कमरे में एक भारी सन्नाटा पसरा हुआ था, जिसे केवल सुमित्रा जी की सुबकियों की आवाज़ ही तोड़ रही थी। उनके हाथ में पकड़ा मोबाइल अब भी स्क्रीन की रोशनी से चमक रहा था। अभी-अभी उनकी अपनी बड़ी बेटी अंजलि से बात हुई थी। अंजलि फोन पर फूट-फूट कर रो रही थी। शादी को तीन साल हो गए थे, लेकिन अंजलि की सास के ताने और प्रताड़ना कम होने का नाम नहीं ले रहे थे। कभी दहेज को लेकर, तो कभी काम को लेकर अंजलि को बात-बात पर जलील किया जाता था। अपनी बेटी की सिसकियाँ सुनकर सुमित्रा जी का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच लिया था।
वे पल्लू से अपनी आँखें पोंछते हुए बड़बड़ा रही थीं, "हे भगवान! मेरी बच्ची ने क्या बिगाड़ा है किसी का। इतना सीधा स्वभाव है उसका, फिर भी उस घर में उसे पल भर का सुकून नहीं है। उसकी सास तो जैसे पत्थर की बनी है। मेरी बच्ची वहां अकेली घुट रही है और मैं यहाँ बैठकर कुछ नहीं कर पा रही।"
पास ही बैठी उनकी छोटी और अविवाहित बेटी, निहारिका, अपनी माँ को पानी का गिलास देते हुए शांत भाव से सब सुन रही थी। सुमित्रा जी ने पानी का एक घूंट लिया और रुंधे गले से बोलीं, "बेटियों का जीवन भी कैसा होता है न। माता-पिता कलेजे का टुकड़ा निकालकर किसी अनजान को सौंप देते हैं और वो लोग उस टुकड़े को पैरों तले रौंद देते हैं। एक माँ कितनी मजबूर होती है निहारिका... मैं चाह कर भी अपनी अंजलि के पास नहीं जा सकती, उसके आँसू नहीं पोंछ सकती। मुझे तो उस घर वालों पर इतना गुस्सा आ रहा है कि बस चले तो उन्हें..."
सुमित्रा जी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थीं कि निहारिका ने बहुत ही संयत लेकिन गंभीर आवाज़ में कहा, "हाँ मम्मी, आप बिल्कुल सही कह रही हैं। हर माँ सच में बहुत मजबूर होती है।"
निहारिका एक पल के लिए रुकी, उसने अपनी माँ की आँखों में सीधा देखा और फिर आगे बोली, "अब देखिए ना, हमारे ही घर में। जब भी काव्या भाभी रोती हैं, अपने आँसू अकेले में बहाती हैं, तो उनके आँसू पोंछने के लिए उनकी माँ कहाँ आ पाती हैं?"
सुमित्रा जी के रोते हुए चेहरे पर अचानक एक स्तब्धता छा गई। निहारिका की बातों ने उनके आंसुओं को जैसे बीच में ही रोक दिया।
निहारिका ने अपनी बात जारी रखी, "उन्हें भी तो कैसा ससुराल मिला है मम्मी। उनकी सास भी तो उन्हें सुबह से लेकर रात तक ताने देती रहती हैं। कल ही की तो बात है, जब दाल में नमक थोड़ा तेज हो गया था, तो आपने सबके सामने भाभी को क्या-क्या नहीं सुनाया। उनके मायके वालों को, उनके संस्कारों को बीच में ले आईं। बेचारी काव्या भाभी रसोई में जाकर चुपचाप रोती रहीं और अपनी मर्यादा के कारण कुछ नहीं कर पाईं। ठीक वैसे ही, जैसे आज अंजलि दीदी अपनी सास के सामने कुछ नहीं कर पाती हैं।"
सुमित्रा जी का मुंह खुला का खुला रह गया। वे कुछ बोलना चाहती थीं, लेकिन उनके गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी। उनका अपना ही अक्स निहारिका ने एक झटके में उनके सामने आईने की तरह खड़ा कर दिया था।
"मम्मी, क्या काव्या भाभी की माँ अपनी बेटी के लिए ऐसे ही नहीं रोती होंगी, जैसे आज आप अंजलि दीदी के लिए रो रही हैं?" निहारिका की आवाज़ अब थोड़ी भारी हो गई थी। "आप अंजलि दीदी की सास को पत्थर दिल कह रही हैं, लेकिन आप खुद काव्या भाभी के लिए क्या हैं? जब दीदी की सास दीदी को रुलाती है, तो आपको अपनी ममता याद आती है, लेकिन जब आप भाभी को रुलाती हैं, तब किसी और की ममता का दर्द आपको क्यों नहीं दिखाई देता? क्या बेटियां सिर्फ अपने घर की होती हैं? जो दूसरे घर से आई है, क्या वो किसी की बेटी नहीं है?"
कमरे में अब सुबकियों की जगह एक खौफनाक सन्नाटे ने ले ली थी। सुमित्रा जी की आँखों के सामने काव्या का वो मासूम चेहरा घूमने लगा, जो शादी करके इस घर में बड़े अरमानों से आई थी। उन्हें याद आने लगा कि कैसे उन्होंने बात-बात पर काव्या को नीचा दिखाया था। कभी उसके कपड़ों को लेकर, कभी उसके काम करने के तरीके को लेकर। जब काव्या बीमार होती थी, तब सुमित्रा जी उसे आराम करने देने के बजाय 'नाटक' कहकर ताने मारती थीं। आज जब उनकी खुद की बेटी उसी दर्द से गुजर रही थी, तो उन्हें तकलीफ हो रही थी, लेकिन जो दर्द वे खुद एक दूसरी बेटी को दे रही थीं, उसका उन्हें कभी अहसास ही नहीं हुआ।
उनका दिल आत्मग्लानि से भर गया। जिस सास को वो कोस रही थीं, असल में वो खुद भी तो वही सास थीं। निहारिका के शब्दों ने उनके भीतर की उस सोई हुई इंसानियत को झकझोर कर रख दिया था, जो अहंकार और सास होने के झूठे गुरूर के नीचे दब गई थी। सुमित्रा जी की आँखों से अब जो आँसू बह रहे थे, वो बेबसी के नहीं, बल्कि अपने ही किए पर शर्मिंदगी के थे।
वे बिना कुछ कहे धीरे से बिस्तर से उठीं और लड़खड़ाते कदमों से रसोई की तरफ चल पड़ीं।
रसोई में काव्या रात के बर्तन साफ कर रही थी। उसकी आँखें लाल थीं, शायद वह कुछ देर पहले रोई थी। सुमित्रा जी के कदमों की आहट सुनकर काव्या ने हड़बड़ाहट में अपने आँसू पोंछे और डरते हुए पीछे मुड़ी। उसे लगा कि शायद फिर से कोई काम बिगड़ गया है और अब उसे फिर ताने सुनने पड़ेंगे।
"मम्मी जी, वो दूध मैंने फ्रिज में रख दिया है और आटा भी गूंथ दिया है..." काव्या ने घबराते हुए सफाई देनी शुरू की।
लेकिन सुमित्रा जी ने कोई शिकायत नहीं की। वे काव्या के पास गईं और उसके साबुन से सने हाथों को अपने हाथों में ले लिया। काव्या इस अप्रत्याशित स्पर्श से हैरान रह गई। उसने सुमित्रा जी की आँखों में देखा, जो आंसुओं से भरी हुई थीं।
"मम्मी जी... क्या हुआ? आप रो क्यों रही हैं?" काव्या ने चिंता से पूछा।
सुमित्रा जी ने आगे बढ़कर काव्या को अपने गले से लगा लिया। काव्या एकदम सुन्न पड़ गई। इस घर में आने के बाद आज तक उसे यह प्यार नसीब नहीं हुआ था।
"मुझे माफ कर दे बेटा," सुमित्रा जी फफक-फफक कर रो पड़ीं। "मैं एक अंधी सास बन गई थी, जिसे सिर्फ अपनी बेटी का दर्द दिखाई देता था, लेकिन तेरे रूप में जो बेटी मेरे घर आई, मैं उसके आंसुओं को कभी नहीं देख पाई। आज मेरी अंजलि के आंसुओं ने मुझे तेरी माँ की पीड़ा समझा दी है। तू भी तो अपना घर-बार छोड़कर हमारे भरोसे यहाँ आई है, और मैंने तुझे सिर्फ कांटे दिए।"
काव्या, जो पिछले दो सालों से एक मशीन की तरह बस ताने सुन रही थी, इस अपनेपन को पाकर खुद को रोक नहीं पाई। वह भी सुमित्रा जी के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसके दिल में दबा सारा गुबार आज आंसुओं के जरिए बाहर निकल रहा था।
निहारिका दरवाजे पर खड़ी यह सब देख रही थी और उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। आज उस घर में एक सास की मौत हुई थी और एक माँ का जन्म हुआ था। सुमित्रा जी ने समझ लिया था कि किसी और की बेटी को रुलाकर कोई भी माँ अपनी बेटी के लिए खुशियां नहीं मांग सकती। कर्मों का चक्र यहीं घूमता है। जब तक हम दूसरों की बेटियों को अपनी बेटी नहीं मानेंगे, तब तक समाज का यह कड़वा सच कभी नहीं बदलेगा। उस रात के बाद से उस घर में 'बहू' शब्द का प्रयोग खत्म हो गया, और काव्या को सच में उसका दूसरा मायका मिल गया।
क्या आपको भी लगता है कि हमारे समाज में अक्सर बेटियों और बहुओं के लिए दोहरे मापदंड अपनाए जाते हैं? अपनी राय हमें जरूर बताएं।
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