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**सांसों की डोर और बेबस प्रेम**

 बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। टिन की जर्जर छत पर गिरती बारिश की बूंदें ऐसा शोर मचा रही थीं, मानो आसमान से पानी नहीं, पत्थर बरस रहे हों। शहर के उस किनारे बसी इस छोटी सी बस्ती में आज रात जैसे कोई खौफनाक साया मंडरा रहा था। शंभू अपनी खोली के छोटे से दरवाजे के पास खड़ा बाहर के घुप अंधेरे को घूर रहा था। उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था, बल्कि एक ऐसी खौफनाक बेबसी तैर रही थी जो किसी भी इंसान को अंदर से तोड़कर रख दे।


पीछे, सीलन भरे कमरे के एक कोने में बिछी पुरानी खटिया से लगातार खांसने और कराहने की आवाजें आ रही थीं। यह शंभू की पत्नी, सुभागी थी। सुभागी को पिछले कई महीनों से सीने में दर्द और सांस उखड़ने की बीमारी थी। शंभू दिन भर ठेला चलाकर जो कुछ कमाता, वह सुभागी की सस्ती और बेअसर दवाइयों में उड़ जाता। सरकारी अस्पताल की लंबी कतारों में वह कई बार खड़ा हुआ, लेकिन हर बार कोई न कोई पर्ची थमा दी जाती जो उसे शहर के बड़े और महंगे अस्पतालों का रास्ता दिखाती थी। आज सुभागी की हालत अचानक बहुत बिगड़ गई थी। उसकी सांसें किसी टूटे हुए वाद्ययंत्र की तरह बज रही थीं, और हर सांस के साथ उसका पूरा शरीर कांप उठता था।


शंभू का दिल खौलते हुए सीसे की तरह धधक रहा था। उसने आज सुबह ही बस्ती के लाला से कुछ पैसे उधार मांगने की सोची थी, लेकिन लाला ने उसे दुत्कार कर भगा दिया था। शंभू को लगा था कि आज ठेला चलाकर जो दिहाड़ी मिलेगी, उसी से रात को डॉक्टर को बुला लाएगा। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। आज ठेकेदार ने काम तो पूरा लिया, लेकिन पैसे कल देने की बात कहकर टाल दिया। शंभू खाली हाथ, भारी कदमों से घर लौटा था। और अब यह बारिश... इस बारिश ने जैसे शंभू के लिए सारे रास्ते बंद कर दिए थे। वह चाहकर भी किसी के पास मदद के लिए नहीं जा सकता था। 


कमरे में टिमटिमाती हुई लालटेन की पीली रोशनी सुभागी के पीले और निस्तेज चेहरे पर पड़ रही थी। शंभू दौड़कर खटिया के पास गया और अपने खुरदरे हाथों से सुभागी के माथे का पसीना पोंछने लगा। सुभागी का शरीर आग की तरह तप रहा था। "बस थोड़ी देर और हिम्मत रख ले सुभागी... सुबह होते ही मैं तुझे अपनी पीठ पर लादकर बड़े अस्पताल ले जाऊंगा। बस यह रात किसी तरह कट जाए," शंभू की आवाज़ में एक अजीब सी दरार थी, जैसे वह सुभागी को नहीं, खुद को दिलासा दे रहा हो।


वक्त जैसे किसी अजगर की तरह कुंडली मारकर बैठ गया था। रात का हर एक पल शंभू की छाती पर भारी पत्थर सा लग रहा था। वह कभी लालटेन की लौ तेज करता, कभी बाहर जाकर आसमान की तरफ देखता कि शायद बारिश रुक जाए। लेकिन बारिश थी कि थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। शंभू के जेहन में अतीत के पन्ने पलटने लगे। वह दिन याद आ गया जब सुभागी इस टूटे-फूटे घर में ब्याह कर आई थी। उसके पास देने के लिए कोई सुख-सुविधा नहीं थी, लेकिन सुभागी ने कभी उफ्फ तक नहीं की। जब शंभू के पास खाने को नहीं होता था, तो वह झूठ बोल देती थी कि उसका पेट भरा है, ताकि शंभू चैन से दो निवाले खा सके। एक बार मेले में शंभू ने उसे बीस रुपये की कांच की चूड़ियाँ दिलाई थीं, तो उसने उसे ऐसे सहेज कर रखा था जैसे वह सोने के कंगन हों। आज वही सुभागी जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी, और शंभू अपनी खाली जेबों को कोसने के सिवा कुछ नहीं कर पा रहा था।


रात के करीब तीन बज चुके थे। बारिश का शोर अब भी वैसा ही था, लेकिन सुभागी की खांसी की आवाज अब धीमी पड़ने लगी थी। शंभू को लगा कि शायद उसे आराम मिल रहा है, लेकिन जब उसने सुभागी के चेहरे को गौर से देखा, तो उसकी रूह कांप गई। सुभागी की सांसें बहुत उथली हो गई थीं। उसकी आँखें आधी खुली थीं और पुतलियाँ स्थिर होने लगी थीं। शंभू तुरंत घुटनों के बल खटिया के पास बैठ गया। उसने सुभागी का ठंडा पड़ता हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया और फूट-फूट कर रोने लगा। एक मर्द, जो दिन भर भारी-भरकम बोझ उठाता था, आज अपनी पत्नी के सामने एक बच्चे की तरह सिसक रहा था। 


सुभागी ने बहुत मुश्किल से अपनी आँखें पूरी खोलीं। उसने अपने कांपते हुए हाथ की उंगलियों से शंभू के गालों से बहते आंसुओं को छूने की कोशिश की। उसकी आवाज़ अब सिर्फ एक फुसफुसाहट बनकर रह गई थी, जो लालटेन की फड़फड़ाती लौ की तरह बुझने को बेताब थी। 


"रो मत शंभू... तूने मुझे बहुत सुख दिया है," सुभागी ने रुक-रुक कर कहा।


"कैसा सुख सुभागी? मैं तो तुझे एक वक्त की अच्छी दवा भी नहीं ला कर दे सका। मैं बहुत अभागा हूँ सुभागी, मुझे माफ कर दे। बस सुबह तक रुक जा, मैं कुछ भी करके तुझे बचा लूंगा," शंभू अपना सिर उसकी छाती पर रखकर बिलखने लगा।


सुभागी के होठों पर एक दर्द भरी लेकिन बेहद सुकून वाली मुस्कान तैर गई। "अस्पताल जाकर क्या होगा शंभू? मेरी तो सबसे बड़ी तीर्थ... मेरा तो सारा सुख तेरी इसी खोली में है। तूने पैसों से मुझे भले ही कुछ ना दिया हो... लेकिन जो प्यार तूने मुझे दिया है, वो तो बड़े-बड़े महल वालों को भी नसीब नहीं होता। मुझे कोई गिला नहीं है।"


शंभू की धड़कनें बेतहाशा तेज हो गई थीं। "ऐसा मत बोल सुभागी, तू चली गई तो मेरा क्या होगा? मैं किसके लिए कमाऊंगा, किसके लिए जिऊंगा?"


सुभागी की सांसें अब टूटने लगी थीं। उसने अपनी पूरी बची हुई ताकत लगाकर शंभू का हाथ कसकर पकड़ लिया। "तू... तू मेरा राजा था शंभू। अगले जनम में भी... मुझे बस तेरी ही... तेरी ही चौखट चाहिए। मेरी परछाईं हमेशा तेरे साथ..."


सुभागी के शब्द पूरे नहीं हो पाए। उसकी आँखें एकटक शंभू के चेहरे पर टिक गईं। हाथ की पकड़ अचानक ढीली पड़ गई और सीने का वह दर्द भरा उतार-चढ़ाव हमेशा के लिए शांत हो गया। बाहर बारिश की बूंदें अभी भी छत पर गिर रही थीं, लेकिन अंदर जैसे एक भयानक तूफान आकर सब कुछ तबाह कर गया था। शंभू की चीख गले में ही घुट कर रह गई। उसकी दुनिया लुट चुकी थी। गरीबी ने उसके जीवन की इकलौती दौलत छीन ली थी।


शंभू सुभागी के बेजान शरीर के पास वैसे ही बैठा रहा। उसने सुभागी का सिर अपनी गोद में रख लिया और उसकी खुली आँखों को अपने कांपते हाथों से बंद कर दिया। उसके अंदर से रोने की आवाज भी आनी बंद हो गई थी। वह बिल्कुल सुन्न पड़ गया था। उसका दिमाग काम करना बंद कर चुका था। बस, वह एकटक सुभागी के शांत चेहरे को निहार रहा था। रात ढलती गई। धीरे-धीरे बारिश थमी और सुबह की पहली किरण उस टूटी हुई खोली की खिड़की से अंदर आई। 


सुबह जब पड़ोसियों ने दरवाजा नहीं खुलने पर उसे धक्का देकर खोला, तो अंदर का दृश्य देखकर सबकी आँखें नम हो गईं। खटिया पर सुभागी की निर्जीव देह पड़ी थी, और उसे अपनी बाहों में जकड़े शंभू का सिर सुभागी के सीने पर लुढ़का हुआ था। शंभू की सांसें भी सुभागी के साथ ही इस दुनिया से विदा ले चुकी थीं। उन दोनों ने शायद एक-दूसरे के बिना जीना सीखा ही नहीं था। गरीबी उनके शरीर को तो लील गई, लेकिन उस सीलन भरे कमरे में उनके निस्वार्थ और अमर प्रेम की महक हमेशा के लिए रच-बस गई थी।


क्या आपको भी लगता है कि आज के भौतिकवादी दौर में ऐसा निस्वार्थ प्रेम पाना किसी चमत्कार से कम नहीं? अपनी राय जरूर साझा करें।


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