दोपहर के करीब दो बज रहे थे। अक्टूबर की हल्की-हल्की धूप खिड़की से छनकर मेरे ऑफिस की डेस्क पर पड़ रही थी। मैं अपनी कंप्यूटर स्क्रीन पर कुछ फाइलों में उलझी हुई थी, तभी मेरे मोबाइल की रिंगटोन बजी। स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमक रहा था। आमतौर पर मैं ऑफिस के समय अनजान नंबर उठाने से कतराती हूँ, लेकिन उस दिन न जाने क्यों मेरे हाथ खुद-ब-खुद फोन की तरफ बढ़ गए। मैंने कॉल रिसीव किया और दूसरी तरफ से आई आवाज़ ने मेरी पूरी दुनिया को एक पल के लिए सुन्न कर दिया।
"हेलो, क्या आप आरोही की माँ बोल रही हैं? मैं सिटी अस्पताल से बोल रहा हूँ। आपकी बेटी का स्कूल के बाहर एक्सीडेंट हो गया है, उसे यहाँ इमरजेंसी में लाया गया है। आप तुरंत पहुँचिए।"
फोन मेरे हाथ से छूटकर डेस्क पर गिर पड़ा। मेरे कानों में एक अजीब सी सीटी बजने लगी और आँखों के सामने अंधेरा छा गया। मेरा पूरा शरीर काँपने लगा। आरोही, मेरी सात साल की जान, मेरी इकलौती बेटी। सुबह तो मैंने खुद उसे स्कूल बस में बिठाया था। उसने मुझे मुस्कुराते हुए 'बाय मम्मा' कहा था और मैंने उसके माथे को चूमा था। क्या हुआ होगा? उसे कितनी चोट आई होगी? क्या मेरी बच्ची सुरक्षित है? इन सवालों ने मेरे दिमाग में एक खौफनाक बवंडर खड़ा कर दिया। मैंने अपना बैग उठाया और बिना किसी को कुछ बताए पागलों की तरह ऑफिस से बाहर दौड़ पड़ी।
रास्ते में ऑटो में बैठे-बैठे मेरे होंठ लगातार काँप रहे थे। मैं सिर्फ भगवान से एक ही प्रार्थना कर रही थी, "हे ईश्वर, मेरी बच्ची को कुछ मत होने देना। मेरी जान ले लेना, मेरी हर खुशी ले लेना, लेकिन मेरी आरोही को सुरक्षित रखना। बस एक बार मैं उसे अपनी आँखों के सामने सही-सलामत देख लूँ।" ऑटो की हर ब्रेक पर मेरा दिल बैठ जाता था। शहर का ट्रैफिक आज मुझे किसी अजगर की तरह लग रहा था जो मुझे मेरी बच्ची तक पहुँचने से रोक रहा था। मेरी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे और ऑटो वाला भी मेरी हालत देखकर अपनी तरफ से ऑटो को जितनी तेजी से निकाल सकता था, निकाल रहा था।
अस्पताल पहुँचते ही मैं बिना पैसे दिए ही अंदर की तरफ भागने लगी (ऑटो वाले ने भी पीछे से कोई आवाज नहीं लगाई)। इमरजेंसी वॉर्ड के बाहर भयानक भीड़ थी, अजीब सी दवाओं की गंध और मशीनों की आवाज़ें आ रही थीं। मैं रिसेप्शन पर जाकर लगभग चिल्ला पड़ी, "मेरी बेटी! आरोही! स्कूल यूनिफॉर्म में आई होगी, कहाँ है वो?" रिसेप्शनिस्ट ने मुझे एक बेड की तरफ इशारा किया।
मैं भागकर उस बेड के पास पहुँची। वहाँ मेरी आरोही बैठी थी। उसके माथे पर एक छोटी सी पट्टी बंधी थी और घुटने पर थोड़ी खरोंच थी। वह डरी हुई और सहमी हुई सी एक नर्स के पास बैठी थी। उसे देखते ही मेरी जान में जान आई। मेरी वो मन्नत पूरी हो गई थी जो मैंने रास्ते भर भगवान से मांगी थी। मैंने दौड़कर उसे अपने सीने से लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगी। आरोही भी मुझे देखकर रोने लगी और अपने छोटे-छोटे हाथों से मुझे कसकर पकड़ लिया।
नर्स ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए सांत्वना दी, "आप शांत हो जाइए। बच्ची बिल्कुल सुरक्षित है। बस कुछ मामूली खरोंचें आई हैं, घबराने की कोई बात नहीं है।"
मैंने हाँफते हुए नर्स से पूछा, "यह सब कैसे हुआ? मेरी बच्ची तो स्कूल बस का इंतज़ार कर रही होगी, फिर यह एक्सीडेंट?"
नर्स का चेहरा अचानक गंभीर हो गया। उसने एक गहरी सांस ली और कहा, "आपकी बच्ची तो बिल्कुल ठीक है, लेकिन उसे बचाने वाली की हालत बहुत गंभीर है। एक तेज रफ्तार बेकाबू कार सीधा आपकी बच्ची की तरफ आ रही थी। वो तो वहां सड़क किनारे खिलौने बेचने वाली एक औरत ने अपनी जान की परवाह किए बिना ऐन मौके पर छलांग लगा दी। उसने आपकी बच्ची को धक्का देकर दूसरी तरफ सुरक्षित गिरा दिया, लेकिन वह खुद उस कार की चपेट में आ गई। वो अभी आईसीयू में है और डॉक्टर कह रहे हैं कि उनके बचने की उम्मीद बहुत कम है।"
यह सुनते ही मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। कोई अजनबी मेरी बच्ची के लिए अपनी जान पर खेल गया? मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने अपनी बेटी का माथा चूमा और उसे वहीं नर्स के पास छोड़कर उस आईसीयू की तरफ दौड़ी जहाँ उस देवदूत का इलाज चल रहा था। मैं किसी भी कीमत पर उस महिला के काम आना चाहती थी, उसका सारा खर्च उठाना चाहती थी, उसके पैरों में गिरकर उसका धन्यवाद करना चाहती थी।
मैं आईसीयू के शीशे के बाहर खड़ी ही हुई थी कि डॉक्टर बाहर निकले। उनका चेहरा झुका हुआ था। मैंने कांपती आवाज़ में पूछा, "डॉक्टर साहब, वो महिला... जिसने मेरी बच्ची को बचाया, वो कैसी हैं?"
डॉक्टर ने निराशा में सिर हिलाते हुए कहा, "आई एम सॉरी। हम उन्हें बचा नहीं पाए। उन्हें बहुत गहरी अंदरूनी चोटें आई थीं। उन्होंने अभी-अभी दम तोड़ दिया है।"
मैं वहीं ज़मीन पर धम्म से बैठ गई। मेरी आँखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। मेरी आरोही की ज़िंदगी की कीमत एक अजनबी ने अपनी जान देकर चुकाई थी। यह कैसा कर्ज था जो मैं जिंदगी भर नहीं चुका सकती थी?
तभी मुझे आरोही की कुछ दिन पुरानी बात याद आई। पिछले हफ्ते जब मैं उसे स्कूल से लेने गई थी, तो उसने स्कूल के गेट के बाहर बैठे एक खिलौने वाली बूढ़ी औरत की तरफ इशारा किया था। आरोही ने मुझसे कहा था, "मम्मा, वो जो आंटी वहां रंग-बिरंगे पंखे बेचती हैं ना, वो मुझे हमेशा बहुत प्यार से देखती हैं। कल जब मेरी पानी की बोतल गिर गई थी, तो उन्होंने भागकर उसे उठाया था और मेरे सिर पर हाथ फेरकर रोने लगी थीं।"
मैंने उस वक्त इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। मुझे लगा था कि कोई गरीब औरत होगी जो बच्चों को देखकर खुश होती होगी।
तभी पीछे से स्कूल का गार्ड, जो आरोही के साथ अस्पताल आया था, मेरे पास आकर खड़ा हो गया। वह भी बहुत भावुक था। उसने रुंधे हुए गले से कहा, "मैडम, आप जानती हैं वो औरत कौन थी? वो वही कमला मौसी थीं जो स्कूल के बाहर खिलौने बेचती थीं।"
गार्ड ने आगे जो बताया, उसने मेरे दिल के एक-एक तार को झकझोर कर रख दिया।
"मैडम, कमला मौसी की भी एक छोटी सी पोती थी, बिल्कुल आरोही बिटिया की उम्र की। तीन साल पहले इसी स्कूल के चौराहे पर एक ट्रक ने उस बच्ची को कुचल दिया था। कमला मौसी उसी दिन से अपना दिमागी संतुलन थोड़ा खो बैठी थीं। उन्हें लगता था कि उनकी बच्ची अभी भी इसी स्कूल में पढ़ती है। वो रोज़ सुबह आकर यहाँ बैठ जाती थीं और स्कूल की बच्चियों में अपनी पोती को ढूँढती थीं। वो अक्सर आरोही बिटिया को देखकर बहुत खुश होती थीं, कहती थीं कि 'ये बिल्कुल मेरी गुड़िया जैसी दिखती है।' आज जब उन्होंने उस बेकाबू कार को आरोही बिटिया की तरफ आते देखा, तो शायद उन्हें लगा कि उनकी अपनी गुड़िया खतरे में है। इस बार वो अपनी बच्ची को मरने नहीं देना चाहती थीं।"
मेरी आँखों के सामने से पर्दा हट गया। वह सिर्फ एक अजनबी नहीं थी, वह एक 'माँ' थी, एक 'दादी' थी जिसका दिल तीन साल पहले उसी सड़क पर टूट चुका था। उसने अपनी अधूरी ममता को मेरी बच्ची पर लुटा दिया। आज उसने उस चौराहे पर इतिहास को दोहराने नहीं दिया। उसने मेरी दुनिया उजड़ने से बचा ली, लेकिन इसके लिए उसने अपनी ज़िंदगी का सौदा कर लिया।
मैं लड़खड़ाते कदमों से आईसीयू के अंदर गई। सफेद चादर से ढका उनका शव वहां रखा था। मैंने धीरे से उनके चेहरे से चादर हटाई। उनके शांत और झुर्रियों भरे चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था। ऐसा लग रहा था जैसे सालों बाद उन्हें कोई बहुत बड़ी शांति मिल गई हो, जैसे वह आखिरकार अपनी उस बिछड़ी हुई पोती से मिलने चली गई हों।
मैंने उनके बेजान, खुरदरे पैरों को अपने हाथों में लिया और उन पर अपना सिर रख दिया। मेरे आँसू उनके पैरों को भिगो रहे थे। मैं बस इतना ही कह पाई, "माँ, तुमने आज साबित कर दिया कि एक माँ का दिल कितना बड़ा हो सकता है। मेरी बच्ची अब हमेशा तुम्हारी भी बच्ची रहेगी। मैं जिंदगी भर तुम्हारे इस बलिदान के कर्ज तले दबी रहूँगी।"
उस दिन मैं अस्पताल से अपनी बच्ची को लेकर घर तो आ गई, लेकिन मेरा एक हिस्सा हमेशा के लिए उस अस्पताल के आईसीयू में, उस बूढ़ी खिलौने वाली माँ के कदमों में छूट गया। आज भी जब आरोही मुस्कुराती है, तो मुझे उसकी उस मुस्कान में कमला मौसी का वह निस्वार्थ और सर्वोच्च बलिदान दिखाई देता है।
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