रात के करीब दो बज रहे थे। बाहर आसमान से बरसती तेज बारिश की बूंदें हवेली के कांच की खिड़कियों पर ऐसे टकरा रही थीं मानो कोई अंदर आने की जिद कर रहा हो। लेकिन हवेली के अंदर का तूफान उस बाहरी बारिश से कहीं ज्यादा खौफनाक था। कांच के गिलास के फर्श पर गिरकर चकनाचूर होने की जोरदार आवाज ने पूरे सन्नाटे को चीर कर रख दिया। सुमेधा अपने कांपते हाथों से उस बिखरे हुए कांच को समेटने की कोशिश कर रही थी, जबकि सामने सोफे पर उसका पति, विक्रम, शराब के नशे में धुत, अपनी लाल हो चुकी आंखों से उसे घूर रहा था।
विक्रम लड़खड़ाती जुबान लेकिन तीखी नफरत के साथ चिल्लाया, "छोड़ दो इस कांच को! तुम्हारी जिंदगी भी तो इसी कांच की तरह है, जिसका कोई मोल नहीं। आज तुम मुझे मत रोकना सुमेधा, क्योंकि आज मैं जश्न मना रहा हूं। मैं उस चीज का जश्न मना रहा हूं जो तुम मुझे पिछले सात सालों में नहीं दे पाई। मैं बाप बनने वाला हूं! हां, तुमने सही सुना। विशाखा मेरे बच्चे को जन्म देने वाली है। उसने मुझे वह खुशी दी है जिसके लिए मैं तरस गया था।"
सुमेधा के हाथ वहीं रुक गए। कांच का एक नुकीला टुकड़ा उसकी उंगली में चुभ गया था और वहां से खून की एक पतली धार रिसने लगी थी, लेकिन उसे वह दर्द महसूस ही नहीं हुआ। विक्रम की बातें किसी गर्म सीसे की तरह उसके कानों में उतर रही थीं। वह चुपचाप उठी और विक्रम की ओर देखा। उसकी आंखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसा सूनापन था जो किसी इंसान के अंदर से पूरी तरह टूट जाने के बाद आता है।
विक्रम का गुरूर अभी शांत नहीं हुआ था। उसने सोफे से उठने की कोशिश की और लड़खड़ाते हुए सुमेधा के करीब आकर बोला, "तुम सोचती होगी कि अगर विशाखा मेरे बच्चे की मां बनने वाली है, तो मैं तुम्हें इस घर से निकाल क्यों नहीं देता? सच कहूं तो मेरा बस चले तो मैं तुम्हें अभी धक्के मारकर बाहर फेंक दूं। लेकिन क्या करूं, मेरे उस महान बाप ने मरने से पहले मेरे साथ खेल कर दिया। पूरी की पूरी जायदाद, ये पुश्तैनी हवेली, फैक्ट्रियों का सारा कंट्रोल तुम्हारे नाम कर गए। मेरे खुद के कारोबार को चलाने के लिए, बैंक से एक रुपया निकालने के लिए भी मुझे तुम्हारे हस्ताक्षरों की मोहताज होना पड़ता है। वरना तुम्हारी जैसी बांझ और अपशकुनी औरत की इस घर में जगह ही क्या है? तुम तो बस मेरे साथ सोसाइटी की पार्टियों में तस्वीरें खिंचवाने के काम आती हो, ताकि दुनिया को लगे कि विक्रम सिंह का परिवार बहुत संस्कारी है। बस, इससे ज्यादा तुम्हारी कोई हैसियत नहीं है मेरी नजर में।"
ये कहकर विक्रम वहीं सोफे पर गिर पड़ा और कुछ ही पलों में नशे के कारण गहरी नींद में सो गया। सुमेधा वहीं फर्श पर बैठ गई। आज तक उसने विक्रम की हर बदतमीजी, हर ताने को सिर झुकाकर सहा था। जब भी विक्रम उसे उसके मां न बन पाने का ताना देता, वह खुद को कोसने लगती थी। उसे लगता था कि शायद सच में उसी में कोई कमी है। अस्पताल के चक्कर, दर्दनाक मेडिकल टेस्ट, मंदिरों की मन्नतें—सब कुछ तो किया था उसने। लेकिन आज विक्रम ने जो कहा, उसने सुमेधा के मन में जमे हुए सारे आंसुओं को सुखा दिया था।
उसे अपने ससुर, स्वर्गीय ठाकुर रणविजय सिंह की याद आई। बाबूजी एक बेहद पारखी इंसान थे। वह जानते थे कि उनका इकलौता बेटा विक्रम एक गैर-जिम्मेदार, घमंडी और अय्याश इंसान है। जब बाबूजी को पता चला कि उन्हें कैंसर है और उनके पास ज्यादा वक्त नहीं है, तो उन्होंने सुमेधा को अपने कमरे में बुलाया था। उन्होंने कहा था, "बेटी, मैं जा रहा हूं, लेकिन मैं तुम्हें इस भेड़िये के भरोसे नहीं छोड़ सकता। मुझे पता है कि वह तुम्हें तुम्हारी इस कमी के लिए जिंदगी भर ताने मारेगा। इसलिए मैं अपनी सारी जायदाद और बिजनेस की पावर ऑफ अटॉर्नी तुम्हारे नाम कर रहा हूं। ये दौलत तुम्हारा हथियार है सुमेधा। जिस दिन ये लड़का अपनी हद पार कर दे, उस दिन इस हथियार का इस्तेमाल करने से हिचकिचाना मत।"
सुमेधा ने पिछले तीन सालों से उस पावर ऑफ अटॉर्नी का कभी कोई गलत फायदा नहीं उठाया था। वह चुपचाप विक्रम की लाई हुई हर फाइल पर दस्तखत कर देती थी, इस उम्मीद में कि शायद एक दिन विक्रम को उसकी वफादारी का अहसास होगा। लेकिन आज रात विक्रम ने उस उम्मीद की चिता जला दी थी। उसने न सिर्फ उसे धोखा दिया था, बल्कि एक दूसरी औरत को अपनी जिंदगी में लाकर सुमेधा के अस्तित्व को ही नकार दिया था।
सुबह की किरणें जब हवेली में दाखिल हुईं, तो सुमेधा के चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। यह वह सुमेधा नहीं थी जो रात को कांच समेटते हुए कांप रही थी। यह रणविजय ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज की मालकिन सुमेधा सिंह थी। उसने सुबह सात बजे ही अपने वकील, मिस्टर माथुर को हवेली बुला लिया था। कुछ ही घंटों में कई कानूनी कागजात तैयार किए गए।
दस बजे जब विक्रम की आंख खुली, तो उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था। वह मुंह धोकर डाइनिंग टेबल पर आया और जोर से चिल्लाया, "मेरा नाश्ता कहां है?" लेकिन वहां कोई नौकर नहीं था। डाइनिंग टेबल के सिरे पर सुमेधा बैठी थी। उसने एक शानदार सिल्क की साड़ी पहन रखी थी और उसका आत्मविश्वास देखने लायक था। उसके बगल में मिस्टर माथुर और दो सिक्योरिटी गार्ड खड़े थे।
विक्रम ने कुछ झिझकते हुए पूछा, "ये सब क्या हो रहा है सुबह-सुबह? ये वकील यहां क्या कर रहा है?"
सुमेधा ने बिना अपनी आवाज ऊंची किए, बेहद शांत और ठंडे लहजे में कहा, "बैठ जाओ विक्रम। आज कुछ जरूरी बातें तय करनी हैं।" उसने एक फाइल विक्रम की तरफ खिसका दी। "ये तुम्हारे सारे क्रेडिट कार्ड्स और बैंक अकाउंट्स के फ्रीज होने के पेपर्स हैं। आज से कंपनी के किसी भी खाते से तुम एक भी पैसा नहीं निकाल सकते। और हां, जिस विला में तुमने अपनी उस विशाखा को रखा है, उसका रेंट एग्रीमेंट कंपनी के नाम पर था, जिसे मैंने आज सुबह ही कैंसिल कर दिया है।"
विक्रम की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसका नशा मिनटों में उतर गया। वह गुस्से से अपनी कुर्सी से उठा और चिल्लाया, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुम भूल रही हो कि मैं कौन हूं! वो मेरे बाप का पैसा है!"
सुमेधा अपनी जगह से उठी। उसकी आंखों में अब कोई डर नहीं था। "तुम्हारे बाबूजी का पैसा था विक्रम, जिसे उन्होंने अपनी 'बेटी' के नाम किया था। तुमने कल रात कहा था ना कि तुम मुझे धक्के मारकर इस घर से निकाल देते अगर प्रॉपर्टी मेरे नाम ना होती? तो सुनो विक्रम, अब वो वक्त आ गया है। जिस जायदाद के लालच में तुमने मुझे इस घर में एक सजावट के सामान की तरह रखा था, उसी जायदाद की मालकिन की हैसियत से मैं तुम्हें आज इस हवेली से बाहर निकाल रही हूं।"
विक्रम ने आगे बढ़कर सुमेधा का हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन दोनों गार्ड्स ने उसे तुरंत पीछे धकेल दिया। विक्रम अब घबराने लगा था। उसे लगा था कि सुमेधा हमेशा की तरह रोएगी, गिड़गिड़ाएगी और वह उसे ब्लैकमेल करके फिर से सब कुछ अपने कंट्रोल में ले लेगा।
"तुम ऐसा नहीं कर सकती सुमेधा! तुम एक बांझ औरत हो, तुम्हारे पास पैसे का क्या काम? मेरा वारिस तो विशाखा के पास पल रहा है," विक्रम ने अपनी आखिरी चाल चलते हुए कहा।
सुमेधा मुस्कुराई, पर उस मुस्कान में केवल दया थी। "वारिस खून से नहीं, परवरिश और संस्कारों से बनते हैं विक्रम। और रही बात मेरे बांझ होने की, तो आज मुझे इस बात का गुरूर है कि मुझमें तुम्हारे जैसा गंदा और धोखेबाज खून नहीं पल रहा है। तुमने मुझे औरत होने का जो ताना दिया है, आज वही औरत तुम्हें तुम्हारी असली औकात दिखा रही है। तुम आजाद हो विक्रम। जाओ अपनी विशाखा के पास। लेकिन एक बात याद रखना, अब तुम सड़क पर हो। तुम्हारे पास न दौलत है, न छत।"
गार्ड्स ने विक्रम का कॉलर पकड़ा और उसे हवेली के बड़े से लोहे के दरवाजे के बाहर फेंक दिया। विक्रम ने बहुत मिन्नतें कीं, दरवाजे पीटे, लेकिन हवेली के दरवाजे हमेशा के लिए उसके लिए बंद हो चुके थे।
कुछ ही हफ्तों में सच्चाई सबके सामने आ गई। जब विशाखा को पता चला कि विक्रम को जायदाद से बेदखल कर दिया गया है और अब वह एक कौड़ी का मोहताज है, तो उसने भी अपना असली रंग दिखा दिया। उसने विक्रम का साथ छोड़ दिया और किसी दूसरे अमीर आदमी के साथ चली गई। विक्रम दर-दर की ठोकरें खाने लगा। उसका सारा गुरूर, उसकी सारी हेकड़ी उस दौलत के साथ ही छिन गई थी जिसे वह अपनी समझता था।
इधर, सुमेधा ने अपनी जिंदगी को एक नया मोड़ दिया। उसने बाबूजी के बिजनेस को संभाला और अपनी मेहनत से उसे नई ऊंचाइयों पर ले गई। उसने अपने अतीत के सारे दर्द को अपनी ताकत बना लिया था। एक साल बाद, सुमेधा ने शहर के एक बड़े अनाथालय से एक छोटी सी बच्ची को गोद लिया और उसका नाम 'आकांक्षा' रखा।
सुमेधा ने समाज को यह साबित कर दिया था कि एक औरत का अस्तित्व केवल एक बच्चे को जन्म देने तक सीमित नहीं है। मातृत्व का अर्थ केवल कोख से नहीं, बल्कि दिल से होता है। आज सुमेधा के पास दौलत, सम्मान और एक प्यारी सी बेटी थी, जबकि विक्रम अपने कर्मों की सजा काटते हुए गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो गया था। सुमेधा अब किसी की परछाई नहीं, बल्कि खुद एक रौशनी बन चुकी थी।
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