कुणाल की बारात जब दरवाजे पर लौट कर आई, तो सुभद्रा देवी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उन्होंने अपनी नई नवेली बहू, काव्या का स्वागत ऐसे किया जैसे साक्षात लक्ष्मी उनके घर पधार गई हों। सुभद्रा देवी ने अपने जीवन के कई साल अकेलेपन और संघर्ष में काटे थे, उनके पति का देहांत बहुत पहले हो गया था। उन्होंने कुणाल को अकेले ही पाल-पोस कर बड़ा किया था और अब बहू के आने से उन्हें लगा जैसे उनके सारे अधूरे सपने पल भर में पूरे हो गए हों। मोहल्ले की हर औरत से सुभद्रा देवी बस अपनी बहू की ही तारीफें करती थीं। "मेरी काव्या तो चांद का टुकड़ा है, और संस्कारी इतनी कि क्या बताऊँ," ये उनके तकियाकलाम बन गए थे। शुरुआत के कुछ हफ्तों तक काव्या को इस घर में किसी रानी की तरह रखा गया। उसे सुबह उठने की कोई जल्दी नहीं थी, नाश्ता भी अक्सर कुणाल या सुभद्रा देवी ही बना लिया करते थे। काव्या भी अपनी सास के इस व्यवहार से बहुत खुश थी, उसे लगा कि उसे मायके से भी बेहतर घर मिल गया है।
लेकिन, जैसे-जैसे दिन बीतते गए और शादी की वो शुरुआती चमक फीकी पड़ने लगी, घर के असली रंग सामने आने लगे। अतिथि सत्कार का दौर खत्म हुआ और काव्या से घर की जिम्मेदारियां संभालने की उम्मीद की जाने लगी। काव्या एक पढ़ी-लिखी, स्वाभिमानी और सुलझे हुए ख्यालों वाली लड़की थी। वह घर के काम करना जानती थी, लेकिन उसके काम करने का तरीका सुभद्रा देवी के पुराने और पारंपरिक तरीकों से बिल्कुल अलग था। यहीं से दोनों के बीच खटपट की नींव पड़ी।
सुभद्रा देवी को हर चीज़ अपने हिसाब से 'परफेक्ट' चाहिए होती थी। अगर काव्या ने सब्जी में आधा चम्मच नमक भी अपने अंदाज़ से डाल दिया, तो सुभद्रा देवी तुरंत टोक देतीं, "हमारे घर में इतना नमक नहीं खाया जाता, तुम्हारे मायके में ब्लड प्रेशर के मरीज नहीं होंगे, पर यहाँ हैं।" शुरुआत में काव्या ने इन बातों को सास का तजुर्बा समझकर नजरअंदाज किया। लेकिन सुभद्रा देवी का स्वभाव दिन-ब-दिन चिड़चिड़ा होता जा रहा था। उन्हें लगने लगा था कि काव्या उनकी सत्ता को चुनौती दे रही है। बात-बात पर रोकना-टोकना उनकी आदत बन गई। कभी नहाने के वक्त को लेकर ताना, "दोपहर के दस बजे तक कौन नहाता है? हमारे ज़माने में औरतें सूरज उगने से पहले नहा-धोकर पूजा कर लेती थीं," तो कभी झाड़ू लगाने के तरीके पर, "तुम तो बस धूल एक कोने से दूसरे कोने में सरका रही हो, ऐसे सफाई होती है क्या?"
काव्या भी कोई मिट्टी की मूरत नहीं थी। वह एक स्वाभिमानी परिवार से आई थी जहाँ उसे हमेशा बराबरी और सम्मान से बोलना सिखाया गया था। वह कब तक चुप रहती? एक दिन जब सुभद्रा देवी ने काव्या के बनाए हुए पोहे को 'कच्चा' कहकर कूड़ेदान में डाल दिया, तो काव्या के सब्र का बांध टूट गया। उसने मन ही मन अपनी किस्मत और अपनी उस सास को कोसना शुरू कर दिया जिसे कुछ दिन पहले वह माँ समान मानती थी।
रोज़ की तू-तू मैं-मैं अब उस घर का आम नज़ारा बन गई थी। सुभद्रा देवी को अब काव्या में सिर्फ कमियां ही नज़र आती थीं। सबसे बुरी बात यह थी कि सुभद्रा देवी अपनी घर की बातें मोहल्ले की औरतों के सामने नमक-मिर्च लगाकर सुनाने लगी थीं। जब भी शाम को पड़ोसनें सुभद्रा देवी के आंगन में चाय पीने आतीं, सुभद्रा देवी जानबूझकर अपनी आवाज़ ऊंची कर लेतीं। "क्या बताऊँ बहन, आजकल की लड़कियों को तो बस मोबाइल चलाना आता है। न ढंग से दाल रांधनी आती है, न बड़ों का अदब। इसके माँ-बाप ने तो जैसे इसे कुछ सिखाकर ही नहीं भेजा।"
काव्या जो रसोई में खड़ी सब सुन रही होती, उसका खून खौल उठता। एक दिन पानी सिर से ऊपर निकल गया। मोहल्ले की औरतों के सामने अपने माता-पिता का अपमान काव्या से बर्दाश्त नहीं हुआ। वह रसोई से बाहर आई और उसने कड़क आवाज़ में कहा, "माँ जी, आपको मेरे काम से जो भी शिकायत है, आप मुझे सीधे कह सकती हैं। लेकिन मेरे माता-पिता और मेरे खानदान को बीच में लाने का हक आपको किसी ने नहीं दिया। उन्होंने मुझे बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं, बस किसी के बेवजह के ताने सहना नहीं सिखाया।"
यह सुनते ही सुभद्रा देवी आग-बबूला हो गईं। "देख रहे हो तुम सब! इसकी ज़बान कितनी लंबी हो गई है। सास के मुँह पर जवाब दे रही है!"
उस दिन के बाद से सास-बहू के बीच एक खुला युद्ध शुरू हो गया। मर्यादा की सारी दीवारें टूट चुकी थीं। अगर सुभद्रा देवी ताने मारतीं, तो काव्या भी उन्हें जली-कटी सुनाने में पीछे नहीं रहती। कभी-कभी तो छोटी सी बात पर विवाद इतना बढ़ जाता कि दोनों एक-दूसरे के खानदान की धज्जियां उड़ाने लगतीं। रसोई में बर्तनों का ज़ोर-ज़ोर से पटका जाना, एक-दूसरे पर अप्रत्यक्ष रूप से थालियां या कटोरियां फेंक कर अपना गुस्सा जाहिर करना रोज़ का काम हो गया था। कुणाल, जो ऑफिस में दिन भर खटकर घर आता, इस रोज़-रोज़ के कलेश से मानसिक रूप से टूट चुका था। वह जब भी माँ को समझाता, तो माँ उसे 'जोरू का गुलाम' कह देतीं, और जब पत्नी को समझाता, तो काव्या कहती, "तुम्हें तो बस अपनी माँ ही सही लगती है।" बेचारा कुणाल दोनों पाटों के बीच पिस कर रह गया था।
हालात यहाँ तक बदतर हो गए कि काव्या ने सुभद्रा देवी की किसी भी बात पर ध्यान देना ही छोड़ दिया। सुभद्रा देवी अगर कहतीं कि आज लौकी की सब्जी बनेगी, तो काव्या जानबूझकर भिंडी बना देती। सुभद्रा देवी चिल्लाती रहतीं, और काव्या कानों में इयरफ़ोन लगाकर अपना काम करती रहती। दोनों एक ही छत के नीचे दो अजनबियों की तरह रहने लगी थीं, जिनके बीच सिर्फ नफरत का रिश्ता बचा था।
लेकिन कहते हैं न कि समय हमेशा एक सा नहीं रहता, और कभी-कभी नियति हमें ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती है जहाँ हमारा सारा अहंकार और गुस्सा मिट्टी में मिल जाता है।
कुणाल एक हफ्ते के लिए कंपनी के काम से शहर से बाहर गया हुआ था। घर में सिर्फ सुभद्रा देवी और काव्या थीं। दोनों के बीच बातचीत पूरी तरह से बंद थी। एक दोपहर सुभद्रा देवी बाथरूम में नहाने गईं। फर्श पर साबुन का पानी गिरा हुआ था। सुभद्रा देवी का पैर अचानक फिसला और वह धड़ाम से पीठ के बल ज़मीन पर गिर पड़ीं। गिरने की वजह से उनके सिर के पिछले हिस्से में गहरी चोट लगी और खून बहने लगा। दर्द के मारे उनकी चीख निकल गई, "बचाओ... काव्या... मुझे बचाओ!"
बाहर अपने कमरे में इयरफ़ोन लगाए बैठी काव्या को पहले तो कुछ सुनाई नहीं दिया। लेकिन जब उसे बाथरूम से कुछ गिरने की भारी आवाज़ का अहसास हुआ, तो उसने इयरफ़ोन निकाले। "काव्या...!" सुभद्रा देवी की कराहने की आवाज़ सुनकर काव्या का दिल धक से रह गया। वह दौड़ती हुई बाथरूम के पास पहुँची। दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं था, बस अटका हुआ था। काव्या ने दरवाज़ा धकेला और अंदर का नज़ारा देखकर उसके होश उड़ गए।
सुभद्रा देवी खून से लथपथ ज़मीन पर पड़ी थीं और दर्द से तड़प रही थीं। उस पल काव्या के दिमाग से सारे ताने, सारे झगड़े, और सारी कड़वाहट जैसे किसी ने मिटा दी। उसके सामने कोई ज़ालिम सास नहीं, बल्कि एक लाचार और दर्द में तड़पती हुई बुज़ुर्ग औरत थी।
"माँ जी! आप चिंता मत कीजिए, मैं आ गई हूँ," काव्या ने तुरंत एक तौलिया उठाया और उनके सिर के घाव पर कसकर दबा दिया ताकि खून रुक सके। उसके हाथ कांप रहे थे, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने सुभद्रा देवी को सहारा देकर उठाया और किसी तरह बाहर बेड तक लाई। बिना एक पल गंवाए काव्या ने एम्बुलेंस को फोन किया और पड़ोस में रहने वाले एक अंकल की मदद से उन्हें तुरंत नज़दीकी अस्पताल ले गई।
अस्पताल में सुभद्रा देवी को आईसीयू में रखा गया। उनके सिर में कई टांके आए थे और पैर की हड्डी में भी फ्रैक्चर था। कुणाल को खबर दी गई, लेकिन उसे पहुँचने में अगली सुबह तक का वक्त लगना था। पूरी रात काव्या अस्पताल के ठंडे फर्श पर बैठी रही। वह बार-बार नर्सों से सुभद्रा देवी की हालत पूछती, उनके लिए दवाइयां लाती और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करती रही कि "माँ जी को कुछ न हो।"
अगली सुबह जब सुभद्रा देवी को होश आया, तो उन्होंने अपनी आँखें खोलीं। उनका सिर भारी हो रहा था। उन्होंने अपने बिस्तर के पास देखा। काव्या कुर्सी पर बैठी हुई थी, उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर गहरी चिंता थी। वह उनका हाथ अपने हाथों में थामे हुए थी।
सुभद्रा देवी को वो सारी बातें याद आ गईं जब उन्होंने मोहल्ले भर में इस लड़की को कोसा था, इसके खानदान को गालियां दी थीं, इसे चुभने वाले ताने मारे थे। और आज जब वे मौत के मुहाने पर खड़ी थीं, तो वही पड़ोस की औरतें कहीं नज़र नहीं आ रही थीं, बल्कि वही काव्या रात भर जागकर उनकी जान बचा रही थी।
सुभद्रा देवी की आँखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। उनकी कमज़ोर उंगलियों ने काव्या के हाथ को हल्के से दबाया। काव्या ने चौंक कर सिर उठाया।
"माँ जी, आप ठीक हैं? दर्द ज्यादा तो नहीं हो रहा? मैं डॉक्टर को बुलाऊं?" काव्या घबरा कर एक साथ कई सवाल पूछने लगी।
सुभद्रा देवी ने रोते हुए अपना सिर ना में हिलाया और कांपती आवाज़ में कहा, "मुझे माफ़ कर दे बेटी... मैं अपने घमंड और पुराने ख्यालों में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे तेरे अंदर की वो अच्छाई कभी नज़र ही नहीं आई जो आज मेरे सामने खड़ी है। मैंने तुझे हमेशा दुश्मन समझा, पर तूने तो मुझे माँ समझ कर मेरी जान बचा ली।"
काव्या की आँखों में भी आंसू आ गए। उसने सुभद्रा देवी के माथे पर प्यार से हाथ फेरा और बोली, "माँ जी, जो हुआ उसे भूल जाइए। बर्तन तो एक ही जगह रहेंगे तो खटकेंगे ही। मेरी भी गलती थी कि मैंने आपके तजुर्बे को समझने की कोशिश नहीं की और बहस करने लगी। अब हम एक नई शुरुआत करेंगे।"
उसी वक्त दरवाज़ा खुला और कुणाल भागता हुआ अंदर आया। अपनी माँ को होश में और अपनी पत्नी को उनके साथ मुस्कुराते हुए रोता देखकर कुणाल के सीने से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया। उसने महसूस किया कि जिस नफरत की दीवार को वह महीनों से गिराने की कोशिश कर रहा था, वो एक रात की परवाह और प्रेम ने हमेशा के लिए ढहा दी थी।
अस्पताल से घर लौटने के बाद उस घर का नज़ारा बिल्कुल बदल चुका था। सुभद्रा देवी अब काव्या के काम में कमियां निकालने के बजाय उसकी तारीफ करती थीं, और काव्या भी अपनी सास के पुराने तौर-तरीकों का सम्मान करने लगी थी। अब रसोई से टूटते बर्तनों का शोर नहीं, बल्कि सास-बहू के एक साथ हंसने की मीठी आवाज़ें आती थीं।
कभी-कभी दूरियां मिटाने के लिए किसी बड़े चमत्कार की नहीं, बस एक-दूसरे के प्रति सच्ची करुणा और समझ की ज़रूरत होती है।
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