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यादों की अलमारी

 समीर अपने ससुर जी, रामकिशोर जी के घर के आंगन में उदास बैठा था। रामकिशोर जी का देहांत कुछ दिन पहले ही हुआ था और पूरा परिवार शोक में था। रामकिशोर जी एक सख्त मिज़ाज और अनुशासित व्यक्ति थे। उनके तीन बेटे थे और समीर उनका इकलौता दामाद था। अपनी पत्नी, अंजलि से वह हमेशा उनके पिता की सख्ती की कहानियां सुना करता था।

समीर को रामकिशोर जी से हमेशा थोड़ा डर लगता था। वे हमेशा गंभीर रहते थे और कभी खुलकर किसी की तारीफ नहीं करते थे। समीर को लगता था कि उनके ससुर जी उसे पसंद नहीं करते। वह जब भी उनके घर आता, तो उनके सामने कम ही जाता था।

"समीर जी, पिताजी की अलमारी से उनका कुछ ज़रूरी सामान निकालना है। आप मेरी मदद करेंगे?" बड़े साले, राहुल ने समीर से पूछा।

समीर ने सहमति में सिर हिलाया और दोनों रामकिशोर जी के कमरे में गए। कमरे में अभी भी उनकी एक खास खुशबू थी। राहुल ने चाबी से अलमारी खोली। अलमारी बहुत ही करीने से सजी हुई थी। एक तरफ उनके कपड़े, दूसरी तरफ कुछ फाइलें और सबसे नीचे एक छोटी सी लाल रंग की डायरी रखी थी।

"यह डायरी..." राहुल ने डायरी उठाते हुए कहा, "पिताजी हमेशा इसमें कुछ लिखते रहते थे। कभी किसी को पढ़ने नहीं दी।"

समीर की आंखों में भी डायरी को देखकर उत्सुकता जाग उठी। उसने डायरी राहुल के हाथ से ले ली और उसे खोला। डायरी के पन्नों पर रामकिशोर जी की खूबसूरत लिखावट में उनके रोज़मर्रा के जीवन के बारे में लिखा था। समीर पन्ने पलटता गया।

कुछ पन्ने पलटने के बाद, समीर की नज़र एक खास तारीख पर पड़ी - उसके और अंजलि की शादी का दिन। रामकिशोर जी ने लिखा था, "आज मेरी बिटिया की शादी है। समीर एक अच्छा लड़का है। मुझे विश्वास है कि वह अंजलि को हमेशा खुश रखेगा। मेरे दामाद में वो सारी खूबियां हैं जो मैं अपने बेटों में देखना चाहता था। वह शांत है, समझदार है और सबसे बड़ी बात, वह मेरी बेटी से बहुत प्यार करता है।"

समीर की आंखों में आंसू आ गए। उसने कभी नहीं सोचा था कि रामकिशोर जी उसके बारे में ऐसी सोच रखते थे। उसने आगे पढ़ना शुरू किया।

एक और पन्ने पर लिखा था, "समीर का प्रमोशन हुआ है। मुझे बहुत खुशी हुई। मैंने उसे फोन करके बधाई देना चाहा, लेकिन फिर सोचा कि वह सोचेगा कि मैं दिखावा कर रहा हूं। मैं उसे अपनी खुशी कैसे बयां करूं, मुझे नहीं पता। लेकिन मुझे उस पर बहुत गर्व है।"

डायरी के पन्नों में रामकिशोर जी का एक अलग ही रूप सामने आ रहा था - एक ऐसा पिता और ससुर जो अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाता था, लेकिन अपने बच्चों और दामाद से बहुत प्यार करता था। उनके सख्त बाहरी रूप के पीछे एक कोमल दिल था, जो अपने परिवार के लिए हमेशा चिंतित रहता था।

समीर को अपनी ही सोच पर पछतावा होने लगा। उसने हमेशा रामकिशोर जी को गलत समझा था। उसने कभी उनके दिल में झांकने की कोशिश ही नहीं की थी।

"क्या हुआ समीर जी?" राहुल ने समीर को रोते हुए देखकर पूछा।

समीर ने डायरी राहुल को दे दी। राहुल ने भी डायरी पढ़ी और उसकी आंखें भी छलक आईं। "पिताजी... हमने आपको कभी नहीं समझा।" राहुल ने रुंधे गले से कहा।

दोनों ने मिलकर डायरी के बाकी पन्ने पढ़े। डायरी में रामकिशोर जी ने अपनी खुशियों, अपने दुखों, अपने सपनों और अपने डर के बारे में लिखा था। उन्होंने अपने बच्चों की छोटी-छोटी सफलताओं पर अपनी खुशी व्यक्त की थी और अपनी कमियों के लिए खुद को कोसा था।

उस दिन समीर को एक बहुत बड़ी सीख मिली। इंसान का बाहरी रूप हमेशा उसका असली रूप नहीं होता। किसी के बारे में राय बनाने से पहले उसके दिल में झांकना बहुत ज़रूरी है।

अंजलि जब कमरे में आई तो उसने देखा कि समीर और राहुल डायरी लेकर रो रहे हैं। उसने उनसे पूछा कि क्या हुआ। समीर ने उसे डायरी के बारे में बताया और रामकिशोर जी की भावनाएं उसके सामने रखीं। अंजलि भी फूट-फूट कर रोने लगी। उसे इस बात का बहुत दुख था कि उसने अपने पिता को कभी उनके जीते-जी नहीं समझा।

रामकिशोर जी की लाल डायरी ने परिवार के सभी सदस्यों के मन में उनके प्रति प्यार और सम्मान को और गहरा कर दिया। उन्होंने महसूस किया कि वे एक ऐसे व्यक्ति थे जो अपने परिवार के लिए कुछ भी कर सकते थे। उन्होंने अपने जीवन में जो भी कठोर निर्णय लिए थे, वे सभी परिवार की भलाई के लिए ही थे।

समीर ने फैसला किया कि वह रामकिशोर जी की यादों को हमेशा अपने दिल में संजो कर रखेगा और उनके आदर्शों पर चलने की कोशिश करेगा। उसने अंजलि से वादा किया कि वह उनके पिता के प्यार और विश्वास को कभी नहीं तोड़ेगा।

रामकिशोर जी भले ही दुनिया से चले गए थे, लेकिन उनकी लाल डायरी ने उनके परिवार के लिए एक अनमोल खजाना छोड़ दिया था - उनकी यादें, उनका प्यार और उनके आदर्श। इस डायरी ने परिवार को एक-दूसरे के और करीब ला दिया था और उन्हें जीवन का एक नया अर्थ सिखाया था।

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