शरद ऋतु की हल्की ठंडक के बीच घर में शहनाइयों की गूंज और गेंदे के फूलों की महक छाई हुई थी। घर की लाडली, शिखा की शादी में अब बस कुछ ही दिन बचे थे। पूरे घर में उथल-पुथल मची थी। शिखा की माँ, विमला जी के माथे पर हमेशा चिंता की लकीरें खिंची रहती थीं। हलवाई ने सामान की लिस्ट नहीं दी, टेंट वाले ने पर्दों का रंग गलत लगा दिया, मेहमानों के कमरे अभी तक साफ नहीं हुए—ऐसी तमाम बातें वो दिन भर रटती रहती थीं और परेशान होती थीं।
ऐसे समय में घर की बड़ी बहू, अंजलि ने बिना कुछ कहे घर की पूरी बागडोर अपने हाथों में ले ली। अंजलि सुबह पाँच बजे उठकर सबसे पहले चाय-नाश्ते का इंतजाम देखती, फिर शिखा के साथ बाज़ार जाकर उसकी शॉपिंग करवाती, दर्जी के चक्कर काटती और घर लौटकर रिश्तेदारों के लिए बिस्तर और खाने की व्यवस्था में जुट जाती। रात के बारह कब बज जाते, उसे खुद पता नहीं चलता था। उसके पैरों में दर्द से हूक उठती थी, आँखों के नीचे काले घेरे साफ नज़र आने लगे थे, लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान कभी कम नहीं हुई। अंजलि के लिए शिखा सिर्फ एक ननद नहीं, बल्कि सगी छोटी बहन जैसी थी। उसने अपने ही मायके की तरह इस शादी को दिल से अपना लिया था।
जैसे-जैसे शादी का दिन करीब आया, घर मेहमानों और रिश्तेदारों से भर गया। बुआ जी, मौसी जी और दूर-दराज के मामा-मामी सब आ चुके थे। अंजलि एक पल के लिए भी चैन से नहीं बैठ रही थी। किसी को नहाने के लिए गर्म पानी चाहिए, किसी को सुबह की कड़क चाय, तो किसी को बाजार से कुछ मंगवाना है—सबके होंठों पर बस एक ही नाम था, "अंजलि"।
एक दोपहर, जब हॉल में सब रिश्तेदार बैठकर मेहंदी की रस्म का इंतज़ार कर रहे थे, तब बड़ी बुआ जी ने विमला जी से कहा, "विमला, तू तो सच में बहुत किस्मत वाली है। अंजलि जैसी बहू पाई है तूने। देखो बेचारी कैसे चकरी की तरह पूरे घर में घूम रही है। शादी का आधा से ज्यादा बोझ तो इस अकेली लड़की ने अपने कंधों पर उठा रखा है। हमने तो यहाँ आकर एक गिलास पानी के लिए भी खुद को कष्ट नहीं दिया, अंजलि ने सब इतनी अच्छी तरह संभाल लिया है।"
पास ही बैठी मौसी जी ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, "बिल्कुल सही कह रही हो दीदी, आजकल ऐसी बहुएं कहाँ मिलती हैं जो ननद की शादी में नौकरों की तरह खटें। यह तो सच में तारीफ के काबिल है।"
विमला जी को अपनी बहू की यह तारीफ कुछ रास नहीं आई। उन्हें लगा कि कहीं अंजलि के सिर पर इस तारीफ का खुमार न चढ़ जाए और वह काम करना कम न कर दे। उन्होंने तुरंत नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहा, "अरे बुआ जी, इसमें इसने इतना क्या अनोखा काम कर दिया? ये तो हर बहू का फ़र्ज़ होता है। घर में शादी है तो काम तो करना ही पड़ेगा न। मेरे समय में तो हम पूरी-पूरी रात जागकर चक्कियां पीसते थे और सुबह उठकर खाना बनाते थे, तब किसी ने हमारी इतनी तारीफ नहीं की। आप लोग बेकार ही इसे चने के झाड़ पर मत चढ़ाओ, कुछ खास नहीं कर दिया है इसने।"
रसोई के दरवाजे के पास खड़ी अंजलि ट्रे में शरबत के गिलास सजा रही थी। विमला जी के ये शब्द उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। उसका गला रुंध गया और आँखों में आंसू आ गए। जिस घर को वह अपना मानकर, अपनी नींद और चैन भूलकर काम कर रही थी, वहाँ उसकी अथक मेहनत का मोल सिर्फ एक 'फ़र्ज़' बताकर चुका दिया गया। उसने एक गहरी सांस ली, अपने आंसुओं को पलकों के पीछे ही सोख लिया और चेहरे पर एक झूठी मुस्कान सजाकर शरबत लेकर बाहर आ गई। उसने किसी से कोई शिकायत नहीं की, क्योंकि वह घर की खुशियों में कोई खलल नहीं डालना चाहती थी।
आखिरकार वो दिन भी आ गया जब शिखा लाल जोड़े में सजी मंडप में बैठी थी। शादी की सारी रस्में बहुत ही खूबसूरती से पूरी हुईं। हर तरफ व्यवस्था और खाने की तारीफ हो रही थी, और विमला जी गर्व से सबका अभिवादन स्वीकार कर रही थीं।
अगली सुबह विदाई का समय आ गया। पूरे घर का माहौल गमगीन था। विमला जी फूट-फूट कर रो रही थीं। शिखा सबसे गले मिल रही थी। पिता और भाई के गले लगने के बाद शिखा अंजलि के पास आई। अंजलि ने अपनी ननद को कसकर गले लगा लिया और उसे हमेशा खुश रहने का आशीर्वाद दिया। तभी शिखा ने अंजलि के कंधे से अपना सिर उठाया और अपनी माँ की तरफ देखकर भारी, लेकिन स्पष्ट आवाज़ में बोली, "मम्मी, आपने मुझे हमेशा एक राजकुमारी की तरह रखा। लेकिन आज यहाँ से जाते-जाते मैं आपको एक सच बताना चाहती हूँ। आप हमेशा कहती हैं न कि भाभी ने जो किया वो बस उनका फ़र्ज़ था? नहीं मम्मी, कोई भी फ़र्ज़ रातों की नींद खराब करके, भूखे पेट रहकर और दूसरों के तानें सुनकर नहीं निभाया जाता। भाभी ने जो किया है, वो फ़र्ज़ नहीं, उनका मेरे लिए और इस परिवार के लिए निस्वार्थ प्यार था।"
शिखा ने विमला जी का हाथ पकड़ा और उसे अंजलि के हाथ में देते हुए आगे कहा, "मेरी शादी इतनी शानदार इसलिए हुई क्योंकि भाभी ने अपनी खुशियां और आराम भूलकर मेरी खुशियों का ध्यान रखा। आज आपकी एक बेटी इस घर से हमेशा के लिए जा रही है, लेकिन प्लीज... अपनी इस दूसरी बेटी को पहचान लीजिए। इन्हें सिर्फ काम करने वाली बहू मत समझिए मम्मी।"
विमला जी स्तब्ध रह गईं। उन्होंने पहली बार अंजलि के थके हुए चेहरे, उसकी सूजी हुई लाल आँखों और उसके भीतर के उस खालीपन को गहराई से महसूस किया, जिसे वो 'फ़र्ज़' के नाम पर लगातार नज़रअंदाज़ करती आ रही थीं।
शिखा की विदाई के बाद जब घर में सन्नाटा पसरा था, विमला जी धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई रसोई में गईं। अंजलि वहां अकेली खड़े होकर जूठे बर्तन समेटने में लगी थी।
विमला जी ने धीरे से आगे बढ़कर अंजलि के हाथ से बर्तन ले लिए। अंजलि ने चौंककर देखा। विमला जी की आँखों में आंसू थे। उन्होंने अंजलि का माथा चूमते हुए रुंधे गले से कहा, "बहुत थक गई है न मेरी बच्ची? जा, जाकर सो जा। आज से इस घर का कोई काम तेरा 'फ़र्ज़' नहीं है, बल्कि इस घर पर और मुझ पर तेरा एक बेटी का 'हक' है। मुझे माफ़ कर दे बेटा।"
अंजलि के सालों से रुके हुए आंसू आज बह निकले, लेकिन आज वो दर्द के नहीं, बल्कि उस सुकून के आंसू थे जो एक बेटी को अपनी माँ के गले लगकर मिलते हैं। उस दिन उस घर में एक ननद तो विदा हो गई, लेकिन एक बहू को हमेशा के लिए उसका असली घर मिल गया।
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