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रेशमी लिबास में लिपटे खंजर

 रघुनाथ जी अपनी पुरानी और घिसी हुई ऐनक को धोती के पल्लू से पोंछते हुए बार-बार दीवार घड़ी की तरफ देख रहे थे। आज उनके उत्साह का कोई ठिकाना नहीं था। उनके इकलौते बेटे, अनुभव ने दिल्ली के एक बहुत पॉश इलाके में अपना नया चार कमरों का फ्लैट लिया था। आज उसी नए घर की 'गृह-प्रवेश' की पार्टी थी। रघुनाथ जी और उनकी पत्नी मीरा ने इस दिन के लिए न जाने कितने सपने बुने थे। गाँव के उस छोटे से कच्चे-पक्के मकान से निकलकर जब अनुभव दिल्ली पढ़ने गया था, तो रघुनाथ जी ने अपनी पुश्तैनी ज़मीन का आखिरी टुकड़ा भी बेच दिया था। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी एक ही जोड़ी जूते और दो जोड़ी कपड़ों में निकाल दी, ताकि उनके बेटे को कभी यह महसूस न हो कि वह किसी गरीब का बेटा है।

मीरा जी ने एक पुराने बक्से से अपनी शादी की वो रेशमी साड़ी निकाली जिसे उन्होंने सालों से किसी खास मौके के लिए सहेज कर रखा था। रघुनाथ जी ने भी अपना सबसे साफ़ और इकलौता सफेद कुर्ता-पाजामा पहना था। उनके हाथों में एक छोटा सा डिब्बा था, जिसमें चांदी की एक छोटी सी गणेश जी की मूर्ति थी। यह मूर्ति उन्होंने अपनी कई महीनों की पेंशन जोड़कर बेटे के नए घर के लिए खरीदी थी। दोनों पति-पत्नी जब दिल्ली के उस आलीशान अपार्टमेंट के नीचे पहुंचे, तो उस गगनचुंबी इमारत को देखकर उनकी आँखें फटी रह गईं। लिफ्ट से होते हुए जब वे बारहवीं मंज़िल पर अनुभव के फ्लैट के बाहर पहुंचे, तो वहाँ की सजावट और चकाचौंध देखकर उन्हें लगा जैसे वे किसी स्वर्ग में आ गए हों।

दरवाज़ा अनुभव की पत्नी, सृष्टि ने खोला। सृष्टि हमेशा से ही आधुनिक ख्यालों की रही थी और उसे अपने सास-ससुर का गंवई रहन-सहन कभी पसंद नहीं आया। उसने एक फीकी सी मुस्कान दी और उन्हें अंदर बुला लिया। घर में पैर रखते ही रघुनाथ जी ने देखा कि अनुभव के बहुत सारे कॉर्पोरेट दोस्त, विदेशी क्लाइंट्स और हाई-सोसाइटी के लोग वहाँ मौजूद थे। हर कोई महंगे सूट और डिज़ाइनर ड्रेसेज़ में था। वेटर ट्रे में महंगे ड्रिंक्स और स्नैक्स सर्व कर रहे थे।

अनुभव अपने बॉस के साथ खड़ा हंस-हंस कर बातें कर रहा था। जैसे ही उसकी नज़र अपने माता-पिता पर पड़ी, उसके चेहरे का रंग हल्का सा उड़ गया। उसे उम्मीद नहीं थी कि वे सच में इतनी साधारण वेशभूषा में आ जाएंगे। उसने तेज़ कदमों से आकर उनके पैर तो छुए, लेकिन उसकी नज़रों में खुशी से ज़्यादा एक अजीब सी घबराहट थी।

"पापा, आप लोग आ गए। चलिए अंदर वाले कमरे में बैठिए, यहाँ बहुत भीड़ है," अनुभव ने उन्हें ड्राइंग रूम से हटाकर एक छोटे से गेस्ट रूम की तरफ धकेलने की कोशिश की।

मीरा जी ने भोलेपन से कहा, "अरे बेटा, हमें भी तो देखने दे तेरा ये महल। और तेरे इतने सारे दोस्त आए हैं, उनसे मिलवाएगा नहीं?"

अनुभव ने झुंझलाते हुए कहा, "माँ, आप लोग यहाँ बोर हो जाएंगे। ये सब मेरे ऑफिस के लोग हैं। आप लोग बस अंदर आराम कीजिए।"

रघुनाथ जी ने अनुभव की इस हड़बड़ाहट को महसूस किया, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। वे दोनों चुपचाप उस गेस्ट रूम में जाकर बैठ गए। बाहर पार्टी का शोरगुल बढ़ता जा रहा था। कुछ देर बाद, रघुनाथ जी को प्यास लगी। वे पानी लेने के लिए कमरे से बाहर निकले। डाइनिंग एरिया के पास अनुभव अपने बॉस और कुछ ख़ास दोस्तों के साथ खड़ा था। रघुनाथ जी पानी का ग्लास लेकर मुड़ ही रहे थे कि अनुभव के बॉस की नज़र उन पर पड़ गई।

"हे अनुभव, ये बुज़ुर्ग कौन हैं? मुझे लगा कैटरिंग वाले स्टाफ में से कोई है," बॉस ने अंग्रेजी में एक हल्का सा मज़ाक करते हुए पूछा।

अनुभव का चेहरा शर्म से लाल हो गया। वह कुछ पल के लिए हड़बड़ा गया। उसे समझ नहीं आया कि वह अपने हाई-प्रोफाइल बॉस को कैसे बताए कि ये सीधे-साधे, पुराने कपड़ों वाले व्यक्ति उसके पिता हैं। उसने नज़रे चुराते हुए, दबी हुई आवाज़ में कहा, "ओह.. वो.. वो मेरे गाँव से आए हुए एक दूर के रिश्तेदार हैं। बस ऐसे ही आ गए थे।"

यह वाक्य रघुनाथ जी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरा। उनके कदम वहीं जम गए। जिस बेटे को उन्होंने अपने कंधों पर बिठाकर दुनिया दिखाई थी, आज वह भरी महफ़िल में उन्हें अपना पिता कहने में शर्मिंदगी महसूस कर रहा था। रघुनाथ जी का दिल किसी कांच के बर्तन की तरह चकनाचूर हो गया था। वे चुपचाप अपने कमरे में लौट आए।

मीरा जी ने उनका उतरा हुआ चेहरा देखा तो घबरा गईं। "क्या हुआ जी? तबीयत तो ठीक है?"

रघुनाथ जी ने बस इतना कहा, "कुछ नहीं मीरा, बस थोड़ी थकान है।"

लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। रात को जब पार्टी ख़त्म होने को आई और मेहमान जाने लगे, तब अनुभव कमरे में आया। उसके चेहरे पर अभी भी गुस्सा था। उसने दरवाज़ा बंद किया और रघुनाथ जी की तरफ मुड़कर तीखे स्वर में बोला, "पापा, आपको समझ नहीं आता क्या? आपको बाहर निकलने की क्या ज़रूरत थी? आपने देखा मेरे बॉस मुझे कैसे देख रहे थे? मेरी पूरी इमेज खराब कर दी आपने। आप लोग मेरे लिए कभी कुछ ढंग का तो कर नहीं पाए, कम से कम मेरी बनी-बनाई इज़्ज़त तो मत मिट्टी में मिलाया कीजिए!"

रघुनाथ जी ने अपनी कांपती हुई आँखों से अपने बेटे को देखा। वे शब्द उनके सीने को चीर रहे थे।

"क्या दिया है आपने मुझे? जो भी हूँ अपनी मेहनत से हूँ। और आप यहाँ इस तरह के कपड़े पहनकर आ गए जैसे कोई भिखारी हो! आपको पता है मेरी सोसाइटी के लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?" अनुभव चिल्ला रहा था।

मीरा जी रोने लगीं। "बेटा, तू ये क्या कह रहा है? तेरे पिता ने अपना पेट काटकर तुझे पढ़ाया है। तू आज उनके कपड़ों पर जा रहा है?"

"रहने दीजिए माँ! हर बाप अपने बच्चे को पढ़ाता है, कोई एहसान नहीं किया। लेकिन आज इन्होंने मुझे मेरे ही दोस्तों के सामने जलील कर दिया," कहकर अनुभव झटके से कमरे से बाहर निकल गया।

रघुनाथ जी बुत बनकर बिस्तर पर बैठे रहे। उनकी आँखों से आंसू नहीं गिरे, क्योंकि जब दर्द हद से गुज़र जाता है, तो इंसान रोना भी भूल जाता है। उन्हें वो कहावत याद आ रही थी जो उन्होंने कभी किसी किताब में पढ़ी थी— 'इंसान अपने जीवनकाल में सबसे ज्यादा अपमानित और जलील अपने कुछ ख़ास अतिप्रिय लोगों द्वारा ही होता है।' आज वह कहावत उनके जीवन का सबसे कड़वा सच बन गई थी। जिस समाज, जिस दुनिया से लड़कर उन्होंने अपने बेटे को काबिल बनाया था, आज उसी बेटे ने उनके वजूद को एक पल में नकार दिया था।

रात के दो बज रहे थे। घर में सन्नाटा पसरा था। रघुनाथ जी उठे, उन्होंने अपना वो पुराना झोला उठाया और मीरा जी से कहा, "मीरा, चल यहाँ से। जिस घर में हमारे प्यार और त्याग की कीमत हमारे फटे कपड़ों से तय होती हो, वो घर हमारा नहीं हो सकता।"

मीरा जी ने बिना कुछ कहे अपना सामान समेट लिया। रघुनाथ जी ने वो चांदी के गणेश जी की मूर्ति और अपनी बची हुई पेंशन के कुछ रुपए एक लिफाफे में डालकर टेबल पर रख दिए। उन्होंने एक छोटा सा पर्चा भी पास में रख दिया।

दोनों पति-पत्नी रात के अंधेरे में चुपचाप उस आलीशान घर की देहरी लांघ गए। उन्हें बाहर की ठंडी हवा भी उस घर की एसी की हवा से ज़्यादा सुकून दे रही थी।

अगली सुबह जब अनुभव सोकर उठा और उसने गेस्ट रूम का दरवाज़ा खोला, तो कमरा खाली था। टेबल पर रखे उस लिफाफे और पर्चे को देखकर उसके हाथ कांप गए। पर्चे पर रघुनाथ जी की टेढ़ी-मेढ़ी लिखाई में लिखा था:

"बेटा, हमें माफ करना कि हमारे पुराने कपड़ों ने तुम्हारी नई इज़्ज़त पर दाग लगा दिया। तुमने सच कहा, हमने जो किया वो हमारा फर्ज़ था। ये चांदी के गणेश जी और कुछ पैसे उस 'दूर के रिश्तेदार' की तरफ से तुम्हारे नए घर का शगुन है। खुश रहना, अब ये 'भिखारी' कभी तुम्हारी महफ़िल का तमाशा नहीं बनेंगे।"

अनुभव उस पर्चे को लेकर ज़मीन पर बैठ गया। उसे अचानक अपनी उस गलती का अहसास हुआ जिसकी अब कोई माफ़ी नहीं थी। उसने बाहर भागकर लिफ्ट की तरफ देखा, सड़क पर देखा, लेकिन उसके माता-पिता उस चकाचौंध भरी दुनिया से बहुत दूर जा चुके थे— अपने स्वाभिमान और उस कड़वे सच को सीने से लगाए कि सबसे गहरे घाव हमेशा अपने ही देते हैं।

ज़िंदगी में हम अक्सर कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते हुए उन हाथों को भूल जाते हैं जिन्होंने हमें पहली सीढ़ी चढ़ना सिखाया था। याद रखिए, माता-पिता का पहनावा चाहे पुराना हो, लेकिन उनका त्याग और आशीर्वाद हमेशा अनमोल होता है।

क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में रुतबे और पैसों के अहंकार ने अपनों के बीच की भावनाओं को खत्म कर दिया है? अपने विचार जरूर साझा करें।

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