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अंतिम श्वास का समर्पण

 रात के करीब बारह बज चुके थे। शहर के सबसे बड़े मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल के तीसरे माले पर बने आईसीयू वॉर्ड में एक अजीब सी मनहूसियत और खामोशी पसरी हुई थी। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, जिसकी बूँदें कांच की बड़ी-बड़ी खिड़कियों पर टकराकर एक डरावनी लय बना रही थीं। वॉर्ड के भीतर सिर्फ जीवन रक्षक उपकरणों की लयबद्ध 'बीप-बीप' की आवाजें और वेंटिलेटर के पंप होने की 'फिस-फिस' ही उस निस्तब्धता को तोड़ रही थी। नीली और हरी मद्धिम रोशनियों के बीच हर बिस्तर पर कोई न कोई जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था। हवा में सर्जिकल स्प्रिट, दवाओं और उस खास अस्पताल वाली गंध का भारीपन था, जो किसी भी इंसान के दिल में खौफ पैदा करने के लिए काफी होता है। 


बेड नंबर सात पर साठ वर्षीय यशोदा देवी पिछले दस दिनों से कोमा में थीं। उनके शरीर में अनगिनत नलियां लगी थीं और चेहरे का आधा हिस्सा वेंटिलेटर के भारी मास्क से ढंका हुआ था। डॉक्टरों के विजिट का समय कब का खत्म हो चुका था। नाइट शिफ्ट का स्टाफ अपनी-अपनी डेस्क पर फाइलों में उलझा था या हल्की झपकी ले रहा था। मगर यशोदा की लगातार गिरती पल्स और क्रिटिकल हालत को देखते हुए, आईसीयू की ड्यूटी इंचार्ज सिस्टर करुणा ने यशोदा के दोनों बेटों, समीर और अनिकेत को सिर्फ पांच मिनट के लिए भीतर जाकर अपनी माँ को देखने की एक खास अनुमति दे दी थी।


दोनों भाई दबे पाँव आईसीयू में दाखिल हुए। यशोदा का सूजा हुआ चेहरा और मशीनों के सहारे चल रही उनकी उथली साँसों को देखकर छोटे बेटे अनिकेत की आँखें भर आईं। वह धीरे से माँ के सिरहाने गया और उनके ठंडे पड़ चुके हाथ को अपने दोनों हाथों में लेकर चूमने लगा। तभी बड़े भाई समीर ने एक लंबी और भारी साँस ली। उसके चेहरे पर दुख के साथ-साथ एक अजीब सी विवशता और थकान की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं।


समीर ने अनिकेत के कंधे पर धीरे से हाथ रखा और रुंधे हुए लेकिन व्यावहारिक स्वर में बोला, "अनी, खुद को सँभाल मेरे भाई। देख, माँ पिछले दस दिनों से इस वेंटिलेटर के सहारे है। डॉक्टरों ने आज शाम ही साफ कह दिया है कि माँ का दिमाग अब काम नहीं कर रहा है। वह एक तरह से डीप कोमा में जा चुकी हैं और उनका शरीर अब दवाइयों का कोई रिस्पॉन्स नहीं दे रहा है। सिर्फ मशीनें उनके सीने को ऊपर-नीचे कर रही हैं।"


अनिकेत ने लाल आँखों से अपने बड़े भाई की ओर देखा, पर कुछ बोला नहीं। समीर ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "तुझे पता है अनिकेत, इस आईसीयू का और दवाइयों का एक दिन का खर्च पैंतीस हजार रुपये आ रहा है। हमारी सारी सेविंग्स खत्म हो चुकी हैं। मैंने अपनी दुकान भी गिरवी रख दी है। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो हम पूरी तरह से सड़क पर आ जाएंगे। जो सच है, उसे हमें स्वीकार करना होगा। डॉक्टर भी यही समझा रहे थे कि अब हमें वेंटिलेटर हटवाने पर विचार करना चाहिए। वो अपनी जिंदगी जी चुकी हैं, और अब उन्हें भी कोई तकलीफ या एहसास नहीं हो रहा होगा। उनका शरीर पूरी तरह से चेतनाशून्य हो चुका है। कुछ ही पलों में सब शांत हो जाएगा और उन्हें इस अमानवीय पीड़ा से मुक्ति मिल जाएगी।"


समीर की यह बात सुनते ही अनिकेत के भीतर जैसे कोई ज्वालामुखी फट पड़ा। वह फफक कर रो पड़ा और उसने समीर का हाथ झटक दिया। उसकी आवाज में एक गहरा दर्द और आक्रोश था। 


"भैया, आप ये कैसी बातें कर रहे हैं? पैसे खत्म हो गए तो क्या हुआ? क्या चंद रुपयों के लिए हम अपनी माँ की साँसों का सौदा कर लें? आपको याद है जब पिताजी का साया हमारे सिर से उठा था, तब हम कितने छोटे थे? जब मुझे पंद्रह साल की उम्र में भयानक टाइफाइड और पीलिया एक साथ हुआ था, तब हमारे घर में खाने को अन्न का एक दाना नहीं था।"


अनिकेत रोते हुए अपनी माँ के चेहरे की तरफ देखने लगा, जैसे वह उनसे ही बात कर रहा हो। "भैया, उस रात भी ऐसी ही बारिश हो रही थी। माँ मुझे अपनी पीठ पर लादकर घुटनों तक भरे पानी में तीन किलोमीटर पैदल चलकर सरकारी अस्पताल ले गई थीं। जब डॉक्टर ने बाहर से महंगी दवाइयाँ लिखीं, तो माँ ने अपनी शादी की इकलौती निशानी, अपनी सोने की बालियां और मंगलसूत्र तक बेच दिया था। उन्होंने महीनों तक दूसरों के घरों में जूठे बर्तन मांजे थे ताकि मेरा इलाज हो सके। वो खुद आधी रोटी खाकर सो जाती थीं, लेकिन मुझे कभी भूखा नहीं रखा। अगर उस दिन माँ भी यही सोच लेती कि इस बच्चे को बचाने में बहुत खर्च है, तो क्या मैं आज यहाँ खड़ा होता?"


अनिकेत ने माँ के बेजान हाथ को और कसकर पकड़ लिया, "आज जब वो इस बिस्तर पर असहाय पड़ी हैं, तो हम पैसों का हिसाब लगा रहे हैं? मैं अपना फ्लैट बेच दूँगा, दिन-रात मजदूरी कर लूँगा, लेकिन जब तक माँ की साँसें चल रही हैं, मैं ये मशीन नहीं हटने दूँगा। आप कहते हैं कि वो 'चेतनाशून्य' हो गई हैं? मेरी माँ कभी चेतनाशून्य नहीं हो सकती। उनका शरीर भले ही काम न कर रहा हो, लेकिन उनकी आत्मा, उनका मन सब सुन रहा है। मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी संपत्ति मेरा फ्लैट या मेरा बैंक बैलेंस नहीं, मेरी माँ है। मैं किसी भी कीमत पर उन्हें मरने नहीं दूँगा। भगवान ने चाहा तो पैसे तो मैं फिर से कमा लूँगा, लेकिन माँ कहाँ से लाऊँगा?"


दोनों भाइयों के बीच जज़्बातों का यह ज्वार तेजी से बढ़ रहा था। अनिकेत की रुलाई और समीर की खामोश विवशता ने आईसीयू के सन्नाटे को तोड़ना शुरू कर दिया था। दूर खड़ी सिस्टर करुणा ने देखा कि दूसरे मरीजों को परेशानी हो रही है और इन दोनों की भावनाएं बेकाबू हो रही हैं। वह तुरंत उनके पास आई और बहुत ही शालीनता से, मगर कड़क लहजे में बोली, "देखिए, मैंने आपको सिर्फ देखने की इजाजत दी थी। आप लोग इस तरह से बहस करके मरीज की हालत और बिगाड़ रहे हैं। प्लीज, आप लोग फौरन बाहर जाइए।"


अनिकेत अपनी माँ के माथे को चूमकर और समीर अपनी आँखें पोंछते हुए किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह आईसीयू वॉर्ड से बाहर निकल गए। बाहर वेटिंग एरिया की ठंडी लोहे की कुर्सियों पर बैठकर समीर को अपनी कही हुई बातों पर गहरा पछतावा होने लगा था। वह अनिकेत को गले लगाकर रोने लगा और उसे सांत्वना देने की कोशिश करने लगा। दोनों भाई अतीत की यादों और वर्तमान की कड़वी सच्चाई के बीच पिस रहे थे।


तभी अचानक अंदर आईसीयू में अलार्म की तेज आवाजें गूंजने लगीं। 'कोड ब्लू... कोड ब्लू...' की आवाज से पूरा फ्लोर दहल गया। नाइट ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर और दो अन्य नर्सें दौड़ते हुए यशोदा के बेड की तरफ भागे। अनिकेत और समीर भी बदहवास होकर आईसीयू के शीशे वाले दरवाजे की तरफ लपके।


अंदर का नजारा खौफनाक था। मॉनिटर पर यशोदा की हार्ट रेट तेजी से गिर रही थी... 40... 32... 20... 12... और फिर एक लंबी बीप की आवाज के साथ वह लाइन बिल्कुल सीधी हो गई। डॉक्टर ने तुरंत सीपीआर देना शुरू किया, डिफिब्रिलेटर से शॉक दिए गए, लेकिन यशोदा का शरीर अब हमेशा के लिए शांत हो चुका था। 


डॉक्टर ने पसीने से लथपथ होकर मॉनिटर की तरफ देखा और फिर सिस्टर करुणा की ओर पलटकर गुस्से से चिल्लाए, "इनका वेंटिलेटर ट्यूब किसने निकाला? पेशेंट एक्सट्यूबेट कैसे हो गई?"


यह सुनकर दरवाजे के बाहर खड़े समीर और अनिकेत के पैरों तले जमीन खिसक गई। डॉक्टर बाहर आए और उन्होंने भारी मन से यशोदा के निधन की पुष्टि करते हुए वही सवाल दोहराया, "आप लोगों के जाने के बाद कोई अंदर आया था क्या? मरीज का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा हुआ था।"


सिस्टर करुणा और बाकी स्टाफ भी अचंभित थे, क्योंकि कोई भी उस बेड के पास नहीं गया था। किसी साजिश या मेडिकल नेग्लिजेंस के शक में डॉक्टर ने तुरंत सिक्योरिटी को फोन करके आईसीयू के उस हिस्से की सीसीटीवी फुटेज चेक करने को कहा। 


कंप्यूटर स्क्रीन के सामने डॉक्टर, सिस्टर करुणा और दोनों भाई खड़े थे। जब उन्होंने पिछले पंद्रह मिनट की फुटेज प्ले की, तो जो कुछ स्क्रीन पर दिखा, उसने वहां खड़े हर इंसान की रूह को कंपा कर रख दिया। 


फुटेज में साफ दिख रहा था कि जैसे ही समीर और अनिकेत उस बिस्तर से दूर जाकर आईसीयू से बाहर निकले, दस दिन से बेजान पड़ी यशोदा के शरीर में एक हल्की सी हरकत हुई। जिस माँ को मेडिकल साइंस ने 'ब्रेन डेड' और 'चेतनाशून्य' मान लिया था, उसने अपनी बंद पलकों को बड़ी मुश्किल से थोड़ा सा खोला। उसके दाएँ हाथ की उंगलियां, जिनमें पल्स ऑक्सीमीटर लगा था, धीरे-धीरे कांपने लगीं। 


यशोदा ने अपनी पूरी बची हुई जीवन शक्ति, अपनी आखिरी ताकत को इकट्ठा किया और अपने कांपते हुए हाथ को सीने तक उठाया। उनका हाथ ट्यूब्स और तारों में उलझा हुआ था, लेकिन एक माँ का संकल्प उस वक्त मौत के साये से भी ज्यादा मजबूत था। यशोदा ने अपने ही हाथों से अपने मुँह पर लगा वह जीवन रक्षक वेंटिलेटर मास्क पकड़ा और उसे पूरी ताकत से खींच कर हटा दिया। कुछ सेकंड तक उनका शरीर हवा के लिए तड़पा, सीने में कुछ हिचकोले उठे और फिर वह हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गईं।


वह चेतनाशून्य नहीं थीं। उन्होंने अपने बेटों की हर एक बात सुनी थी। उन्होंने सुना था कि कैसे उनका बड़ा बेटा कर्जे में डूब रहा है, कैसे उनका छोटा बेटा उनकी खातिर अपना सब कुछ नीलाम करने को तैयार है। जिस माँ ने जिंदगी भर अपने बच्चों को बचाने के लिए अपने गहने और अपनी खुशियां बेची थीं, आज उसने अपने बच्चों के भविष्य और उनकी खुशियों को बचाने के लिए अपनी साँसों की ही कुर्बानी दे दी थी। 


अनिकेत स्क्रीन के सामने घुटनों के बल गिरकर दहाड़ मार कर रोने लगा। समीर के मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी। विज्ञान और मशीनें यह साबित कर सकती हैं कि शरीर कब काम करना बंद कर देता है, लेकिन दुनिया की कोई मशीन आज तक यह नहीं माप पाई है कि एक माँ की चेतना और उसकी ममता किस हद तक जा सकती है। यशोदा ने जाते-जाते भी अपने बच्चों का कर्ज उतार दिया था।


***


**क्या आपको भी लगता है कि माता-पिता का प्यार और उनका बलिदान दुनिया की हर मेडिकल साइंस और हर तर्क से परे होता है? इस कहानी ने आपके मन में क्या विचार जगाए, हमें कमेंट करके जरूर बताएं।**


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