रितिका के ये कड़वे शब्द किसी खंजर की तरह पल्लवी के सीने में उतर गए। उसकी आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली। विकास अवाक रह गया, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही बहन है जिसे उन्होंने खून-पसीने से सींचा था। पल्लवी ने अपने आँसू पोंछे और रुंधे हुए गले से बोली, "मुझे माफ़ कर दे रितिका। मुझसे गलती हो गई। हम अभी चले जाते हैं।"
शहर के सबसे पॉश इलाके में स्थित 'मल्होत्रा हाउस' आज रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगा रहा था। मौका था घर की छोटी बहू, रितिका और उसके पति रोहन की शादी की पहली सालगिरह का। लॉन में शहर के नामी-गिरामी लोगों का जमावड़ा था। विदेशी फूलों की महक और महंगे परफ्यूम की खुशबू हवा में घुली हुई थी। रितिका एक बेहद महंगे डिज़ाइनर गाउन में सजी हुई किसी बॉलीवुड अभिनेत्री से कम नहीं लग रही थी। उसकी सहेलियाँ और हाई-सोसाइटी की महिलाएँ उसे घेरकर खड़ी थीं और उसके रूप, उसके गहनों और उसकी किस्मत की तारीफों के पुल बांध रही थीं। रितिका का सीना गर्व से चौड़ा हो रहा था।
रितिका मूल रूप से एक बहुत ही साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती थी। उसके पिता का साया बचपन में ही सिर से उठ गया था। उसके बड़े भाई, विकास और भाभी, पल्लवी ने ही उसे माता-पिता का प्यार देकर पाला था। पल्लवी एक बेहद शांत, समझदार और सादगी पसंद महिला थी। जब रितिका ने एमबीए (MBA) जैसे महंगे कोर्स में दाखिला लेने की ज़िद की थी, तो घर के हालात ऐसे नहीं थे कि इतनी भारी फीस भरी जा सके। लेकिन पल्लवी ने हार नहीं मानी। उसने घर के खर्चों में कटौती की, अपनी छोटी-सी सिलाई मशीन पर रात-रात भर जागकर लोगों के कपड़े सिले और तीन साल तक अपने लिए त्योहारों पर एक भी नई साड़ी नहीं खरीदी। पल्लवी की उसी तपस्या का फल था कि रितिका की पढ़ाई पूरी हुई और उसे एक अच्छी नौकरी मिली, जहाँ रोहन मल्होत्रा से उसकी मुलाकात हुई और दोनों की शादी हो गई।
शादी के बाद, दौलत की सीढ़ियां चढ़ते ही रितिका की आँखें इस चकाचौंध में ऐसी चौंधिया गईं कि वह अपने अतीत और अपनों के बलिदान को भूलने लगी। उसे अब अपने मायके का साधारण रहन-सहन अपनी 'क्लास' के खिलाफ लगने लगा था। वह अक्सर मायके जाने से कतराती और अगर विकास या पल्लवी फोन करते, तो 'मीटिंग में हूँ' कहकर फोन काट देती।
आज उसकी सालगिरह की इस शानदार पार्टी में विकास और पल्लवी भी आमंत्रित थे। रितिका की सास, कांता देवी, जो बहुत ही सुलझी हुई और ज़मीन से जुड़ी महिला थीं, ने खास तौर पर विकास और पल्लवी को बुलवाया था।
पार्टी शबाब पर थी, तभी गेट से विकास और पल्लवी ने अंदर प्रवेश किया। विकास ने एक साधारण सा पैंट-शर्ट पहना था और पल्लवी ने एक हल्के गुलाबी रंग की सूती सिल्क की साड़ी। साड़ी साफ-सुथरी थी, लेकिन उसकी चमक बता रही थी कि वह नई नहीं है। पल्लवी के हाथों में एक सुंदर सा कपड़े का थैला था, जिसे वह बहुत सहेज कर पकड़े हुए थी। दोनों संकोच के साथ पार्टी के उस चकाचौंध भरे माहौल में आगे बढ़ रहे थे।
रितिका की नज़र जैसे ही अपने भाई-भाभी पर पड़ी, उसके माथे पर बल पड़ गए। उसे लगा कि उसकी सहेलियाँ उसके मायके वालों के इस साधारण रूप को देखकर उसका मज़ाक उड़ाएंगी। वह तेज़ी से उनके पास पहुँची।
"भैया, भाभी... आप लोग आ गए," रितिका ने एक बनावटी मुस्कान के साथ कहा, लेकिन उसकी नज़रें पल्लवी की उस पुरानी साड़ी पर टिकी थीं।
"सालगिरह बहुत-बहुत मुबारक हो रितिका," पल्लवी ने स्नेह से रितिका के माथे को चूमते हुए कहा। "हम बस से आए ना, इसलिए थोड़ा लेट हो गए।"
'बस' शब्द सुनते ही रितिका ने घबराकर आस-पास देखा कि कहीं किसी ने सुन तो नहीं लिया। "भाभी, आप लोग कैब क्यों नहीं कर लेते? और... और भाभी, यह आपने क्या पहना है? यह मेरी सालगिरह की पार्टी है, शहर के इतने बड़े-बड़े लोग आए हैं। आप कोई अच्छी सी भारी साड़ी नहीं पहन सकती थीं? मेरा सारा इंप्रेशन खराब कर दिया आपने।"
पल्लवी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। विकास ने अपनी बहन को समझाते हुए कहा, "रितिका, तेरे लिए जो तोहफा लिया था, उसमें थोड़े पैसे ज़्यादा लग गए, इसलिए तेरी भाभी ने कहा कि वो पुरानी साड़ी में ही काम चला लेगी। तू तोहफा देख, तुझे बहुत पसंद आएगा।"
पल्लवी ने कांपते हाथों से वह थैला खोला। अंदर एक बेहद खूबसूरत, हाथ की कढ़ाई किया हुआ शिफॉन का सूट था और साथ में एक छोटी सी डिब्बी में सोने की एक पतली सी चेन थी। पल्लवी ने पिछले छह महीनों से रात-रात भर जागकर उस सूट पर खुद अपने हाथों से कढ़ाई की थी, क्योंकि रितिका को बचपन से ही हाथ की कढ़ाई वाले कपड़े बहुत पसंद थे।
लेकिन रितिका का अहंकार अब आसमान छू रहा था। अपनी कुछ अमीर सहेलियों को अपनी ओर आता देख वह घबरा गई। उसने बिना सोचे-समझे पल्लवी के हाथों से वह थैला लिया और उसे पास ही रखी एक खाली मेज़ पर लगभग पटकते हुए कहा, "भाभी, आपको समझ नहीं आता क्या? अब मेरी पसंद बदल चुकी है। मैं अब ब्रांडेड कपड़े पहनती हूँ, यह आपकी सिलाई मशीन वाले कपड़े नहीं। और यह पतली सी चेन? मेरे ससुराल वाले देखेंगे तो क्या कहेंगे कि रितिका के मायके वालों ने क्या भिकारियों वाला शगुन दिया है! आपको अगर सलीका नहीं था तो आने की क्या ज़रूरत थी? मेरी बेइज्जती कराने आ गए बस!"
रितिका के ये कड़वे शब्द किसी खंजर की तरह पल्लवी के सीने में उतर गए। उसकी आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली। विकास अवाक रह गया, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही बहन है जिसे उन्होंने खून-पसीने से सींचा था। पल्लवी ने अपने आँसू पोंछे और रुंधे हुए गले से बोली, "मुझे माफ़ कर दे रितिका। मुझसे गलती हो गई। हम अभी चले जाते हैं।"
पल्लवी मुड़ी ही थी कि तभी पीछे से एक गंभीर और कड़क आवाज़ आई, "रुकिए पल्लवी जी, आप कहीं नहीं जाएंगी।"
यह आवाज़ रितिका की सास, कांता देवी की थी। उन्होंने यह पूरा तमाशा देख लिया था। कांता देवी ने मेज़ पर से उस हाथ की कढ़ाई वाले सूट और चेन को बहुत ही सम्मान के साथ उठाया और अपने सीने से लगा लिया।
"मम्मी जी... वो... मैं तो बस..." रितिका की आवाज़ लड़खड़ा गई। उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था।
कांता देवी ने रितिका को ऐसी नज़र से देखा जैसे कोई अजनबी हो। "तुम तो बस क्या, रितिका? अपनी हैसियत दिखा रही थी ना? अपनी उस भाभी को, जिसने तुम्हारी हैसियत बनाने के लिए अपनी पूरी जवानी और अपने सारे शौक कुर्बान कर दिए?"
पार्टी में अब तक सन्नाटा छा चुका था। आस-पास खड़े लोग इस दृश्य को हैरानी से देख रहे थे।
कांता देवी ने रितिका के करीब आकर कहा, "रितिका... तुमने ही तो शादी से पहले मुझे बताया था कि तुम्हारी एमबीए की भारी-भरकम फीस भरने के लिए तुम्हारी भाभी ने पूरे तीन साल तक अपने लिए एक भी नई साड़ी नहीं खरीदी थी। तुमने ही तो कहा था कि जब तुम रात को पढ़ाई करती थी, तो तुम्हारी भाभी तुम्हारे लिए जागकर सिलाई करती थी ताकि तुम्हें किताबों की कमी न हो। उन्होंने हमेशा तुम्हारी पसंद-नापसंद का ख्याल रखा, तुम्हारे सपनों को अपने सपनों से ऊपर रखा, लेकिन आज जब तुम्हारे पास दौलत आ गई, तो तुमने उनके साथ क्या किया?"
रितिका की आँखें ज़मीन में गड़ गईं। उसके होंठ कांप रहे थे, लेकिन आवाज़ नहीं निकल रही थी।
कांता देवी ने पल्लवी के कंधे पर हाथ रखा और रितिका की तरफ देखकर बोलीं, "तुम इस हाथ की कढ़ाई वाले सूट को 'सस्ता' और 'भिकारियों वाला' कह रही हो? अरे मूर्ख लड़की, इसमें जो पसीना और प्यार बुना हुआ है, उसकी कीमत मेरे बेटे की पूरी जायदाद बेचकर भी नहीं चुकाई जा सकती। तुम दौलत से अपने शरीर को तो ढक सकती हो, लेकिन तुम्हारी सोच आज भी उस फटे हुए कपड़े की तरह है जिसे रफू करने की ज़रूरत है। पल्लवी जी ने जो पुरानी साड़ी पहनी है, वह उनकी गरीबी नहीं, बल्कि उनके त्याग का प्रतीक है। उन्होंने वह पुरानी साड़ी इसलिए पहनी है ताकि आज तुम इस डिज़ाइनर गाउन में खड़ी होकर इतरा सको।"
विकास और पल्लवी अपनी आँखों से बहते आंसुओं को नहीं रोक पा रहे थे।
कांता देवी ने अपनी बात जारी रखी, "मुझे तुम पर शर्म आ रही है रितिका। जिस परिवार में रिश्तों से ज्यादा ब्रांड के टैग की अहमियत हो, वह परिवार अंदर से बहुत गरीब होता है। पल्लवी जी ने तुम्हें डिग्रियां तो दिलवा दीं, लेकिन काश! तुम इंसानियत भी पढ़ पातीं।"
ये शब्द रितिका के गाल पर किसी ज़ोरदार तमाचे की तरह लगे। उसे अचानक अपना वो अतीत याद आ गया, जब वह बीमार होती थी तो पल्लवी पूरी रात उसके सिरहाने बैठी रहती थी। जब कॉलेज में उसे प्रोजेक्ट के लिए पैसे चाहिए होते थे, तो पल्लवी अपने मायके से मिले गहने तक गिरवी रख देती थी। दौलत के नशे में उसने उस माँ समान भाभी का सरेआम अपमान कर दिया था।
रितिका का अहंकार आंसुओं में पिघलने लगा। वह घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गई और पल्लवी के पैर पकड़ लिए।
"भाभी... मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं सच में अंधी हो गई थी। इस झूठी शान-ओ-शौकत ने मेरी मति मार दी थी। मैं भूल गई थी कि आज मैं जो कुछ भी हूँ, वो सिर्फ और सिर्फ आपके बलिदानों की वजह से हूँ। प्लीज़ मुझे अपनी वही पुरानी रितिका समझकर माफ़ कर दीजिए।" वह फूट-फूट कर रो रही थी।
पल्लवी का दिल तो वैसे ही मोम का था। उसने अपनी ननद को उठाया और गले से लगा लिया। "पागल लड़की, घर में किससे गलतियां नहीं होतीं। तू तो मेरी बेटी जैसी है। चुप हो जा, आज तेरा खुशी का दिन है, ऐसे रोते नहीं हैं।"
कांता देवी ने मुस्कुराते हुए रितिका के सिर पर हाथ फेरा और कहा, "याद रखना बेटा, दुनिया की कोई भी दौलत उस प्यार और त्याग का मुकाबला नहीं कर सकती जो हमारे अपने हमारे लिए करते हैं। जब उड़ान ऊँची हो, तो ज़मीन को कभी नहीं भूलना चाहिए।"
उस रात रितिका ने अपनी सालगिरह का केक उसी हाथ की कढ़ाई वाले सूट को पहनकर काटा। उसकी अमीर सहेलियां भले ही उसे अजीब नज़रों से देख रही थीं, लेकिन रितिका को अब किसी के 'स्टैंडर्ड' की परवाह नहीं थी। उसे समझ आ गया था कि रिश्तों की असली गर्माहट दिखावे की इन खोखली महफिलों में नहीं, बल्कि अपनों के निस्वार्थ प्यार और त्याग में होती है।
एक सवाल आप सभी के लिए: क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में लोग कामयाबी और पैसा मिलने के बाद अक्सर उन लोगों के त्याग को भूल जाते हैं, जिन्होंने उन्हें उस मुकाम तक पहुँचाया हो? क्या आपने कभी किसी को ऐसे बदलते हुए देखा है? अपने अनुभव जरूर साझा करें।
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