क्या मीठी जुबान हमेशा साफ दिल की निशानी होती है? या कभी-कभी शहद में डूबे अल्फाज़ भी रिश्तों को दीमक की तरह चाट जाते हैं? एक ऐसी सास की कहानी जिसने अपनी आँखों की रोशनी खोने के बाद जाना कि असली और नकली का फर्क आँखों से नहीं, महसूस करने से पता चलता है।
राय साहब का बंगला शहर के पॉश इलाके में अपनी शानो-शौकत के लिए मशहूर था। घर में सबकुछ था—दौलत, शोहरत और नौकर-चाकर। राय साहब के गुजरने के बाद घर की मालकिन सुमित्रा देवी थीं। सुमित्रा देवी के दो बेटे थे—अमित और सुमित। अमित की पत्नी का नाम था नताशा और सुमित की पत्नी थी वंदना।
नताशा शहर के एक बड़े रईस घराने से थी। वह मॉडर्न थी, खूबसूरत थी और उसकी बातों में जैसे चीनी घुली होती थी। जब वह बोलती, तो सामने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता। “माजी, आप क्यों तकलीफ करती हैं? मैं हूँ ना,” यह उसका तकियाकलाम था। दूसरी तरफ वंदना थी—एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की। वह कम बोलती थी, थोड़ी संकोच में रहती थी और उसकी आवाज में नताशा जैसी खनक या बनावटी मिठास नहीं थी। वह सीधे बात करती थी, जो कभी-कभी सुमित्रा देवी को रूखी लग जाती थी।
सुमित्रा देवी को नताशा पर बहुत गर्व था। वे अक्सर अपनी सहेलियों से कहतीं, “मेरी बड़ी बहू तो बिल्कुल लक्ष्मी है। मुँह से फूल झड़ते हैं उसके। और छोटी? बस काम से काम रखती है, कभी दो मीठे बोल नहीं बोलती।”
समय का पहिया घूमा और सुमित्रा देवी की आँखों में मोतियाबिंद उतर आया। धीरे-धीरे रोशनी कम होने लगी और एक दिन ऐसा आया जब उन्हें दिखना लगभग बंद हो गया। डॉक्टर ने ऑपरेशन की तारीख एक महीने बाद की दी। इस एक महीने के अंधेरे ने सुमित्रा देवी को रिश्तों का वह सच दिखाया जो वो खुली आँखों से कभी नहीं देख पाई थीं।
घर की जिम्मेदारी अब बहुओं पर थी।
सुबह का वक्त था। नताशा सुमित्रा देवी के कमरे में आई।
“गुड मॉर्निंग माजी! ओह माय गॉड, आप कितनी प्यारी लग रही हैं आज,” नताशा की आवाज में वही पुरानी चहक थी। “लीजिए, मैंने आपके लिए स्पेशल सूप बनवाया है। नौकरानी कह रही थी कि वो बनाएगी, पर मैंने कहा—नहीं, माजी के लिए मैं खुद अपने हाथों से बनाऊंगी।”
सुमित्रा देवी गदगद हो गईं। “जीती रहो बेटा, तू ही तो है जो बुढ़ापे में मेरा सहारा है।”
नताशा ने सूप का कटोरा मेज पर रखा और फोन पर बात करने लगी। सुमित्रा देवी ने सूप का पहला घूंट भरा। सूप बिल्कुल ठंडा था और उसमें नमक इतना तेज़ था कि गले में चुभने लगा।
“बेटा नताशा… यह सूप तो बहुत खारा है और ठंडा भी है,” सुमित्रा देवी ने झिझकते हुए कहा।
नताशा फोन पर अपनी किटी पार्टी की सहेली से बात करते हुए रुकी। उसकी आवाज तुरंत बदल गई, “माजी, डॉक्टर ने कहा है आपको टेस्ट बड्स की प्रॉब्लम हो रही है। सूप बिल्कुल परफेक्ट है। मैंने इतनी मेहनत से बनाया और आप नुक्स निकाल रही हैं? खैर, पी लीजिये, सेहत के लिए अच्छा है।”
सुमित्रा देवी चुप हो गईं। उन्हें लगा शायद उन्हीं की जीभ का स्वाद बिगड़ गया है। उन्होंने मन मार कर वो खारा सूप पी लिया। नताशा फोन पर हँसती-खिलखिलाती कमरे से बाहर निकल गई।
दोपहर को वंदना आई।
“माजी, खाना खा लीजिये,” वंदना ने कहा। उसकी आवाज सपाट थी।
“भूख नहीं है,” सुमित्रा देवी ने चिड़चिड़ाते हुए कहा। सुबह के सूप से उनका जी मिचला रहा था।
“भूख कैसे नहीं है? दवाई खानी है आपको,” वंदना ने कड़ाई से कहा। “चुपचाप बैठिये, मैं खिलाती हूँ।”
सुमित्रा देवी को गुस्सा आया। यह लड़की कैसे बात करती है? कोई लिहाज नहीं। लेकिन जैसे ही वंदना ने पहला निवाला उनके मुँह में डाला, सुमित्रा देवी हैरान रह गईं। खिचड़ी थी, लेकिन एकदम गरम और हल्की। बिल्कुल वैसा स्वाद जैसा उन्हें पसंद था—हल्का नमक, थोड़ा सा घी।
“वंदना, यह तूने बनाई है?” सुमित्रा देवी ने पूछा।
“हाँ, महराज जी (रसोइया) ने बहुत तेल डाल दिया था सब्जी में। आपके बीपी के लिए ठीक नहीं है, इसलिए मैंने खिचड़ी बना दी। अब नखरे मत कीजिये, पूरा खत्म कीजिये,” वंदना ने डांटने वाले अंदाज में कहा, लेकिन हर निवाले के साथ वह उनके मुँह को नैपकिन से पोंछती जा रही थी।
दिन बीतते गए। सुमित्रा देवी को एहसास होने लगा कि नताशा के कमरे में आते ही इत्र की खुशबू तो आती थी, लेकिन उसके बाद जो होता था, वह तकलीफदेह था। नताशा अक्सर आती, मीठी बातें करती, “माजी, आपके पैर दबा दूँ?” और फिर पैर दबाते वक्त उसका ध्यान मोबाइल में होता। वह जोर-जोर से झटके देती, जिससे सुमित्रा देवी को और दर्द होता। जब वो कराहतीं, तो नताशा कहती, “अरे माजी, आपकी हड्डियाँ कमजोर हो गई हैं, थोड़ा सा दबाव भी नहीं सह पातीं।”
दूसरी तरफ वंदना थी। वह कभी पूछती नहीं थी कि पैर दबा दूँ या नहीं। वह बस रात को आती, चुपचाप बाम लगाती और इतनी कोमलता से मालिश करती कि सुमित्रा देवी को पता ही नहीं चलता कि कब उनकी आँख लग गई। वंदना कभी यह नहीं कहती थी कि “मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ”, लेकिन जब सुमित्रा देवी को बाथरूम जाना होता, तो वंदना एक आवाज पर दौड़कर आती, चाहे वह खुद कितनी भी व्यस्त क्यों न हो।
एक दिन की बात है। सुमित्रा देवी के कमरे में वकील साहब आए। सुमित्रा देवी अपनी वसीयत में कुछ बदलाव करना चाहती थीं। नताशा को इसकी भनक लग गई थी। वह तुरंत कमरे में आ गई।
“माजी, वकील साहब को क्यों तकलीफ दी? आप मुझे बता देतीं। वैसे भी अमित कह रहे थे कि अब आपकी उम्र हो गई है, ये प्रॉपर्टी के झमेले आपसे नहीं संभलेंगे। आप बस साइन कर दीजिये, हम सब संभाल लेंगे। हम तो आपके सेवक हैं,” नताशा ने शहद में लिपटी छुरी चलाई।
तभी वंदना भी चाय लेकर आई। उसने नताशा की बात सुनी।
“वकील साहब,” वंदना ने अपनी स्वाभाविक तेज आवाज में कहा, “अभी माजी की आँख का ऑपरेशन होना है। डॉक्टर ने कहा है उन्हें किसी भी तरह का स्ट्रेस नहीं देना है। यह प्रॉपर्टी के कागज़ अभी रहने दीजिये। जब माजी ठीक हो जाएंगी और अपनी आँखों से कागज़ पढ़ पाएंगी, तब साइन करेंगी।”
नताशा भड़क गई। “वंदना! तुम बड़ों के बीच में क्यों बोल रही हो? माजी को हम पर भरोसा नहीं है क्या? माजी, देखिये ना यह कैसे बात करती है। इसे लगता है हम आपको ठग लेंगे।”
सुमित्रा देवी चुपचाप सुन रही थीं। अंधापन इंसान की सुनने की शक्ति को बढ़ा देता है। आज उन्हें नताशा की मीठी आवाज के पीछे की हड़बड़ाहट और लालच साफ़ सुनाई दे रहा था। और वंदना की रूखी आवाज में उन्हें सुरक्षा और परवाह महसूस हो रही थी। वंदना उन्हें ठगने से नहीं, बल्कि उनके अधिकार को सुरक्षित रखने की बात कर रही थी।
“वकील साहब,” सुमित्रा देवी ने कहा, “वंदना ठीक कह रही है। जब तक मेरी आँखें ठीक नहीं हो जातीं, मैं किसी कागज़ पर अंगूठा नहीं लगाऊंगी। आप जा सकते हैं।”
नताशा पैर पटकते हुए बाहर चली गई, यह बड़बड़ाते हुए कि “बुढ़िया सठिया गई है।” सुमित्रा देवी ने यह सुन लिया। वह शब्द बहुत धीमे थे, लेकिन कान के पर्दों पर हथौड़े की तरह लगे।
ऑपरेशन का दिन आया। ऑपरेशन सफल रहा। डॉक्टर ने कहा कि पट्टी दो दिन बाद खुलेगी।
घर वापस आने पर सुमित्रा देवी ने एक नाटक किया। उन्होंने घर में कहा कि डॉक्टर ने बताया है कि रोशनी वापस आने में अभी एक हफ्ता लगेगा, अभी उन्हें कुछ नहीं दिख रहा।
यह झूठ उन्होंने जानबूझकर बोला था। वह देखना चाहती थीं कि अब, जब सब सोच रहे हैं कि वो अभी भी अंधी हैं, तो उनका व्यवहार कैसा होता है।
अगले दिन सुबह नताशा आई।
“गुड मॉर्निंग माजी!” नताशा ने कहा। सुमित्रा देवी ने (नाटक करते हुए) हवा में हाथ हिलाया।
सुमित्रा देवी ने अपनी धुंधली आँखों से देखा (जो अब ठीक हो चुकी थीं)। नताशा ने अपनी नौकरानी को इशारा किया। नौकरानी ने बासी रोटी और कल की बची हुई सब्जी थाली में पटक दी।
नताशा ने अपनी नाक पर रुमाल रखा, जैसे सुमित्रा देवी के पास से बदबू आ रही हो। उसने मुँह बनाकर इशारे से नौकरानी को कहा कि ‘जल्दी खिला और चलो यहाँ से’।
लेकिन जुबान से बोली, “माजी, एकदम ताजा खाना बनवाया है। खाइये, आपको ताकत मिलेगी।”
सुमित्रा देवी का दिल टूट गया। वह ‘लक्ष्मी’ जिसे वह पूजती थीं, असल में एक बेहतरीन अभिनेत्री थी।
थोड़ी देर बाद वंदना आई। उसने देखा कि सुमित्रा देवी की चादर पर दाल गिर गई है (जो नौकरानी की लापरवाही से गिरी थी)।
वंदना ने तुरंत थाली हटाई।
“यह क्या तरीका है?” वंदना चिल्लाई, लेकिन सुमित्रा देवी पर नहीं, नौकरानी पर। “माजी को ऐसे खाना देते हैं? और यह चादर कब से नहीं बदली? बदबू आ रही है।”
वंदना ने तुरंत साफ चादर निकाली। उसने सुमित्रा देवी को धीरे से उठाया।
सुमित्रा देवी ने देखा (छुपकर) कि वंदना की आँखों में आंसू थे। वह बड़बड़ा रही थी, “पता नहीं ये लोग माजी का ध्यान क्यों नहीं रखते। इंसान बूढ़ा हो जाता है तो क्या कबाड़ हो जाता है?”
वंदना ने गीले तौलिये से सुमित्रा देवी का चेहरा और हाथ पोंछे। फिर अपने लिए जो खीर बनाई थी, वह कटोरी में लेकर आई।
“माजी, आज मैंने खीर बनाई थी। आपको मीठा मना है, पर आज थोड़ा सा खा लीजिये, मेरा मन था आपको खिलाने का,” वंदना की आवाज में वही पुराना रूखापन था, कोई बनावट नहीं।
सुमित्रा देवी की आँखों से आँसू बह निकले। यह आँसू बीमारी के नहीं, पश्चाताप के थे।
“क्या हुआ माजी? दर्द हो रहा है?” वंदना घबरा गई।
सुमित्रा देवी ने वंदना का हाथ पकड़ लिया। उन्होंने अपनी आँखें पूरी खोल दीं और सीधे वंदना की आँखों में देखा।
“नहीं बहु, दर्द नहीं हो रहा। आज मेरा मोतियाबिंद पूरी तरह कट गया।”
वंदना हैरान रह गई। “माजी? आपको दिख रहा है?”
सुमित्रा देवी ने वंदना को गले लगा लिया।
“हाँ बहु, मुझे दिख रहा है। मुझे पानी और वाणी, दोनों का फर्क दिख रहा है। लोग कहते हैं कि पानी स्वच्छ हो तो चित्र नजर आता है, लेकिन आज मैंने जाना कि वाणी मधुर हो तो जरूरी नहीं कि चरित्र भी सुंदर हो। कभी-कभी कड़वी दवा ही जान बचाती है और मीठा जहर मार देता है।”
नताशा दरवाजे पर खड़ी यह सब देख रही थी। उसका चेहरा पीला पड़ गया था। उसकी पोल खुल चुकी थी। सुमित्रा देवी ने उसकी तरफ देखा, लेकिन कोई गुस्सा नहीं किया। बस एक शांत, भेदती हुई नज़र।
“नताशा,” सुमित्रा देवी ने कहा, “तेरी जुबान में रस है, पर तेरे मन में मैल। और वंदना की जुबान में शायद कांटें हैं, लेकिन इसका मन फूल जैसा कोमल है। आज से इस घर की तिजोरी की चाबी और मेरी जिम्मेदारी, दोनों वंदना के पास रहेगी।”
उस दिन राय साहब के बंगले में एक नई परिभाषा लिखी गई। सुंदरता चेहरे की नहीं, सेवा की होती है। और मिठास शब्दों की नहीं, नीयत की होती है। सुमित्रा देवी ने समझ लिया था कि जो पानी (आचरण) साफ होता है, उसी में ईश्वर का चित्र नजर आता है, और जो वाणी (बोली) सच बोलती है, चाहे कड़वी ही क्यों न हो, उसी में असली चरित्र नजर आता है।
वंदना आज भी कम बोलती है, लेकिन अब सुमित्रा देवी को उसकी खामोशी में दुनिया का सबसे मधुर संगीत सुनाई देता है।
**समापन:**
दोस्तों, हम अक्सर बाहरी दिखावे और मीठी बातों में आकर अपनों को परखने में गलती कर देते हैं। कड़वा बोलने वाला व्यक्ति अक्सर दिल का साफ़ होता है क्योंकि उसे छल-कपट नहीं आता, जबकि मीठा बोलने वाले के दिल में क्या है, यह जान पाना समुद्र की गहराई नापने जैसा मुश्किल है। रिश्तों को शब्दों से नहीं, उनके द्वारा किए गए त्याग और समर्पण से तौलना चाहिए। जो आपके बुरे वक्त में साये की तरह साथ खड़ा हो, वही आपका अपना है, चाहे उसकी जुबान कितनी भी कड़वी क्यों न हो।
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