दीनानाथ जी पिछले छह महीनों से एक ही कमरे में, एक ही खिड़की के पास अपनी व्हीलचेयर पर बैठे रहते थे। बाहर मौसम बदलते रहे, सर्द हवाओं की जगह हल्की गर्म धूप ने ले ली, लेकिन दीनानाथ जी के मन का मौसम नहीं बदला। वहाँ सिर्फ एक गहरी, काली और ठंडी उदासी छाई हुई थी। छह महीने पहले शहर के सबसे प्रतिष्ठित स्कूल के प्रिंसिपल रहे दीनानाथ जी का एक भयंकर सड़क दुर्घटना में शिकार हो गए थे। उनकी जान तो बच गई, लेकिन उनके शरीर का निचला हिस्सा हमेशा के लिए लकवाग्रस्त हो गया। जिस इंसान ने अपनी पूरी जिंदगी अनुशासन, दौड़-भाग और बच्चों के शोरगुल के बीच बिताई हो, उसके लिए एक जगह अपाहिज होकर बैठ जाना मौत से भी बदतर था।
उनकी पत्नी सुमित्रा जी दिन-रात उनकी सेवा में लगी रहतीं। वे उन्हें उनके पसंदीदा भजन सुनाने की कोशिश करतीं, उनके लिए उनका मनपसंद खाना बनातीं, लेकिन दीनानाथ जी की आँखों में वो शून्यता जस की तस रहती। वे किसी से बात नहीं करते थे। उनका इकलौता बेटा, विवान, ऑफिस से थका-हारा लौटता और पिता की यह हालत देखकर अंदर ही अंदर टूटता रहता। विवान कई बार उनके पास बैठकर पुरानी बातें छेड़ने की कोशिश करता, लेकिन दीनानाथ जी बस एक ही बात कहते— "जो पेड़ सूख चुका हो, उस पर पानी डालने से कोई फायदा नहीं विवान। मेरी उम्मीद, मेरी जिंदगी उसी दिन उस सड़क पर खत्म हो गई थी। अब तो बस मैं तुम लोगों पर एक बोझ हूँ।"
यह शब्द पूरे परिवार के सीने में तीर की तरह चुभते थे। सुमित्रा जी रसोई में छुपकर रोती थीं। दीनानाथ जी ने मान लिया था कि जो इंसान खुद अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता, वो समाज या परिवार को क्या ही दे पाएगा। उन्होंने खुद को छोड़ दिया था।
इसी घर में एक और सदस्य थी, विवान की पांच साल की बेटी, मिष्ठी। मिष्ठी घर की जान थी। उसकी तोतली बोली और चुलबुलापन किसी भी उदास चेहरे पर मुस्कान ला सकता था। लेकिन हादसे के बाद से दीनानाथ जी ने मिष्ठी को भी खुद से दूर कर दिया था। उन्हें डर लगता था कि कहीं उनकी व्हीलचेयर से बच्ची को चोट न लग जाए या बच्ची उन्हें इस दयनीय हालत में देखकर डर न जाए।
एक दिन विवान और उसकी पत्नी किसी जरूरी काम से शहर से बाहर गए हुए थे। घर में सिर्फ सुमित्रा जी, दीनानाथ जी और मिष्ठी थे। सुमित्रा जी को भी अचानक तेज बुखार आ गया। वे दवा खाकर अपने कमरे में लेट गईं। घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। दीनानाथ जी अपनी व्हीलचेयर पर बैठे बाहर सड़क को घूर रहे थे। तभी उनके कमरे का दरवाजा धीरे से खुला। मिष्ठी अपने छोटे-छोटे हाथों में एक बहुत बड़ी सी गणित की किताब और एक टूटी हुई पेंसिल लिए अंदर आई।
दीनानाथ जी ने उसकी तरफ देखा और फिर से नजरें फेर लीं। मिष्ठी धीरे से उनके पैरों के पास फर्श पर बैठ गई और अपनी किताब खोल ली। दीनानाथ जी ने कठोर आवाज में कहा, "मिष्ठी, बाहर जाओ। दादू को आराम करना है।"
लेकिन मिष्ठी टस से मस नहीं हुई। उसने अपनी बड़ी-बड़ी मासूम आंखों से दीनानाथ जी की तरफ देखा और बोली, "दादू, कल मेरा स्कूल में टेस्ट है। मम्मा घर पर नहीं है और दादी को फीवर है। मुझे ये सवाल नहीं आ रहा। आप मुझे बता दो ना।"
"मुझसे कुछ नहीं आता बेटा, मैं अब किसी काम का नहीं हूँ। मैं एक अपाहिज हूँ," दीनानाथ जी ने चिड़चिड़ाते हुए कहा। उनका गला रुंध गया था।
मिष्ठी ने अपनी टूटी पेंसिल को किताब पर घुमाते हुए बहुत ही सहजता से कहा, "पर दादू, आपके पैर ही तो खराब हुए हैं, आपका दिमाग थोड़ी खराब हुआ है। मम्मा कहती है कि दादू दुनिया के सबसे स्मार्ट टीचर हैं। आप मुझे नहीं पढ़ाओगे तो मैं टेस्ट में फेल हो जाऊंगी, फिर सब मुझ पर हंसेंगे।" यह कहते-कहते मिष्ठी की आंखें भर आईं।
एक बच्ची के उन सीधे और सच्चे शब्दों ने दीनानाथ जी के अंदर जैसे कोई तार झकझोर दिया। "आपके पैर खराब हुए हैं, दिमाग थोड़ी..." ये शब्द उनके कानों में गूंजने लगे। उन्होंने अपने कांपते हाथों से मिष्ठी की वो किताब ली। सवाल दूसरी क्लास के हिसाब से थोड़ा मुश्किल था। दीनानाथ जी, जो बरसों से बड़े-बड़े गणित के समीकरण हल करते थे, आज एक पांच साल की बच्ची के सवाल को देखकर उनके अंदर का वो पुराना 'प्रिंसिपल' और 'शिक्षक' अचानक जाग उठा।
उन्होंने मिष्ठी को अपने पास बुलाया और बहुत ही प्यार से, एक कहानी के जरिए उसे वो सवाल समझाना शुरू किया। मिष्ठी ताली बजाकर हंस पड़ी, "ये तो बहुत ईजी था दादू! आप तो जादूगर हो!"
मिष्ठी की वो खिलखिलाहट उस अंधेरे कमरे में किसी सूरज की किरण की तरह थी। दीनानाथ जी के होठों पर पिछले छह महीनों में पहली बार एक सच्ची मुस्कान आई। उन्होंने मिष्ठी को अगले दो घंटे तक पढ़ाया। उस दिन उन्हें एहसास हुआ कि वे पहियों की कुर्सी पर जरूर बैठे हैं, लेकिन उनका अनुभव, उनका ज्ञान और उनका वजूद अभी अपाहिज नहीं हुआ है।
शाम को जब विवान घर लौटा, तो वह अपने पिता के कमरे का नजारा देखकर दरवाजे पर ही ठिठक गया। दीनानाथ जी मिष्ठी को एक कागज पर चित्र बनाना सिखा रहे थे और जोर-जोर से हंस रहे थे। सुमित्रा जी भी दरवाजे के पास खड़ी खुशी के आंसू पोंछ रही थीं।
उस रात खाने की मेज पर दीनानाथ जी ने खुद अपनी व्हीलचेयर आगे बढ़ाई। उन्होंने विवान से कहा, "विवान, कल मोहल्ले के उन बच्चों के माता-पिता से बात करना जो ट्यूशन की फीस नहीं दे सकते। मैं अब घर के बाहर वाले कमरे में उन्हें मुफ्त में गणित पढ़ाऊंगा। मैं शायद अब स्कूल चलकर नहीं जा सकता, लेकिन स्कूल को अपने घर जरूर ला सकता हूँ।"
विवान ने दौड़कर अपने पिता को गले लगा लिया। दीनानाथ जी की आँखों से आज बेबसी के नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत के आंसू बह रहे थे। उन्होंने समझ लिया था कि हर दिन एक नई उम्मीद है। जो उम्मीद छोड़ दे, वो खुद को छोड़ देता है। हालात चाहे कितने भी बुरे क्यों न हों, इंसान के अंदर हमेशा कुछ न कुछ ऐसा जरूर बचता है जिससे वो अपनी और दूसरों की जिंदगी रोशन कर सकता है। उन्होंने अपनी बंद खिड़की खोल दी थी और अब उम्मीद की धूप उनके पूरे वजूद को रोशन कर रही थी।
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