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अहंकार बनाम सम्मान

 “मम्मी, ज़रा ये गिफ्ट देखिए तो सही… ये लोग गोद भराई में यही-यही सामान लेकर आए हैं? ये देखिए—प्लास्टिक का झूला, सस्ते से खिलौने, और ये कंबल तो ऐसा लग रहा है जैसे किसी रोड साइड मार्केट से उठा लाए हों! इन्हें ज़रा भी शर्म नहीं आई क्या?”

पूजा ने ठुड्डी ऊँची करके, मुँह बनाते हुए अपनी माँ शालिनी से कहा।

ड्रॉइंग रूम में रस्म अभी-अभी खत्म हुई थी। सब महिलाएँ ऊपर के कमरे में गाना-बजाना कर रही थीं। नीचे हाल में लगे गिफ्टों के ढेर के सामने खड़ी पूजा जैसे एक-एक सामान में कमियाँ ढूँढने का ठेका लेकर आई हो।

“पूजा, बात करने से पहले ज़रा सोच लिया करो,” शालिनी ने धीमे स्वर में टोका, “जिस घर से हमारी बहू आई है, वहाँ की अपनी हैसियत होगी, अपनी मजबूरियाँ होंगी। इतना कटाक्ष करना ठीक नहीं।”

“अरे मम्मी, आप ही तो हमेशा कहती हो कि हमारा नाम है समाज में। ऐसे गिफ्ट्स देख कर क्या इज़्ज़त रह जाएगी हमारी? ये देखिए—छोटे से डिब्बे में चाँदी की पतली-सी पायल… न जाने कितनी हल्की होगी। मेरी सहेलियों के यहाँ तो नाती के लिए सोने के कड़े आते हैं, और यहाँ…!”

पूजा ने हाथ झटकते हुए जैसे पूरे मायके की औकात नाप दी हो।

उसी समय सीढ़ियों से उतरते हुए काव्या की नज़र इन सब पर पड़ गई। नौ महीने की गर्भवती काव्या आज पूरी तरह सजी-धजी थी—गोद भराई थी, चेहरे पर हल्की थकान और आँखों में गहरी नमी। ऊपर कमरे में उसकी माँ और मामा-नानी सब थे, अभी-अभी वे लोग अपनी ओर से लाए गिफ्ट सजा कर लौटे थे।

काव्या ने साफ-साफ पूजा की बातें सुन लीं।
उसका कदम वहीं ठिठक गया।

उसकी माँ ने कितने हफ्तों तक धीरे-धीरे पैसे जोड़कर, एक-एक चीज़ चुनी थी—
“बेटी के घर में नाती के लिए कुछ तो अच्छा ले जाएँ।”
उस पुरानी अलमारी में रखी गुल्लक तक तोड़ दी थी उन्होंने, ताकि चाँदी का कंबल, पायल, और कुछ कपड़े ले सकें।

काव्या के गले में जैसे कोई चीज़ अटक गई।

इतने में ओमप्रकाश जी भी अंदर आ गए।
उन्होंने पूजा की ऊँची आवाज़ सुनी,
“क्या हुआ? किसका ज्ञान बाँट रही है तू?”

पूजा बात बदलने लगी,
“कुछ नहीं पापा, मैं तो बस कह रही थी कि आजकल लोग रस्मों में भी कितने… कमज़ोर गिफ्ट्स देने लगे हैं। कम से कम नाती की गोद भराई में थोड़ा तो सोच लेना चाहिए ना।”

शालिनी ने हल्के से सिर झुका लिया।
उन्हें पता था, पूजा के मुँह से असली बात अब बाहर आएगी ही।

“और मम्मी,” पूजा ने आगे कहा,
“आप तो बहू की इतनी तारीफें करती रहती हो—संस्कारी, समझदार, इत्यादि-इत्यादि। लेकिन देखो तो ज़रा, उसके मायके वाले क्या ले आए हैं! अगर इतनी छोटी सोच है तो कम से कम इतना भारी-भरकम कार्यक्रम क्यों रखा? तीन तरह के समाज देने की क्या ज़रूरत थी?”

काव्या का मन हुआ कि वहीं से वापस ऊपर चली जाए, पर फिर सोचा—
“आज भी चुप रहूँगी तो कल ये लोग और बढ़ जाएँगे। मेरी माँ ने जितना किया, दिल से किया है। उनके सम्मान की रक्षा तो मुझे ही करनी होगी।”

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी और पास रखी कुर्सी पर बैठ गई।
ओमप्रकाश जी ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए पूछा,
“बहू, थक गई क्या? बैठ जा आराम से। सब ठीक तो है?”

काव्या ने गहरी साँस ली, फिर पूजा की तरफ़ देखते हुए बोली,
“दीदी, एक बात पूछूँ?”

पूजा ने भौं सिकोड़कर कहा,
“हाँ-हाँ, पूछो। क्या बात है?”

“आपको मेरे मायके से आए गिफ्ट्स बहुत छोटे लगे, है ना?”

“छोटे?” पूजा हँस पड़ी,
“छोटा शब्द मत बोलो, बेकार कहो। ऐसी चीज़ें तो मैं अपने नौकरों के बच्चों को भी न दूँ। हमारा स्टैंडर्ड कुछ और है भाभी, आप समझ नहीं पाओगी।”

कमरे में अचानक जैसे हवा भारी हो गई।
शालिनी ने काँपते हुए हाथों से साड़ी का पल्लू ठीक किया,
“पूजा, बात संभाल कर…”

लेकिन अब काव्या ने तय कर लिया था कि वह आज अपने मन की बात कहकर रहेगी।

“दीदी,” उसने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा,
“आप सही कह रही हैं। मेरा मायका उतना समृद्ध नहीं, जितना शायद आपके मन में ‘स्टैंडर्ड’ की परिभाषा है।
मेरे पापा छोटी-सी कपड़े की दुकान में काम करते हैं।
मम्मी घरों में टिफ़िन बना-बनाकर देती हैं।
उन्होंने मेरी शादी में कर्ज़ लेकर सब किया।
उसके बाद जब उन्हें पता चला कि उनके घर नाती आने वाला है,
तब से हर महीने थोड़ा-थोड़ा करके पैसे बचाए,
ताकि गोद भराई में समाज दे सकें।”

पूजा ने आँखें घुमा दीं,
“पर भाभी, बात पैसे की नहीं, सोच की भी होती है ना?”

“बिल्कुल,” काव्या ने तुरंत जवाब दिया,
“सोच की ही तो बात है।
आप मेरी माँ की सोच को ‘छोटा’ समझ रही हैं,
जबकि उसी सोच ने उन्हें यह सिखाया कि—
‘जितना हो सके, ईमानदारी से, प्रेम से देना,
पर किसी पर भार बनकर नहीं।’

आपके अनुसार समाज का मतलब सोने के गहने और महंगे-ब्रांडेड कपड़े हैं।
लेकिन मेरे घर में समाज का मतलब है—
साफ दिल से, सम्मान के साथ दिया गया आशीर्वाद और छोटा-सा उपहार।
आपको चाँदी की पतली करधनी में कमी दिखी,
मुझे उसमें मेरी माँ के हाथों की लकीरें दिखती हैं।”

काव्या की आँखों में आँसू तैरने लगे,
पर आवाज़ में अब भी मजबूती थी।

पूजा तिलमिला उठी,
“तो क्या मैं गलत हूँ कि अपने घर की इज़्ज़त का सोच रही हूँ?”

“इज़्ज़त… किससे बनती है दीदी?”
काव्या ने पूछा,
“गहनों के वज़न से? ब्रांडेड चीज़ों से?
या फिर इस बात से कि हम दूसरों के दिए हुए को कितने सम्मान से स्वीकार करते हैं?

आप कहती हैं, ‘आजकल के लोग चालाक हो गए हैं।’
मैं कहती हूँ, आजकल हम लोग
दूसरों की थाली में कमियाँ ढूँढने में इतने व्यस्त हैं
कि उनके हालात समझना भूल गए हैं।”

ओमप्रकाश जी अब तक चुपचाप सुन रहे थे।
अब वे आगे बढ़े,
“पूजा, तुम्हें पता भी है, तुम क्या बोल रही हो?
जो गिफ्ट्स काव्या के घर से आए,
वो मैंने खुद देखे हैं—सादे हैं, पर साफ-सुथरे हैं, उपयोगी हैं।
और सबसे बड़ी बात, उनमें दिखावा नहीं है।
तुमने कितनी आसानी से उनकी बेइज़्ज़ती कर दी।
क्या यही संस्कार दिए हैं हमने तुम्हें?”

पूजा ने कुछ कहना चाहा,
“पापा, आप हमेशा भाभी का ही पक्ष लेते हो…”

शालिनी का धैर्य भी अब जवाब दे चुका था।
“बस, पूजा!” उन्होंने कड़े स्वर में कहा,
“एक बार की गलती को हम सहन कर गए थे।
शादी के समय भी तुमने अपने भाई की नई-नई दुल्हन की साड़ियों में कमियाँ निकालीं,
तब मैंने समझाया—‘नववधू है, दिल पर मत चोट कर।’

लेकिन आज तुम उस बहू के मायके को नीचा दिखा रही हो,
जिसकी कोख से हमारे घर का वारिस आने वाला है!
तुम्हें ये भी ख्याल नहीं आया कि वह सब सुन रही होगी?”

पूजा के चेहरे पर ग्लानि और गुस्से की मिली-जुली परछाईं थी।
वह तर्क करने के मूड में ही थी,
पर ओमप्रकाश जी की आवाज़ इस बार सचमुच गूँज उठी—

“बस बहुत हो गया, पूजा!
तुम्हारी हर बात में अहंकार झलकने लगा है।
तुम्हें अपने ससुराल की अमीरी पर घमंड है,
तो याद रखना—
घमंड हमेशा खुद को ही खा जाता है।

आज के बाद अगर हमने तुम्हारे मुँह से बहू के मायके या उसके गिफ्ट्स के लिए एक भी ताना सुना,
तो ये घर तुम्हारे लिए ‘महँगा होटल’ बना रहेगा,
लेकिन ‘मायका’ नहीं कहलाएगा।”

पूजा ठिठक गई।
यह चेतावनी सिर्फ़ डाँट नहीं,
पिता की अंतिम सीमा थी।

काव्या ने तुरंत आगे बढ़कर उनके बीच की दूरी कम की।
वह पूजा के पास गई,
“दीदी, मैं आपसे माफ़ी नहीं माँग रही,
पर मैं ये भी नहीं चाहती कि आपका और पापा का रिश्ता बिगड़े।

मैं सिर्फ़ इतना चाहती हूँ कि
अगली बार जब आप मेरे मायके को याद करें,
तो उनकी मजबूरी नहीं,
उनका प्रेम याद करें।
ये घर आपका भी है, मेरा भी;
लेकिन मेरे मायके की इज़्ज़त का स्तर
आपके शब्द तय नहीं करेंगे।”

पूजा की आँखों से आँसू चुपचाप बह निकले।
उसने धीमे से कहा,
“भाभी… मुझसे सचमुच गलती हो गई।
शायद मैं अपने ही ‘स्टैंडर्ड’ के नशे में
दूसरों की भावनाएँ देख ही नहीं पाई।”

शालिनी ने आगे बढ़कर दोनों को गले लगा लिया,
“चलो, अब जो हो गया सो हो गया।
पर याद रखो—
रिश्ते गिफ्ट्स से नहीं,
आदर से चलते हैं।
जो दूसरों का मान रखता है,
वही अपने घर की असली इज़्ज़त बढ़ाता है।”

उसी समय ऊपर से बच्चे की खिलखिलाहट और औरतों की हँसी की आवाज़ आई।
गोद भराई के गीत फिर से शुरू हो गए थे।

नीचे, इस छोटे-से कमरे में
आज एक बड़ा बदलाव आ चुका था—
किसी के मायके की तौहीन से
किसी के अपने अहंकार का पर्दा उठा था,
और रिश्तों की इज़्ज़त…
थोड़ी और गहरी हो गई थी।


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