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एक बेजान कठपुतली

 घड़ी में सुबह के पांच बजते ही अलार्म की कर्कश आवाज ने सुरभि की नींद तोड़ी। शरीर बुरी तरह टूट रहा था। कल रात घर में मेहमान आए थे और उनके जाने, बर्तन समेटने और रसोई साफ करने में रात के दो बज गए थे। मुश्किल से तीन घंटे की नींद मिली थी। सिर में एक अजीब सा भारीपन था, जैसे कोई हथौड़े मार रहा हो।


सुरभि ने करवट बदली, तो पास सोए अपने पति, मयंक को देखा जो गहरी नींद में था। उसका मन किया कि मयंक को जगाकर कहे, "मयंक, आज मुझसे नहीं उठते बन रहा। आज नाश्ता तुम बना लो या बाहर से मंगा लो।" लेकिन यह ख्याल आते ही उसने झटक दिया। उसे अपनी सासू माँ, मनोरमा जी की वो बात याद आ गई जो उन्होंने शादी के पहले दिन कही थी—*"बेटा, हमारे घर में सुबह की चाय और नाश्ता घर की लक्ष्मी के हाथ का ही शुभ माना जाता है। और वैसे भी, हम ससुराल वाले तुमसे कोई दहेज या पैसा नहीं चाहते, बस इतना ही तो चाहते हैं कि हमारी बहू सबको खुश रखे।"*


'सबको खुश रखना'—यह तीन शब्द सुरभि के जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन गए थे।


सुरभि ने अपनी थकान को एक तरफ धकेला, चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारे और एक झूठी मुस्कान ओढ़कर रसोई में दाखिल हो गई।

मनोरमा जी पहले से ही पूजा घर में थीं।

"अरे सुरभि, आज थोड़ी देर हो गई? साढ़े छह बज रहे हैं। तुम्हारे ससुर जी की शुगर फ्री चाय अभी तक नहीं बनी? और सुनो, आज नाश्ते में पोहा मत बनाना, मयंक के मामा जी आए हुए हैं, उन्हें आलू के परांठे पसंद हैं," मनोरमा जी ने घंटी बजाते हुए बिना मुड़े निर्देश दिया।


"जी मम्मी जी," सुरभि ने हमेशा की तरह सिर झुकाकर कहा।


सुरभि एक मल्टीनेशनल कंपनी में एच.आर. (HR) थी। लेकिन शादी के बाद उसे समझा दिया गया था कि नौकरी करना उसकी 'चॉइस' है, लेकिन घर संभालना उसका 'फर्ज़'। अगर नौकरी की वजह से घर की किसी खुशी में कमी आई, तो वो नौकरी छोड़नी पड़ेगी। इसलिए सुरभि ने खुद को एक मशीन बना लिया था। 9 से 6 ऑफिस, और बाकी समय 'आदर्श बहू'।


नाश्ते की टेबल पर मयंक के मामा जी, ससुर जी और मयंक बैठे थे। सुरभि गरम-गरम परांठे परोस रही थी। पसीने से उसकी कुर्ती भीग चुकी थी।

"वाह बहू! परांठे तो अच्छे बने हैं, पर इसमें थोड़ा अनारदाना डालतीं तो और मज़ा आता," मामा जी ने स्वाद लेते हुए नुस् निकाला।


सुरभि का दिल एक पल के लिए बैठा। उसने इतनी मेहनत की, फिर भी 'खुशी' में कुछ कमी रह गई? उसने तुरंत मुस्कुराकर कहा, "माफ़ कीजिये मामा जी, अगली बार पक्का ध्यान रखूँगी।"


मनोरमा जी ने गर्व से मामा जी की ओर देखा और कहा, "भाई साहब, हमारी बहू की यही बात तो हमें पसंद है। जुबान नहीं लड़ाती। हमने तो पहले ही दिन कह दिया था, हमें मॉडर्न बहू नहीं चाहिए, हमें वो चाहिए जो परिवार को जोड़कर रखे, सबको राजी रखे।"


सुरभि किचन में वापस गई और सिंक में पड़े बर्तनों को देखकर उसकी आँखों में आंसू आ गए। 'सबको राजी रखना'—क्या इसका मतलब यह था कि उसकी अपनी इच्छाओं का, उसकी अपनी थकान का कोई मोल नहीं?


दिन बीतते गए। सुरभि की तबीयत धीरे-धीरे खराब होने लगी। उसे हल्का बुखार रहने लगा, लेकिन उसने किसी से नहीं कहा। उसे डर था कि अगर वो बीमार पड़ गई, तो घर की व्यवस्था बिगड़ जाएगी और सास का चेहरा उतर जाएगा। और सास का चेहरा उतरना मतलब—सुरभि अपने 'मिशन' में फेल हो गई।


दिवाली का त्यौहार नजदीक था। मनोरमा जी ने ऐलान कर दिया कि इस बार घर की पुताई और सफाई के लिए मजदूर नहीं लगेंगे।

"अरे, फालतू पैसा क्यों खर्चना? सुरभि है ना, शनिवार-रविवार की छुट्टी होती है इसकी। हम सब मिलकर कर लेंगे। वैसे भी बहू के हाथ की सफाई में जो बात है, वो नौकरों में कहाँ?" मनोरमा जी ने मयंक से कहा।

मयंक ने भी हामी भर दी, "हाँ माँ, सुरभि को डेकोरेशन का शौक भी है। वो कर लेगी।"


सुरभि को उस वीकेंड डॉक्टर के पास जाना था, उसे लगातार चक्कर आ रहे थे। लेकिन 'सबकी खुशी' के लिए उसने अपॉइंटमेंट कैंसिल कर दिया।

दो दिन तक सुरभि सीढ़ियों पर चढ़कर जाले साफ़ करती रही, पंखे पोंछती रही, और भारी सोफे खिसकाती रही। मयंक और ससुर जी टीवी देख रहे थे और बीच-बीच में निर्देश दे रहे थे—"सुरभि, वो कोना रह गया," "सुरभि, ज़रा चाय तो पिला दो।"


रविवार की शाम होते-होते सुरभि का शरीर जवाब दे गया। उसे 103 डिग्री बुखार चढ़ गया। वह अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर गिर पड़ी।

मयंक ने माथे पर हाथ रखा तो जल रहा था। "अरे, तुम्हें तो बहुत तेज़ बुखार है।"


तभी बाहर से मनोरमा जी की आवाज़ आई, "सुरभि! ओ सुरभि! शाम की आरती का समय हो गया है, और पड़ोस वाली गुप्ता आंटी आई हैं दिवाली की मिठाई देने। बाहर आ जाओ ज़रा।"


मयंक ने कमरे से बाहर जाकर कहा, "माँ, सुरभि को बहुत तेज़ बुखार है। वो नहीं उठ पाएगी।"

मनोरमा जी के चेहरे पर चिंता की जगह एक शिकन आ गई। "अरे, अभी तो ठीक थी। मेहमान बैठी हैं बाहर, अच्छा नहीं लगता बहू कमरे में पड़ी रहे। बस पाँच मिनट के लिए आकर नमस्ते कर ले, फिर सो जाए। आखिर गुप्ता जी के घर में भी बातें बनेंगी कि उनकी बहू कैसी है।"


मयंक वापस कमरे में आया। "सुरभि, बस 5 मिनट के लिए बाहर आ जाओ। माँ कह रही हैं अच्छा नहीं लगता।"


सुरभि ने अपनी जलती हुई आँखों से मयंक को देखा। उसे लगा कि मयंक कहेगा, "नहीं, तुम लेटी रहो, मैं माँ को समझा दूँगा।" लेकिन मयंक भी उसी 'खुशी' के जाल में फंसा था। वह भी माँ को नाराज़ नहीं करना चाहता था।


सुरभि कांपते हुए उठी। उसने ठीक से साड़ी पहनी, चेहरे पर पानी मारा और लड़खड़ाते कदमों से बाहर ड्राइंग रूम में गई।

"नमस्ते आंटी जी," उसने हाथ जोड़कर कहा। उसकी आवाज़ में कंपन था।


गुप्ता आंटी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। "अरे मनोरमा, तुम्हारी बहू तो बड़ी सुस्त लग रही है। त्यौहार सर पर है और चेहरे पर कोई रौनक नहीं? हमारी बहू को देखो, पूरा घर चमक गया पर मजाल है जो थकान दिखे।"


मनोरमा जी ने झेंपते हुए कहा, "हाँ वो... मौसम बदल रहा है ना, तो थोड़ी नरम है। वरना काम तो बहुत करती है।"


सुरभि को चक्कर आ रहा था। सबकी बातें गूंजने लगी थीं। "सुस्त लग रही है...", "रौनक नहीं...", "सबको खुश रखो..."।

अचानक सुरभि की आँखों के आगे अंधेरा छा गया और वह धड़ाम से फर्श पर गिर पड़ी।


"सुरभि!" मयंक चिल्लाया।

चाय का कप सुरभि के हाथ से छूटकर गिर गया और गर्म चाय उसके हाथ पर फैल गई। अफरातफरी मच गई।


सुरभि को अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने बताया कि उसे वायरल फीवर के साथ-साथ 'सीवियर एग्जॉशन' (अत्यधिक थकान) और तनाव है। उसका ब्लड प्रेशर बहुत कम हो गया था।

"इन्हें आराम की सख्त ज़रूरत है। ऐसा लगता है कि महीनों से इनका शरीर और दिमाग बिना रुके काम कर रहा है। अगर अब ध्यान नहीं दिया गया, तो यह डिप्रेशन में जा सकती हैं," डॉक्टर ने मयंक को फटकारते हुए कहा।


सुरभि को होश आया तो उसने खुद को अस्पताल के सफ़ेद बिस्तर पर पाया। सामने मयंक सिर झुकाए बैठा था और मनोरमा जी और ससुर जी कोने में खड़े थे।

सुरभि ने आँखें खोलीं। उसके मन में पहला ख्याल यही आया—'आज खाने का क्या होगा? मम्मी जी नाराज़ तो नहीं होंगी?'

यह ख्याल आते ही उसकी आँखों से आंसू बह निकले। वह अपनी बीमारी से नहीं, अपनी इस मानसिक गुलामी से रो रही थी।


मयंक ने सुरभि का हाथ पकड़ा। "सुरभि, तुम ठीक हो?"


तभी मनोरमा जी आगे आईं। उनके चेहरे पर चिंता थी, लेकिन साथ ही एक शिकायत भी। "बेटा, डॉक्टर कह रहा है तुम्हें आराम चाहिए। पर देखो, अपनी सेहत का ध्यान रखना भी तो तुम्हारी ही ज़िम्मेदारी है। अब तुम ऐसे बीमार पड़ गयी, तो घर कैसे चलेगा? दिवाली सर पर है।"


सुरभि, जो अब तक चुप थी, जिसे 'जुबान न लड़ाने वाली बहू' कहा जाता था, आज टूट गई। वह इंजेक्शन की नली लगे हाथ के सहारे उठी और बैठ गई।

"मम्मी जी," सुरभि की आवाज़ कमजोर थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी धार थी।


सब चौंक गए।


"आप कहती थीं ना, कि ससुराल वाले बस इतना चाहते हैं कि बहू सबको खुश रखे? मैंने पूरी कोशिश की मम्मी जी। मैंने अपनी नींद छोड़ी ताकि आपकी चाय समय पर मिले। मैंने अपनी पसंद छोड़ी ताकि मामा जी को अनारदाने वाले परांठे मिलें। मैंने अपना आराम छोड़ा ताकि घर साफ़ रहे और आप पड़ोसियों में गर्व कर सकें। मैंने अपनी बीमारी छुपाई ताकि आपके चेहरे की मुस्कान न जाए।"


मनोरमा जी हक्की-बक्की रह गईं।


"लेकिन मम्मी जी," सुरभि की आँखों से आंसू बह रहे थे, "इस 'सबको' की गिनती में 'मैं' कहाँ थी? क्या मैं इस घर का हिस्सा नहीं थी? या मैं सिर्फ़ एक ज़रिया थी आप सबको खुश रखने का? एक मशीन, जिसमें पेट्रोल की जगह बस 'उम्मीदें' भरी जाती हैं?"


मयंक ने रोकने की कोशिश की, "सुरभि, तुम अभी बीमार हो..."


"नहीं मयंक!" सुरभि ने हाथ दिखाया। "आज मुझे बोलने दो। आज मैं बीमार हूँ, अस्पताल में पड़ी हूँ, तब भी मम्मी जी को मेरी जान की नहीं, 'दिवाली' की चिंता है। उन्हें चिंता है कि 'घर कैसे चलेगा'। क्यों? क्या आप सबके हाथ नहीं हैं? क्या मैं मर गई तो यह घर बंद हो जाएगा?"


कमरे में सन्नाटा छा गया।


"खुशी मांगकर नहीं ली जाती, और न ही किसी को निचोड़कर हासिल की जाती है। आप लोग चाहते थे कि मैं सबको खुश रखूँ, पर आप भूल गए कि एक खाली बर्तन से किसी की प्यास नहीं बुझाई जा सकती। मैं अंदर से खाली हो चुकी हूँ मम्मी जी। मेरी अपनी खुशी मर चुकी है। और जो इंसान खुद खुश नहीं है, वो दूसरों को सिर्फ 'खुशी का नाटक' दे सकता है, असली खुशी नहीं। और पिछले एक साल से मैं वही नाटक कर रही थी।"


सुरभि ने एक गहरी सांस ली। "अब और नहीं। मुझे माफ़ कीजियेगा, पर अब मैं 'सबको' खुश नहीं रख सकती। अब मैं पहले खुद को खुश रखूँगी, खुद को स्वस्थ रखूँगी। अगर उससे आप लोग खुश होते हैं तो ठीक, और अगर नाराज़ होते हैं... तो वो आपकी समस्या है, मेरी नहीं।"


सुरभि फिर से बिस्तर पर लेट गई और आँखें मूंद लीं। उसे एक अजीब सा सुकून महसूस हुआ। जैसे छाती पर रखा हुआ कोई भारी पत्थर हट गया हो।


मनोरमा जी अवाक खड़ी थीं। उनके पास कोई जवाब नहीं था। उनकी 'संस्कारी' बहू ने आज उन्हें आईना दिखा दिया था। मयंक को भी अपनी गलती का अहसास हो रहा था। वह समझ गया था कि 'शांति' बनाए रखने के चक्कर में उसने अपनी पत्नी को अकेला छोड़ दिया था।


तीन दिन बाद सुरभि घर लौटी।

लेकिन इस बार वह वो पुरानी सुरभि नहीं थी।

अगली सुबह, 6 बजे अलार्म बजा। सुरभि उठी, लेकिन रसोई में नहीं गई। उसने मयंक को जगाया।

"मयंक, उठो। मुझे आज योगा क्लास जाना है। तुम चाय बना लेना और मम्मी जी को भी दे देना। और हाँ, नाश्ते में ओट्स बनेंगे, वो सबके लिए हेल्दी हैं।"


मयंक हड़बड़ा कर उठा। "क्या? माँ क्या कहेंगी?"

"माँ को समझाना तुम्हारा काम है। मैं अपनी सेहत से अब समझौता नहीं करूँगी," सुरभि ने मुस्कुराते हुए कहा और अपने योगा मैट के साथ कमरे से बाहर निकल गई।


मनोरमा जी रसोई में इंतज़ार कर रही थीं। सुरभि को तैयार होकर बाहर जाते देख वे चिल्लाईं, "बहू, चाय?"

"मयंक बना रहे हैं मम्मी जी। मैं एक घंटे में आऊंगी," सुरभि ने बिना रुके जवाब दिया और दरवाज़ा खोलकर बाहर की ताज़ी हवा में सांस ली।


शुरुआत में घर में तनाव रहा। मनोरमा जी ने मुंह फुलाया, ताने मारे। "बहू हाथ से निकल गई," "मॉडर्न हो गई"। लेकिन सुरभि ने उन बातों को दिल पर लेना छोड़ दिया। उसने ऑफिस में भी काम का बोझ कम किया और अपनी हॉबीज़ को समय देना शुरू किया।


धीरे-धीरे मयंक ने भी जिम्मेदारी संभालनी शुरू की। जब उसने खुद चाय बनाई, तो उसे पता चला कि सुबह उठकर खटना कितना मुश्किल होता है। ससुर जी को भी समझ आया कि पानी का गिलास खुद लेने में कोई बुराई नहीं है।


एक महीने बाद, दिवाली आई।

इस बार सुरभि ने अकेले काम नहीं किया। उसने साफ़ कह दिया, "मम्मी जी, पुताई वाले को बुला लेते हैं। मुझसे नहीं होगा।" मनोरमा जी को मानना पड़ा।

शाम को जब पूजा हुई, तो सुरभि के चेहरे पर थकान नहीं, एक असली चमक थी। उसने मयंक का हाथ पकड़कर आरती की।


उस रात, मनोरमा जी सुरभि के पास आईं। उनके हाथ में एक डिब्बा था।

"यह क्या है मम्मी जी?" सुरभि ने पूछा।

"मिठाई है," मनोरमा जी ने रूखे स्वर में कहा, फिर थोड़ा रुकीं। "बहू, तू बदल गई है।"

"हाँ मम्मी जी," सुरभि ने स्वीकार किया।

"शायद... शायद ठीक ही हुआ," मनोरमा जी ने धीरे से कहा। "जब तू पहले मुस्कुराती थी, तो वो मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँचती थी। आज आरती के वक्त तेरी आँखों में चमक देखी। मुझे लगा था कि बहू का काम सबको खुश रखना है, पर यह भूल गई थी कि बहू भी 'सब' में ही आती है। अगर तू खुश नहीं रहेगी, तो घर में लक्ष्मी कैसे वास करेगी?"


सुरभि की आँखों में आंसू आ गए। उसने सास के पैर छुए। मनोरमा जी ने उसे गले लगा लिया।

"कल सुबह चाय मैं बनाऊँगी, तू आराम से उठना," मनोरमा जी ने कहा और कमरे से चली गईं।


सुरभि खिड़की के पास खड़ी होकर जलते हुए दीयों को देखने लगी। उसने सीख लिया था कि **दूसरों के लिए मोमबत्ती बनकर पिघलने से बेहतर है, दीया बनकर जलना—जो खुद भी रोशन रहता है और दूसरों को भी रौशनी देता है।**


उस घर की परिभाषा अब बदल चुकी थी। अब वहां सिर्फ़ 'बहू का फ़र्ज़' नहीं, बल्कि 'सबकी साझेदारी' थी। और सबसे ज़रूरी बात—अब वहां 'सबको खुश रखने' की होड़ नहीं, बल्कि 'साथ में खुश रहने' का प्रयास था।


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**कहानी का सार:**

यह कहानी उन सभी बहुओं के लिए है जो 'अच्छी बहू' का तमगा पाने की दौड़ में खुद को खो देती हैं। ससुराल वालों की अपेक्षाएं कभी खत्म नहीं होंगी, लेकिन आपको अपनी सीमा रेखा (boundary) खुद खींचनी होगी। याद रखिये, आपका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य आपकी सबसे बड़ी पूंजी है। खुशियां बलिदान से नहीं, संतुलन से आती हैं।


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**लेखक का नोट:**

अक्सर हम रिश्तों को बचाने के लिए खुद को मिटा देते हैं, लेकिन जो रिश्ता आपको मिटा दे, वो रिश्ता नहीं, एक सौदा है। सुरभि ने बगावत नहीं की, उसने बस अपने वजूद को बचाया। और जब आप अपनी कद्र करते हैं, तभी दुनिया आपकी कद्र करती है।


**क्या इस कहानी ने आपके दिल को छुआ?**

क्या आप भी सुरभि की तरह 'सबको खुश रखने' के बोझ तले दबे हैं? या आपने अपनी राह खुद चुनी है? अपने अनुभव कमेंट में जरूर लिखें।


**“अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया और आपको सोचने पर मजबूर किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। यह कहानी हर उस महिला तक पहुँचनी चाहिए जो अपनी मुस्कान खो चुकी है। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसी ही दिल को छू लेने वाली मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**


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