शहर के सबसे पॉश इलाके में स्थित 'सूर्या विला' की चमक दूर से ही लोगों की आंखें चौंधिया देती थी। यह शानदार बंगला शहर के सबसे बड़े बिल्डर, सूर्यकांत शर्मा का था। घर के बाहर महंगी गाड़ियों की कतार लगी रहती थी और नौकर-चाकर हर वक्त हाथ बांधे खड़े रहते थे। सूर्यकांत की गिनती शहर के सबसे कामयाब और रसूखदार लोगों में होती थी। उनके पास वो सब कुछ था जिसे दुनिया 'सफलता' मानती है—करोड़ों का बैंक बैलेंस, बड़ा व्यापार, और समाज में रुतबा। लेकिन, अगर इस आलीशान बंगले की दीवारों के भीतर झांककर देखा जाता, तो एक अजीब सा खोखलापन और सन्नाटा महसूस होता।
सूर्यकांत की पत्नी, नीता, अक्सर अपने विशाल और सजे-धजे बेडरूम में अकेली बैठी टीवी के चैनल बदलती रहती थी। सूर्यकांत सुबह जल्दी घर से निकल जाते और रात को बहुत देर से लौटते। जब भी वो घर में होते, उनका फोन लगातार बजता रहता। उनके माथे पर हमेशा एक गहरी शिकन और आंखों में एक अनजानी सी थकान रहती थी। करोड़ों की डील क्रैक करने के बाद भी सूर्यकांत के चेहरे पर वो इत्मीनान नहीं दिखता था, जो एक साधारण इंसान को अपनी छोटी सी उपलब्धि पर होता है। उनका एक ही लक्ष्य था—और पैसा, और बड़ा प्रोजेक्ट, और ज्यादा रुतबा। इस अंधी दौड़ में वो यह भूल गए थे कि उन्होंने आखिरी बार अपनी पत्नी के साथ बैठकर सुकून से एक कप चाय कब पी थी या खुलकर कब हंसे थे।
दूसरी तरफ, शहर के एक पुराने, लेकिन बेहद साफ-सुथरे मोहल्ले में सूर्यकांत के छोटे भाई, रमाकांत का एक छोटा सा घर था। रमाकांत एक साधारण से सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। उनकी आमदनी सूर्यकांत की एक दिन की कमाई के बराबर भी नहीं थी, लेकिन उनके छोटे से घर के आंगन से हमेशा हंसी और ठहाकों की आवाजें आती रहती थीं। रमाकांत शाम को ठीक पांच बजे घर लौट आते। उनकी पत्नी, सुमेधा, उनके लिए अदरक वाली चाय बनाती और दोनों बैठकर दिन भर की बातें साझा करते। उनके दो बच्चे थे, जो अक्सर अपने पिता के साथ आंगन में क्रिकेट खेलते या किताबें पढ़ते नजर आते।
रमाकांत के पास कार नहीं थी, वो अपनी पुरानी स्कूटर पर ही खुश थे। उनके घर में इटालियन मार्बल नहीं था, लेकिन फर्श पर इतनी चमक थी कि कोई भी सुकून से बैठ जाए। वो जो कुछ भी कमाते, उसमें बेहद संतुष्ट थे। कभी किसी महंगी चीज की लालसा ने उनकी रातों की नींद नहीं उड़ाई।
सूर्यकांत और रमाकांत की मां, शांति देवी, बारी-बारी से दोनों बेटों के पास रहती थीं। शांति देवी एक बहुत ही सुलझी हुई और अनुभवी महिला थीं। वो दोनों बेटों की जिंदगी को बहुत करीब से देखती थीं। जब वो सूर्यकांत के घर होतीं, तो उन्हें रेशमी गद्दों पर नींद नहीं आती थी क्योंकि घर का तनाव और सूर्यकांत की बेचैनी उन्हें भी महसूस होती थी। लेकिन जब वो रमाकांत के छोटे से घर में होतीं, तो दाल-चावल खाकर भी उन्हें ऐसा सुकून मिलता था जो किसी शाही पकवान में नहीं था।
एक दिन की बात है, सूर्यकांत के जीवन में एक ऐसा भूचाल आया जिसने उनकी सारी 'कामयाबी' की इमारत को हिला कर रख दिया। उन्होंने एक बहुत बड़े कमर्शियल प्रोजेक्ट में अपना सारा पैसा और रसूख दांव पर लगा दिया था। लेकिन जमीन को लेकर कोई बहुत बड़ा कानूनी पचड़ा सामने आ गया। कोर्ट ने प्रोजेक्ट पर स्टे लगा दिया। सूर्यकांत की करोड़ों की रकम फंस गई। जिन निवेशकों ने पैसा लगाया था, वो रोज़ उनके ऑफिस और घर के चक्कर काटने लगे। सूर्यकांत की रातों की नींद उड़ गई। उनका ब्लड प्रेशर इतना बढ़ गया कि उन्हें एक रात सीने में तेज दर्द के साथ अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
अस्पताल के उस वीआईपी कमरे में सूर्यकांत बिस्तर पर लेटे हुए थे। उनके चेहरे का रंग उड़ चुका था। जिस पैसे और रुतबे के लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी थी, वो आज उन्हें इस बिस्तर से उठा नहीं पा रहा था। उनके तथाकथित 'बड़े' दोस्त और बिजनेस पार्टनर कोई भी उनसे मिलने नहीं आया था, सब अपना पैसा डूबने के डर से उनसे किनारा कर चुके थे। कमरे में सिर्फ उनकी पत्नी नीता रो रही थी, और पास ही शांति देवी और रमाकांत खड़े थे।
रमाकांत ने अपने बड़े भाई का हाथ पकड़ रखा था। "भैया, आप हिम्मत मत हारिए। पैसा ही तो है, आनी-जानी चीज है। हम सब आपके साथ हैं। अगर जरूरत पड़ी तो मैं अपना छोटा सा घर बेच दूंगा, लेकिन आपको कुछ नहीं होने दूंगा," रमाकांत की आंखों में आंसू थे और आवाज में एक सच्ची तड़प थी।
सूर्यकांत ने अपने छोटे भाई की तरफ देखा। वो भाई जिसे वो हमेशा 'बेवकूफ' और 'नाकामयाब' समझते थे क्योंकि उसने कभी पैसे के पीछे भागने की कोशिश नहीं की। आज उसी भाई के चेहरे पर सूर्यकांत को वो सुकून और मजबूती नजर आ रही थी, जो उनके अपने अरबपति दोस्तों में कभी नहीं थी।
शांति देवी धीरे से सूर्यकांत के सिरहाने आकर बैठीं। उन्होंने अपने कांपते हुए हाथों से बेटे के सिर को सहलाया। सूर्यकांत रो पड़े, "मां, मेरा सब कुछ खत्म हो गया। मैंने इतनी मेहनत की, इतना नाम कमाया, सब मिट्टी में मिल गया। मैं बर्बाद हो गया मां। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं अब क्या करूंगा। मेरा वक्त बहुत खराब चल रहा है।"
शांति देवी ने एक बहुत ही शांत और गहरी मुस्कान के साथ कहा, "बेटा, वक्त की एक आदत बहुत अच्छी है... जैसा भी हो, गुजर जाता है। अच्छा वक्त भी नहीं रुकता और बुरा वक्त भी नहीं ठहरता। तू किस बात का रोना रो रहा है? उस पैसे का जो तूने कभी सुकून से बैठकर अपने परिवार के साथ खर्च ही नहीं किया? या उस रुतबे का जिसके पीछे भागते-भागते तूने अपनी सेहत और अपनी हंसी खो दी?"
सूर्यकांत चुपचाप अपनी मां को सुन रहे थे।
शांति देवी ने आगे कहा, "बेटा, कामयाब इंसान खुश रहे न रहे, लेकिन खुश और संतुष्ट रहने वाला इंसान कामयाब जरूर हो जाता है। तूने हमेशा कामयाबी को बैंक बैलेंस से नापा। तूने सोचा कि जितना ज्यादा पैसा होगा, उतनी बड़ी कामयाबी होगी। लेकिन देख, आज तेरी ये दौलत तुझे एक रात की चैन की नींद नहीं दे पा रही है। वहीं तेरे छोटे भाई रमाकांत को देख। इसके पास करोड़ों नहीं हैं, लेकिन इसके पास वो 'संतुष्टि' है जिसने इसे असल जिंदगी में कामयाब बना दिया है। ये रात को चैन से सोता है, इसके बच्चे इसे प्यार करते हैं, और इसकी पत्नी इसके साथ खुलकर हंसती है। यही तो असली दौलत है मेरे लाल।"
सूर्यकांत के दिल पर मां की ये बातें बहुत गहराई तक असर कर रही थीं। उन्हें अपने पिछले दस सालों की जिंदगी किसी फिल्मी रील की तरह याद आ रही थी। वो कब अपनी पत्नी नीता के साथ सुकून से बैठे थे, उन्हें याद नहीं। वो आखिरी बार किसी बात पर ठहाका मारकर कब हंसे थे, उन्हें याद नहीं। उन्होंने जो कुछ भी कमाया था, वो सिर्फ एक 'आंकड़ा' था, जिंदगी नहीं।
"मां, मैं बहुत गलत था," सूर्यकांत ने सिसकते हुए कहा। "मैंने सफलता को गलत चश्मे से देखा। मैं एक मशीन बन गया था जिसे बस नोट छापना आता था। आज मुझे अहसास हो रहा है कि रमाकांत मुझसे कहीं ज्यादा बड़ा और अमीर इंसान है।"
रमाकांत ने अपने भाई को गले लगा लिया। "ऐसा मत कहिए भैया। आप हमारे घर के बड़े हैं। ये बुरा वक्त है, हम मिलकर इससे बाहर आ जाएंगे।"
कुछ महीनों बाद, कानूनी उलझनें धीरे-धीरे सुलझने लगीं, लेकिन सूर्यकांत ने अपना बहुत कुछ खो दिया था। उन्हें अपना बड़ा बंगला बेचना पड़ा और वो एक साधारण से घर में शिफ्ट हो गए। उनका व्यापार अब पहले जितना बड़ा नहीं था। लेकिन एक चीज जो पूरी तरह बदल गई थी, वो था सूर्यकांत का नजरिया।
अब वो शाम को सात बजे तक घर लौट आते थे। अब उनका फोन डाइनिंग टेबल पर नहीं रहता था। अब नीता के चेहरे पर वो पुराना सूनापन नहीं था, बल्कि एक ताज़ा मुस्कान रहती थी। सूर्यकांत अब वीकेंड्स पर रमाकांत के परिवार के साथ मिलकर पिकनिक पर जाते थे। उन्होंने जान लिया था कि जिस सुकून की तलाश में वो दर-दर भटक रहे थे, वो उनके अपने घर के भीतर, उनके अपनों के बीच ही था।
आज सूर्यकांत आर्थिक रूप से शायद पहले जितने 'कामयाब' नहीं थे, लेकिन वो आज बहुत खुश और संतुष्ट थे। और जैसा कि उनकी मां ने कहा था—खुश और संतुष्ट रहने वाला इंसान कामयाब जरूर हो जाता है। उन्होंने जिंदगी की सबसे बड़ी बाजी जीत ली थी। उन्होंने 'जीना' सीख लिया था।
क्या आपके आस-पास भी कोई ऐसा इंसान है जो सब कुछ पाकर भी परेशान है? आपकी नजर में असली कामयाबी क्या है? अपने विचार जरूर लिखें।
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