रात के आठ बज रहे थे। डाइनिंग टेबल पर आज मालपुए, पनीर की सब्ज़ी और पुलाव सजे थे। सुरभि ने आज सुबह ही अपने फ्रीलांस कंटेंट राइटिंग के पहले प्रोजेक्ट का चेक हासिल किया था। रकम बहुत बड़ी नहीं थी, सिर्फ पंद्रह हज़ार रुपये। लेकिन शादी के पाँच साल बाद, घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर अपनी मेहनत से कमाया गया यह उसका पहला पैसा था। सुरभि के चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो पिछले कई सालों से कहीं खो गई थी। उसने सोचा था कि आज उसका पति, विहान, उसकी इस छोटी सी कामयाबी पर खुश होगा, उसे गले लगाएगा और कहेगा कि उसे अपनी पत्नी पर गर्व है।
तभी विहान अपने कमरे से बाहर आया। उसने टेबल पर सजे खाने को देखा और कुर्सी खींचते हुए बैठ गया। सुरभि ने चहकते हुए उसे खाना परोसा और अपना लिफाफा उसके सामने रख दिया। "विहान, आज मेरा पहला चेक आया है। पंद्रह हज़ार का! मैंने सोचा आज हम सेलिब्रेट करेंगे।"
विहान ने लिफाफे को एक सरसरी निगाह से देखा, एक हल्का सा व्यंग्यात्मक ठहाका लगाया और लिफाफे को वापस खिसका दिया। "बस पंद्रह हज़ार? सुरभि, इतने में तो मेरी गाड़ी का एक महीने का पेट्रोल आता है। और ये जो तुमने इसके लिए दिन-रात लैपटॉप पर अपनी आँखें फोड़ी हैं, उससे घर का कितना नुकसान हुआ है, ये सोचा है? माँ को कल शाम की चाय दस मिनट लेट मिली थी। बाहर की दुनिया में दस-पंद्रह हज़ार कमाना कोई बड़ी बात नहीं है, इसे अपने सिर पर मत चढ़ने दो। असली काम तो घर संभालना है, जो तुमसे ठीक से होता नहीं।"
विहान के ये शब्द किसी धारदार चाकू की तरह सुरभि के सीने में उतर गए। उसके चेहरे की मुस्कान पल भर में गायब हो गई। पास ही बैठी उसकी सास, कांता जी ने भी विहान की बात में सुर मिलाते हुए कहा, "सही तो कह रहा है विहान। औरतों को ये दो-चार पैसों का घमंड बहुत जल्दी आ जाता है। तुम कौन सा लाखों कमा कर ला रही हो जो इतना इतरा रही हो।"
सुरभि ने चुपचाप अपनी प्लेट में खाना परोस लिया, लेकिन अब वह निवाला उसके गले से नीचे नहीं उतर रहा था। यह कोई पहला मौका नहीं था जब विहान ने सुरभि को नीचा दिखाया हो। यह तो पिछले पाँच सालों की दिनचर्या बन चुकी थी।
सुरभि एक समय में अपने कॉलेज की सबसे होनहार और आत्मविश्वासी लड़की हुआ करती थी। उसकी हंसी पूरे मोहल्ले में गूंजती थी। लेकिन शादी के बाद, विहान की 'परफेक्शन' की सनक और उसके ताने मारने की आदत ने सुरभि को अंदर से खोखला कर दिया था। विहान कभी उस पर हाथ नहीं उठाता था, लेकिन उसके शब्द किसी भी शारीरिक चोट से ज्यादा गहरे घाव देते थे।
अगर सुरभि कोई नई साड़ी पहनती, तो विहान सबके सामने कह देता, "तुम पर ये रंग बिल्कुल नहीं जंचता, तुम डल (dull) लग रही हो।" अगर सुरभि किसी बहस में अपना नजरिया रखती, तो विहान उसे बीच में ही टोक देता, "तुम्हें दुनियादारी की समझ नहीं है, तुम चुप ही रहा करो।" धीरे-धीरे सुरभि ने खुद को समेटना शुरू कर दिया। उसने चटक रंग पहनना छोड़ दिया, अपनी राय रखना छोड़ दिया, और यहाँ तक कि अपनी सहेलियों से मिलना भी कम कर दिया क्योंकि विहान को लगता था कि उसकी सहेलियां 'लो-क्लास' हैं। सुरभि खुद को विहान के अहंकार के सांचे में ढालने के लिए रोज थोड़ा-थोड़ा कटती रही, छोटी होती रही।
उस रात सुरभि अपने कमरे के शीशे के सामने खड़ी थी। उसने अपनी आँखों में झांका। आँखों के नीचे काले घेरे थे, और चेहरे पर एक अजीब सा डर। उसे अचानक महसूस हुआ कि वह इस घर में एक इंसान नहीं, बल्कि एक ऐसा पायदान बन गई है जिस पर पैर रखकर विहान अपने अहंकार का कद ऊंचा करता है।
तभी सुरभि की नज़र अपनी पुरानी डायरी पर पड़ी, जो वह मायके से अपने साथ लाई थी। उसने डायरी के पन्ने पलटे। पहले पन्ने पर उसके पिता की लिखाई थी। उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं थे, लेकिन उनके शब्द आज भी ज़िंदा थे। उन्होंने लिखा था— "मेरी प्यारी बच्ची, जिंदगी में समझौता करना बुरी बात नहीं है, लेकिन कभी उस इंसान के साथ समझौता मत करना जो तुम्हारे वजूद को दीमक की तरह खा रहा हो। जो तुम्हें बार-बार छोटा करे, तुम्हारे आत्मविश्वास को तोड़े, उससे दूर रहना सीखो। तुम्हारी आत्मा सिर्फ तुम्हारी है, उसे किसी के अहंकार की वेदी पर मत चढ़ाना।"
सुरभि के आंसुओं ने डायरी के उस पन्ने को भिगो दिया। उसे लगा जैसे उसके पिता आज भी उसका हाथ थामे खड़े हैं और उसे उस घुटन भरे पिंजरे से बाहर निकलने का रास्ता दिखा रहे हैं। उसने खुद से सवाल किया— "क्या मैं अपना पूरा जीवन उस इंसान के साथ गुजार सकती हूँ जिसके लिए मेरी कोई अहमियत ही नहीं? क्या एक छत और दो वक्त की रोटी के लिए मैं अपनी आत्मा का सौदा कर सकती हूँ?"
अगली सुबह घर का माहौल हमेशा की तरह सामान्य था। विहान ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था।
"सुरभि! मेरी नीली शर्ट प्रेस नहीं की तुमने? तुम एक काम भी ढंग से नहीं कर सकती। पता नहीं सारा दिन घर में करती क्या हो!" विहान ने कमरे से चिल्लाते हुए कहा।
सुरभि आज हड़बड़ाते हुए कमरे में नहीं गई। वह बहुत ही शांत कदमों से चलकर कमरे में दाखिल हुई। उसके चेहरे पर आज कोई डर या अपराधबोध नहीं था। उसने नीली शर्ट उठाई और विहान के सामने रख दी।
"विहान, मैं आज ये घर छोड़कर जा रही हूँ।" सुरभि की आवाज़ इतनी शांत और स्पष्ट थी कि विहान एक पल के लिए अपनी टाई बांधना भूल गया।
"क्या बकवास कर रही हो? सुबह-सुबह ड्रामा शुरू करने की आदत हो गई है तुम्हारी," विहान ने झल्लाते हुए कहा।
"यह ड्रामा नहीं है विहान, यह मेरा फैसला है," सुरभि ने अपनी आँखें विहान की आँखों में डालते हुए कहा। "मैंने पिछले पाँच सालों में तुम्हारी हर बात मानी, खुद को तुम्हारे हिसाब से ढाला। लेकिन तुमने मुझे कभी एक इंसान नहीं समझा। तुमने हर रोज़, हर पल, मेरी पसंद, मेरी मेहनत, मेरी सोच... सबको छोटा साबित करने की कोशिश की। तुमने मुझे मारा नहीं, लेकिन तुमने मेरे आत्मविश्वास की रोज़ हत्या की है। मुझे लगा था कि शायद मेरे और झुकने से यह रिश्ता संवर जाएगा, लेकिन तुम्हारे अहंकार की कोई सीमा नहीं है।"
विहान अब थोड़ा घबरा गया था। उसने बात संभालने की कोशिश की, "तुम बात का बतंगड़ बना रही हो सुरभि। मैंने कल रात तुम्हारे उस छोटे से चेक के लिए कुछ कह दिया, तो तुम घर छोड़कर जाओगी? बाहर की दुनिया देखी है तुमने? मेरे बिना तुम्हारा क्या वजूद है?"
सुरभि के होंठों पर एक बहुत ही स्वतंत्र और गर्व से भरी मुस्कान आ गई। "यही तो बात है विहान। तुम आज भी मुझे छोटा ही दिखा रहे हो। मेरा वजूद वो पंद्रह हज़ार रुपये नहीं हैं, मेरा वजूद मेरी वो आत्मा है जिसे तुमने कुचलने की कोशिश की। मैं अब और छोटी नहीं होना चाहती। मेरी आत्मा मेरी है, और मैं उसे अब तुम्हारे हवाले नहीं कर सकती।"
सुरभि ने अपना सूटकेस उठाया, जो उसने रात में ही पैक कर लिया था। कांता जी हॉल में हैरान खड़ी थीं, लेकिन सुरभि ने आज किसी की नहीं सुनी। जब उसने उस घर की दहलीज पार की, तो बाहर की हवा उसे सालों बाद इतनी ताज़ा और हल्की लगी। उसके पास बैंक में करोड़ों रुपये नहीं थे, लेकिन उसके पास वो दौलत थी जो उसने इस घर में खो दी थी—उसका आत्मसम्मान।
क्या सुरभि का यह कदम सही था? क्या मानसिक प्रताड़ना, शारीरिक प्रताड़ना से कम होती है? क्या एक औरत को अपने सम्मान के लिए ऐसे रिश्ते से बाहर निकल आना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।
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