Skip to main content

"चकाचौंध के साये में प्यार की कीमत"

 कैसे एक छोटे से उपहार के तिरस्कार ने एक भरे-पूरे परिवार को टूटने की कगार पर ला खड़ा किया और कैसे अतीत के एक कड़वे सच ने इस टूटते रिश्ते को बचाया।


शहर के सबसे पॉश इलाके में स्थित 'रॉयल हाइट्स' का पेंटहाउस आज रोशनी से जगमगा रहा था। मौका था विशाखा और रोहन की शादी की पाँचवीं सालगिरह का। पूरा घर विदेशी फूलों की महक और धीमी, सुरीली संगीत की धुनों से गूंज रहा था। विशाखा ने एक मशहूर डिज़ाइनर का लाखों का गाउन पहना हुआ था और उसके गले में चमकता हीरे का हार उसकी रईसी की गवाही दे रहा था। पार्टी में शहर के नामी बिजनेसमैन, सोशलाइट्स और उनके अमीर दोस्त शिरकत कर रहे थे। विशाखा अपनी इस दुनिया में इतनी मगन थी कि उसे अपने अतीत और अपने मायके की सादगी अब एक बोझ लगने लगी थी।


उसी शानदार महफ़िल के एक कोने में विशाखा की भाभी, नियति, थोड़ी असहज सी खड़ी थीं। नियति और विशाखा के बड़े भाई, शशांक, एक छोटे शहर से आए थे। शशांक ने अपनी छोटी बहन विशाखा की इस आलीशान शादी को मुकम्मल करने के लिए अपनी जीवन भर की जमापूंजी लगा दी थी और कुछ कर्ज़ भी लिया था। इसी वजह से शशांक और नियति का जीवन बहुत ही सादगी भरा और संघर्षपूर्ण चल रहा था। नियति ने एक साधारण सी सूती सिल्क की साड़ी पहनी हुई थी, जो उस चकाचौंध भरी पार्टी में बिल्कुल अलग और 'आउट ऑफ प्लेस' लग रही थी।


नियति के हाथों में एक कपड़े का थैला था, जिसे वह बहुत ही सहेज कर पकड़े हुए थी। जब तोहफे देने का सिलसिला शुरू हुआ, तो विशाखा की अमीर सहेलियाँ उसे महँगे परफ्यूम, ब्रांडेड घड़ियाँ और डिज़ाइनर बैग्स दे रही थीं। विशाखा हर तोहफे को देखकर खुशी से चहक उठती।


काफी देर संकोच करने के बाद, नियति धीरे से विशाखा के पास गई। उसने बहुत ही प्यार से वह कपड़े का थैला विशाखा की तरफ बढ़ाते हुए कहा, "विशाखा, सालगिरह बहुत-बहुत मुबारक़ हो। मेरे और तुम्हारे भइया की तरफ से यह एक छोटा सा आशीर्वाद है तुम्हारे लिए।"


विशाखा की सहेलियों की नज़रें उस साधारण से थैले पर टिक गईं। एक सहेली ने हल्की सी व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, "अरे वाह विशाखा, तुम्हारी भाभी का तोहफा तो बड़ा 'विंटेज' लग रहा है।"


विशाखा का चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो गया। उसने झटके से उस थैले को खोला। अंदर कोई महँगा मखमली डिब्बा नहीं था, बल्कि एक हल्के गुलाबी रंग की, हाथ की भारी कढ़ाई वाली पारंपरिक साड़ी थी। साड़ी पर कोई बड़े ब्रांड का टैग नहीं था, बल्कि वह बिल्कुल सादी पैकिंग में थी।


यह देखते ही विशाखा का जो थोड़ा बहुत धैर्य था, वह भी जवाब दे गया। अपनी हाई-सोसाइटी सहेलियों के सामने अपनी इस 'मिडिल-क्लास' भाभी के तोहफे ने उसके अहंकार को गहरी चोट पहुँचाई थी। उसने बिना यह सोचे कि वहाँ कितने लोग खड़े हैं, उस साड़ी को पास रखे सोफे पर लगभग फेंकते हुए कहा:


"ये क्या है भाभी? आप यह कैसा पुराना और बाज़ारू सा सामान उठा लाई हैं? आपको पता है न कि मैं अब सिर्फ डिज़ाइनर कपड़े ही पहनती हूँ। माना कि आपके पास पैसे नहीं हैं, लेकिन बड़े घरों में लेन-देन का क्या सलीका होता है, यह तो आपको सीखना चाहिए था! मिडिल क्लास सोच कभी नहीं बदल सकती। अगर हैसियत नहीं थी तो खाली हाथ आ जातीं, पर मेरी सहेलियों के सामने मेरा यह मज़ाक उड़वाने की क्या ज़रूरत थी?"


विशाखा के ये कड़वे शब्द किसी धारदार तीर की तरह नियति के दिल के आर-पार हो गए। नियति का गला रुँध गया, उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन अपमान के उस घूंट ने उसकी आवाज़ छीन ली थी। उसने ज़मीन की तरफ देखा, अपने आँसू पोंछे और बिना एक शब्द कहे, उस भरी महफ़िल से बाहर गेस्ट रूम की तरफ भाग गई।


विशाखा की सहेलियाँ भी माहौल की नज़ाकत को भाँपकर वहाँ से खिसक गईं। विशाखा अभी भी गुस्से में हाँफ रही थी। तभी वहाँ विशाखा की माँ, सुमित्रा जी आईं। उन्होंने दूर से यह पूरा तमाशा देखा था। सुमित्रा जी एक बहुत ही सुलझी हुई और ज़मीन से जुड़ी महिला थीं। दौलत कभी उनके संस्कारों पर हावी नहीं हो पाई थी।


सुमित्रा जी ने आगे बढ़कर सोफे पर फेंकी गई उस गुलाबी साड़ी को उठाया। उन्होंने उस साड़ी की कढ़ाई पर हाथ फेरा और उसे बहुत ही सम्मान के साथ अपने सीने से लगा लिया। उनकी आँखों में अपनी बेटी के लिए गुस्सा और एक गहरी निराशा थी।


"मम्मी, आप इस सस्ते कपड़े को क्यों उठा रही हैं? मैंने नौकरानी को इसे बाहर फेंकने के लिए ही वहाँ रखा था," विशाखा ने मुँह बनाते हुए कहा।


सुमित्रा जी ने एक गहरी साँस ली और विशाखा का हाथ पकड़कर उसे महफ़िल से दूर एक खाली कमरे में ले गईं। उन्होंने बहुत ही शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा:


"विशाखा... रिश्ते बहुत अनमोल होते हैं। उनकी कद्र करनी चाहिए। उपहार देने वाले का दिल देखा जाता है, उसकी कीमत या ब्रांड का टैग नहीं। तू जानती है ना कि दूध चाहे कितना भी शुद्ध और मीठा क्यों न हो, अगर उसमें दो बूँद खटास या नींबू की पड़ जाए, तो वह हमेशा के लिए फट जाता है। आज तेरे इन दो पल के गुस्से और अहंकार ने ननद-भाभी के उस प्यार भरे रिश्ते को तार-तार कर दिया है, जिसे तेरी भाभी ने इतने सालों से सहेज कर रखा था।"


विशाखा ने अपनी सफाई देनी चाही, "पर मम्मी, आपने देखा नहीं वो मेरे स्टैंडर्ड के हिसाब से..."


सुमित्रा जी ने उसे बीच में ही टोक दिया, "स्टैंडर्ड? तेरा स्टैंडर्ड इस घर और इन कपड़ों से नहीं, तेरी सोच से तय होता है विशाखा। और आज तेरी सोच बहुत छोटी और गरीब साबित हुई है। ज़रा इस साड़ी को गौर से देख। यह बाज़ार से खरीदी हुई कोई सस्ती साड़ी नहीं है। इसके पल्लू पर जो बारीक कढ़ाई है, वह मशीन की नहीं, हाथों की है।"


विशाखा ने हैरान होकर साड़ी की तरफ देखा।


सुमित्रा जी की आवाज़ भर्रा गई, "तुझे पता है, पिछले छह महीनों से तेरी भाभी को सर्वाइकल का भयंकर दर्द है। डॉक्टर ने उसे गर्दन झुकाने से सख्त मना किया है। लेकिन अपनी लाडली ननद की सालगिरह के लिए उसने दर्द की गोलियाँ खाकर, रात-रात भर जागकर यह कढ़ाई खुद अपने हाथों से की है। रेशम के धागे खरीदने के लिए उसने अपने मायके से मिली अपनी इकलौती सोने की चेन बेच दी, क्योंकि तेरे भाई का व्यापार अभी मंदी में है। उसने अपना गुरूर, अपनी कीमती निशानी और अपनी सेहत, सब कुछ तेरे इस तोहफे की वेदी पर चढ़ा दिया... और तूने उसे 'मिडिल क्लास' कहकर सरेआम जलील कर दिया?"


विशाखा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


सुमित्रा जी की आँखों से आँसू छलक पड़े। वे अतीत की एक गहरी खाई में उतर चुकी थीं। उन्होंने भारी आवाज़ में कहा:


"बरसों पहले, जब मैं नई-नई ब्याह कर आई थी और दौलत का नया-नया नशा मुझ पर भी चढ़ा था, तब मुझसे भी ठीक ऐसी ही भूल हो गई थी विशाखा। मेरी सबसे करीबी सहेली, मालती, जो एक बहुत ही गरीब परिवार से थी, मेरे लिए मिट्टी के गुल्लक में अपने बचाए हुए कुछ छुट्टे पैसे और एक हाथ से बुना हुआ रुमाल लेकर आई थी। मैंने भी अपने रईस रिश्तेदारों के सामने उसके उस तोहफे का मज़ाक उड़ाया था और उसे ज़मीन पर फेंक दिया था। उस दिन मालती बिना कुछ कहे रोती हुई चली गई थी। मैंने सोचा कि कल मना लूँगी... लेकिन वो कल कभी नहीं आया। कुछ ही दिनों बाद एक बीमारी से उसका निधन हो गया। आज पैंतीस साल हो गए हैं विशाखा, मेरे पास दुनिया की हर सुख-सुविधा है, लेकिन उस रुमाल को सीने से लगाकर मैं आज भी रोती हूँ। मेरा वो पछतावा आज तक कम नहीं हुआ है। मेरे ज़रा से क्रोध और अहंकार के कारण मेरी प्यारी सहेली हमेशा के लिए मुझसे बिछड़ गई थी। कहीं आज तेरी भाभी भी तेरे इस व्यवहार से हमेशा के लिए..."


सुमित्रा जी आगे नहीं बोल पाईं और रो पड़ीं।


विशाखा के हाथों में अब वह गुलाबी साड़ी थी। जब उसने उस साड़ी की कढ़ाई को करीब से देखा, तो उसे जगह-जगह धागों के बीच खून के कुछ बहुत ही हल्के, सूखे हुए धब्बे नज़र आए—शायद सुई चुभने के निशान। उसे महसूस हुआ कि हर धागे में कितनी सफ़ाई और कितनी मेहनत थी। उसे याद आ गया कि कैसे बचपन में जब भी वह बीमार पड़ती थी, तो यही नियति भाभी रात-रात भर उसके सिरहाने बैठकर उसके सिर पर पट्टियाँ रखती थीं। कैसे उसकी शादी के लिए नियति भाभी ने बिना एक भी सवाल किए अपने सारे जेवर गिरवी रखवा दिए थे।


दौलत के नशे ने उसे कितना अंधा कर दिया था! गिल्ट और पश्चाताप के बोझ से विशाखा का दिल फटने लगा। उसके हाथ काँपने लगे और आँखों से झर-झर आँसू बह निकले। उसने उस साड़ी को अपने चेहरे से लगा लिया। उसमें उसे बाज़ार के किसी महँगे परफ्यूम की नहीं, बल्कि अपने घर की, अपनी भाभी के आँचल की वो जानी-पहचानी खुशबू आ रही थी।


"मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई मम्मी... मैं कितनी अंधी हो गई थी!" विशाखा खुद से बुदबुदाते हुए फूट-फूट कर रोने लगी।


उसने बिना एक पल गँवाए, अपने गले से वह महँगा हीरे का हार उतारा, अपना डिज़ाइनर दुपट्टा वहीं फेंका और उसी भारी गाउन में नंगे पैर गेस्ट रूम की तरफ भागी।


उसने दरवाज़ा खोला तो देखा कि नियति अपना एक छोटा सा सूटकेस पैक कर रही थी और शशांक उदास चेहरे के साथ खिड़की के बाहर देख रहा था। नियति की आँखें सूजी हुई थीं।


विशाखा दौड़ती हुई गई और सीधे नियति के पैरों में गिर पड़ी।


"भाभी... मेरी माँ... मुझे माफ़ कर दीजिए!" विशाखा दहाड़ मार कर रोने लगी।


नियति ने अपनी ननद को इस हालत में देखा तो वह घबरा गई। उसने तुरंत नीचे झुककर विशाखा को उठाया और अपने सीने से लगा लिया। "ये क्या कर रही है पागल? उठ, किसी ने देख लिया तो क्या कहेगा?"


"भाभी, मैं दौलत के नशे में अंधी हो गई थी। मुझे माफ़ कर दीजिए। आप मेरे लिए साड़ी नहीं, अपना प्यार, अपना कलेजा निकाल कर लाई थीं और मैंने उसे ठुकरा दिया। मुझे अपनी वो पुरानी विशाखा वापस चाहिए भाभी, मुझे ये घमंड नहीं चाहिए। प्लीज़ मुझे माफ़ कर दीजिए, वरना मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगी।" विशाखा बच्चों की तरह बिलख रही थी।


नियति का दिल तो वैसे ही मोम का था। उसने अपनी ननद के आँसू पोंछे और उसके माथे को चूम लिया। "पागल लड़की, परिवार में किससे गलतियाँ नहीं होतीं? तू तो मेरी छोटी बहन जैसी है। चल, रोना बंद कर। आज तेरा खास दिन है।"


कुछ देर बाद, जब विशाखा वापस पार्टी हॉल में आई, तो सभी मेहमान हैरान रह गए। विशाखा ने अपना वह डिज़ाइनर गाउन उतार दिया था और उसकी जगह अपनी भाभी की हाथ से कढ़ाई की हुई वह गुलाबी रंग की सूती सिल्क की साड़ी पहन रखी थी। उसके चेहरे पर अब कोई नकली मेकअप या अहंकार नहीं था, बल्कि एक सच्ची और सुकून भरी मुस्कान थी।


जब उसकी एक अमीर सहेली ने आश्चर्य से पूछा, "विशाखा, तुमने अचानक कपड़े क्यों बदल लिए? और यह साड़ी कौन से डिज़ाइनर की है?"


विशाखा ने बहुत ही गर्व के साथ अपनी भाभी नियति का हाथ पकड़ते हुए कहा, "यह दुनिया के सबसे महँगे और नायाब डिज़ाइनर की साड़ी है—मेरी भाभी की। इसका ब्रांड उनका निस्वार्थ प्यार है, जिसकी कीमत इस दुनिया की कोई दौलत, कोई हीरा नहीं चुका सकता।"


उस रात विशाखा ने सिर्फ एक साड़ी नहीं पहनी थी, बल्कि उसने रिश्तों की अहमियत का वह गहना पहन लिया था, जो उसे उसकी समझदार माँ ने दिया था। दौलत से घर बनते हैं, लेकिन परिवार तो सिर्फ प्यार, सम्मान और एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करने से ही बनते हैं।


---


**क्या आपने भी कभी बाहरी दिखावे या महँगे तोहफों के चक्कर में किसी अपने के सच्चे प्यार और भावनाओं को अनदेखा किया है? क्या क्रोध और अहंकार ने कभी आपके किसी अनमोल रिश्ते में खटास पैदा की है? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ ज़रूर साझा करें।**


**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद**


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...