माधव के घर का आंगन आज भी वैसा ही था, जैसा बीस साल पहले हुआ करता था। वही तुलसी का चौंतरा, वही पुरानी आराम कुर्सी और वही खामोशी। लेकिन आज इस खामोशी में एक चुभन थी। माधव के हाथों में एक पुरानी एल्बम थी, जिसमें उसके छोटे भाई सुमित और छोटी बहन अंजलि की बचपन की तस्वीरें थीं। इन तस्वीरों को देखते हुए माधव की आँखों में आंसू तैर गए, लेकिन ये आंसू किसी याद की खुशी के नहीं, बल्कि उस कड़वे सच के थे जिसने पिछले कुछ महीनों में माधव की आत्मा को छलनी कर दिया था।
माधव महज़ बाइस साल का था जब उसके पिता का साया सिर से उठ गया था। घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। सुमित उस समय दसवीं में था और अंजलि आठवीं में। माधव बहुत होनहार था, उसे शहर के एक बड़े कॉलेज में दाखिला भी मिल गया था, लेकिन पिता के जाने के बाद उसने अपनी किताबों को हमेशा के लिए एक पुराने बक्से में बंद कर दिया। उसने पिता की एक छोटी सी परचून की दुकान संभाल ली। माधव ने दिन-रात एक कर दिया। वह खुद फटे कपड़े पहनता, लेकिन सुमित और अंजलि की हर फरमाइश पूरी करता। सुमित को इंजीनियरिंग करवाई और अंजलि को अच्छे कॉलेज से पढ़ाकर उसकी धूमधाम से शादी की।
इस पूरे सफर में अगर किसी ने माधव का बिना शर्त साथ दिया, तो वो थी उसकी पत्नी, जानकी। जानकी ने कभी अपने लिए कोई नई साड़ी नहीं मांगी। उसने सुमित और अंजलि को अपने बच्चों की तरह पाला। जब सुमित की नौकरी शहर की एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में लगी और अंजलि की शादी एक रईस घर में हुई, तो माधव और जानकी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उन्हें लगा कि उनका संघर्ष अब सफल हो गया है। सुमित और अंजलि त्योहारों पर घर आते, माधव उन्हें सिर आंखों पर बिठाता। सब कुछ बहुत खूबसूरत लग रहा था, एक भ्रम की तरह।
लेकिन ज़िंदगी की असली परीक्षा खुशियों में नहीं, बल्कि आंसुओं में होती है। और माधव की यह परीक्षा छह महीने पहले शुरू हुई।
एक शाम अचानक जानकी के सीने में तेज़ दर्द उठा। माधव उसे तुरंत शहर के बड़े अस्पताल ले गया। डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि जानकी के दिल की तीन नसें ब्लॉक हैं और अगले अड़तालीस घंटों के भीतर उसकी ओपन हार्ट सर्जरी करनी होगी। इस पूरे इलाज का खर्च करीब आठ लाख रुपये था। माधव के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसकी छोटी सी दुकान की कमाई से उसने जो कुछ भी बचाया था, वह मुश्किल से दो लाख रुपये ही था।
माधव घबराया हुआ था, लेकिन उसे तसल्ली थी कि उसके पास उसका परिवार है। उसने अस्पताल के गलियारे में खड़े होकर सबसे पहले अपने छोटे भाई सुमित को फोन मिलाया। सुमित ने दो बार फोन काट दिया। तीसरी बार जब फोन उठा, तो माधव ने रोते हुए जानकी की हालत और पैसों की ज़रूरत के बारे में बताया।
दूसरी तरफ से कुछ पल की खामोशी रही, फिर सुमित ने बहुत ही सधे हुए, ठंडे स्वर में कहा, "भैया, आपने बताया नहीं कि भाभी की तबीयत इतनी खराब है। लेकिन भैया, पैसों का थोड़ा टाइट है अभी। मैंने पिछले महीने ही नई कार फाइनेंस करवाई है और अगले हफ्ते पत्नी को लेकर मालदीव ट्रिप पर जाना है, सारी बुकिंग्स हो चुकी हैं। आप एक काम करो, भाभी को किसी सरकारी अस्पताल में शिफ्ट कर लो, वहां कम खर्चे में हो जाएगा। मैं कोशिश करके बीस-पच्चीस हज़ार भिजवा दूंगा।"
माधव के हाथ से फोन लगभग छूट ही गया। जिस भाई की इंजीनियरिंग की फीस भरने के लिए माधव ने अपनी पुश्तैनी ज़मीन का एक हिस्सा बेच दिया था, आज उस भाई के पास अपनी भाभी की जान बचाने के लिए मालदीव ट्रिप कैंसल करने का विकल्प नहीं था।
माधव ने खुद को संभाला और नम आँखों से अपनी लाडली बहन अंजलि को फोन किया। अंजलि ने पूरी बात सुनी और बहुत ही दयनीय आवाज़ बनाते हुए बोली, "भैया, बहुत बुरा हुआ। पर आप तो जानते हैं, मेरे पति को बिज़नेस में घाटा हुआ है (जो कि सच नहीं था)। मैं उनसे मायके के लिए पैसे कैसे मांग सकती हूँ? मेरी तो खुद की कोई कमाई नहीं है। आप कुछ कर्ज़ लेकर देख लीजिए, मैं भगवान से भाभी के लिए प्रार्थना करूंगी।"
कॉल कट गई। माधव अस्पताल की ठंडी ज़मीन पर बैठ गया। उस दिन उसे समझ में आया कि रिश्ते और अपनापन सिर्फ तब तक मीठे लगते हैं जब तक आप देने वाले (Giver) होते हैं। जिस दिन आप मांगने वाले (Seeker) बन जाते हैं, रिश्ते अपनी हैसियत दिखा देते हैं।
माधव ने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। उसने जानकी के बचे हुए कुछ गहने बेचे और जिस दुकान को उसने अपने पिता की निशानी समझकर बीस साल सींचा था, उसे एक सेठ के पास गिरवी रख दिया। जानकी का ऑपरेशन हुआ। पंद्रह दिन माधव ने अकेले अस्पताल की ज़मीन पर सोकर काटे। न सुमित देखने आया और न अंजलि। दोनों ने बस एक-एक बार फोन करके अपना 'फर्ज़' निभा लिया।
वक्त गुज़रता गया। जानकी अब धीरे-धीरे ठीक हो रही थी। लेकिन माधव अंदर से बहुत शांत और खामोश हो गया था। उसकी आँखों में अब अपने भाई-बहनों के लिए वो पुराना इंतज़ार और प्यार नहीं बचा था। उसने जीवन की सबसे कड़वी सच्चाई को पी लिया था।
दीवाली का त्योहार नज़दीक था। हर साल की तरह इस बार भी सुमित अपनी पत्नी के साथ और अंजलि अपने पति के साथ त्योहार मनाने गांव वाले घर आए। उन्होंने घर में ऐसे प्रवेश किया जैसे कुछ हुआ ही न हो। वे अपने साथ मिठाई के कुछ डिब्बे लाए थे।
"भैया! कैसे हो आप? और भाभी कैसी हैं अब?" सुमित ने माधव के गले लगते हुए एक बनावटी उत्साह के साथ पूछा।
माधव ने भी बिना किसी शिकन के उन्हें गले लगाया। "मैं ठीक हूँ, जानकी भी पहले से बेहतर है।"
जानकी, जो अभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं थी, उठी और उनके लिए चाय-नाश्ता बनाने लगी। अंजलि या सुमित की पत्नी में से किसी ने भी जानकी के हाथ से चाय की ट्रे लेने की कोशिश नहीं की। वे महंगे कपड़ों में सजे हुए थे और सोफे पर बैठकर अपने नए फ्लैट और गाड़ियों की चर्चा कर रहे थे। माधव दूर एक कुर्सी पर बैठा उनकी इस खोखली दुनिया को चुपचाप देख रहा था।
रात को खाने के बाद, सुमित ने माधव के पास आकर एक बात छेड़ी। "भैया, मैं और अंजलि कुछ दिनों से एक बात सोच रहे थे। अब आप और भाभी अकेले इस बड़े से पुराने घर में क्या करेंगे? यह घर और जो अपनी दुकान है, वो मेन मार्केट में है। उसकी बहुत अच्छी कीमत मिल रही है। एक बिल्डर दोस्त है मेरा। हम इस प्रॉपर्टी को बेच देते हैं। जो पैसे मिलेंगे, उसमें से कुछ से आप शहर के किनारे एक छोटा सा फ्लैट ले लेना, और बाकी पैसों से मैं अपना एक नया स्टार्टअप शुरू कर लूँगा। अंजलि को भी उसके हिस्से के कुछ पैसे मिल जाएंगे। आखिर यह पुश्तैनी संपत्ति है, तो हमारा भी हक़ बनता है न?"
अंजलि ने भी तुरंत हाँ में हाँ मिलाई, "हाँ भैया, सुमित बिल्कुल सही कह रहा है। आप तो वैसे भी ज़्यादा कमा नहीं पाते, ये पैसे हम सबके काम आएंगे।"
माधव ने उन दोनों की आँखों में देखा। वहां लालच, स्वार्थ और बेशर्मी का एक ऐसा नंगा नाच चल रहा था कि माधव को अपने ही खून पर घिन आने लगी। जिस घर और दुकान को बचाए रखने के लिए उसने अपनी जवानी जला दी, जिस दुकान को उसने जानकी की जान बचाने के लिए गिरवी रख दिया क्योंकि उसके अपने भाई-बहनों ने उसे मरने के लिए छोड़ दिया था, आज वो उसी संपत्ति में अपना 'हक़' मांगने चले आए थे।
माधव को गुस्सा नहीं आया। वह उठा, अपनी अलमारी के पास गया और उसमें से एक फाइल निकालकर लाया। उसने वह फाइल सुमित के सामने मेज़ पर रख दी।
"यह क्या है भैया?" सुमित ने पूछा।
"यह इस घर और दुकान के कागज़ात हैं सुमित," माधव ने एक बहुत ही ठंडी और ठहरी हुई आवाज़ में कहा। "लेकिन तुम इसे बेच नहीं सकते।"
"क्यों? हमारा हक़ है इस पर," अंजलि ने ज़रा तेज़ आवाज़ में कहा।
"हाँ, तुम्हारा हक़ था," माधव मुस्कुराया, एक ऐसी मुस्कान जिसमें सदियों का दर्द छिपा था। "पर तुम्हें पता नहीं है कि छह महीने पहले जब जानकी अस्पताल में मौत से लड़ रही थी, और तुम दोनों ने अपने फोन पर मेरे दर्द की आवाज़ सुनने से इंकार कर दिया था, तब मैंने इस घर और दुकान को बेच दिया था। यह घर अब हमारा नहीं है। मैं तो बस इस महीने के अंत तक यहाँ किराएदार के रूप में रह रहा हूँ। जो पैसे मिले, वो जानकी की सांसें खरीदने में खर्च हो गए।"
सुमित और अंजलि के चेहरों का रंग उड़ गया। उनका लालच उनके चेहरों पर झल्लाहट बनकर दिखने लगा।
"भैया! आपने हमसे बिना पूछे इतनी बड़ी पुश्तैनी प्रॉपर्टी बेच दी? हमारा हिस्सा भी हमें नहीं दिया? यह तो सरासर धोखा है!" सुमित चिल्लाने लगा।
अंजलि भी बिफर पड़ी, "आप हमेशा से स्वार्थी थे भैया। आपने हमारी कभी परवाह ही नहीं की।"
माधव अपनी जगह से नहीं हिला। उसने बहुत ही शांत कदमों से सुमित के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा। माधव की आँखों में कोई आंसू नहीं थे, बस एक वीरान बंजरपन था।
"धोखा? स्वार्थ?" माधव की आवाज़ गूंजी। "सुमित, अंजलि... जब मैंने अपनी पढ़ाई छोड़कर तुम्हें इस लायक बनाया कि तुम आज करोड़ों की बातें कर सको, तब मैं स्वार्थी नहीं था? जब मेरी पत्नी ने तुम्हारी हर झूठन साफ की, तब वो स्वार्थी नहीं थी? मेरी जान की कीमत पर तुम आज यहाँ खड़े हो। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी तुम्हारे नाम कर दी, और तुम मुझे स्वार्थी कह रहे हो?"
सुमित और अंजलि की आँखें नीची हो गईं, लेकिन उनके अंदर का अहंकार अभी भी ज़िंदा था।
माधव ने एक गहरी सांस ली, और कमरे में सन्नाटा छा गया। माधव ने उनके चेहरों को आखिरी बार देखा और वो बात कही जिसने उनके दिलों को हमेशा के लिए बेध दिया:
"जिंदगी भर मैंने तुम्हें अपना माना, अपनी हर खुशी तुम्हारे नाम कर दी। पर छह महीने पहले उस अस्पताल के बाहर मुझे एक बात समझ में आई। फुर्सत मिले तो कभी बैठ कर सोचना… तुम भी मेरे अपने हो, या सिर्फ हम ही तुम्हारे हैं..।"
कमरे में एक भारी सन्नाटा पसर गया। माधव के उस एक सवाल में इतनी पीड़ा, इतनी सच्चाई और इतना बड़ा तमाचा था कि सुमित और अंजलि की आत्मा कांप उठी। उनके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे। माधव और जानकी चुपचाप अपने कमरे में चले गए। अगली सुबह जब सुमित और अंजलि सोकर उठे, तो उन्होंने देखा कि माधव और जानकी अपना थोड़ा सा सामान लेकर हमेशा के लिए उस घर से जा चुके थे। वे कहाँ गए, किसी को नहीं पता था। लेकिन वो जाते-जाते सुमित और अंजलि को एक ऐसे अपराधबोध और खालीपन में छोड़ गए थे, जिसका बोझ उन्हें ज़िंदगी भर ढोना था।
रिश्ते ताली की तरह होते हैं, जो दोनों हाथों से बजते हैं। जब एक तरफ का हाथ हमेशा के लिए थक जाता है, तो फिर वहां सिर्फ खामोशी और पछतावा ही बाकी रह जाता है।
आपके लिए एक सवाल:
क्या आपको भी लगता है कि अक्सर परिवारों में जो इंसान सबसे ज़्यादा त्याग करता है, उसे ही सबसे ज़्यादा 'टेकन फॉर ग्रांटेड' (हल्के में) लिया जाता है? क्या माधव का बिना कुछ कहे हमेशा के लिए चले जाना सही फैसला था? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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