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बिकती हुई घड़ी और खरीदा हुआ वक्त

 "बुढ़ापे में इनको टूर पर जाना है... पैसे क्या पेड़ पर उगते हैं? अभी चिंटू के स्कूल की फीस भरनी है, कार की ईएमआई पेंडिंग है, और बाबूजी को देखो, कश्मीर की वादियों में घूमने का शौक चढ़ा है!"


अजय की आवाज़ ड्राइंग रूम की दीवारों से टकराकर सीधे सोफे पर बैठे उसके पिता, दीनानाथ जी के दिल में किसी खंजर की तरह उतरी। दीनानाथ जी के हाथ में पकड़ा हुआ अखबार कांप गया। उन्होंने नज़रें नहीं उठाईं, बस सिर झुकाए बैठे रहे, मानो अखबार की सुर्खियों में अपनी शर्मिंदगी छिपाने की कोशिश कर रहे हों।


रसोई से बर्तनों की खनखनाहट के बीच अजय की पत्नी, स्नेहा की तीखी आवाज़ भी आई, "अरे, जाने दो अजय। उम्र का तकाज़ा है, दिमाग सठिया जाता है। भूल गए होंगे कि अब वो कमाने वाले नहीं, खाने वाले हैं। पेंशन के पाँच हज़ार में तो दवाइयां भी नहीं आतीं, और सपने देख रहे हैं डल झील के।"


कमरे के भीतर सन्नाटा पसर गया। यह सन्नाटा अजय के चिल्लाने से ज़्यादा शोर कर रहा था।


दीनानाथ जी धीरे से उठे। उनके घुटनों ने कड़कड़ाते हुए आवाज़ की। उन्होंने अपनी लाठी उठाई और चुपचाप अपने कमरे की ओर बढ़ गए। उनकी पत्नी, सुशीला, जो दरवाजे की ओट में खड़ी सब सुन रही थीं, जल्दी से उनके पीछे लपकीं।


कमरे में घुसते ही दीनानाथ जी बिस्तर पर बैठ गए। सुशीला जी ने पानी का गिलास उनकी ओर बढ़ाया।

"रहने दीजिए," दीनानाथ जी ने हाथ के इशारे से मना कर दिया। "प्यास नहीं है, सुशीला। शायद भूख-प्यास सब मिट गई है आज।"


सुशीला जी की आँखों में आंसू थे। "क्यों छेड़ दी आपने बात? मैंने मना किया था ना? अजय आजकल दफ्तर की परेशानियों से घिरा है। उसका स्वभाव बदल गया है।"


"स्वभाव नहीं बदला सुशीला, प्राथमिकताएं बदल गई हैं," दीनानाथ जी ने एक गहरी सांस ली। "मैं अपने लिए नहीं जाना चाहता था। मुझे कश्मीर से क्या लेना-देना? मैं तो... मैं तो बस तुम्हारे लिए जाना चाहता था।"


सुशीला जी ने हैरानी से उन्हें देखा। "मेरे लिए?"


दीनानाथ जी ने कांपते हाथों से अपनी अलमारी की दराज खोली और एक पुराना, पीला पड़ चुका लिफाफा निकाला।

"तुम्हें याद है सुशीला? पैंतालीस साल पहले, हमारी शादी के बाद, मैंने तुमसे वादा किया था कि एक दिन तुम्हें कश्मीर ले जाऊंगा। तब मेरी क्लर्क की नौकरी नई-नई थी, जेब में पैसे नहीं थे। फिर बच्चे हुए, अजय की पढ़ाई, घर का खर्च, बिटिया की शादी... जिम्मेदारियों के बोझ तले वो वादा कहीं दब गया। कल रात जब तुम अपनी दवाइयां ढूंढ रही थीं और बार-बार एक ही बात पूछ रही थीं, तो मुझे डॉक्टर की बात याद आ गई।"


सुशीला जी चुप रहीं। पिछले कुछ महीनों से वो चीजें भूलने लगी थीं। कभी गैस खुली छोड़ देतीं, तो कभी अजय का नाम भूल जातीं। डॉक्टर ने कहा था कि यह 'डिमेंशिया' (स्मृति लोप) की शुरुआत है।


दीनानाथ जी की आवाज़ भर्रा गई। "डॉक्टर ने कहा है कि धीरे-धीरे तुम्हारी याददाश्त और कमज़ोर होती जाएगी। एक दिन ऐसा आएगा जब तुम मुझे भी नहीं पहचानोगी। मैं चाहता था कि उस अंधेरे के आने से पहले, मैं तुम्हें वो वादा पूरा करके दूँ। मैं चाहता था कि तुम कश्मीर की वो वादियों को अपनी धुंधली होती यादों में एक बार बसा लो। ताकि जब तुम सब कुछ भूल जाओ, तो शायद... शायद वो खुशी का एक लम्हा तुम्हें याद रह जाए।"


सुशीला जी का गला रुंध गया। वो फूट-फूट कर रो पड़ीं। "पागल हो आप। इस उम्र में, जब बेटे को लगता है हम बोझ हैं, आप पुराने वादे निभा रहे हैं?"


"हाँ, क्योंकि अब मेरे पास वक्त नहीं है सुशीला। पैसे तो शायद मैं जुगाड़ लूँ, पर वक्त कहाँ से लाऊँ?"


अगले दो दिन घर में अजीब सी खामोशी रही। अजय ऑफिस जाता, आता, खाना खाता और अपने कमरे में बंद हो जाता। स्नेहा अपनी किटी पार्टी और फोन में व्यस्त रहती। दीनानाथ जी और सुशीला जी जैसे घर के अदृश्य हिस्से बन गए थे।


तीसरे दिन, दोपहर के वक्त दीनानाथ जी चुपके से घर से निकले। उन्होंने अपना पुराना स्कूटर नहीं निकाला, बल्कि पैदल ही बस स्टॉप की तरफ चल पड़े। उनके हाथ में एक छोटा सा थैला था।


शाम को जब अजय ऑफिस से लौटा, तो उसने देखा कि पिताजी घर पर नहीं हैं।

"माँ, बाबूजी कहाँ हैं?" अजय ने पूछा।

"पता नहीं बेटा, दोपहर को कहीं गए थे। अभी तक नहीं आए," सुशीला जी की आवाज़ में घबराहट थी।


रात के आठ बज गए। अजय को चिंता होने लगी। वह बाहर जाने ही वाला था कि गेट खुला और दीनानाथ जी अंदर आए। वे बुरी तरह थके हुए लग रहे थे, पसीने से लथपथ। लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी।


"कहाँ गए थे आप? फोन भी घर छोड़ गए थे!" अजय चिल्लाया।


दीनानाथ जी ने कुछ नहीं कहा। वे सीधे डाइनिंग टेबल के पास गए और अपनी जेब से कुछ नोटों की गड्डी निकालकर मेज पर रख दी।

"ये लो अजय," दीनानाथ जी ने हांफते हुए कहा।


अजय और स्नेहा ने नोटों को देखा। वो करीब पचास हज़ार रुपये थे।

"ये पैसे? कहाँ से आए?" अजय ने अविश्वास से पूछा।


"ये मेरे हैं," दीनानाथ जी ने पानी का गिलास उठाते हुए कहा। "तुम्हें याद है, दादाजी की वो पुरानी घड़ी जो मुझे विरासत में मिली थी? 'रोलेक्स' की थी। आज शहर के एक एंटीक डीलर को बेच दी। और... और अपनी वो पुरानी अंगूठी भी बेच दी।"


"क्या?" अजय सन्न रह गया। वो घड़ी दीनानाथ जी की जान थी। उन्होंने अजय को भी उसे कभी छूने नहीं दिया था।


"क्यों किया आपने ऐसा?" अजय की आवाज़ कांप गई।


"क्योंकि मुझे टूर पर जाना है," दीनानाथ जी ने दृढ़ता से कहा। "मैंने सोचा था तुम पर बोझ नहीं डालूंगा। पर टिकट और होटल की बुकिंग ऑनलाइन होती है, वो मुझे नहीं आता। ये पैसे लो और हमारे लिए कश्मीर की टिकट बुक कर दो। बाकी खर्चा हम खुद देख लेंगे। हमें महंगे होटल नहीं चाहिए, किसी धर्मशाला में भी रह लेंगे।"


"लेकिन बाबूजी, इतनी क्या ज़िद है? वो घड़ी तो..."


"ज़िद नहीं है बेटा, मजबूरी है," दीनानाथ जी ने पहली बार अजय की आँखों में आँखें डालीं। "तुम्हारी माँ... सुशीला, धीरे-धीरे अपनी याददाश्त खो रही है। डॉक्टर ने कहा है कुछ सालों में वो सब भूल जाएगी। मैंने उसे जवानी में एक वादा किया था। मैं नहीं चाहता कि जब वो मुझे पहचानना बंद कर दे, तब मेरे दिल में यह मलाल रह जाए कि मैंने अपना वादा नहीं निभाया। मैं चाहता हूँ कि वो अपनी यादों के बुझने से पहले, एक बार जी भर के जी ले।"


कमरे में सन्नाटा पसर गया। इतना गहरा सन्नाटा कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े जैसी लग रही थी।

स्नेहा, जो हमेशा ताने मारती थी, ने अपना मुँह हथेली से ढक लिया। अजय को लगा जैसे किसी ने उसे ज़ोरदार तमाचा मारा हो।


वह पिता, जिसे उसने "पैसों का भूखा" और "जिद्दी बुड्ढा" समझा था, वह असल में एक प्रेमी था जो अपनी पत्नी के लिए अपनी सबसे कीमती चीज़ कुर्बान करके आया था। वो घड़ी, जिसे दीनानाथ जी ने अपनी बेटी की शादी में भी नहीं बेचा था, आज पत्नी की एक मुस्कान के लिए बेच दी थी।


अजय की आँखों के आगे धुंध छा गई। उसे अपना बचपन याद आया। जब उसे साइकिल चाहिए थी, तो दीनानाथ जी ने ओवरटाइम करके दिलाई थी। जब उसे इंजीनियरिंग करनी थी, तो उन्होंने अपनी पी.एफ. (PF) का पैसा तोड़ा था। तब तो उन्होंने कभी नहीं कहा था कि "पैसे पेड़ पर नहीं उगते"।


दीनानाथ जी अपने कमरे में चले गए। मेज पर रखे वो पचास हज़ार रुपये अजय को कागज के नहीं, अंगारों के लग रहे थे।


अजय उस रात सो नहीं पाया। वह करवटें बदलता रहा। उसे बार-बार अपनी कही बात याद आ रही थी—*"पैसे क्या पेड़ पर उगते हैं?"*

सच तो यह था कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते, लेकिन माँ-बाप उस पेड़ की तरह होते हैं जो अपनी छाँव देने के लिए खुद धूप में जलते रहते हैं, और बच्चे उनकी छाँव को उनका फर्ज़ समझकर भूल जाते हैं।


अगली सुबह, नाश्ते की मेज पर माहौल बदला हुआ था।

अजय तैयार होकर आया। उसके हाथ में एक लिफाफा था।

उसने वह लिफाफा दीनानाथ जी के पास रखा।


"टिकट बुक हो गए?" दीनानाथ जी ने फीकी मुस्कान के साथ पूछा। "पैसे कम तो नहीं पड़े?"


अजय ने घुटनों के बल बैठकर पिता के पैर पकड़े और फूट-फूट कर रो पड़ा।

"बाबूजी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं इतना अंधा हो गया था कि मुझे नोटों के आगे आपका प्यार नहीं दिखा। मैं भूल गया था कि जिस बेटे को पालने के लिए आपने अपनी जवानी खपा दी, वो आज आपको 'बोझ' कह रहा है।"


दीनानाथ जी ने उसे उठाने की कोशिश की, "अरे पगले, क्या कर रहा है?"


अजय ने आँसू पोंछे और लिफाफा खोला। उसमें कश्मीर के टिकट नहीं थे।

उसमें अजय की कार की चाबी और एक रसीद थी।


"बाबूजी, यह रसीद उस डीलर की है। मैं सुबह सबसे पहले वहां गया और आपकी घड़ी और अंगूठी वापस ले आया। मैंने उसे दुगनी कीमत दी, पर आपकी निशानी वापस ले आया," अजय ने रुंधे गले से कहा। "और यह कार की चाबी... हम ट्रेन से नहीं जा रहे हैं।"


"हम?" सुशीला जी ने पूछा।


"हाँ माँ, हम," अजय ने मुस्कुराने की कोशिश की। "मैं, स्नेहा, चिंटू... हम सब आपके साथ कश्मीर जा रहे हैं। मैंने ऑफिस से पंद्रह दिन की छुट्टी ले ली है। और रही बात पैसों की... तो मैंने अपनी वो फिक्स्ड डिपाजिट तुड़वा दी जो मैंने नई कार लेने के लिए जोड़ी थी। कार तो अगले साल भी आ जाएगी, पर ये वक्त वापस नहीं आएगा।"


स्नेहा भी आगे आई। उसने सुशीला जी का हाथ थामा। "माँजी, मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं घर की गृहिणी होकर भी घर की नींव को ही चोट पहुंचा रही थी। चिंटू की फीस और ईएमआई तो चलती रहेगी, लेकिन अगर आज हम नहीं गए, तो शायद हम खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे।"


दीनानाथ जी की आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे। उन्होंने अपनी घड़ी वापस कलाई पर बांधी। वह घड़ी, जो कल तक सिर्फ वक्त बताती थी, आज रिश्तों का वक्त बदल चुकी थी।


दस दिन बाद...

कश्मीर की डल झील में एक शिकारा (नाव) तैर रहा था। ठंडी हवा चल रही थी। दीनानाथ जी और सुशीला जी एक साथ बैठे थे। सुशीला जी ने अपना सिर दीनानाथ जी के कंधे पर रखा हुआ था।

"सुनिए," सुशीला जी ने धीरे से कहा।

"हाँ?"

"ये जगह बहुत सुंदर है। ऐसा लगता है मैंने इसे सपने में देखा है। क्या हम यहाँ पहले कभी आए हैं?" सुशीला जी ने मासूमियत से पूछा। उनकी बीमारी के कारण उन्हें याद नहीं आ रहा था कि यह उनका पहला ही दौरा है, या वादा पूरा हुआ है।


दीनानाथ जी ने मुस्कुराते हुए उनका हाथ थाम लिया। उनकी आँखों में नमी थी।

"नहीं सुशीला, हम पहली बार आए हैं। पर अब यह याद हमेशा तुम्हारे दिल में रहेगी, चाहे दिमाग भूल भी जाए।"


पीछे दूसरे शिकारे में बैठे अजय और स्नेहा यह दृश्य देख रहे थे। अजय ने महसूस किया कि उसने अपनी एफ.डी. (FD) तोड़कर कोई घाटा नहीं किया, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा मुनाफा कमाया है—अपने माता-पिता की मुस्कान।


उसे समझ आ गया था कि बुढ़ापा 'खर्च' का नाम नहीं, बल्कि 'कर्ज' उतारने का समय है। वो कर्ज, जो बच्चों पर माँ-बाप के प्यार का होता है। पैसे पेड़ पर नहीं उगते, लेकिन खुशियाँ परिवार के पेड़ की छाँव में ही मिलती हैं।


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**लेखक का संदेश:**

दोस्तों, हम अक्सर अपनी भविष्य की चिंताओं में इतने उलझ जाते हैं कि अपने माता-पिता के वर्तमान को भूल जाते हैं। उनके पास सीमित समय है। उनकी छोटी-छोटी इच्छाएं हमारे लिए 'फालतू खर्चा' हो सकती हैं, लेकिन उनके लिए वो 'जीने की वजह' होती हैं। इससे पहले कि उनकी यादें धुंधली हो जाएं, या वो हमेशा के लिए चले जाएं, उनके सपनों को पूरा कीजिये। क्योंकि कार, बंगला और बैंक बैलेंस दोबारा बन सकते हैं, लेकिन माँ-बाप दोबारा नहीं मिलते।


**क्या इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया?**

क्या आपके पास भी अपने माता-पिता के साथ बिताई कोई ऐसी याद है जिसे आप कभी खोना नहीं चाहेंगे? कमेंट में जरूर बताएं।


**"अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें ताकि हर बेटा और बहू यह समझ सकें कि बुजुर्गों को पैसों से ज़्यादा आपके साथ और प्यार की ज़रूरत होती है। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो ऐसी ही दिल को छू लेने वाली पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!"**


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