बारिश की पहली फुहार ने मिट्टी की सोंधी खुशबू पूरे घर में बिखेर दी थी। 65 वर्षीय सावित्री जी बालकनी में बैठीं उस बारिश को देख रही थीं। उनका हाथ आदतन बगल वाली कुर्सी की तरफ बढ़ा, जैसे किसी को इशारा कर रही हों कि "देखो, आज फिर वही मौसम है।" लेकिन उनकी उंगलियों ने हवा को छूकर महसूस किया कि वह कुर्सी खाली है। पिछले दो सालों से वह कुर्सी खाली ही थी।
रसोई से कुकर की सीटी बजी और सावित्री जी की तंद्रा टूटी। उन्होंने अपनी छड़ी उठाई और धीरे-धीरे रसोई की तरफ बढ़ीं।
"बहू, चाय बना रही हो क्या? एक कप मेरे लिए भी बना देना, अदरक वाली," सावित्री जी ने अपनी बहू, मेघा से कहा।
"जी मम्मी जी, बस अभी बना रही हूँ," मेघा ने जल्दी-जल्दी हाथ चलाते हुए कहा। "अरे हाँ, आज तो रोहन (पोता) की पीटीएम है, हमें जल्दी निकलना होगा। मम्मी जी, आप चाय पीकर कप सिंक में रख दीजिएगा, मैं आकर धो लूँगी।"
सावित्री जी ने सिर हिलाया। थोड़ी देर बाद मेज पर चाय का कप आ गया। सावित्री जी ने कप उठाया और ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठ गईं। सामने उनका बेटा, विकास, लैपटॉप खोले बैठा था और फोन पर ज़ोर-ज़ोर से किसी क्लाइंट को समझा रहा था।
सावित्री जी का मन हुआ कि विकास से कहें, "बेटा, देख आज वैसी ही बारिश हो रही है जैसी तेरे पापा के स्कूटर पर हम भीगते हुए गए थे।" उनके अंदर एक उत्साह था, एक पुरानी याद साझा करने की तड़प थी।
जैसे ही विकास का फोन कटा, सावित्री जी बोलीं, "विक्की बेटा, तुझे याद है जब तू छोटा था और ऐसी ही बारिश में..."
"मम्मी प्लीज!" विकास ने झुंझलाते हुए कहा। "अभी नहीं। मेरा बहुत ज़रूरी मेल अटक गया है। वाई-फाई भी आज ही खराब होना था। बाद में बात करते हैं ना।"
सावित्री जी के शब्द गले में ही अटक गए। उन्होंने फीकी मुस्कान के साथ कहा, "कोई बात नहीं बेटा, तू काम कर ले।"
थोड़ी देर में बेटा, बहू और पोता तैयार होकर चले गए। घर का मुख्य दरवाजा बंद हुआ और एक भारी सन्नाटा पूरे घर में पसर गया। सावित्री जी, जो अभी तक सोफे के कोने में बैठी थीं, उठीं और अपने कमरे में चली गईं।
कमरे की दीवार पर उनके पति, स्वर्गीय रमेश जी की तस्वीर टंगी थी। सावित्री जी ने अपनी चाय का कप टेबल पर रखा और तस्वीर के सामने खड़ी हो गईं।
"देख रहे हो रमेश? आज फिर हार गई मैं। आज फिर मेरे पास कहने को बहुत कुछ था, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं। बच्चे बुरे नहीं हैं, मैं जानती हूँ। वे मेरा ख्याल रखते हैं। समय पर दवा देते हैं, खाने की प्लेट हाथ में पकड़ा देते हैं, डॉक्टर के पास ले जाते हैं। लेकिन... लेकिन वो मेरे 'मन' का हाल नहीं पूछते। वो मेरी सेवा करते हैं रमेश, पर मुझसे 'बात' नहीं करते।"
सावित्री जी की आँखों से आंसू बहने लगे। उन्हें याद आया कि कैसे रमेश जी और वो घंटों बालकनी में बैठकर बिना कुछ बोले भी एक-दूसरे की बात समझ लेते थे। कैसे एक कप चाय पर दुनिया भर की चर्चा होती थी। जीवन साथी का मतलब सिर्फ साथ रहना नहीं होता, बल्कि उस मानसिक जुड़ाव का होना होता है जहाँ आप अपने बुढ़ापे के डर, अपनी छोटी-छोटी खुशियाँ और बेतुकी बातें बिना झिझक साझा कर सकें।
आज घर में सब कुछ था—सुख, सुविधा, पैसा, परिवार। लेकिन वो 'एक शख्स' नहीं था जो उनकी खामोशी पढ़ सके। बेटे-बहू अपनी गृहस्थी और करियर की दौड़ में इतने व्यस्त थे कि उन्हें सावित्री जी की ज़रूरतें तो याद रहती थीं, लेकिन सावित्री जी का 'अकेलापन' दिखाई नहीं देता था।
सावित्री जी ने अपनी डायरी खोली। जब से रमेश जी गए थे, उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। क्योंकि जब इंसान के पास बात करने के लिए कोई नहीं होता, तो कागज और कलम ही सबसे अच्छे श्रोता बन जाते हैं।
उन्होंने कांपते हाथों से लिखा:
"रमेश, लोग कहते हैं कि समय के साथ घाव भर जाते हैं। लेकिन जीवन साथी के जाने का घाव समय के साथ और गहरा होता जाता है। जवानी में तो दुनिया की भीड़ में मन लग जाता है, लेकिन बुढ़ापे की इस ढलान पर जब बच्चे अपने घोंसले बनाने में व्यस्त हो जाते हैं, तब उस एक साथी की कमी सबसे ज़्यादा खलती है जो हाथ पकड़कर कहे—'चिंता मत करो, मैं हूँ ना'।"
शाम को जब बच्चे वापस आए, तो घर फिर से शोर से भर गया।
"मम्मी जी, आज तो बहुत थक गए," मेघा ने सोफे पर गिरते हुए कहा। "आप बताइए, आपका दिन कैसा रहा? आपने खाना खाया न?"
सावित्री जी मुस्कुराईं। "हाँ बेटा, खा लिया। मेरा दिन... बस अच्छा था।"
उन्होंने यह नहीं बताया कि उन्होंने दोपहर का खाना नहीं खाया क्योंकि उन्हें भूख नहीं थी। उन्होंने यह नहीं बताया कि आज पुरानी यादों ने उन्हें बहुत सताया। उन्होंने बस वही जवाब दिया जो बच्चे सुनना चाहते थे।
क्योंकि सावित्री जी समझ चुकी थीं कि 'देखभाल' और 'साथ' में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। बच्चे 'देखभाल' कर सकते हैं, लेकिन 'साथ' तो वही दे सकता है जिसने आपके साथ जीवन का सफर तय किया हो। उस दिन सावित्री जी ने महसूस किया कि जीवन साथी सिर्फ एक रिश्ता नहीं, बल्कि वह आईना होता है जिसमें आप खुद को ज़िंदा महसूस करते हैं। उसके जाने के बाद, आप बस सांस लेते हैं, जीते नहीं।
उस रात, सावित्री जी ने अपने बिस्तर के बगल वाले तकिए को थपथपाया और खालीपन को ओढ़कर सो गईं, इस उम्मीद में कि शायद सपने में ही सही, वो अधूरी चाय की चुस्कियां पूरी हो सकें।
क्या आपने भी अपने घर में किसी बुजुर्ग की आँखों में यह सूनापन देखा है? क्या हम अपनी व्यस्तता में अपने माता-पिता के उस साथी की कमी को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।
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