"माफ़ कीजिएगा सर, यह टेबल पहले से एक परिवार के लिए रिज़र्व है। वीकेंड की वजह से कैफे में काफी भीड़ है, क्या आप प्लीज़ किसी और टेबल पर शिफ्ट हो जाएंगे?" वेटर ने एक पैंतीस-छत्तीस साल के आदमी से नम्रतापूर्वक कहा, जो अपने लैपटॉप की स्क्रीन और कॉफी के कप में बुरी तरह उलझा हुआ था।
"कोई बात नहीं भैया, इन्हें बैठने दीजिए। हमें बस कुछ ही देर रुकना है, मेरे हसबैंड हमें पिक करने आ ही रहे होंगे," वेटर के ठीक पीछे खड़ी एक महिला ने अपनी शांत और ठहरी हुई आवाज़ में कहा।
"ठीक है मैम, थैंक यू," वेटर ने सिर हिलाया और वहां से चला गया।
मेधा ने अपनी पांच साल की बेटी परी को आराम से कुर्सी पर बिठाया, उसका मफलर ठीक किया और खुद उसके सामने वाली कुर्सी खींचकर बैठ गई। सामने बैठा शख्स, जिसे अपने काम में खलल पड़ना बिल्कुल पसंद नहीं था, झल्लाकर अपनी स्क्रीन से नज़रें हटाने ही वाला था कि उस आवाज़ ने उसे वहीं रोक दिया। उसने धीरे से अपना चेहरा उठाया और सामने देखा। वह पूरी तरह अवाक् था।
"हल्के नीले रंग की सूती साड़ी, उस पर गहरे भूरे रंग का एक लंबा वूलन कोट। एक हाथ में काले पट्टे वाली क्लासिक घड़ी और दूसरे हाथ में एक पतली सी चांदी की चूड़ी। माथे पर एक बहुत ही छोटी सी काली बिंदी और आंखों पर एक सलीकेदार फ्रेम का चश्मा। बालों को एक साधारण से क्लचर से बांधा हुआ था... वो पहले से थोड़ी बदल गई थी, चेहरे पर एक अलग सा ठहराव और मैच्योरिटी थी, पर उसकी सादगी और वो बेबाक खूबसूरती आज भी वैसी ही थी।" कबीर मन ही मन सोच रहा था। उसकी धड़कनें अचानक तेज़ हो गई थीं।
मेधा ने अपना बैग टेबल पर रखा और जैसे ही उसकी नज़रें उठीं, उसके हाथ भी एक पल के लिए ठिठक गए। सामने बैठा शख्स कोई अजनबी नहीं था। वह कबीर था... कबीर शर्मा! वह इंसान जिसके साथ उसने अपनी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत और सबसे तकलीफदेह तीन साल गुज़ारे थे।
वेटर वापस आया। मेधा ने परी के लिए एक हॉट चॉकलेट और अपने लिए एक ब्लैक कॉफी का ऑर्डर दिया। कबीर अभी भी पलकें झपकाए बिना मेधा को देखे जा रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। क्या वह मुस्कुराए? क्या वह नज़रें चुरा ले?
मेधा ने एक नज़र अपनी चुलबुली बेटी पर डाली जो मेन्यू कार्ड के पन्नों में छपी तस्वीरों में खोई थी, और फिर बहुत ही सहजता से कबीर की तरफ देखकर एक हल्की सी, शिष्टाचार वाली मुस्कान के साथ बोली, "कैसे हो कबीर?"
कबीर जैसे किसी गहरी नींद से जागा। उसने हड़बड़ाते हुए अपने लैपटॉप की स्क्रीन बंद की, गला साफ किया और थोड़ा झेंपते हुए बोला, "मैं... मैं बहुत अच्छा हूँ मेधा। तुम कैसी हो? कितने साल हो गए ना..."
"करीब सात साल," मेधा ने उसी सहजता से जवाब दिया। "मैं भी बहुत अच्छी हूँ।"
कबीर की नज़र परी पर गई। उसके गले में एक अजीब सी गांठ पड़ गई थी। "तो... शादी कर ली तुमने? या अभी नहीं?" कबीर का यह सवाल पूछना बेहद अजीब और बेवकूफी भरा था, क्योंकि सामने एक बच्ची बैठी थी जो मेधा को 'मम्मा' कह रही थी। लेकिन कबीर के अंदर का वो इंसान जो शायद आज भी मेधा को उसी सात साल पुरानी जगह पर खड़ा देखना चाहता था, खुद को रोक नहीं पाया।
मेधा ने एक गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। "हाँ कबीर, शादी हो गई मेरी। पांच साल पहले। और ये मेरी बेटी है, परी।"
कबीर के दिमाग में सात साल पुरानी वो बारिश वाली शाम ताज़ा हो गई। वह भी ऐसी ही एक सर्द शाम थी, जब कबीर ने मेधा से कहा था कि वह अभी शादी या किसी भी तरह के कमिटमेंट के लिए तैयार नहीं है। उसे अपना स्टार्टअप देखना था, उसे दुनिया घूमनी थी, उसे किसी की ज़िम्मेदारी नहीं उठानी थी। मेधा ने बहुत समझाया था कि सपने साथ मिलकर भी पूरे किए जा सकते हैं, प्यार कभी तरक्की का रास्ता नहीं रोकता। लेकिन कबीर ने उसे अपनी राह का रोड़ा और एक 'इमोशनल बर्डन' समझ लिया था। उसने मेधा से कह दिया था कि वह उसके बिना ज्यादा फोकस कर पाएगा। और उस दिन मेधा चुपचाप उसकी ज़िंदगी से चली गई थी। बिना कोई तमाशा किए, बिना कोई शिकायत किए। उसने पलटकर कभी कबीर को फोन नहीं किया।
आज कबीर के पास वो सब कुछ था जिसके लिए उसने मेधा को छोड़ा था—पैसा, शोहरत, शहर के सबसे पॉश इलाके में एक आलीशान फ्लैट और एक सफल कंपनी। लेकिन जब वह रात को अपने उस बड़े से घर में लौटता, तो उसे उस भयानक खालीपन का एहसास होता जिसे कोई सफलता या बैंक बैलेंस नहीं भर सकता था।
"और तुम्हारे पति? क्या करते हैं वो?" कबीर ने अपनी कॉफी का कप दोनों हाथों में थामते हुए पूछा, जैसे वह खुद को कोई दिलासा देना चाहता हो।
"विराज एक आर्किटेक्ट हैं। बहुत ही सुलझे हुए और शांत इंसान। मेरी तरह," मेधा मुस्कुराई। "और सबसे बड़ी बात, वो मेरे सपनों का उतना ही सम्मान करते हैं जितना अपने सपनों का। मैंने पिछले साल ही अपनी पहली किताब पब्लिश की है कबीर। तुम्हें याद है ना, मुझे कहानियां लिखने का शौक था? विराज ने ही मुझे अपनी उस अधूरी किताब को पूरा करने के लिए सबसे ज्यादा प्रेरित किया।"
कबीर को एक हल्का सा झटका लगा। मेधा हमेशा से लिखना चाहती थी, लेकिन कबीर हमेशा उसके इस शौक को 'टाइमपास' कहकर टाल देता था। वह अक्सर कहता था कि इन सब से कुछ हासिल नहीं होता, प्रैक्टिकल बनो। आज किसी और ने मेधा के उस शौक को उसकी पहचान बना दिया था और उसे वो आसमान दिया था जो कबीर कभी नहीं दे पाया।
"ये तो बहुत अच्छी बात है मेधा। आई एम रियली हैप्पी फॉर यू," कबीर ने कहा, पर उसकी आवाज़ में एक अजीब सी उदासी और हार का भाव था। वह कुछ पल चुप रहा, फिर मेज़ पर अपनी उंगलियां फेरते हुए बोला, "मुझे लगा था कि शायद तुम मुझे कभी माफ नहीं कर पाओगी। मैंने उस दिन बहुत स्वार्थी होकर फैसला लिया था।"
मेधा ने अपनी कॉफी का एक घूंट लिया। उसका चेहरा एकदम शांत था। उसकी आंखों में न तो कोई पुराना गुस्सा था, न कड़वाहट, और न ही कबीर को नीचा दिखाने की कोई चाहत।
"माफी तो उन्हें दी जाती है कबीर, जिनसे कोई नाराजगी हो या जिनसे कोई उम्मीद बची हो," मेधा ने बहुत ही ठहरे हुए लहज़े में कहा। "जब हम अलग हुए थे, तो शुरुआत के कुछ महीनों तक मुझे बहुत तकलीफ हुई थी। मुझे लगा था कि शायद मुझमें ही कोई कमी थी या मेरा प्यार तुम्हारे लिए काफी नहीं था। लेकिन फिर वक्त के साथ मुझे समझ आया कि हम दोनों की मंज़िलें ही अलग थीं। तुम्हें एक ऐसी ज़िंदगी चाहिए थी जिसमें तुम सिर्फ अपने लिए दौड़ सको, बिना किसी ठहराव के। और मुझे एक ऐसा हमसफ़र चाहिए था जिसके साथ मैं कदम मिलाकर चल सकूं, जो मेरी खामोशी को भी पढ़ सके। तुमने जो चुना, वो तुम्हारे लिए सही था। और मुझे जो मिला, वो मेरे लिए बेहतरीन है। इसलिए, शिकायत की कोई जगह ही नहीं है।"
कबीर के पास कहने को कुछ नहीं बचा था। मेधा की यह परिपक्वता उसे अंदर तक चीर रही थी। वो मेधा जो कभी उसके एक फोन के लिए घंटों इंतजार करती थी, जो छोटी-छोटी बातों पर रोने लगती थी, आज उसके सामने इतनी मजबूत और मुकम्मल बैठी थी कि कबीर खुद को बहुत बौना महसूस कर रहा था। मेधा मीलों दूर जा चुकी थी, और कबीर शायद आज भी उसी शाम में अटका हुआ था।
तभी कैफे के शीशे वाले दरवाजे से एक लंबा, सौम्य चेहरे वाला आदमी अंदर दाखिल हुआ। परी उसे देखते ही अपनी कुर्सी से उछल पड़ी और चहक उठी, "पापा आ गए!"
विराज मुस्कुराता हुआ उनकी टेबल के पास आया। उसने अपनी बेटी को गोद में उठाया, उसके गाल पर प्यार से चूमा और फिर मेधा के कंधे पर बहुत ही अपनेपन से हाथ रखा। विराज ने कबीर की तरफ देखकर एक गर्मजोशी भरी मुस्कान दी।
"सॉरी मेधा, थोड़ा ट्रैफिक था इसलिए दस मिनट लेट हो गया। तुम्हारा कॉफी खत्म हो गया?" विराज ने पूछा।
"हाँ, बस हो ही गया। विराज, ये कबीर हैं। हम एक ही कॉलेज में थे," मेधा ने बिना किसी हिचकिचाहट के, बहुत ही सहजता से परिचय कराया।
"ओह, नाइस टू मीट यू कबीर," विराज ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
कबीर ने भी उठकर हाथ मिलाया। उस एक पल में कबीर ने देख लिया कि मेधा और विराज की आंखों में एक-दूसरे के लिए कितना गहरा सुकून, विश्वास और सम्मान था। वहां कोई दिखावा नहीं था, बस एक सच्चा साथ था।
"चलें? बाहर ठंड बढ़ रही है," विराज ने मेधा का कोट उठाते हुए पूछा।
मेधा ने सिर हिलाया। उसने कबीर की तरफ देखा और एक सच्ची, बिना किसी कड़वाहट वाली मुस्कान के साथ कहा, "मिलकर अच्छा लगा कबीर। ऑल द बेस्ट फॉर योर फ्यूचर। अपनी कंपनी को और ऊंचाइयों पर लेकर जाना।"
कबीर के होंठ सूखे हुए थे। वह बस इतना ही कह पाया, "तुम्हें भी मेधा... बहुत खुश रहना।"
मेधा, विराज और परी कैफे से बाहर निकल गए। कबीर वहीं अपनी कुर्सी पर धम्म से बैठ गया। बाहर बर्फ की हल्की फुहारें गिरने लगी थीं। उसने अपनी कॉफी का आखिरी घूंट लिया जो अब पूरी तरह से ठंडी और कड़वी हो चुकी थी। आज उसे एहसास हुआ कि उसने ज़िंदगी की दौड़ में बहुत कुछ कमा लिया था, लेकिन जो सुकून मेधा के उस छोटे से परिवार की हंसी में था, जो ठहराव उसके चेहरे पर था, वो उसने अपनी एक बेवकूफी में हमेशा के लिए खो दिया था। कुछ फैसले ज़िंदगी में बहुत छोटे लगते हैं, लेकिन उनका असर उम्र भर एक टीस बनकर हमारा पीछा करता है।
क्या आपने भी कभी महसूस किया है कि करियर और महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ में हम अक्सर उन लोगों को पीछे छोड़ देते हैं जो हमारी असली ताकत होते हैं? क्या कबीर का पछतावा जायज़ था? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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