Skip to main content

प्रेम की बंदगी या दिखावे का बाज़ार

 नव्या और उसके पति सुमित ने अभी पिछले ही महीने शहर की सबसे पॉश 'गोल्डन विलोस' सोसाइटी में अपना नया फ्लैट लिया था। नव्या के लिए यह एक बिल्कुल नई दुनिया थी। मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली नव्या जब इस हाई-प्रोफाइल सोसाइटी में आई, तो उसकी आँखें यहाँ की चकाचौंध देखकर चुंधिया गईं। अभी उन्हें शिफ्ट हुए कुछ ही दिन बीते थे कि करवा चौथ का त्योहार नज़दीक आ गया। सोसाइटी के क्लब हाउस और शाम की सैर के दौरान महिलाओं का मुख्य विषय अब सिर्फ करवा चौथ की तैयारियाँ ही रह गया था।


नव्या शाम को जब सोसाइटी के पार्क में टहलने जाती, तो हर तरफ बस यही बातें सुनाई देतीं। 

"अरे शालिनी, मैंने तो इस बार डिज़ाइनर बुटीक से सत्तर हज़ार का लहंगा कस्टमाइज़ करवाया है।"

"मैंने तो अपने पति को साफ बोल दिया है कि इस बार मुझे उस मशहूर ज्वैलर का डायमंड नेकलेस ही चाहिए, आखिर मैं उनके लिए भूखी-प्यासी जो रहूँगी!"

"यार, मेरा तो दिमाग खराब है। मेरे मेकअप आर्टिस्ट ने एंड टाइम पर बुकिंग कैंसिल कर दी। अब मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्लब हाउस के 'करवा चौथ क्वीन' कॉन्टेस्ट में क्या करूंगी।"


नव्या चुपचाप सब सुनती रहती। इन महिलाओं का पूरा दिन अब या तो महंगे पार्लरों में कट रहा था या फिर बड़े-बड़े शोरूम्स में। कोई अपनी मैचिंग चूड़ियों के लिए पूरा शहर छान रही थी, तो कोई अपनी ड्रेस की फिटिंग को लेकर डिज़ाइनर से रोज़ झगड़ रही थी। नव्या को लगने लगा कि शायद इस सोसाइटी का यही 'स्टैंडर्ड' है और अगर उसे यहाँ के लोगों के बीच अपनी जगह बनानी है, तो उसे भी ऐसा ही करना होगा। 


दिखावे की इस अंधी दौड़ में नव्या भी शामिल हो गई। उसने सुमित से जिद करके एक बहुत ही महंगी रेशमी साड़ी खरीदी। सुमित, जो नए घर की ईएमआई और शिफ्टिंग के खर्चों से पहले ही दबा हुआ था, नव्या की खुशी के लिए किसी तरह पैसों का इंतज़ाम करके उसे साड़ी और एक सोने की चेन दिलवा लाया। करवा चौथ से दो दिन पहले से ही सुमित की रातों की नींद उड़ गई। नव्या को रात बारह बजे तक मेहंदी लगवानी होती, और दिन भर थका-हारा सुमित कार में बैठकर उसका इंतज़ार करता। सुमित के चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी, लेकिन नव्या का ध्यान सिर्फ इस बात पर था कि उसकी मेहंदी का रंग सोसाइटी की बाकी औरतों से गहरा होना चाहिए।


आखिरकार करवा चौथ का दिन आ गया। 'गोल्डन विलोस' का क्लब हाउस किसी फैशन शो के रैंप से कम नहीं लग रहा था। पूजा की थालियों से ज्यादा ध्यान इस बात पर था कि किसने कितने लाख की ज्वेलरी पहनी है। औरतों के बीच होड़ मची थी कि किसके पति ने सबसे महंगा गिफ्ट दिया है। क्लब हाउस में 'बेस्ट ड्रेस्ड', 'बेस्ट मेहंदी' और 'परफेक्ट कपल' जैसे अवार्ड्स रखे गए थे। नव्या भी वहां सज-धज कर बैठी थी, लेकिन उसे वहां एक अजीब सी घुटन महसूस हो रही थी। जब उसने देखा कि एक महिला की साड़ी उसकी साड़ी से ज्यादा महंगी है, तो नव्या का मन उदास हो गया। पूरे दिन भूखे रहने का जो आध्यात्मिक सुकून होना चाहिए था, वह सिर्फ ईर्ष्या और असुरक्षा में बदल गया था। 


पूजा खत्म होने के बाद जब नव्या अपनी थाली लेकर वापस अपने टावर की तरफ लौट रही थी, तो उसकी नज़र फर्स्ट फ्लोर की बालकनी पर पड़ी। वहां श्रुति खड़ी थी। श्रुति नव्या के ठीक नीचे वाले फ्लैट में रहती थी। उसने एक बेहद साधारण लेकिन खूबसूरत पुरानी बनारसी साड़ी पहनी हुई थी। माथे पर एक बड़ी सी लाल बिंदी और चेहरे पर एक ऐसा सुकून जो नव्या ने क्लब हाउस की किसी भी महिला के चेहरे पर नहीं देखा था। श्रुति के पति अमन ने बड़े प्यार से उसे पानी पिलाया और दोनों वहीं बालकनी में खड़े होकर एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराते हुए बातें करने लगे। 


नव्या को याद आया कि श्रुति पूरे करवा चौथ की तैयारियों के दौरान कहीं नज़र नहीं आई थी। वह न तो उन किटी पार्टी वाली चर्चाओं में थी, न ही उसने किसी पार्लर में घंटों समय बिताया था। 


अगले दिन सुबह नव्या से रहा नहीं गया। वह ग्यारह बजे के करीब श्रुति के फ्लैट पर पहुँच गई। श्रुति ने दरवाज़ा खोला और अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ नव्या को अंदर बुलाया। 


"आइए नव्या जी, बैठिए। मैं चाय बनाती हूँ," श्रुति ने बहुत ही आत्मीयता से कहा।


नव्या के मन में सवालों का तूफान उठ रहा था। उसने बिना किसी औपचारिकता के सीधे पूछा, "श्रुति जी, आप कल सोसाइटी के क्लब हाउस में करवा चौथ के ग्रैंड सेलिब्रेशन में क्यों नहीं आईं? वहां इतना बड़ा आयोजन था, सबने अपनी-अपनी ड्रेसेस दिखाईं, गिफ्ट्स दिखाए। आप वहां क्यों नहीं थीं?"


श्रुति चाय के दो कप लेकर आई और नव्या के सामने बैठकर मुस्कुराई। "नव्या जी, आप यहाँ नई हैं, इसलिए आपको वहां की चकाचौंध असली त्योहार लग रही है। मैं हर साल करवा चौथ अपने घर पर, अपने परिवार के साथ ऐसे ही मनाती हूँ।"


"ऐसे ही मनाती हूँ मतलब? आपने कोई खास तैयारी नहीं की?" नव्या ने हैरानी से पूछा।


श्रुति ने बहुत ही शांत स्वर में जवाब दिया, "तैयारी तो बहुत की थी नव्या जी। करवा चौथ वाले दिन मेरे पति अमन खास तौर पर छुट्टी लेते हैं। हम दोनों सुबह जल्दी उठकर साथ में सरगी बनाते हैं। फिर नहा-धोकर मंदिर जाते हैं और भगवान से अपने रिश्ते की मजबूती की प्रार्थना करते हैं। वापस आकर मैं अपनी सासू माँ की पसंद का खाना बनाती हूँ और उनसे आशीर्वाद लेती हूँ।"


नव्या ने बीच में टोकते हुए कहा, "सासू माँ का आशीर्वाद तो हम भी लेते हैं, पर इसमें अलग क्या है?"


श्रुति की आँखें सम्मान से भर आईं। उसने कहा, "अलग यह है नव्या जी, कि मैं यह महसूस करती हूँ कि जिस पति की लंबी उम्र के लिए मैं व्रत रख रही हूँ, उस पति को पाल-पोसकर, इतना अच्छा इंसान बनाकर मेरी सासू माँ ने ही मुझे सौंपा है। यह उनके त्याग का धन्यवाद करने का दिन होता है। शाम को अमन और मैं साथ मिलकर कुछ अच्छा समय बिताते हैं, कोई पुरानी फिल्म देखते हैं, साथ मिलकर पूजा करते हैं और फिर पूरा परिवार एक साथ बैठकर खाना खाता है। मेरे लिए यही है करवा चौथ।"


नव्या को श्रुति की बातें बहुत अलग लग रही थीं। उसने हिचकिचाते हुए पूछा, "आपकी बात तो ठीक है, लेकिन आपने यह नहीं बताया कि आपने अमन जी से करवा चौथ का क्या गिफ्ट लिया? कल क्लब हाउस में तो सब औरतें अपने गिफ्ट्स गिना रही थीं।"


यह सुनकर श्रुति जोर से हँसी। उसकी हँसी में कोई ताना नहीं, बल्कि एक गहरी समझ थी। "गिफ्ट? करवा चौथ पर गिफ्ट कैसा नव्या जी? मैंने आपसे कहा ना, यह प्यार और विश्वास का त्योहार है, कोई व्यापार नहीं।"


"व्यापार? गिफ्ट लेना व्यापार कैसे हो गया?" नव्या उलझन में पड़ गई।


श्रुति ने अपना चाय का कप रखा और नव्या की आँखों में देखते हुए बोली, "नव्या जी, जब हम किसी के लिए कुछ करते हैं और उसके बदले में किसी चीज़ की उम्मीद रखते हैं, तो वह सौदा कहलाता है, प्रेम नहीं। अगर मैं पूरे दिन इसलिए भूखी-प्यासी हूँ ताकि रात को मेरा पति मुझे एक डायमंड रिंग दे, तो यह मेरी प्रार्थना कहाँ हुई? यह तो एक तरह का इमोशनल ब्लैकमेल हुआ। प्रेम में तो हम देते हैं, कुछ मांगते नहीं। मैं व्रत रखती हूँ क्योंकि मैं अमन से प्यार करती हूँ और उनकी लंबी उम्र चाहती हूँ, किसी महंगे गिफ्ट के लालच में नहीं।"


श्रुति की इस एक बात ने नव्या के दिमाग के सारे जाले साफ कर दिए। श्रुति ने अपनी बात जारी रखी, "आजकल हमने त्योहारों को आधुनिकता के नाम पर एक बोझ बना दिया है। पत्नियाँ महीनों पहले से पति का दिमाग खाना शुरू कर देती हैं। पतियों की रातों की नींद उड़ जाती है कि अगर उन्होंने कोई महंगा गिफ्ट नहीं दिया, तो पत्नी उन्हें बाकी औरतों के सामने ताने मारेगी। करवा चौथ से एक रात पहले बेचारे पति ऑफिस से थके-हारे आते हैं और रात के एक-एक बजे तक पार्लर के बाहर खड़े रहते हैं। अगले दिन भी वे थके होते हैं, लेकिन पत्नियाँ कहती हैं कि हम तुम्हारे लिए ही तो सज रहे हैं। क्या फायदा ऐसे सजने का, जब आपके पति के चेहरे पर सुकून ही न हो? हम कपड़े और गहने दूसरों को दिखाने के लिए पहनते हैं, पति के लिए नहीं।"


नव्या को अचानक सुमित का थका हुआ चेहरा याद आ गया। उसे याद आया कि कैसे सुमित ने ईएमआई की टेंशन के बावजूद नव्या के लिए वह महंगी साड़ी खरीदी थी। कैसे वह रात के एक बजे तक मेहंदी वाले के पास खड़ा झपकियाँ ले रहा था। और इसके बदले में नव्या ने क्या किया? वह सुमित के साथ समय बिताने के बजाय क्लब हाउस में दूसरों की साड़ियों से अपनी साड़ी की तुलना कर रही थी।


नव्या की आँखों में पश्चाताप के आँसू आ गए। उसने श्रुति का हाथ पकड़ लिया और रुंधे हुए गले से बोली, "आपने आज मेरी आँखें खोल दीं श्रुति जी। मैं इस दिखावे की दुनिया में यह भूल ही गई थी कि मेरा सुमित मुझसे कितना प्यार करता है। मैंने इस पवित्र त्योहार को सच में एक सौदा बना दिया था। इस सोसाइटी की बाकी औरतें चाहे जो करें, लेकिन मैं आपको वचन देती हूँ कि मेरा अगला करवा चौथ सच में प्रेम, विश्वास और समर्पण का ही पर्व होगा। कोई दिखावा नहीं, कोई महंगी फरमाइश नहीं।"


नव्या जब वापस अपने घर लौटी, तो उसने सुमित को कसकर गले लगा लिया। सुमित हैरान था, लेकिन नव्या के चेहरे पर जो आज सुकून था, वह कल रात उन महंगे गहनों और साड़ी में भी नहीं था। नव्या ने तय कर लिया था कि अब से उसका जीवन और उसके त्योहार सिर्फ और सिर्फ प्यार की नींव पर टिके होंगे, दिखावे की रेत पर नहीं। 


अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...