और रितिका ने कहा कि वो इंटरनेट से 'हेल्दी लेकिन टेस्टी' रेसिपीज़ ढूंढेंगी।
सुधा की वापसी की फ्लाइट दो दिन बाद थी। जब वह जाने लगी, तो पापा उसे गेट तक छोड़ने आए। उनकी चाल में अब वो पुरानी वाली मज़बूती दिख रही थी।
"जा रही है पगली?" पापा ने मुस्कुराते हुए कहा।
"हाँ पापा, पर अब जल्दी आऊंगी। और खबरदार जो आपने अपनी मन की बात मन में रखी तो," सुधा ने हंसते हुए चेतावनी दी।
समीर ने सुधा को गले लगाया। "थैंक यू दीदी। तूने सही कहा था। हम सिर्फ उनकी सांसें गिन रहे थे, तूने उन्हें ज़िंदगी दे दी।"
कार में बैठते हुए सुधा ने पीछे मुड़कर देखा। पापा, समीर और रितिका हाथ हिला रहे थे। पापा के चेहरे पर अब वो बासीपन नहीं था, बल्कि एक ताज़गी थी—जैसे मुरझाए हुए पौधे को अचानक पानी और धूप मिल गई हो।
सुधा जानती थी कि बुढ़ापा सिर्फ़ शरीर का कमजोर होना नहीं है, बल्कि उम्मीदों का ज़िंदा रहना भी है। और आज, उसने उस घर में उम्मीद का तड़का लगा दिया था। उसे यकीन था कि अब उस घर में सिर्फ़ 'डाइट चार्ट' नहीं, बल्कि 'दिल' की भी सुनी जाएगी।
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