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असली वसीयत

 घर के आंगन में अभी भी हवन की लकड़ी जलने की महक आ रही थी। तेरहवीं के संस्कार को बीते अभी कुछ ही घंटे हुए थे। सफेद चादरें, जो शोक मनाने के लिए बिछाई गई थीं, अब समेट दी गई थीं, और उनकी जगह अब वकीलों के कागज़ात और हिस्से-बांटवारे की दबी-दबी आवाज़ों ने ले लिया था।

रघुवीर जी के जाने का गम जितना गहरा था, उससे कहीं ज़्यादा गहरा तनाव उनके दोनों बेटों—विक्रम और समीर—के माथे पर दिख रहा था। रघुवीर जी शहर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी थे। अपनी मेहनत से उन्होंने एक बड़ा मकान और दो दुकानें बनाई थीं। लेकिन उनकी मौत अचानक हुई थी, बिना किसी वसीयत (Will) के।

विक्रम, जो बड़ा बेटा था, अपनी पत्नी के साथ कमरे के कोने में फुसफुसा रहा था। "देखो, दुकान तो मैं ही संभालूँगा, समीर को वैसे भी बिज़नेस की समझ नहीं है। और रही बात इस हवेली की, तो इसे बेचकर जो पैसा आएगा, उसे आधा-आधा कर लेंगे।"

समीर की पत्नी, रेखा, भी अपने पति के कान भर रही थी। "सुनिए, बड़े भैया बहुत चालाक हैं। कहीं ऐसा न हो कि अच्छी वाली दुकान वो रख लें और पुरानी वाली हमें दे दें। अपना हिस्सा मजबूती से मांगना। और हाँ, अम्माजी का क्या होगा? वो किसके साथ रहेंगी? हमारे फ्लैट में तो जगह ही नहीं है।"

तभी गेट पर एक ऑटो आकर रुका। उसमें से एक सादे लिबास में लिपटी हुई महिला उतरी। वह 'नंदिनी' थी—रघुवीर जी की इकलौती बेटी।

नंदिनी को देखते ही घर का माहौल बदल गया। विक्रम के चेहरे पर एक शिकन आ गई और समीर ने नज़रें फेर लीं। बहुओं ने एक-दूसरे को कोहनी मारी।

"लो आ गई! तेरहवीं खत्म होते ही हिस्सा मांगने आ गई," रेखा ने धीरे से, मगर इतनी जोर से कहा कि आसपास के दो-चार लोग सुन लें।

"यही तो रीत है आजकल की। बाप मरा नहीं कि बेटियां गिद्ध की तरह झपट पड़ती हैं। मायके से प्यार-व्यार सब ढोंग है, असली प्यार तो प्रॉपर्टी से है," विक्रम की पत्नी ने तंज कसा।

नंदिनी ने किसी की तरफ नहीं देखा। उसकी आँखें सूजी हुई थीं। वह सीधे उस कमरे की तरफ बढ़ी जहाँ उसकी माँ, सुमित्रा देवी, एक कोने में बैठी शून्य में ताक रही थीं। सुमित्रा जी की दुनिया उजड़ चुकी थी, और उनके अपने बेटे-बहू उनके दुख को बांटने के बजाय, उनके पति की दौलत बांटने में व्यस्त थे।

नंदिनी ने माँ के घुटनों पर सिर रखा और फूट-फूट कर रोई। सुमित्रा जी ने कांपते हाथों से बेटी का सिर सहलाया। "आ गई तू? मुझे लगा तू नहीं आएगी।"

"कैसे नहीं आती माँ? बाबूजी ने बुलाया था," नंदिनी सिसकते हुए बोली।

थोड़ी देर बाद, परिवार के वकील, मिस्टर खन्ना, और समाज के कुछ बुजुर्ग बैठक में जमा हुए। विक्रम और समीर भी आ गए। नंदिनी को भी बुलाया गया।

मिस्टर खन्ना ने गला साफ़ किया। "देखिए, रघुवीर जी ने कोई लिखित वसीयत नहीं छोड़ी है। कानूनन उनकी संपत्ति पर पत्नी और तीनों बच्चों—विक्रम, समीर और नंदिनी—का बराबर का हक़ है।"

"बराबर का हक़?" विक्रम तमक कर बोला। "खन्ना अंकल, नंदिनी की शादी में पिताजी ने 25 लाख रुपए खर्च किए थे। दहेज दिया, जेवर दिए। अब इस घर और दुकान पर इसका क्या हक़ बनता है? यह तो पराये घर की है।"

समीर ने भी सुर में सुर मिलाया, "हाँ अंकल। और पिछले साल जब इसके पति को ज़रूरत थी, तब भी पिताजी ने 5 लाख दिए थे। वो सब इसका हिस्सा ही तो था। अब और क्या चाहिए इसे?"

नंदिनी चुपचाप बैठी सुनती रही। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

विक्रम ने नंदिनी की तरफ देखकर कड़वे स्वर में कहा, "नंदिनी, देख। हम भाई-भाई आपस में सुलझा लेंगे। तू क्यों बीच में पड़ रही है? तू अपने ससुराल में खुश है, तुझे पैसों की क्या कमी? यहाँ आकर महाभारत मत कर। जो थोड़ा-बहुत नकद या जेवर चाहिए, बता दे, हम दे देंगे, पर प्रॉपर्टी में टांग मत अड़ा।"

रेखा ने भी ताना मारा, "दीदी, वैसे तो आप बड़ी स्वाभिमानी बनती थीं। आज पिता की चिता की राख ठंडी भी नहीं हुई और आप हिस्सा लेने आ धमकीं? लोग क्या कहेंगे?"

नंदिनी धीरे से अपनी कुर्सी से उठी। उसने अपनी नम आँखों से एक बार अपने दोनों भाइयों को देखा, जिनके साथ वह इसी आंगन में खेली थी। आज वो भाई उसे दुश्मन की तरह देख रहे थे।

"भैया," नंदिनी की आवाज़ शांत लेकिन दृढ़ थी। "आप सही कह रहे हैं। मैं हिस्सा लेने आई हूँ। और मैं अपना पूरा हिस्सा लेकर ही जाऊंगी। एक इंच भी कम नहीं।"

हॉल में सन्नाटा छा गया। विक्रम और समीर को लगा जैसे उनके डर सच साबित हो गए। बहुओं के चेहरे पर गुस्सा और नफरत साफ़ दिखने लगा।

"देखा! मैंने कहा था ना!" रेखा चिल्लाई। "ये सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। इसे भी पैसा चाहिए।"

वकील साहब ने पूछा, "नंदिनी बेटा, तुम क्या चाहती हो? कानूनन तुम्हारा एक-चौथाई हिस्सा बनता है।"

नंदिनी ने एक गहरी सांस ली। वह चलते हुए कमरे के बीचो-बीच आई।

"भैया, आप दोनों दुकानें रख लीजिये। मुझे उनमें से एक रुपया नहीं चाहिए। आप यह हवेली भी रख लीजिये, मुझे इसकी ईंटों से कोई मोह नहीं है। बैंक बैलेंस, गाड़ियाँ, सोना-चांदी... सब आप दोनों आपस में बाँट लीजिये।"

विक्रम और समीर हैरान रह गए। "तो फिर? फिर तुम्हें क्या चाहिए? तुम हिस्सा लेने आई हो, यह तुमने खुद कहा।"

नंदिनी मुड़ी और कोने में बैठी अपनी बूढ़ी और लाचार माँ के पास गई। उसने माँ का हाथ अपने हाथ में लिया और उन्हें सहारा देकर खड़ा किया।

"मेरा हिस्सा यह है," नंदिनी ने माँ की तरफ इशारा करते हुए कहा।

पूरा कमरा स्तब्ध रह गया।

नंदिनी ने भाइयों की आँखों में आँखें डालकर कहा, "बाबूजी की संपत्ति के तीन हिस्से नहीं, दो ही हिस्से कीजिये—आधा विक्रम भैया का, आधा समीर भैया का। लेकिन बाबूजी की एक और 'पूंजी' है, जिसे आप लोग शायद 'ज़िम्मेदारी' या 'बोझ' समझ रहे हैं—वो है हमारी माँ। मैं अपनी वसीयत में, अपने हिस्से के तौर पर, अपनी माँ को मांगती हूँ।"

सुमित्रा देवी की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उन्होंने अपनी बेटी को कसकर गले लगा लिया।

नंदिनी ने आगे कहा, "मैंने अभी अंदर आते वक्त सुना था। आप लोग चर्चा कर रहे थे कि माँ किसके पास रहेगी। रेखा कह रही थी फ्लैट छोटा है, भाभी कह रही थीं कि माँ की दवाइयों का खर्चा कौन उठाएगा। आप लोग दुकानों के लिए लड़ रहे थे, पर माँ के लिए एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारी डाल रहे थे। तो मैंने आपकी मुश्किल आसान कर दी। संपत्ति आपकी, माँ मेरी।"

विक्रम का सिर शर्म से झुक गया। समीर की नज़रें ज़मीन में गड़ गईं।

नंदिनी रुकी नहीं। उसका गला भर आया था, लेकिन वह बोलती रही। "बाबूजी जब ज़िंदा थे, तो यह घर 'घर' था। उनके जाते ही यह 'प्रॉपर्टी' बन गया। आप लोगों ने दुकानों का टर्नओवर गिना, मकान की कीमत आंकी, लेकिन यह नहीं सोचा कि जिसने इस घर को बनाया, उसका जीवनसाथी आज अकेला हो गया है। भैया, दौलत बांटना आसान है, पर बुढ़ापा बांटना सबके बस की बात नहीं होती।"

"नंदिनी, तू पागल हो गई है?" विक्रम ने धीमी आवाज़ में कहा। "लोग क्या कहेंगे? कि बेटों के होते हुए माँ बेटी के घर जाकर रहेगी? हमारी नाक कट जाएगी।"

"नाक तो तब कटी भैया, जब पिता की तेरहवीं पर आप माँ के आंसुओं को पोंछने के बजाय नोट गिनने में मशगूल थे," नंदिनी ने करारा जवाब दिया। "और रही बात लोगों की, तो लोग तब भी थूकेंगे जब यह माँ बेटों के घर में दाने-दाने को तरसेगी या किसी वृद्धाश्रम में छोड़ी जाएगी। उससे बेहतर है कि मैं उन्हें अपने साथ ले जाऊं, जहाँ कम से कम उन्हें 'बोझ' नहीं समझा जाएगा।"

नंदिनी ने वकील साहब की तरफ देखा। "अंकल, कागज़ तैयार कीजिये। मैं लिखित में देती हूँ कि मुझे पिता की संपत्ति में से कुछ नहीं चाहिए। बदले में, मेरे भाई भी लिखित में दें कि आज के बाद माँ की ज़िम्मेदारी मेरी है और वे इसमें कभी दखल नहीं देंगे।"

वकील साहब, जिनकी उम्र साठ के पार थी, उन्होंने अपना चश्मा उतारा और अपनी भीगी आँखें पोंछीं। उन्होंने कहा, "बेटी, आज तूने साबित कर दिया कि वारिस बेटा नहीं, संस्कार होते हैं। रघुवीर जी आज जहाँ भी होंगे, उन्हें अपनी बेटी पर नाज़ होगा।"

सुमित्रा देवी ने अपने बेटों की तरफ देखा। उनकी आँखों में अब कोई शिकायत नहीं थी, बस एक खालीपन था। उन्होंने अपना छोटा सा संदूक उठाया और बेटी का हाथ पकड़ लिया।

"चलो नंदिनी। यहाँ मेरा अब कुछ नहीं बचा। मेरा 'राम' (पति) चला गया, और मेरे 'लव-कुश' (बेटे) अब व्यापारी बन गए हैं। मेरा घर वही है जहाँ मेरा मान है।"

नंदिनी ने माँ का सामान उठाया और दरवाज़े की तरफ बढ़ी।

जाते-जाते वह विक्रम के पास रुकी।

"भैया, एक बात याद रखना। आज आपने जो खोया है, उसकी कीमत आप दोनों दुकानों को बेचकर भी नहीं लगा पाएंगे। आपने 'छांव' खो दी है। धूप जब लगेगी, तब समझ आएगा।"

नंदिनी अपनी माँ को लेकर ऑटो में बैठ गई। ऑटो चला गया।

पीछे सन्नाटा था। विक्रम और समीर के पास अब दो दुकानें थीं, एक बड़ा मकान था, लाखों का बैंक बैलेंस था। लेकिन घर के आंगन में खड़ी तुलसी सूख रही थी, और घर का वो कोना खाली हो चुका था जहाँ माँ बैठकर दुआएं देती थीं।

कुछ ही महीनों बाद, भाइयों में बंटवारे को लेकर झगड़े शुरू हो गए। दुकानें ठीक से चली नहीं क्योंकि उनमें बरकत नहीं थी। घर में कलह रहने लगी। तब उन्हें याद आया कि घर की असली लक्ष्मी तो वो बूढ़ी माँ थी, जिसे उन्होंने अपनी बहन को 'हिस्से' में दे दिया था।

दूसरी ओर, नंदिनी का छोटा सा घर खुशियों से भर गया था। सुमित्रा देवी के आशीर्वाद से नंदिनी के पति का रुका हुआ प्रमोशन हो गया। घर में हंसी-ठहाके गूंजते थे। नंदिनी ने साबित कर दिया था कि बेटी पराई होकर भी सबसे ज़्यादा अपनी होती है।


 


 


लेखक का संदेश:

दोस्तों, माता-पिता कोई वस्तु नहीं होते जिनका बंटवारा किया जाए। वे वो नींव हैं जिस पर हमारा जीवन टिका है। अक्सर हम संपत्ति के लालच में उन रिश्तों को बोझ समझ लेते हैं जो असल में हमारा सबसे बड़ा संबल होते हैं। नंदिनी ने समाज को आईना दिखाया कि असली धन बैंक में नहीं, बल्कि बड़ों के आशीर्वाद में होता है।

क्या इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया?

क्या आपके आसपास भी ऐसा हुआ है जहाँ संपत्ति के चक्कर में रिश्तों की बलि चढ़ गई? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।

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