"बस बहुत हो गया विकास! मैं अब इस धर्मशाला में और नहीं रह सकती!" नेहा ने अपने पति के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा। उसकी आँखों में गुस्सा और थकान साफ झलक रही थी।
विकास ने दरवाज़े की तरफ देखते हुए फुसफुसा कर कहा, "धीरे बोल नेहा, बाहर मम्मी-पापा या भाभी सुन लेंगे तो क्या सोचेंगे?"
"सोचने दो! मुझे क्या? मैं यहाँ शादी करके आई थी या पूरे गाँव का खाना बनाने और कपड़े धोने? सुबह उठो तो नाश्ते की फरमाइशें, दोपहर में दस लोगों का खाना, शाम को फिर वही बर्तन और चाय। मेरे घर में हम सिर्फ़ तीन लोग थे। मैंने तो हमेशा यही सोचा था कि शादी के बाद मेरा अपना एक छोटा सा आशियाना होगा—तुम, मैं और हमारी छोटी सी दुनिया। लेकिन यहाँ तो हर वक़्त किसी न किसी की आवाज़ गूँजती रहती है।"
तभी दरवाज़े पर विकास की माँ, सावित्री देवी आ खड़ी हुईं। उन्होंने सब सुन लिया था। उन्होंने एक ठंडी सांस ली और शांत स्वर में बोलीं, "बेटा विकास, अगर बहू का दम घुट रहा है, तो उसे आज़ादी दे दो। तुम दोनों कल ही अलग फ्लैट में शिफ्ट हो जाओ। मैं तुम्हारा सामान पैक करवा देती हूँ।"
दो दिन के अंदर ही विकास और नेहा अपना सामान लेकर शहर के दूसरे कोने में एक नए अपार्टमेंट में शिफ्ट हो गए। जाते वक़्त घर में एक अजीब सी खामोशी थी। नेहा की जेठानी, शिखा, ने चुपचाप सारा राशन और ज़रूरत का सामान बांध दिया था। नेहा को लगा कि ये सब अंदर ही अंदर खुश हो रहे होंगे कि चलो एक का बोझ कम हुआ।
नए फ्लैट में कदम रखते ही नेहा को लगा जैसे उसे जन्नत मिल गई हो। यहाँ कोई सास टोकने वाली नहीं थी, कोई ससुर सुबह-सुबह अख़बार मांगते हुए आवाज़ नहीं लगा रहा था। जब चाहो उठो, जो चाहो बनाओ। पहले हफ्ते तो सब कुछ किसी सपने जैसा लगा। नेहा ने अपनी मर्ज़ी से घर सजाया, विकास के साथ लेट नाईट मूवीज़ देखीं और वीकेंड पर बाहर खाना खाया।
लेकिन आज़ादी का ये नशा ज़्यादा दिन नहीं टिका। पंद्रह दिन बीतते-बीतते असलियत सामने आने लगी।
एक सुबह नेहा उठी तो देखा कि दूध वाला नहीं आया था। उसने झटपट चाय बनाने के लिए सूखा दूध ढूँढा, तो वो भी ख़त्म था। विकास को ऑफिस जाने में देर हो रही थी। नेहा ने जल्दबाज़ी में नाश्ता बनाना शुरू किया तो गैस का सिलेंडर ख़त्म हो गया। अब दोनों एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे।
"विकास, तुमने सिलेंडर बुक नहीं किया था?"
"नेहा, मुझे क्या पता? घर पर तो पापा ये सब देख लेते थे। मुझे तो पता भी नहीं कि गैस एजेंसी का नंबर क्या है।" विकास झुंझलाते हुए बिना नाश्ता किए ऑफिस चला गया।
नेहा सिर पकड़ कर बैठ गई। उसे याद आया कि कैसे पुराने घर में ससुर जी, रामनाथ जी, महीने की पहली तारीख को ही सारे बिल, गैस, दूध और अख़बार का हिसाब चुकता कर देते थे। किसी चीज़ की कभी कमी महसूस ही नहीं होती थी।
दिन बीतने लगे। नेहा की छह महीने की बेटी, रिया, अब बहुत रोने लगी थी। पहले जब नेहा किचन में होती थी, तो शिखा भाभी या सास रिया को खिला लेती थीं। लेकिन अब रिया हर वक़्त नेहा की गोद में रहती। एक हाथ से बच्ची को संभालना और दूसरे हाथ से सब्ज़ी काटना नेहा के लिए जंग लड़ने जैसा हो गया था।
एक दिन विकास का फोन आया, "नेहा, आज बॉस के साथ एक ज़रूरी मीटिंग है। मैं लंच के लिए घर नहीं आ पाऊंगा। तुम मेरे ऑफिस में टिफिन भिजवा देना।"
नेहा घबरा गई। समय देखा तो 12 बज चुके थे। रिया सो नहीं रही थी और घर में सब्ज़ी के नाम पर सिर्फ दो टमाटर और एक प्याज़ बचा था। पुराने घर में तो ससुर जी सुबह सैर से लौटते वक़्त ताज़ी सब्ज़ियां ले आते थे। अगर कभी कुछ कम पड़ जाता, तो शिखा भाभी दौड़ कर पड़ोस की दुकान से ले आती थीं।
नेहा ने रोते हुए रिया को पालने में डाला और जैसे-तैसे दाल छौंकी। जल्दबाज़ी में दाल में नमक डालना ही भूल गई। जब उसने टिफिन पैक किया, तो उसे अपना वो वक़्त याद आ गया जब सास विकास का टिफिन पैक करती थीं—दो तरह की सब्ज़ी, रायता, घर का बना अचार और एक मीठा। आज नेहा के टिफिन में सिर्फ सूखी दाल और जली हुई रोटियां थीं।
उसी शाम नेहा को बुखार चढ़ गया। शरीर टूट रहा था और रिया लगातार रो रही थी। विकास ऑफिस से लौटा तो घर का हाल देखकर चिढ़ गया।
"ये क्या हाल बना रखा है नेहा? बर्तन सुबह से सिंक में पड़े हैं और बच्ची रो रही है। तुम सारा दिन करती क्या हो?" विकास ने गुस्सा करते हुए कहा।
नेहा फूट-फूट कर रो पड़ी। "मुझे बुखार है विकास! मैं इंसान हूँ, मशीन नहीं!"
विकास ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप बाहर से खाना ले आया। अगले तीन दिन नेहा बिस्तर पर रही। विकास ने कोशिश तो की, लेकिन उससे घर और ऑफिस एक साथ नहीं संभला। नेहा को याद आया कि जब वो पुराने घर में बीमार पड़ती थी, तो कैसे सास उसे अपने कमरे में सुला लेती थीं। शिखा भाभी गरमा-गरम हल्दी वाला दूध लेकर आती थीं और ससुर जी रिया को बाहर पार्क में घूमाने ले जाते थे ताकि नेहा आराम कर सके। वहाँ बीमारी में भी महारानियों जैसी खातिरदारी होती थी। और यहाँ? यहाँ तो उसे बुखार में भी उठकर अपनी बच्ची के डायपर बदलने पड़ रहे थे।
एक दिन नेहा अपनी माँ से फोन पर बात कर रही थी।
"माँ, मुझे लगता था कि मैं वहाँ बहुत काम करती हूँ। लेकिन सच तो ये है कि वहाँ काम बंटा हुआ था। यहाँ तो मुझे बाई से लेकर कुक और आया तक, सब कुछ खुद ही बनना पड़ रहा है। वहाँ मुझे लगता था कि मेरे पास 'प्राइवेसी' नहीं है, लेकिन यहाँ इस अकेलेपन ने मुझे डिप्रेशन में डाल दिया है।"
माँ ने लंबी सांस लेते हुए कहा, "बेटा, मैंने तुझे पहले ही समझाया था। संयुक्त परिवार एक पेड़ की तरह होता है। बाहर से देखने पर लगता है कि वो हमें धूप से रोक रहा है, लेकिन असल में वो हमें तूफानों से बचाता है। वहाँ तेरी सास जो टोकती थीं, वो उनका तजुर्बा था, ताने नहीं। तेरी जेठानी जो काम में हाथ बंटाती थी, वो उसका बड़प्पन था। तूने अपनी आज़ादी के चक्कर में वो छत खो दी जहाँ तुझे कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होता था।"
नेहा की आँखों से आंसू बहने लगे। उसे याद आया कि कैसे शाम को जब विकास और उसके बड़े भाई ऑफिस से लौटते थे, तो पूरा परिवार आँगन में चाय पीता था। बच्चों की किलकारियां, बड़ों के ठहाके और वो गर्माहट... जो इस बंद और शानदार फ्लैट में कहीं नहीं थी।
"माँ, मुझे मेरी गलती समझ आ गई है। वो शोर नहीं, मेरे घर की धड़कन थी। मैं वापस जाना चाहती हूँ।"
उसी शाम जब विकास ऑफिस से लौटा, तो उसने देखा कि नेहा ने सारा सामान पैक कर लिया है।
"ये क्या है नेहा? हम कहीं जा रहे हैं?" विकास ने हैरानी से पूछा।
नेहा ने रिया को सीने से लगाया और मुस्कुराते हुए बोली, "हाँ विकास, हम अपने 'घर' जा रहे हैं। इस मकान में मुझे सांस नहीं आ रही। मुझे मम्मी जी की डांट, पापा जी का अख़बार पढ़ते हुए टोकना और शिखा भाभी की चाय की तलब लग रही है। चलो, वापस चलते हैं।"
विकास की आँखों में आंसू आ गए। उसने नेहा को गले लगा लिया।
अगली सुबह जब विकास और नेहा अपना सामान लेकर पुराने घर के दरवाज़े पर पहुंचे, तो सावित्री देवी दरवाज़े पर ही खड़ी थीं। उन्होंने कुछ नहीं पूछा, बस मुस्कुराकर आगे बढ़ीं और रिया को अपनी गोद में ले लिया। शिखा भाभी ने दौड़कर नेहा के हाथ से बैग लिया और बोलीं, "अच्छा हुआ आ गई! मैं तो तेरे बिना चाय पीने में भी बोर हो रही थी।"
रामनाथ जी ने अख़बार से नज़रें उठाईं और बोले, "बहू, आज नाश्ते में तेरे हाथ के पोहे खाने का मन है।"
नेहा ने अपने ससुर की तरफ देखा, उसकी आँखों से आंसू छलक पड़े। उसने अपना सिर हिलाया और खुशी-खुशी किचन की तरफ बढ़ गई। आज किचन में उसे काम का बोझ नहीं, बल्कि उस आत्मीयता का अहसास हो रहा था जिसे वो 'चकचक' समझ बैठी थी।
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**क्या आपको भी लगता है कि संयुक्त परिवार की वो 'चकचक' आजकल के फ्लैट्स की 'शांति' से कहीं बेहतर थी? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।**
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