क्या हमारी दी हुई कोई छोटी सी चीज़, किसी की ज़िंदगी में इतना बड़ा बदलाव ला सकती है कि वह हमारे बुरे वक्त में हमारा सबसे बड़ा सहारा बन जाए? पढ़िए एक ऐसी सास-बहू की कहानी, जहाँ 'बर्बादी' का ताना, 'इंसानियत' की सबसे बड़ी मिसाल बन गया।
सर्दियों की दस्तक के साथ ही शहर की हवाओं में एक चुभने वाली ठंड घुलने लगी थी। सुबह के आठ बज रहे थे और घर में हमेशा की तरह काम की आपाधापी मची हुई थी। नेहा अपने लैपटॉप बैग में कुछ जरूरी फाइलें ठूंस रही थी और साथ ही नाश्ते की मेज पर सैंडविच भी खा रही थी। वह एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर थी और समय उसके लिए हमेशा कम ही पड़ता था।
नेहा अपनी गाड़ी की चाबी उठा ही रही थी कि पीछे से उसकी सास, रुक्मिणी देवी की धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ आई।
"बहू, आज ऑफिस से लौटते वक्त बाज़ार की तरफ से आओगी क्या? अगर उधर से आना हो तो मेरे लिए घुटनों के दर्द वाले तेल की एक बड़ी शीशी और एक हल्का सा ऊनी शॉल लेती आना। पुरानी शॉल से अब रात की ठंड नहीं रुकती और जोड़ों का दर्द तो इस मौसम में जैसे जान ही निकाल देता है। और हाँ, अगर समीर से बात हो तो उसे कहना कि मेरे चश्मे का नंबर शायद बदल गया है, धुंधला दिखता है, ज़रा वक्त निकालकर नया चश्मा बनवा दे।"
नेहा ने अपना बैग कंधे पर लटकाते हुए एक गहरी साँस ली और मुड़कर अपनी सास को देखा। उसके चेहरे पर हल्की सी झल्लाहट साफ़ झलक रही थी।
"मम्मी जी, आप भी ना, जब देखो कोई न कोई फरमाइश तैयार रखती हैं। अभी पिछले महीने ही तो समीर ने आपको वो महँगी वाली कश्मीरी शॉल लाकर दी थी। इतनी अच्छी और गर्म थी वो। और दर्द का तेल? परसों ही तो मैंने मेडिकल स्टोर से नई शीशी मँगवाई थी। इतनी जल्दी कोई तेल पी थोड़ी जाता है? घर में हर दिन कोई न कोई नया खर्चा खड़ा रहता है।"
रुक्मिणी देवी ने झिझकते हुए अपनी सूती साड़ी का पल्लू उँगलियों में लपेटा। उनकी आँखें थोड़ी झुक गईं और वे धीमी, संकोच भरी आवाज़ में बोलीं, "बहू, वो... बात असल में यह है कि अपनी जो कामवाली है ना, सुशीला... उसकी छोटी बेटी को दो दिन से बहुत तेज़ बुखार था। कल जब सुशीला काम पर आई तो बेचारी रो रही थी। बता रही थी कि झोपड़ी में सर्द हवा आती है और बच्ची ठंड से काँप रही है, उसके पास ओढ़ाने के लिए कोई ढंग का गर्म कपड़ा नहीं था। मुझसे उसका वो दुख देखा नहीं गया। मैंने वो कश्मीरी शॉल उसे दे दी। बच्ची को गर्माहट मिलेगी तो जल्दी ठीक हो जाएगी।"
रुक्मिणी देवी ने एक पल रुककर फिर कहना शुरू किया, "और जहाँ तक तेल की बात है, हमारी सोसाइटी के जो गेटकीपर हैं, रामू काका, उनके घुटनों में इतनी तकलीफ थी कि कल रात जब मैं बालकनी में खड़ी थी, तो देखा वो ड्यूटी पर खड़े-खड़े दर्द से रो रहे थे। उनकी उम्र भी तो हो गई है। तो मैंने वो तेल की शीशी उन्हें दे दी और बता दिया कि इसे हल्का गर्म करके रात को मालिश करना, बहुत आराम मिलेगा।"
नेहा का पारा अब सातवें आसमान पर पहुँच गया था। उसका कॉर्पोरेट दिमाग इस तरह की 'भावुकता' को पैसे की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं समझता था।
"मम्मी जी! आपको अंदाज़ा भी है कि वो शॉल कितने की थी? पाँच हज़ार रुपये की! हम दिन-रात मेहनत करके, स्ट्रेस झेलकर पैसे कमाते हैं और आप उन्हें ऐसे ही खैरात में बाँट देती हैं? सुशीला को कोई पुराना स्वेटर या कंबल दे देतीं, इतनी महँगी शॉल देने की क्या ज़रूरत थी? वो लोग इसकी कद्र भी नहीं समझते। और रामू काका को दर्द है तो वो अपना इलाज खुद कराएँगे या सोसाइटी वाले देखेंगे, आप क्यों पूरे मोहल्ले का ठेका लेकर बैठी हैं?"
रुक्मिणी देवी चुपचाप सुनती रहीं। उनकी आँखें डबडबा आईं, गले में एक गोला सा अटक गया, पर उन्होंने पलटकर कोई जवाब नहीं दिया। वे चुपचाप अपने कमरे में चली गईं और भगवान की मूर्ति के सामने बैठ गईं।
शाम को जब समीर ऑफिस से लौटा, तो नेहा ने तिल का ताड़ बनाते हुए सारी बात उसे सुना दी। समीर भी दिन भर की मीटिंग्स से थक कर आया था। उसने पत्नी की बात सुनी और बिना गहराई में जाए, अपनी माँ के कमरे में चला गया।
"माँ, नेहा सही कह रही है," समीर ने थोड़ी सख्त आवाज़ में समझाते हुए कहा। "हम आपके लिए चीजें लाते हैं, दुनिया के लिए नहीं। महंगाई का ज़माना है, पैसा पेड़ पर नहीं उगता। आगे से हमारी लाई हुई कोई भी चीज़ आप किसी बाहर वाले को नहीं देंगी। अगर किसी की मदद करनी भी है, तो हमसे पूछ लिया कीजिए।"
रुक्मिणी देवी ने बस एक बार अपने बेटे को देखा और हामी में सिर हिला दिया। उस रात उन्होंने ठीक से खाना नहीं खाया और बिना कुछ कहे सो गईं। घर में अगले कुछ दिनों तक एक अजीब सी खामोशी छाई रही।
दिन बीतते गए। सर्दियाँ अब अपने चरम पर थीं। बर्फीली हवाओं ने शहर को अपनी चपेट में ले लिया था। एक दिन अचानक रुक्मिणी देवी की तबीयत बहुत ज़्यादा बिगड़ गई। उन्हें तेज़ वायरल बुखार ने जकड़ लिया और ठंड लगने की वजह से घुटनों में भयंकर दर्द उठ गया। वे बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थीं।
संयोग से उसी दिन समीर को एक ज़रूरी बिजनेस मीटिंग के लिए तीन दिन के लिए शहर से बाहर जाना पड़ गया था। नेहा घर पर अकेली थी और ऑफिस में 'ईयर-एंड क्लोजिंग' चलने के कारण उसे घर से ही काम करते हुए एक बहुत महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट रात तक सबमिट करना था।
नेहा परेशान हो गई। वह एक तरफ लैपटॉप पर काम कर रही थी, बार-बार क्लाइंट्स की कॉल्स अटेंड कर रही थी और दूसरी तरफ बार-बार उठकर अपनी सास को दवा और पानी दे रही थी। लेकिन रुक्मिणी देवी का बुखार 103 डिग्री से नीचे आने का नाम नहीं ले रहा था और दर्द के मारे वे कराह रही थीं। नेहा को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। न तो वह उन्हें अकेले छोड़कर डॉक्टर के पास जा सकती थी और न ही अपना काम छोड़ सकती थी। वह तनाव से रोने की कगार पर पहुँच गई थी।
तभी दरवाजे की घंटी बजी।
नेहा ने झल्लाहट में जाकर दरवाज़ा खोला तो सामने सुशीला खड़ी थी। उसके हाथों में एक स्टील का टिफिन था जिससे गर्म भाप निकल रही थी।
"दीदी, रामू काका ने नीचे बताया कि आज डॉक्टर साहब घर आए थे और माँ जी की तबीयत बहुत खराब है। भैया भी शहर से बाहर हैं। मैंने सोचा आप ऑफिस के काम में उलझी होंगी और अकेली परेशान हो रही होंगी। मैंने घर पर ही देसी मसालों का गर्म सूप बनाया है माँ जी के लिए। आप बेफिक्र होकर अपना काम कीजिए, मैं आज पूरे दिन माँ जी के पास ही बैठती हूँ।"
नेहा कुछ बोल ही नहीं पाई। सुशीला सीधे रुक्मिणी देवी के कमरे में गई। उसने बड़े प्यार से उन्हें सहारा देकर उठाया, अपने हाथों से सूप पिलाया और फिर उनके सिरहाने बैठकर उनके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखने लगी।
दोपहर होते-होते दरवाजे पर फिर एक दस्तक हुई। इस बार सामने सोसाइटी के गार्ड रामू काका खड़े थे। उनकी ड्यूटी का समय नहीं था, फिर भी वे आए थे। उनके हाथ में एक छोटी सी सूती कपड़े की पोटली थी।
"बहू जी," रामू काका ने नेहा से बहुत ही आदर और चिंता भरे स्वर में कहा, "ये जड़ी-बूटियों का लेप है। मेरी पत्नी ने गाँव से बनाकर भेजा था। माँ जी ने मेरे बुरे वक्त में अपना महँगा तेल मुझे दे दिया था, जिससे मैं आज अपने पैरों पर खड़ा होकर नौकरी कर पा रहा हूँ। उनका अहसान मैं ज़िंदगी भर नहीं भूल सकता। आज जब सुना कि उन्हें तकलीफ है, तो मुझसे रहा नहीं गया। ये लेप उनके घुटनों पर हल्का गर्म करके लगा दीजिए, दर्द ऐसे गायब होगा जैसे कभी था ही नहीं।"
नेहा अवाक खड़ी दोनों को देख रही थी। सुशीला ने तुरंत रामू काका से वह लेप लिया, उसे रसोई में ले जाकर हल्का गर्म किया और रुक्मिणी देवी के सूजे हुए घुटनों पर बहुत ही जतन से लगा दिया।
पूरे दिन सुशीला ने रुक्मिणी देवी की एक सगी बेटी की तरह सेवा की। उसने उनके पैर दबाए, उन्हें समय पर दवा दी और उनके पास बैठी रही। रामू काका भी बीच-बीच में आकर पूछ जाते कि किसी दवा या फल की ज़रूरत तो नहीं है।
शाम ढलते-ढलते चमत्कार सा हुआ। रामू काका के उस देसी लेप और सुशीला की निस्वार्थ सेवा ने असर दिखाया। रुक्मिणी देवी का बुखार काफी हद तक उतर गया और घुटनों के दर्द में भी इतना आराम मिल गया कि वे उठकर बैठ गईं। उनके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी और वे बार-बार सुशीला के सिर पर हाथ फेरकर उसे आशीर्वाद दे रही थीं।
अपने कमरे के दरवाज़े पर खड़ी नेहा यह सब देखकर अपने आँसुओं को रोक नहीं पाई। उसकी आँखों से पश्चाताप के आंसू लगातार बह रहे थे। उसे अपना वह दिन याद आ रहा था जब उसने अपनी सास को 'पैसे बर्बाद' करने का ताना दिया था। आज उसे समझ आ रहा था कि रुक्मिणी देवी ने उस दिन पैसे बर्बाद नहीं किए थे, बल्कि उन्होंने उन पैसों से 'इंसानियत' और 'सच्चे रिश्ते' कमाए थे।
अगर उस दिन रुक्मिणी देवी ने सुशीला की बच्ची और रामू काका की तकलीफ को अनदेखा कर दिया होता, तो आज इस मुश्किल घड़ी में नेहा बिलकुल अकेली और असहाय पड़ जाती। उन दोनों गरीब लेकिन दिल के अमीर लोगों ने जो सेवा और समर्पण दिखाया, वह दुनिया के किसी भी महँगे अस्पताल या पैसे देकर रखी गई नर्स से बढ़कर था। नेहा का सारा कॉर्पोरेट गुरूर और पैसों का घमंड आज उस साधारण सी कामवाली और एक मामूली से गार्ड की नेकी के आगे घुटने टेक चुका था।
शाम को जब सुशीला और रामू काका जाने लगे, तो नेहा ने हाथ जोड़कर, रुंधे हुए गले से उनका धन्यवाद किया।
रात को नेहा अपनी सास के कमरे में गई। रुक्मिणी देवी अब आराम से सो रही थीं। नेहा उनके पैरों के पास बैठ गई और धीरे-धीरे उनके पैर दबाने लगी। आहट सुनकर रुक्मिणी देवी की आँख खुल गई।
"अरे बहू, तू क्यों परेशान हो रही है? जा जाकर आराम कर। मैं अब बिल्कुल ठीक हूँ," रुक्मिणी देवी ने ममता भरे स्वर में कहा।
यह सुनते ही नेहा फफक कर रो पड़ी। उसने अपनी सास के दोनों हाथ पकड़ लिए और अपने माथे से लगा लिए।
"मुझे माफ़ कर दीजिए मम्मी जी। मैं बहुत बड़ी मूर्ख थी। मैंने आपकी दी हुई चीज़ों की कीमत चंद कागज़ के नोटों में आँकी, जबकि आपने उन चीज़ों के बदले जो दुआएँ और निस्वार्थ प्यार कमाया, उसकी कोई कीमत नहीं है। आपने मुझे आज ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखा दिया कि असली अमीरी बैंक बैलेंस या महँगे कपड़ों में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में जगह बनाने में है।"
रुक्मिणी देवी की आँखें भी नम हो गईं। उन्होंने मुस्कुराते हुए नेहा के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और उसे खींचकर अपने सीने से लगा लिया। उस रात सास-बहू के बीच की हर ग़लतफ़हमी आंसुओं में बहकर साफ़ हो गई थी।
अगले दिन शाम को जब समीर अपना ट्रिप खत्म करके वापस आया, तो उसने घर का नज़ारा बदला हुआ पाया। नेहा आज बाज़ार गई थी और लौटते वक्त एक बहुत ही सुंदर, मुलायम और बेहद गर्म शॉल लेकर आई थी।
उसने वह शॉल अपनी सास के कंधों पर ओढ़ाते हुए कहा, "मम्मी जी, ये आपके लिए है। और हाँ, अगर आपको लगे कि किसी को इसकी ज़रूरत आपसे ज़्यादा है, तो बेझिझक दे दीजिएगा। क्योंकि मैं अब जान गई हूँ कि आपका दिल इस शॉल से भी ज़्यादा बड़ा और दूसरों को गर्माहट देने वाला है।"
समीर दरवाज़े पर खड़ा अपनी पत्नी का यह बदलाव देखकर हैरान था, लेकिन घर में छाई इस नई गर्माहट और अपनेपन से उसका दिल भर आया था। उसे एहसास हो गया था कि रिश्तों की असली गर्माहट बैंक के खातों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति संवेदना और दया भाव से आती है।
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