घर के आंगन में अभी भी हवन की लकड़ियों की गंध बची हुई थी। माँ को गए हुए आज पूरे तेरह दिन हो चुके थे। तेरहवीं की रस्में खत्म हो चुकी थीं, मेहमान जा चुके थे और घर में अब सिर्फ एक अजीब सी, काटने वाली खामोशी बची थी।
विकास अपने सूटकेस में कपड़े जमा रहा था। उसकी फ्लाइट कल सुबह की थी। उसे वापस बैंगलोर लौटना था, अपनी कॉर्पोरेट दुनिया में, जहाँ भावनाओं के लिए एक्सेल शीट में कोई कॉलम नहीं होता। लेकिन जाने से पहले, एक बात थी जो उसके सीने में पिछले कई दिनों से खटक रही थी। वह बार-बार अपनी बड़ी बहन, सरिता को देख रहा था।
सरिता, जो पिछले दस सालों से इस घर में माँ की परछाई बनकर रह रही थी। विकास तो अपनी पढ़ाई और फिर नौकरी के सिलसिले में बाहर निकल गया था, लेकिन सरिता... उसकी शादी हुई थी, पर वह रिश्ता महज दो साल चला। पति से अलग होने के बाद वह वापस माँ के पास आ गई थी और तब से यहीं थी।
विकास के मन में पिछले कुछ दिनों से रिश्तेदारों ने कई बातें भर दी थीं।
"अरे विकास, तू तो भोला है। आजकल भाई-बहन का प्यार भी जमीन-जायदाद के आगे फीका पड़ जाता है।"
"तेरी बहन ने माँ के बीमारी के दौरान न जाने कितने कागजों पर अंगूठे लगवाए होंगे।"
"माँ के गहने कहाँ हैं? देखा नहीं, सरिता ने एक बार भी अलमारी की चाबी हाथ से नहीं छोड़ी।"
ये बातें धीमे जहर की तरह विकास के दिमाग में घुल गई थीं। उसे याद था कि पिताजी शहर के बीचों-बीच यह 300 गज का मकान छोड़ गए थे, जिसकी कीमत आज करोड़ों में थी। और माँ के पास पुश्तैनी जेवर भी काफी थे।
शाम ढल रही थी। सरिता माँ के कमरे में बैठी पुराने संदूक को साफ कर रही थी। विकास वहां पहुंचा। उसके माथे पर पसीना था और दिल में एक अजीब सी बेचैनी। उसे लगा कि अब नहीं पूछा तो कभी नहीं पूछ पाएगा।
वह दरवाजे पर खड़ा हो गया। सरिता ने उसे देखा, हल्का सा मुस्कुराई और फिर अपने काम में लग गई। उस मुस्कान में थकान थी, एक ऐसी थकान जो नींद से नहीं मिटती।
"दीदी..." विकास ने गला साफ करते हुए कहा।
"हां विक्कू, बोल। खाना लगा दूं? तुझे सुबह जल्दी निकलना है न?" सरिता ने बिना मुड़े पूछा।
विकास अंदर आया और संदूक के पास खड़ा हो गया। उसने देखा कि सरिता कुछ फाइलें और एक मखमली पोटली अलग रख रही है। शक की सुई और गहरी हो गई।
"दीदी, मुझे आपसे कुछ पूछना है। मतलब... अब माँ तो रही नहीं, तो हमें कुछ चीज़ें स्पष्ट कर लेनी चाहिए।"
सरिता का हाथ रुक गया। उसने धीरे से सर उठाकर विकास को देखा। "क्या स्पष्ट करना है विक्कू?"
विकास ने एक गहरी सांस ली और वह सवाल दाग दिया जो उसके गले में अटका हुआ था।
**"दीदी! क्या अम्मा जी की सारी जायदाद पर.. आपका अकेली का ही हक है??"**
कमरे में सन्नाटा पसर गया। घड़ी की टिक-टिक अचानक बहुत तेज हो गई। सरिता के चेहरे के भाव नहीं बदले, बस उसकी आँखों की चमक थोड़ी फीकी पड़ गई। उसने संदूक का ढक्कन धीरे से बंद किया और वहीं जमीन पर बैठ गई।
"तुझे ऐसा क्यों लगा विक्कू?" सरिता की आवाज़ बहुत शांत थी, इतनी शांत कि विकास को डर लगने लगा।
"नहीं, वो... बुआ जी कह रही थीं कि माँ के जेवर और इस घर के कागज़ सब आपके पास हैं। मैं तो बाहर रहता हूँ, मुझे तो पता भी नहीं कि यहाँ क्या चल रहा था। मेरा भी तो हक है न दीदी? मैं बेटा हूँ इस घर का।" विकास ने नज़रें चुराते हुए कहा। उसे खुद अपनी बात ओछी लग रही थी, लेकिन 'हक' का सवाल था।
सरिता कुछ पल चुप रही। फिर उसने वह मखमली पोटली और वो फाइलें उठाईं और विकास की ओर बढ़ा दीं।
"ले, तेरा हक। मैं सोच ही रही थी कि तुझे ये कब दूं। अच्छा हुआ तूने खुद मांग लिया।"
विकास के चेहरे पर एक विजय की मुस्कान आ गई। उसे लगा कि सरिता डर गई है। उसने झटपट फाइल खोली। उसे उम्मीद थी कि अंदर मकान की रजिस्ट्री और फिक्स्ड डिपॉजिट के कागज होंगे।
लेकिन जैसे ही उसने फाइल के पन्ने पलटे, उसके चेहरे का रंग उड़ने लगा।
पहला कागज—बैंक का नोटिस। मकान पर 25 लाख का लोन था, जिसकी ईएमआई पिछले दो महीने से बाउंस हो रही थी।
दूसरा कागज—स्थानीय साहूकार का हिसाब। 10 लाख रुपये, 5% ब्याज पर।
तीसरा कागज—अस्पताल के बिल। माँ की कीमोथेरेपी, डायलिसिस और आईसीयू के लाखों के बिल।
विकास के हाथ कांपने लगे। उसने मखमली पोटली खोली। उसे लगा शायद इसमें जेवर होंगे। लेकिन उसमें क्या था?
उसमें रसीदें थीं। 'गिरवी रखने की रसीद'। माँ के कंगन, नेकलेस, यहाँ तक कि सरिता की अपनी शादी की अंगूठी और चेन—सब कुछ मुथूट फाइनेंस और स्थानीय सुनारों के पास गिरवी रखा था।
"ये... ये सब क्या है दीदी?" विकास की आवाज़ में अब वो हेकड़ी नहीं थी, बल्कि घबराहट थी।
सरिता उठी और खिड़की की ओर देखने लगी।
"ये अम्मा की 'जायदाद' है विक्कू। और हां, तूने सही पूछा था, क्या इस पर सिर्फ मेरा हक है? कायदे से तो आधा तेरा भी बनता है।"
विकास को लगा जैसे किसी ने उसे जोरदार तमाचा मारा हो।
सरिता ने बोलना जारी रखा, "तुझे याद है विक्कू, पांच साल पहले जब तुझे अमेरिका जाने के लिए 15 लाख रुपये चाहिए थे? तूने कहा था कि स्कॉलरशिप मिली है, बस थोड़ी कमी है। वो स्कॉलरशिप नहीं थी विक्कू, वो माँ के कंगन और मेरी चेन थी जो आज भी साहूकार की तिजोरी में कैद है।"
विकास की सांसें अटक गईं। उसे सच में नहीं पता था। माँ ने तो कहा था कि पिताजी की पुरानी सेविंग्स थीं।
"और ये घर..." सरिता ने दीवार पर हाथ फेरा। "माँ को जब कैंसर डिटेक्ट हुआ था, तब डॉक्टर ने कहा था कि सरकारी अस्पताल में नंबर आने में देर हो जाएगी। मैं उन्हें खोना नहीं चाहती थी। प्राइवेट अस्पताल का खर्चा तू जानता है। तूने फोन पर कहा था न—'दीदी, जो बेस्ट हो वो करो, पैसों की चिंता मत करना।' तू हर महीने 20 हजार भेजता था, विक्कू। लेकिन माँ का एक इंजेक्शन 45 हजार का आता था। बाकी पैसे कहाँ से आ रहे थे, तूने कभी पूछा?"
विकास निशब्द था। वह फाइल के पन्नों को देख रहा था। हर पन्ना उस संघर्ष की गवाही दे रहा था जिसे सरिता ने अकेले भोगा था।
"मैंने इस घर पर लोन लिया। जब वो कम पड़ा, तो पर्सनल लोन लिया। अपनी सिलाई की जमापूंजी लगा दी। माँ को बचाने के लिए मैंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया विक्कू। मुझे लगा था कि मैं घर बचा लूंगी, जेवर छुड़ा लूंगी, लेकिन बीमारी दीमक की तरह सब खा गई।"
सरिता की आँखों से अब आंसू बह रहे थे, लेकिन आवाज़ अभी भी स्थिर थी।
"तो अब बता विक्कू, इस 'कर्ज की जायदाद' में तुझे कितना हिस्सा चाहिए? आधा लोन तू चुकाएगा? या साहूकार की गालियां आधी तू सुनेगा? बता, क्या बंटवारा करूँ मैं?"
विकास वहीँ घुटनों के बल बैठ गया। वह जिस 'सोने की चिड़िया' का हिस्सा मांगने आया था, वह असल में एक 'जलती हुई चिता' थी जिसे उसकी बहन बरसों से अपने नंगे हाथों में थामे हुए थी।
वह खुद को इतना छोटा महसूस कर रहा था कि ज़मीन में गड़ जाना चाहता था। वह बैंगलोर में अपनी लग्जरी लाइफ जी रहा था, वीकेंड पार्टी कर रहा था, और यहाँ उसकी बहन एक-एक रुपये के लिए लड़ रही थी, सिर्फ इसलिए ताकि माँ को तकलीफ न हो और भाई को पढ़ाई और करियर में रुकावट न आए।
"दीदी..." विकास के गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी। वह फूट-फूट कर रो पड़ा। "मुझे माफ कर दो दीदी। मैं... मैं अंधा हो गया था। मैंने सोचा कि तुम..."
सरिता उसके पास आई और उसे वैसे ही गले लगाया जैसे बचपन में लगाती थी जब वह गिर जाता था।
"पागल है तू। मैं तो बस डर रही थी कि तुझे ये सब कैसे बताऊं। मुझे लगा तू सोचेगा कि मैंने घर डुबो दिया। मैं नहीं चाहती थी कि तेरे करियर पर कोई आंच आए। तू घर का बेटा है, तेरी उड़ान ऊंची होनी चाहिए, बस यही माँ का सपना था।"
विकास ने सरिता के पैर पकड़ लिए। "नहीं दीदी, मैं बेटा नहीं, मैं स्वार्थी हूँ। असली बेटा तो तुम हो। तुमने माँ की सेवा की, उनका दर्द बांटा, और मैं... मैं बस जायदाद का हिसाब मांगने आ गया।"
उसने आंसू पोंछे और खड़ा हुआ। उसने वो सारे कागज समेटे और अपनी फाइल में रख लिए।
"ये सारा कर्ज मेरा है दीदी। आज से, अभी से। घर का लोन, साहूकार का पैसा, गहनों की गिरवी—सब मैं चुकाऊंगा। मेरी नौकरी, मेरी सेविंग्स सब इसी के लिए है।"
"पर विक्कू..." सरिता ने रोकना चाहा।
"नहीं दीदी," विकास ने उसका हाथ थाम लिया। "तुमने माँ को अपना समय दिया, अपनी जवानी दी, अपनी रातों की नींद दी। वो कर्ज मैं सात जन्मों में भी नहीं उतार सकता। पैसों का कर्ज तो बहुत छोटी बात है। ये घर तुम्हारा है, सिर्फ तुम्हारा। मैं बस इस घर की दीवारों पर लगी सीलन हटाऊंगा, ताकि तुम चैन से रह सको।"
अगले दिन सुबह, विकास बैंगलोर नहीं गया। वह बैंक गया, साहूकार के पास गया। उसने अपनी कार बेचने का विज्ञापन डाला और अपनी पीएफ निकालने की अर्जी दी।
जब वह शाम को घर लौटा, तो उसके हाथ में माँ के कंगन थे। उसने वो कंगन सरिता की कलाई में पहना दिए।
"ये माँ का आशीर्वाद है दीदी, और इस पर सिर्फ तुम्हारा हक है। और रही बात घर की, तो जब तक मैं ज़िंदा हूँ, इस घर की छत पर आंच नहीं आने दूंगा।"
सरिता ने अपने भाई को देखा। आज उसे लगा कि माँ सच में चली गईं, लेकिन जाते-जाते उसके छोटे भाई को 'बड़ा' बना गईं।
रिश्ते कागज के टुकड़ों पर नहीं, विश्वास की नींव पर टिके होते हैं। उस दिन उस घर का बंटवारा नहीं हुआ, बल्कि घर और मजबूत हो गया। क्योंकि जायदाद बंटी नहीं, बल्कि जिम्मेदारियां साझा हो गईं।
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**लेखक का संदेश:**
यह कहानी उन सभी भाई-बहनों के लिए है जो दूर रहकर यह सोचते हैं कि घर में रहने वाला भाई या बहन मजे कर रहा है और माता-पिता की संपत्ति पर कब्जा जमाए बैठा है। सेवा का कोई मोल नहीं होता, और जिम्मेदारियों का कोई वजन नहीं तौल सकता। जो संतान माता-पिता के पास रहकर उनकी सेवा करती है, वह सबसे बड़ी संपत्ति की हकदार वही है। शक करने से पहले एक बार उस त्याग को ज़रूर देखें जो खामोशी से किया गया है।
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