"आँसुओं की कीमत जब रुपयों में आंकी जाती है, तो नियति अपना ऐसा बहीखाता खोलती है जहाँ दौलत नहीं, सिर्फ दर्द का हिसाब होता है।"
यह कहानी किसी किताब का पन्ना नहीं, बल्कि इंसान के लालच और कुदरत के न्याय का वह जीता-जागता सच है, जो हर उस व्यक्ति को झकझोर सकता है जिसे अपनी दौलत और चालाकी पर गुरूर है।
कानपुर शहर के सबसे व्यस्त सर्राफा बाजार में सेठ केदारनाथ की सोने-चांदी की बहुत बड़ी दुकान थी। केदारनाथ सिर्फ जेवर ही नहीं बेचते थे, बल्कि गिरवी रखने का भी बहुत बड़ा व्यापार करते थे। बाजार में उनकी हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उनके पास शहर की सबसे महंगी गाड़ियां और सबसे आलीशान कोठी थी। लेकिन उनकी इस कामयाबी के पीछे मेहनत से ज्यादा उनकी बेईमानी और क्रूरता का हाथ था। केदारनाथ किसी भी जेवर की कीमत सोने की शुद्धता देखकर नहीं, बल्कि उसे बेचने वाले की मजबूरी देखकर तय करते थे। ग्राहक जितना लाचार होता, केदारनाथ का मुनाफा उतना ही ज्यादा होता। उन्हें किसी के दुख या आंसुओं से कोई फर्क नहीं पड़ता था; उनकी आँखों में सिर्फ अपनी तिजोरी की चमक बसती थी।
साल 2011 की बात है। सावन का महीना था और शहर में लगातार तीन दिनों से मूसलाधार बारिश हो रही थी। एक शाम, जब केदारनाथ अपनी दुकान बढ़ाने की तैयारी कर रहे थे, तभी एक अधेड़ उम्र का आदमी उनकी दुकान में दाखिल हुआ। उसके कपड़े बारिश में पूरी तरह भीगे हुए थे और वह ठंड और घबराहट से बुरी तरह कांप रहा था। उसका नाम गिरधारी था, जो एक दिहाड़ी मजदूर था।
गिरधारी ने कांपते हाथों से अपनी जेब से एक छोटी सी पोटली निकाली और उसे केदारनाथ के सामने रख दिया। पोटली में एक पुराना पुश्तैनी सोने का हार और दो कंगन थे। गिरधारी ने रुंधे हुए गले से कहा, "सेठ जी, मेरी इकलौती बेटी छत से गिर गई है। उसके सिर में गहरी चोट आई है। डॉक्टर ने कहा है कि आज रात ही ऑपरेशन करना पड़ेगा, वरना वह नहीं बचेगी। अस्पताल वालों ने साठ हजार रुपये जमा करने को कहा है। मेरे पास यही मेरी पत्नी की आखिरी निशानी बची है। इसे रख लीजिए और मुझे पैसे दे दीजिए।"
केदारनाथ ने अपनी पारखी नजरों से उन जेवरों को देखा। उन्हें अच्छी तरह पता था कि वह पुश्तैनी और शुद्ध 24 कैरेट सोना था। उस समय के बाजार भाव के हिसाब से उन जेवरों की कीमत कम से कम एक लाख रुपये थी। लेकिन केदारनाथ का लालची दिमाग अपना खेल खेल चुका था। उन्होंने जेवरों को कसौटी पर घिसने का नाटक किया और नाक-भौं सिकोड़ते हुए बोले, "अरे भाई, यह तो पूरा मिलावटी है। इसमें सोने से ज्यादा तो तांबा भरा है। इसके मैं तुम्हें ज्यादा से ज्यादा पंद्रह हजार रुपये दे सकता हूँ।"
यह सुनते ही गिरधारी के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह रोने लगा और बोला, "सेठ जी, ऐसा मत कहिए। यह मेरे दादाजी के समय का खरा सोना है। मुझे कम से कम पचास हजार तो दे दीजिए, वरना मेरी बेटी मर जाएगी। मेरे पास किसी और दुकान पर जाने का समय नहीं है।"
केदारनाथ ने कठोरता से जवाब दिया, "लेना है तो पंद्रह हजार ले, वरना अपना रास्ता नाप। मेरे पास फालतू समय नहीं है।"
गिरधारी लाचार था। उसने अपने सिर का गीला साफा उतारा और केदारनाथ के जूतों पर रख दिया। वह उनके पैरों में गिरकर गिड़गिड़ाने लगा, "सेठ जी, मुझ पर रहम खाइए। मेरी बेटी की जान आपके हाथों में है। थोड़ा और पैसा दे दीजिए, मैं जीवन भर आपकी गुलामी करूँगा।"
दुकान में खड़े एक मुनीम ने भी धीरे से कहा, "सेठ जी, जेवर तो असली हैं, दे दीजिए बेचारे को। बेटी की जान का सवाल है।" लेकिन केदारनाथ ने मुनीम को बुरी तरह डांट कर चुप करा दिया। उन्होंने अपने जूतों पर पड़े गिरधारी के साफे को पैर से किनारे कर दिया और बोले, "पंद्रह हजार से एक रुपया ज्यादा नहीं दूँगा।"
वक्त तेजी से बीत रहा था और गिरधारी की बेटी की सांसें टूट रही थीं। हारकर उस लाचार बाप ने पंद्रह हजार रुपये ही लिए और रोता हुआ दुकान से निकल गया। केदारनाथ ने उस दिन एक ही झटके में पच्चासी हजार रुपये का मुनाफा कमा लिया था। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि पंद्रह हजार में उस गरीब का क्या हुआ होगा।
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। साल 2016 आ गया। केदारनाथ का व्यापार और भी फैल चुका था। लेकिन कहते हैं न कि पाप की कमाई जब अपना रंग दिखाती है, तो इंसान को संभलने का मौका भी नहीं मिलता। केदारनाथ के बाईस साल के इकलौते बेटे, रोहन का एक भयानक कार एक्सीडेंट हो गया। उसे शहर के सबसे महंगे अस्पताल में भर्ती कराया गया। रोहन के शरीर की कई हड्डियां टूट गई थीं और उसके फेफड़ों में भी गंभीर चोट थी।
इलाज शुरू हुआ और पानी की तरह पैसा बहने लगा। एक दिन का बिल लाखों में आता था। केदारनाथ ने अपनी सारी दौलत बेटे को बचाने में लगा दी। शहर के बाहर के प्लॉट बिक गए, कोठी गिरवी रख दी गई और आखिरकार वह बड़ी सी दुकान भी बिक गई। तीन साल तक रोहन वेंटिलेटर और आईसीयू के बीच झूलता रहा। केदारनाथ जो कभी शहर के सबसे रईस सेठ हुआ करते थे, अब कर्ज के बोझ तले दब चुके थे।
लेकिन कुदरत का न्याय अभी बाकी था। 2019 में तमाम कोशिशों और करोड़ों रुपये लुटाने के बाद भी रोहन को बचाया नहीं जा सका। बेटे की मौत के सदमे से केदारनाथ की पत्नी लकवाग्रस्त हो गईं और कुछ ही महीनों बाद वह भी इस दुनिया से चल बसीं। केदारनाथ पूरी तरह से टूट चुके थे। कभी मखमली गद्दों पर सोने वाले सेठ जी अब एक छोटे से किराए के बदबूदार कमरे में रहने को मजबूर थे।
साल 2023 आते-आते केदारनाथ खुद भी गंभीर बीमारियों से घिर गए। उनकी दोनों किडनी खराब हो चुकी थीं और उन्हें हफ्ते में तीन दिन डायलिसिस की जरूरत पड़ने लगी। एक दिन उनकी तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ गई। डॉक्टर ने तुरंत कुछ महंगे इंजेक्शन और डायलिसिस के लिए पैसे जमा करने को कहा। केदारनाथ के पास फूटी कौड़ी नहीं बची थी।
उनकी नजर अपनी उंगली में पड़ी उस आखिरी सोने की अंगूठी पर गई, जो उन्होंने अपने रईसी के दिनों में बनवाई थी। यह भारी और शुद्ध सोने की अंगूठी थी। केदारनाथ अपनी जान बचाने के लिए वह अंगूठी लेकर बाजार के एक नए और बड़े सर्राफा व्यापारी के पास गए।
कांपते हाथों से उन्होंने वह अंगूठी उस नए सेठ के सामने रखी और हांफते हुए कहा, "सेठ जी, मेरी तबीयत बहुत खराब है। अस्पताल में डायलिसिस के लिए पैसे देने हैं। यह शुद्ध सोने की अंगूठी है। इसकी कीमत कम से कम अस्सी हजार है। मुझे साठ हजार दे दीजिए ताकि मेरी जान बच सके।"
नए सेठ ने अंगूठी को हाथ में लिया, उसे लापरवाही से देखा और एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ बोला, "अरे बाबा, यह तो पूरा पीतल और तांबा है। इसके मैं तुम्हें बीस हजार रुपये से ज्यादा नहीं दे सकता।"
केदारनाथ सन्न रह गए। यह वही अंगूठी थी जिसे उन्होंने खुद अपने हाथों से परखा था। वे रो पड़े और हाथ जोड़कर बोले, "बेटा, ऐसा मत कहो। मैं भी कभी सर्राफा बाजार का व्यापारी था। यह खरा सोना है। मुझ पर रहम करो, मेरे पास इलाज के पैसे नहीं हैं, मैं तड़प-तड़प कर मर जाऊंगा।"
उस नए सेठ ने रूखेपन से जवाब दिया, "मरते हो तो मरो, मैं क्या करूँ? मुझे जो ठीक लगा मैंने बता दिया। लेना है तो बीस हजार लो, वरना मेरा रास्ता छोड़ो।"
केदारनाथ की आँखों से आंसुओं की धार फूट पड़ी। उनके कानों में अचानक वह पुरानी आवाज गूंजने लगी— "सेठ जी, मुझ पर रहम खाइए। मेरी बेटी की जान आपके हाथों में है..." उन्हें अचानक वह बारिश की शाम, गिरधारी का भीगा हुआ शरीर और अपने जूतों पर रखा हुआ वह साफा याद आ गया।
आज केदारनाथ उसी जगह खड़े थे जहाँ कभी गिरधारी खड़ा था। वही लाचारी, वही मजबूरी, वही आंसू और सामने बैठा हुआ वही निर्दयी लालच। केदारनाथ बिना पैसे लिए अपनी अंगूठी उठाकर वापस लौट आए। उन्हें समझ आ गया था कि बेईमानी और क्रूरता से कमाया गया धन कभी साथ नहीं देता। जब वह लौटता है, तो पेट की एक-एक आंत और आत्मा का एक-एक कतरा फाड़ कर निकलता है।
हम सब इस दुनिया की दौड़ में यह भूल जाते हैं कि हमारे कर्मों का कोई हिसाब भी रख रहा है। हमें लगता है कि गरीब और लाचार को लूटकर हम अपने परिवार के लिए सुख बटोर रहे हैं, लेकिन हकीकत में हम अपने और अपने बच्चों के भविष्य के लिए कांटों का बिस्तर तैयार कर रहे होते हैं। ईश्वर की लाठी में आवाज नहीं होती, लेकिन जब वह पड़ती है, तो इंसान को दर्द के सिवा कुछ महसूस नहीं होता। आज केदारनाथ अपनी हर उस चालाकी और बेईमानी पर खून के आंसू रो रहे हैं, लेकिन अब समय बहुत आगे निकल चुका है।
पैसा जरूरी है, लेकिन वह किसी की आह और आंसुओं की कीमत पर नहीं आना चाहिए। ईमानदारी की सूखी रोटी बेईमानी के पकवानों से हजार गुना बेहतर है, क्योंकि वह कम से कम सुकून की नींद तो देती है।
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