"ये अपने घड़ियाली आंसू मेरे सामने मत बहाना। जब देखो बस रोने का नाटक शुरू कर देती हो। 'मुझसे ये नहीं होता, मुझसे वो नहीं होता', क्या तुम्हारी माँ ने तुम्हें मायके में महारानी बनाकर रखा था जो कुछ काम नहीं सिखाया? हमारे ज़माने में तो बहुएं सुबह चार बजे उठकर पूरे घर का काम करती थीं और उफ़ तक नहीं करती थीं। ये तुम्हारे झूठे आंसू और ये शहरी नखरे इस घर में बिल्कुल नहीं चलेंगे!" विमला जी की तेज़ और चुभती हुई आवाज़ से पूरा घर गूंज रहा था।
सामने सिर झुकाए खड़ी काव्या की आँखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी। शादी को अभी मुश्किल से छह महीने ही हुए थे। काव्या को घर के सामान्य काम, जैसे दाल-रोटी बनाना और साफ-सफाई करना अच्छी तरह आता था, लेकिन उसकी सास विमला जी की उम्मीदें आसमान छूती थीं। वे चाहती थीं कि उनकी बहू ऑफिस भी संभाले और घर में एक 'परफेक्ट' पारंपरिक बहू की तरह दस-पंद्रह लोगों का राजशाही खाना भी अकेले बनाए। जब भी काव्या किसी ऐसे काम के लिए अपनी असमर्थता जताती जो उसने पहले कभी नहीं किया था, तो विमला जी उसे सीधे उसके मायके और उसकी माँ के संस्कारों से जोड़कर ताने मारने लगती थीं।
काव्या का पति सिद्धार्थ अपनी माँ के स्वभाव को जानता था, लेकिन वह हमेशा "माँ हैं, कह दिया तो क्या हुआ, तुम इग्नोर करो" कहकर बात टाल देता था। काव्या हर दिन खुद को साबित करने की होड़ में दौड़ रही थी। सुबह पांच बजे उठना, नाश्ता बनाना, ऑफिस जाना, वहां दिन भर लैपटॉप के सामने खटना और फिर शाम को लौटकर रात के भारी-भरकम खाने की तैयारी करना। उसकी अपनी कोई ज़िंदगी नहीं बची थी।
विमला जी का गुरूर तब और बढ़ गया जब उन्होंने अपने घर पर 'सावन मिलन' का एक बड़ा कार्यक्रम रखा। इस कार्यक्रम में उनके मोहल्ले और रिश्तेदारी की करीब पचास औरतें आने वाली थीं। विमला जी ने शान से सबको न्योता दे दिया था और काव्या को हुक्म सुना दिया कि बाहर से कोई हलवाई नहीं आएगा, सारा खाना—कचौड़ी, छोले, मालपुए, खीर और तीन तरह की सब्जियां—काव्या ही अपने हाथों से बनाएगी, ताकि समाज में विमला जी का रुतबा बढ़े कि उनकी बहू कितनी सर्वगुण संपन्न है।
काव्या ने डरते हुए कहा, "मां जी, पचास लोगों का खाना अकेले बनाना मेरे लिए बहुत मुश्किल होगा। ऊपर से कल मेरे ऑफिस में एक बहुत जरूरी प्रोजेक्ट की डिलीवरी है। क्या हम किसी कुक को बुला लें?"
"क्यों बुला लें कुक? क्या मेरी बहू अपाहिज है? बस बहाने बनाने आते हैं। अगर नहीं कर सकती थी तो शादी क्यों की? मेरी सहेलियों के सामने मेरी नाक कटवाने का इरादा है क्या?" विमला जी ने फिर से वही कड़वे शब्द उगल दिए।
काव्या चुप रह गई। अगले दिन से काव्या की तबीयत बिगड़ने लगी। वायरल बुखार ने उसे जकड़ लिया था। शरीर आग की तरह तप रहा था, लेकिन सावन मिलन के कार्यक्रम में सिर्फ दो दिन बचे थे। काव्या ने दवाइयां खाईं और ऑफिस से छुट्टी लेकर तैयारियों में जुट गई। सिद्धार्थ ने अपनी माँ को समझाना चाहा कि काव्या बीमार है, लेकिन विमला जी ने इसे भी काव्या का एक नया नाटक करार दिया। "बुखार ही तो है, कौन सी बड़ी बीमारी है। काम करेगी तो पसीना आएगा और बुखार अपने आप उतर जाएगा," उन्होंने बेरुखी से कह दिया।
कार्यक्रम वाले दिन सुबह से ही काव्या रसोई में कैद थी। 102 डिग्री बुखार में भट्टी जैसी गैस के सामने खड़े होकर पुड़ियां तलना और मालपुए बनाना उसके शरीर की बची-खुची जान भी निकाल रहा था। चक्कर आने पर वह थोड़ी देर स्लैब पकड़कर खड़ी हो जाती और फिर काम में लग जाती। दोपहर तक मेहमान आने शुरू हो गए। बाहर हॉल में विमला जी नई बनारसी साड़ी पहनकर इठला रही थीं। सभी औरतें खाने की तारीफ करते नहीं थक रही थीं।
"अरे विमला, तेरी बहू के हाथों में तो जादू है। इतना स्वादिष्ट खाना तो किसी हलवाई के बस का भी नहीं," एक सहेली ने तारीफ की। विमला जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। "अरे, मैंने ही तो उसे सब सिखाया है। जब आई थी तो पानी भी ढंग से उबालना नहीं आता था," विमला जी ने अपनी झूठी शान बघारते हुए कहा।
तभी रसोई से एक जोरदार बर्तन गिरने की आवाज़ आई। सब लोग घबराकर रसोई की तरफ दौड़े। अंदर का नज़ारा देखकर सिद्धार्थ और विमला जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। काव्या फर्श पर बेहोश पड़ी थी। उसके हाथ पर खौलते हुए तेल के छींटे पड़े थे, जिससे फफोले उठ आए थे। सिद्धार्थ ने दौड़कर काव्या को गोद में उठाया और तुरंत डॉक्टर को बुलाया।
डॉक्टर ने काव्या की जांच करने के बाद गुस्से में सिद्धार्थ और विमला जी की तरफ देखा। "आप लोग कैसे इंसान हैं? इस लड़की को पिछले तीन दिन से 102 डिग्री बुखार है। इसका ब्लड प्रेशर इतना लो है कि ये किसी भी वक्त कोमा में जा सकती थी। और इस हालत में आप इससे तपती गर्मी में इतना भारी काम करवा रहे थे? ये कोई मशीन नहीं, एक इंसान है!"
विमला जी सन्न रह गईं। मेहमान औरतें भी अब विमला जी को ताने मारने लगीं थीं। "कैसी सास है, बीमार बच्ची की जान लेने पर तुली थी अपनी झूठी शान के लिए।"
जब मेहमान चले गए और काव्या को होश आया, तो उसने अपने जले हुए हाथ से सिद्धार्थ को पकड़कर धीरे से पूछा, "मां जी की सहेलियों को खाना पसंद तो आया ना? उन्हें कोई ताना तो नहीं सुनना पड़ा?"
दरवाज़े के पास खड़ी विमला जी ने जब यह सुना, तो उनके अंदर की कठोर दीवार भरभरा कर गिर पड़ी। जिस बहू को वे दिन-रात गालियां देती थीं, जिसे वे नाकारा समझती थीं, उस लड़की ने अपनी जान पर खेलकर भी अपनी सास की नाक समाज में नीची नहीं होने दी थी। विमला जी को अपनी ही सोच पर घिन आने लगी। उन्हें याद आया कि कैसे बरसों पहले उनकी सास ने भी उनके साथ ऐसा ही बर्ताव किया था और तब वे कितना रोई थीं। आज वही सास बनकर वे एक मासूम बच्ची पर वही जुल्म कर रही थीं।
विमला जी दौड़कर काव्या के बिस्तर के पास आईं और उसके पैरों के पास बैठकर फूट-फूट कर रोने लगीं। "मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची। मैं एक अंधी और स्वार्थी औरत बन गई थी। मुझे एक परफेक्ट बहू चाहिए थी, पर मैं भूल गई कि पहले मुझे एक अच्छी इंसान बनना चाहिए था। तेरी मां ने तुझे बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं, तभी तो तूने मेरे इतने तानों के बाद भी मेरे गुरूर की रक्षा की। आज के बाद तू इस घर की बहू नहीं, मेरी बेटी है। तुझे जो नहीं आता, हम मिलकर सीखेंगे, लेकिन अब तू कभी इस तरह खुद को तकलीफ नहीं देगी।"
काव्या ने मुस्कुराते हुए अपनी सास के आंसू पोंछे। उस दिन उस घर में एक 'परफेक्ट बहू' की झूठी चाहत हमेशा के लिए खत्म हो गई थी और एक सच्चे माँ-बेटी के रिश्ते ने जन्म लिया था। रिश्तों में पूर्णता काम से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के दर्द को समझने से आती है।
क्या आपको भी लगता है कि समाज में आज भी पढ़ी-लिखी और नौकरीपेशा बहुओं से घर के सारे कामों में भी 'परफेक्ट' होने की अनुचित उम्मीद की जाती है? क्या सास-बहू के रिश्ते में थोड़ा ठहराव और समझदारी नहीं होनी चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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